भोपाल ब्यूरो
मध्य प्रदेश के 12 जिलों में इस मौसम सामान्य से काफी कम बारिश हुई है, और अब सरकार उन जिलों के किसानों तक सूखा राहत पहुंचाने का रास्ता तलाश रही है — वह भी बिना जिलों को औपचारिक रूप से सूखाग्रस्त घोषित किए। सूखा राहत की इस तैयारी के तहत सभी 12 जिलों से विस्तृत कार्ययोजना मांगी गई है, और राज्य व केंद्र स्तर पर मदद के विकल्पों पर भी काम चल रहा है।
मध्य प्रदेश में इस बार बारिश का गणित कई जिलों में बिगड़ा हुआ है। जिन जिलों में पानी कम बरसा, वहां खरीफ की फसल को नुकसान पहुंचा है और अब रबी की बुवाई को लेकर भी चिंता बनी हुई है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बारिश की कमी के बावजूद इन जिलों को सूखाग्रस्त घोषित करना आसान नहीं है, क्योंकि इसके लिए तय मापदंड पूरे नहीं हो रहे हैं। ऐसे में सरकार वैकल्पिक रास्ता तलाश रही है, ताकि किसानों को सूखा घोषित होने का इंतजार किए बिना मदद मिल सके। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव लगातार किसानों के हित में फैसले लेने की बात कह रहे हैं, और हाल ही में पांढुर्णा में किसानों से संवाद के दौरान भी उन्होंने कृषि और किसान कल्याण को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई थी।
सूखा राहत: किन 12 जिलों में कितनी कम बारिश हुई
प्रदेश के जिन 12 जिलों में बारिश सामान्य से काफी नीचे रही, उनमें अलीराजपुर, उज्जैन, बैतूल, धार, झाबुआ, रतलाम, नर्मदापुरम, हरदा, इंदौर, पांढुर्णा, शाजापुर और छिंदवाड़ा शामिल हैं। इन जिलों में बारिश की कमी एक जैसी नहीं है — कहीं आधी बारिश हुई है तो कहीं कमी एक-चौथाई से एक-तिहाई के बीच है।
सबसे खराब स्थिति अलीराजपुर जिले की है, जहां सामान्य से 51 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। यहां सामान्य औसत से आधी बारिश हुई है, जिससे खेती-किसानी पर सीधा असर पड़ा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के गृह जिले उज्जैन में भी 27 प्रतिशत कम पानी बरसा है, जबकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के गृह जिले बैतूल में 31 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। इनके अलावा धार, झाबुआ, रतलाम, नर्मदापुरम, हरदा, इंदौर, पांढुर्णा, शाजापुर और छिंदवाड़ा भी कम बारिश की मार झेल रहे हैं।
बारिश की यह कमी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। जिन गांवों में पानी कम बरसा, वहां खरीफ की फसल कमजोर हुई और कई जगह बुवाई का रकबा भी प्रभावित हुआ। किसानों के सामने अब दोहरी चिंता है — एक तरफ खरीफ के नुकसान की भरपाई, दूसरी तरफ रबी की तैयारी के लिए पानी और संसाधनों का इंतजाम। यही वजह है कि सरकार इस मसले को सिर्फ बारिश के आंकड़ों से नहीं, बल्कि जमीन पर फसलों की वास्तविक स्थिति से जोड़कर देख रही है।
सूखा घोषित करने में गाइडलाइन की अड़चन क्यों
मध्य प्रदेश के 12 जिलों में सामान्य से काफी कम बारिश होने के बावजूद उन्हें सूखाग्रस्त घोषित करने में केंद्र और राज्य सरकार की गाइडलाइन आड़े आ रही है। बहुत कम पानी गिरने के बावजूद सरकार इन्हें सूखाग्रस्त घोषित करने की स्थिति में नहीं है, और इसकी प्रमुख वजह सूखा आकलन के निर्धारित मापदंड हैं।
सूखा घोषित करने के लिए सिर्फ बारिश की कमी को आधार नहीं बनाया जाता। इसमें बारिश की कमी के साथ बुवाई के रकबे में आई गिरावट और फसलों की वास्तविक स्थिति को भी आधार बनाया जाता है। कृषि उत्पादन पर पड़े असर का आकलन भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। यही वजह है कि इन जिलों में बारिश की भारी कमी के बावजूद सूखा घोषित करने का फैसला फिलहाल मुश्किल बना हुआ है।
