सार: छोटी दीपावली की शाम जबलपुर का गौरीघाट 51 हजार दीयों की रोशनी से जगमगा उठा। मां नर्मदा के तट पर हुए भव्य दीपोत्सव के साथ ही लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने बड़ा ऐलान किया — अयोध्या की सरयू की तर्ज पर गौरीघाट का कायाकल्प होगा और नर्मदा किनारे ‘नर्मदा पथ’ बनेगा। करीब 450 करोड़ रुपये की लागत से होने वाले इस काम की निविदा प्रक्रिया दो से तीन महीने में पूरी होने की बात कही गई है।
छोटी दीपावली की शाम, नर्मदा तट पर दीपों का समंदर
शनिवार की शाम जब अंधेरा गहराने लगा, तो जबलपुर में मां नर्मदा का पावन तट गौरीघाट दीपों की रोशनी से नहा उठा। दीपावली की पूर्व संध्या पर आयोजित भव्य दीपोत्सव में एक साथ 51 हजार मिट्टी के दीये प्रज्ज्वलित किए गए। घाट की सीढ़ियों से लेकर नर्मदा के किनारे तक दीयों की कतारें ऐसी सजीं कि पूरा तट सोने की तरह चमक उठा। हजारों श्रद्धालु इस दृश्य के साक्षी बने और मां नर्मदा की आराधना में शामिल हुए।
दीपोत्सव की शुरुआत पारंपरिक नर्मदा आरती के साथ हुई। आरती की घंटियों और मंत्रों की ध्वनि के बीच श्रद्धालुओं ने दीप जलाए और प्रदेश के विकास, नागरिकों की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की। इसके बाद म्यूजिकल लेजर शो और आकर्षक आतिशबाजी ने आयोजन को और भव्य बना दिया। आसमान में रंग-बिरंगी आतिशबाजी और नर्मदा के जल में दीयों की परछाईं ने ऐसा दृश्य रचा, जिसे देखने के लिए शहरभर से लोग गौरीघाट पहुंचे थे।
करीब 500 मीटर लंबे घाट पर दीयों को सजाने की जिम्मेदारी शहर की अलग-अलग मंडलियों को सौंपी गई थी। हर मंडली ने पहले से तय डिजाइन के अनुसार अपने हिस्से के दीप सजाए। सामाजिक, धार्मिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधि भी आयोजन में शामिल हुए। दीपोत्सव में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर उम्र के लोगों ने उत्साह के साथ भाग लिया। शाम ढलते ही घाट पर उमड़ी भीड़ ने यह बता दिया कि गौरीघाट का दीपोत्सव अब संस्कारधानी जबलपुर की पहचान बन चुका है।
दीपोत्सव की परंपरा: 2022 से हर साल और भव्य
गौरीघाट पर दीपोत्सव की शुरुआत वर्ष 2022 में हुई थी। तब से हर साल छोटी दीपावली की पूर्व संध्या पर यह आयोजन होता आ रहा है और हर साल इसका आकार और भव्यता बढ़ती जा रही है। पहले साल सीमित स्तर पर शुरू हुआ दीपोत्सव अब शहर के सबसे बड़े धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों में से एक बन गया है।
इस परंपरा की खास बात यह है कि यह केवल एक सरकारी या एक संगठन का आयोजन नहीं है। इसमें शहर के सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्थाएं, व्यापारिक संगठन और आम नागरिक — सभी अपनी भूमिका निभाते हैं। दीयों की व्यवस्था, घाट की सजावट, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हर वर्ग की भागीदारी दिखती है। यही सामूहिक भागीदारी इस आयोजन को जबलपुर की साझा पहचान बनाती है।
पिछले वर्षों में दीपों की संख्या भी लगातार बढ़ी है। इस बार 51 हजार दीयों का आंकड़ा अपने आप में बताता है कि आयोजन किस स्तर पर पहुंच चुका है। आयोजकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ेगी, क्योंकि हर साल नए संगठन और नए लोग इससे जुड़ रहे हैं।
मंत्री राकेश सिंह का संबोधन: परंपरा ही पहचान है
