ग्वालियर ब्यूरो
सार: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर बेंच ने प्रदेश के लगभग 99,000 शिक्षकों को पुरानी पेंशन योजना का लाभ देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा है कि जिन शिक्षकों की पिछली सेवा को वरिष्ठता और पदोन्नति के लिए मान्यता दी जा चुकी है, उन्हें उसी सेवा के आधार पर पेंशन के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने इन शिक्षकों के राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली खातों में जमा राशि को पुरानी पेंशन योजना में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया है। दीपावली के मौके पर आया यह फैसला हजारों शिक्षक परिवारों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।
क्या है हाईकोर्ट का फैसला
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वर्ष 1998 से 2005 के बीच नियुक्त लगभग 99,000 शिक्षकों को पुरानी पेंशन योजना का लाभ दिया जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत की पीठ ने शिक्षिका करुणा शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया है। अदालत ने साथ ही यह भी आदेश दिया है कि इन शिक्षकों के राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली खातों में जमा पूरी राशि को पुरानी पेंशन योजना में स्थानांतरित किया जाए और उन्हें पुरानी पेंशन योजना के सभी लाभ दिए जाएं।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि जिन शिक्षकों की पिछली सेवा को पहले ही वरिष्ठता और पदोन्नति के लिए मान्यता मिल चुकी है, उन्हें उन्हीं आधारों पर पेंशन के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत का मानना है कि जब प्रशासन शिक्षकों की पुरानी सेवा को उनके करियर में आगे बढ़ने के लिए गिन रहा है, तो वही सेवा पेंशन तय करते समय नजरअंदाज नहीं की जा सकती। यही इस फैसले का सबसे अहम सिद्धांत है और इसी आधार पर अदालत ने सरकार की दलील को खारिज कर दिया।
इस फैसले का असर प्रदेश के लगभग 99,000 शिक्षकों पर पड़ने की उम्मीद है, जबकि राज्य में कुल शिक्षकों की संख्या लगभग 3.75 लाख है। यानी प्रदेश के हर चार शिक्षकों में से लगभग एक शिक्षक इस फैसले की परिधि में आता है। यही वजह है कि इस फैसले को शिक्षक जगत में ऐतिहासिक माना जा रहा है और शिक्षक संगठनों ने इसका स्वागत किया है।
1998 से 2018 तक: विवाद की जड़ कहाँ है
99,000 शिक्षकों को पुरानी पेंशन का यह मामला कोई नया विवाद नहीं है। इसकी जड़ें करीब तीन दशक पुरानी नियुक्तियों में हैं। इन शिक्षकों की शुरुआती नियुक्ति वर्ष 1998 से 2003 के बीच पंचायतों और नगरीय निकायों के माध्यम से शिक्षा कर्मी के रूप में हुई थी। उस समय वे स्थानीय निकायों के अधीन काम करते थे और उनकी सेवा शर्तें भी उसी व्यवस्था के तहत तय होती थीं।

वर्ष 2018 में इन शिक्षकों की सेवाओं का राज्य के नियमित शिक्षण संवर्ग में विलय कर दिया गया। विलय के बाद राज्य सरकार ने इस संविलियन को एक नई नियुक्ति मान लिया। सरकार का तर्क था कि 2018 का विलय नई नियुक्ति के समान है, इसलिए इन शिक्षकों को राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के तहत पंजीकृत करना उचित है। राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली एक जनवरी 2005 के बाद सेवा में आने वाले कर्मचारियों पर लागू होती है। इस तर्क के आधार पर 1998 से 2005 के बीच नियुक्त शिक्षक भी राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के दायरे में आ गए, जबकि उनकी मूल नियुक्ति 2005 से पहले की थी।
शिक्षकों का कहना था कि उनकी मूल नियुक्ति की तारीख ही उनकी पेंशन पात्रता तय करनी चाहिए, क्योंकि उनकी पिछली सेवा को अन्य सेवा लाभों के लिए पहले से गिना जा रहा है। शिक्षकों की ओर से यह भी कहा गया कि जब उनकी सेवा को वरिष्ठता और क्रमोन्नति के लिए मान्य किया जा रहा है, तो पेंशन के मामले में उसी सेवा को नजरअंदाज करना तर्कसंगत नहीं है। इसी सवाल को लेकर शिक्षिका करुणा शर्मा ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
अदालत ने सरकार की दलील क्यों खारिज की
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि 2018 का संवर्ग विलय एक नई नियुक्ति के समान था, इसलिए इन शिक्षकों को राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में शामिल करना उचित था। सरकार का कहना था कि विलय के बाद शिक्षकों की सेवा नए सिरे से शुरू हुई है और इसलिए पेंशन की पात्रता भी उसी तारीख से तय होनी चाहिए।