इस अड़चन का सीधा असर किसानों पर पड़ता है। अगर इन जिलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया जाता है तो सरकार को किसानों की फसल बर्बादी के लिए अतिरिक्त मुआवजे की व्यवस्था करनी होगी। ऐसे जिलों में किसानों द्वारा फसलों के लिए उठाए गए कर्ज को या तो पूरा माफ करना पड़ेगा या ब्याज की राशि और फसल बीमा के प्रीमियम में पूरी तरह छूट देनी पड़ेगी। यह बड़ा वित्तीय फैसला होगा, और इसी आर्थिक बोझ को देखते हुए सरकार अब वैकल्पिक राहत योजनाओं पर काम कर रही है। कोशिश यह है कि प्रभावित किसानों को किसी न किसी रूप में मदद मिल सके और उन्हें सरकारी सहायता के लिए सूखा घोषित होने का इंतजार न करना पड़े।
दो स्तर पर तैयारी: जिले बनाएंगे कार्ययोजना
सरकार ने राहत की तैयारी दो स्तर पर शुरू की है। पहला, सभी 12 जिलों से कम बारिश के कारण पैदा हुई समस्याओं और उनसे निपटने के लिए जरूरी खर्च का आकलन करते हुए विस्तृत कार्ययोजना मांगी गई है। दूसरा, राज्य और केंद्र स्तर पर ऐसे विकल्प तलाशे जा रहे हैं, जिनसे सूखा घोषित किए बिना भी जिलों को अधिकतम आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
जिला प्रशासन को यह बताना होगा कि कम बारिश से किन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा असर पड़ा है और पेयजल, खेती तथा अन्य जरूरी व्यवस्थाओं के लिए कितनी अतिरिक्त राशि की आवश्यकता होगी। इसके आधार पर राहत के लिए कार्ययोजना तैयार की जा रही है। खासतौर पर पेयजल योजनाओं और प्रभावित क्षेत्रों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त बजट जारी करने पर विचार किया जा सकता है।
यह कार्ययोजना सिर्फ कागजी प्रक्रिया नहीं है। जिलों से मांगा गया ब्योरा ही तय करेगा कि किस जिले को कितनी और किस तरह की मदद चाहिए — कहां पेयजल की व्यवस्था पहले करनी है, कहां सिंचाई के वैकल्पिक इंतजाम चाहिए और कहां किसानों को सीधी आर्थिक सहायता देनी है। सरकार का जोर इस बात पर है कि मदद का फैसला जमीन की हकीकत पर हो, न कि सिर्फ बारिश के आंकड़ों पर।
किसानों की सबसे बड़ी उम्मीद: कर्ज से राहत
इन 12 जिलों के किसानों को सबसे बड़ी उम्मीद कर्ज से राहत मिलने की है, लेकिन सूखा घोषित करने की प्रक्रिया में आ रही बाधाओं ने इस उम्मीद को भी प्रभावित किया है। खरीफ की फसल को नुकसान पहुंचने के बाद कई किसानों के सामने कर्ज की किस्त और अगली फसल की तैयारी का बोझ एक साथ आ गया है।
अगर इन जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया जाता है तो सरकार को किसानों की फसल बर्बादी के लिए अतिरिक्त मुआवजे की व्यवस्था करनी होगी। साथ ही कृषि ऋण की अदायगी में राहत, ब्याज में छूट और फसल बीमा प्रीमियम से जुड़ी सहायता जैसे बड़े वित्तीय फैसले भी लेने पड़ सकते हैं। इसी आर्थिक बोझ और निर्धारित नियमों को देखते हुए सरकार अब वैकल्पिक राहत योजनाओं पर काम कर रही है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पांढुर्णा के किसानों से बातचीत में किसानों के हित में काम करने का संकल्प दोहराया था। सरकार का कहना है कि किसानों की हर जरूरत को पूरा करना उसकी प्राथमिकता है। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर है कि कर्ज माफी के अलावा सरकार इन जिलों के किसानों को किस दूसरे बड़े राहत पैकेज का लाभ देती है। फिलहाल कोई राहत पैकेज घोषित नहीं हुआ है — तैयारी चल रही है और फैसला कार्ययोजनाओं और केंद्र से बातचीत के बाद सामने आएगा।
पेयजल और रबी की चिंता
कम बारिश का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। इन जिलों में पेयजल की व्यवस्था भी दबाव में है, और आने वाले समय में राज्य सरकार औसत से कम बारिश वाले इन 12 जिलों में पीने के पानी से जुड़ी योजनाओं के लिए अलग से अतिरिक्त राशि जारी कर सकती है। जिला कार्ययोजनाओं में पेयजल को खास जगह दी गई है, ताकि गांवों में पानी की किल्लत न हो।