दीपोत्सव के अवसर पर लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि गौरीघाट का दीपोत्सव जबलपुर की सांस्कृतिक धरोहर और सामूहिक भक्ति का प्रतीक है। उनके अनुसार, यह उत्सव केवल दीप जलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी परंपराओं को जीवित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का माध्यम है।
मंत्री राकेश सिंह ने कहा कि परंपराएं किसी समाज की पहचान होती हैं और उन्हें सहेजना हम सबकी जिम्मेदारी है। उन्होंने दीपोत्सव में भाग लेने वाले सभी संगठनों और नागरिकों की सराहना की और प्रदेशवासियों को दीपावली की शुभकामनाएं दीं। उनके संबोधन के दौरान घाट पर मौजूद श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा के जयकारे लगाए।
दीपोत्सव का संयोजन भी मंत्री राकेश सिंह के नेतृत्व में हुआ था। आयोजन के दौरान उन्होंने मां नर्मदा का पूजन कर प्रदेशवासियों की तरक्की और आरोग्यता की कामना की। मंच से उन्होंने यह भरोसा भी जताया कि गौरीघाट का विकास अब केवल घोषणा नहीं, बल्कि तय समयसीमा में पूरा होने वाला काम है।
सरयू की तर्ज पर गौरीघाट का कायाकल्प
दीपोत्सव के मंच से ही मंत्री राकेश सिंह ने गौरीघाट के भविष्य को लेकर सबसे बड़ा ऐलान किया। उन्होंने कहा कि अयोध्या में सरयू नदी के तट पर जिस तरह भव्य रिवरफ्रंट विकसित किया गया है, उसी तर्ज पर जबलपुर में नर्मदा किनारे गौरीघाट का विकास किया जाएगा। गौरीघाट को देश के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में से एक के रूप में विकसित करने की योजना है।

मंत्री के अनुसार, इस महत्वाकांक्षी परियोजना की घोषणा मुख्यमंत्री मोहन यादव ने की थी और इसे सरकार की मंजूरी मिल चुकी है। यानी परियोजना अब केवल विचार के स्तर पर नहीं है, बल्कि उसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया शुरू होने की ओर बढ़ रही है। गौरीघाट को भव्य धार्मिक और सांस्कृतिक गंतव्य के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाएगा।
योजना के अनुसार, गौरीघाट के विकास में नर्मदा तट के धार्मिक महत्व को बनाए रखते हुए आधुनिक सुविधाएं जोड़ी जाएंगी। घाट पर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बेहतर व्यवस्था, पर्यटकों के लिए सुविधाएं और तट के सौंदर्यीकरण पर काम होगा। मंत्री ने भरोसा जताया कि नया रूप पाकर गौरीघाट देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करेगा और जबलपुर की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करेगा।
‘नर्मदा पथ’: 450 करोड़ की योजना में क्या-क्या
सरयू की तर्ज पर नर्मदा किनारे ‘नर्मदा पथ’ बनाने की घोषणा इस आयोजन की सबसे चर्चित खबर रही। करीब 450 करोड़ रुपये की लागत से गौरीघाट का कायाकल्प किए जाने की बात सामने आई है। इस राशि से घाट और उसके आसपास के क्षेत्र का समग्र विकास किया जाएगा, ताकि यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यटन की दृष्टि से भी देश के प्रमुख स्थलों में शामिल हो सके।
मंत्री राकेश सिंह के अनुसार, परियोजना की निविदा प्रक्रिया अगले दो से तीन महीनों के भीतर पूरी कर ली जाएगी। इसके बाद भूमिपूजन कर निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाएगा। यानी अगर समयसीमा के अनुसार काम चला, तो आने वाले महीनों में गौरीघाट पर निर्माण की गतिविधियां दिखाई देने लगेंगी।