उच्च न्यायालय ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि जब प्रशासन शिक्षकों की पुरानी सेवा के आधार पर उन्हें वरिष्ठता और पदोन्नति का लाभ दे रहा है, तो वह उसी सेवा को पेंशन के मामले में महत्वहीन नहीं ठहरा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि सेवा की निरंतरता को एक जगह मानना और दूसरी जगह न मानना, यह दोहरा मापदंड है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत के इस रुख का अर्थ यह है कि शिक्षकों की मूल नियुक्ति की तारीख ही उनकी सेवा की शुरुआत मानी जाएगी। 2018 का विलय उनकी सेवा की निरंतरता को तोड़ने वाला कदम नहीं है, बल्कि उसी सेवा को नियमित संवर्ग में समाहित करने की प्रक्रिया है। इसी आधार पर अदालत ने निर्देश दिया कि प्रभावित शिक्षकों के राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली खातों में जमा राशि को पुरानी पेंशन योजना में स्थानांतरित किया जाए और उन्हें पुरानी पेंशन योजना के सभी लाभ दिए जाएं।
OPS और NPS में क्या अंतर है
99,000 शिक्षकों को पुरानी पेंशन का लाभ मिलने का सवाल इसलिए इतना अहम है, क्योंकि पुरानी पेंशन योजना और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में बुनियादी अंतर है। पुरानी पेंशन योजना में कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के बाद उसके अंतिम वेतन के एक तय हिस्से के बराबर निश्चित पेंशन मिलती है और उस पर महंगाई राहत भी मिलती है। इस योजना में कर्मचारी को अपने वेतन से पेंशन के लिए कोई अंशदान नहीं देना होता था और पेंशन का पूरा खर्च सरकार उठाती थी।
राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में कर्मचारी और सरकार दोनों की ओर से हर महीने अंशदान जमा होता है और यह राशि बाजार से जुड़े कोषों में निवेश की जाती है। सेवानिवृत्ति पर कर्मचारी को इस जमा राशि और उस पर मिलने वाले प्रतिफल के आधार पर पेंशन मिलती है। इस व्यवस्था में पेंशन की राशि पहले से तय नहीं होती, बल्कि जमा राशि और बाजार के प्रदर्शन पर निर्भर करती है। यही वजह है कि कर्मचारी संगठनों की ओर से लंबे समय से पुरानी पेंशन योजना की बहाली की मांग उठती रही है।
एक जनवरी 2005 के बाद नियुक्त होने वाले सभी शासकीय सेवकों के लिए पुरानी पेंशन बंद करके राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली अनिवार्य कर दी गई थी। इस कट-ऑफ तारीख के कारण ही 1998 से 2005 के बीच नियुक्त शिक्षकों का मामला उलझा था। सरकार का कहना था कि 2018 के विलय को नई नियुक्ति माना जाए, तो ये शिक्षक 2005 के बाद के नियुक्त माने जाएंगे। अदालत ने इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया और मूल नियुक्ति की तारीख को ही निर्णायक माना।
99,000 शिक्षकों को पुरानी पेंशन: फैसले का क्या असर होगा
इस फैसले का सीधा असर प्रदेश के उन लगभग 99,000 शिक्षकों पर होगा, जिनकी मूल नियुक्ति 1998 से 2005 के बीच हुई थी। इन शिक्षकों में वे सभी शामिल हैं, जो शुरुआत में शिक्षा कर्मी या संविदा शाला शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए थे और बाद में 2018 के संविलियन से नियमित शिक्षण संवर्ग में आए। इनमें से कई शिक्षक अब सेवानिवृत्ति के करीब हैं और कुछ सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। ऐसे में पेंशन की व्यवस्था उनके लिए सबसे बड़ा सवाल है।
शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार सरकार को अब इस आदेश के प्रशासनिक और वित्तीय असर का अध्ययन करना होगा। इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों की पेंशन व्यवस्था बदलने और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में जमा राशि को पुरानी पेंशन योजना में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया आसान नहीं होगी। इसके लिए विभाग को खातों का मिलान, राशि का हस्तांतरण और पेंशन निर्धारण की पूरी प्रक्रिया तय करनी होगी।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह फैसला उन शिक्षकों के लिए लंबे समय से प्रतीक्षित न्याय है, जो करीब दो दशकों से अनिश्चित पेंशन व्यवस्था के तहत काम कर रहे थे। संगठनों के अनुसार इन शिक्षकों ने सरकारी स्कूलों में अपनी पूरी सेवा दी है और उनकी सेवा को हर दूसरे मामले में गिना जा रहा है। ऐसे में पेंशन के मामले में भी उनकी मूल नियुक्ति को ही आधार बनाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित है वरिष्ठता का विवाद