फिलहाल खरीफ फसलों की कटाई और रबी फसलों की बुवाई का दौर चल रहा है। आने वाले दिनों में बुवाई के रकबे और फसलों की वास्तविक स्थिति से तस्वीर और स्पष्ट होगी। अगर बुवाई के रकबे में अन्य वर्षों की तुलना में कोई बड़ा अंतर आता है तो उसे भी सूखा आकलन का आधार बनाया जा सकता है। यही वजह है कि सरकार जल्दबाजी में कोई घोषणा करने के बजाय जमीन की स्थिति का पूरा आकलन कर रही है।
रबी सीजन किसानों के लिए साल का अहम पड़ाव होता है। खरीफ में नुकसान झेल चुके किसानों के लिए रबी की अच्छी फसल ही भरपाई का रास्ता है। इसलिए सिंचाई के पानी, बीज और खाद की उपलब्धता पर भी सरकार की नजर है, ताकि कम बारिश का असर रबी पर कम से कम पड़े।
कैबिनेट से अब तक: 27 अक्टूबर से 7 नवंबर तक
इस मसले पर सरकार की तैयारी अचानक शुरू नहीं हुई है। 27 अक्टूबर 2026 को भोपाल में हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में कम बारिश वाले 12 जिलों की स्थिति पर विस्तृत चर्चा हुई थी। बैठक में इन जिलों में पेयजल और किसानों की जरूरतों पर विशेष ध्यान देने की तैयारी पर चर्चा हुई और सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए विशेष सहायता और आगे की कार्रवाई पर विचार किया गया।
इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पांढुर्णा के किसानों से सीधा संवाद किया और किसानों के हित में फैसले लेने की बात दोहराई। 7 नवंबर तक आते-आते यह साफ हो गया कि सरकार सूखा घोषित करने की औपचारिक प्रक्रिया से अलग, वैकल्पिक राहत के रास्ते पर काम कर रही है। उसी दिन यह भी सामने आया कि सभी 12 जिलों से विस्तृत कार्ययोजना मांगी गई है।
इस बीच केंद्र सरकार भी राज्यों में कम बारिश की स्थिति पर गंभीर है। कई स्तर पर बैठकें हो चुकी हैं और राज्यों से जरूरी आंकड़े मंगाए गए हैं। दिल्ली से मिल रहे संकेतों के मुताबिक केंद्र भी औसत से कम बारिश वाले जिलों और राज्यों के लिए अलग आर्थिक इंतजाम कर सकता है। यह मामला सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है — देश के कई हिस्सों में इस मौसम बारिश सामान्य से कम रही है, और केंद्र सरकार विभिन्न राज्यों में बारिश की स्थिति और उससे पैदा हुए आर्थिक संकट पर नजर बनाए हुए है।
आगे क्या: सूखा राहत की राह और केंद्र की भूमिका
अब आगे की राह दो बातों पर टिकी है। पहली, जिलों की कार्ययोजनाएं कितनी जल्दी और कितनी सटीक आती हैं — क्योंकि उन्हीं के आधार पर राहत का खाका बनेगा। दूसरी, केंद्र सरकार कम बारिश वाले क्षेत्रों के लिए क्या आर्थिक इंतजाम करती है। फिलहाल खरीफ फसलों की कटाई और रबी फसलों की बुवाई का दौर चल रहा है, इसलिए आने वाले दिनों में बुवाई के रकबे और फसलों की वास्तविक स्थिति से तस्वीर और स्पष्ट होगी।
जिलों में राहत कार्यों को गति देने और जरूरतमंद किसानों तक मदद पहुंचाने पर जोर रहेगा। सूखे से प्रभावित किसानों के लिए यह तैयारी कितनी राहत लेकर आती है, यह जिलों की कार्ययोजनाओं और सरकार के फैसलों पर निर्भर करेगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इन 12 जिलों के किसानों को कर्ज माफी के अलावा किसी दूसरे बड़े राहत पैकेज का लाभ देगी या नहीं। इसका जवाब कार्ययोजनाओं के आने और केंद्र से बातचीत के बाद ही मिलेगा। तब तक किसानों की नजर सरकार के हर फैसले पर टिकी है — और सरकार के सामने चुनौती यह है कि मदद सिर्फ घोषणाओं तक सीमित न रहे, बल्कि दीपावली के बाद शुरू हो रहे रबी सीजन से पहले जमीन पर उतरे। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सरकार की योजनाओं की तरह ही इस राहत की असली परीक्षा उसकी जमीनी पहुंच से होगी।
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