इस फैसले को समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि शिक्षकों की वरिष्ठता का बड़ा विवाद अभी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। मध्य प्रदेश सरकार ने शिक्षाकर्मी के रूप में नियुक्त शिक्षकों की वरिष्ठता के विवाद को लेकर पहले ही सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है और वह मामला अभी विचाराधीन है। शिक्षक संघ के अध्यक्ष जगदीश यादव के अनुसार ताजा फैसला पेंशन पात्रता से जुड़ा है और यह वरिष्ठता को लेकर चल रहे बड़े विवाद का अलग पहलू है।
शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ और जबलपुर स्थित प्रधान पीठ से भी पहले इसी तरह के फैसले आ चुके हैं, लेकिन वरिष्ठता का व्यापक विवाद अभी तक सुलझा नहीं है। इसका अर्थ यह है कि ग्वालियर बेंच का यह फैसला पेंशन के सवाल पर एक अहम न्यायिक राहत है, लेकिन इससे जुड़ा पूरा कानूनी विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है।
राज्य सरकार ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह इस फैसले को लागू करने की दिशा में बढ़ेगी या इसे उच्च अदालत में चुनौती देगी। सरकार की ओर से इस बारे में कोई आधिकारिक बयान अभी सामने नहीं आया है। यही वजह है कि शिक्षक संगठनों की नजर अब सरकार के अगले कदम पर टिकी है। अगर सरकार इस फैसले के खिलाफ अपील नहीं करती है या अपील में भी यह आदेश बरकरार रहता है, तो शासन को 1998 से 2005 के बीच नियुक्त सभी पात्र शिक्षकों को पुरानी पेंशन के दायरे में लाना होगा।
शिक्षक संगठनों ने फैसले का स्वागत किया
शिक्षक संगठनों ने ग्वालियर बेंच के फैसले का स्वागत किया है। संगठनों का कहना है कि यह फैसला उन शिक्षकों के लिए न्याय है, जो लंबे समय से अपनी पेंशन को लेकर लड़ाई लड़ रहे थे। शिक्षक संघ के अध्यक्ष जगदीश यादव ने कहा है कि ये शिक्षक अपनी मूल नियुक्ति की तारीख से ही सरकारी स्कूलों और सरकारी विभागों में शिक्षक के रूप में काम कर रहे थे, इसलिए उनकी सेवा उसी तारीख से गिनी जानी चाहिए। उनका कहना है कि 2005 से पहले नियुक्त शिक्षकों को पुरानी पेंशन योजना के दायरे में आना चाहिए।
शिक्षकों के आंदोलन के बाद सरकार के साथ हुई चर्चा में यह समझ बनी थी कि ग्रेच्युटी का लाभ उनकी पहली नियुक्ति की तारीख से गिना जाएगा और सरकार इस लाभ को देने पर विचार कर रही थी। शिक्षक संगठनों का कहना है कि जब ग्रेच्युटी जैसे लाभ के लिए पहली नियुक्ति की तारीख मान्य है, तो पेंशन के लिए भी वही तारीख मान्य होनी चाहिए। अदालत के फैसले ने इसी तर्क को न्यायिक मान्यता दी है।
दीपावली के मौके पर आए इस फैसले को शिक्षक जगत में त्योहार की सौगात के रूप में देखा जा रहा है। कई शिक्षकों के लिए यह फैसला सिर्फ पेंशन का सवाल नहीं है, बल्कि उनकी दशकों की सेवा की मान्यता का सवाल है। संगठनों का कहना है कि इस फैसले से शिक्षकों के परिवारों में भी राहत की भावना है, क्योंकि पेंशन सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा होती है।
आगे क्या होगा
अब सबकी नजर राज्य सरकार के अगले कदम पर है। सरकार के पास दो रास्ते हैं। पहला रास्ता यह है कि वह अदालत के आदेश को लागू करे और 99,000 शिक्षकों की राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में जमा राशि को पुरानी पेंशन योजना में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू करे। दूसरा रास्ता यह है कि वह इस फैसले को खंडपीठ या सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे। सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वह किस रास्ते पर चलेगी।
शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार सरकार पहले इस आदेश के प्रशासनिक और वित्तीय पहलुओं का अध्ययन करेगी। इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों की पेंशन व्यवस्था बदलने में कितना खर्च आएगा और यह प्रक्रिया कैसे पूरी होगी, इसका आकलन किए बिना कोई फैसला लेना आसान नहीं होगा। विभाग को यह भी देखना होगा कि जिन शिक्षकों की राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में राशि जमा है, उसका हस्तांतरण किस तरह किया जाए और जिन शिक्षकों ने पहले ही सेवानिवृत्ति ले ली है, उनके मामले में क्या व्यवस्था होगी।
इस फैसले का असर सिर्फ शिक्षकों तक सीमित नहीं रहेगा। अदालत ने अपने आदेश में जिस सिद्धांत को अपनाया है, वह उन अन्य कर्मचारियों के मामलों में भी मिसाल बन सकता है, जिनकी नियुक्ति बाद में हुए संवर्ग विलय से नियमित की गई थी। अगर ऐसे कर्मचारी भी अपनी मूल नियुक्ति की तारीख से पेंशन की मांग करते हैं, तो यह फैसला उनके लिए भी एक अहम न्यायिक आधार बन सकता है। यही वजह है कि इस फैसले को शिक्षा विभाग के साथ-साथ पूरे सरकारी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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