इस विकास कार्य का उद्देश्य केवल घाट को सुंदर बनाना नहीं है। इसके पीछे सोच यह है कि नर्मदा तट पर आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलें, पर्यटकों के ठहरने और घूमने की व्यवस्था सुधरे और जबलपुर धार्मिक पर्यटन के नक्शे पर और मजबूती से उभरे। अयोध्या की सरयू का उदाहरण सामने रखकर यह भरोसा जताया जा रहा है कि नर्मदा तट का यह विकास भी उसी तरह शहर की तस्वीर बदल सकता है।
गौरीघाट: आस्था, इतिहास और संस्कारधानी की पहचान
गौरीघाट जबलपुर का सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन घाट है। नर्मदा के तट पर स्थित इस घाट पर मां नर्मदा का मंदिर है, जहां हर शाम नर्मदा आरती होती है। शाम करीब सात बजे शुरू होने वाली यह आरती गंगा आरती की तरह ही भव्य होती है। पुजारी एक साथ आरती करते हैं और श्रद्धालु दीप प्रवाहित कर मां नर्मदा से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
गौरीघाट का धार्मिक महत्व पुराणों से जुड़ा है। यहां नर्मदा सिद्ध कुंड और उमा घाट हैं, जहां ऋषियों की तपस्या की मान्यता है। कार्तिक के महीने में यहां बड़ा मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। घाट के पास गुरुद्वारा ग्वारी घाट साहिब भी है, जहां गुरु नानक के आगमन की मान्यता है। इस तरह गौरीघाट केवल एक घाट नहीं, बल्कि कई आस्थाओं का संगम है।
गौरीघाट की प्रसिद्धि का एक और अध्याय वर्ष 2021 में जुड़ा, जब तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने यहां आकर नर्मदा आरती में भाग लिया था। इसके अलावा जबलपुर को संस्कारधानी कहा जाता है और गौरीघाट इस पहचान का एक बड़ा केंद्र है। दीपोत्सव जैसे आयोजन इसी पहचान को हर साल नया विस्तार देते हैं।
अयोध्या से चित्रकूट तक, दीपोत्सव की लहर
गौरीघाट का दीपोत्सव अकेला आयोजन नहीं है। इस बार दीपावली पर पूरे प्रदेश और देश में दीपोत्सव की लहर देखी जा रही है। अयोध्या में दीपोत्सव के तहत सरयू के 56 घाटों पर 30 लाख से अधिक दीये जलाए गए, जिसने नया विश्व रिकॉर्ड बनाया। अयोध्या का यह आयोजन अब देशभर में दीपोत्सव का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है और उसी की तर्ज पर अब जबलपुर के गौरीघाट को विकसित करने की बात हो रही है।
मध्य प्रदेश में भी दीपावली की धूम जगह-जगह दिख रही है। चित्रकूट में छोटी दीपावली पर मंदाकिनी तट और रामघाट पर लाखों श्रद्धालुओं ने दीपदान किया। उज्जैन में महाकाल के दरबार में दीपावली विशेष पूजा-अर्चना के साथ मनाई गई। इंदौर के महालक्ष्मी मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी और रतलाम के महालक्ष्मी मंदिर को करोड़ों के नोटों और जेवरों से सजाया गया। इन सबके बीच जबलपुर के गौरीघाट का दीपोत्सव अपनी अलग पहचान के साथ उभरा है।
इन आयोजनों का एक साझा संदेश है — दीपावली केवल घरों में दीप जलाने का पर्व नहीं है, बल्कि यह सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक गौरव का उत्सव है। जब पूरा शहर एक साथ घाट पर दीप जलाता है, तो वह दृश्य केवल रोशनी का नहीं, बल्कि सामूहिक भावना का प्रतीक बन जाता है।
आगे क्या: श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए क्या बदलेगा
अब सबकी निगाहें ‘नर्मदा पथ’ परियोजना के अगले चरण पर टिकी हैं। निविदा प्रक्रिया दो से तीन महीने में पूरी होने की बात कही गई है, जिसके बाद भूमिपूजन और निर्माण कार्य शुरू होगा। अगर काम तय समयसीमा में पूरा होता है, तो आने वाले वर्षों में गौरीघाट का रूप पूरी तरह बदल जाएगा। श्रद्धालुओं को बेहतर घाट, बेहतर सुविधाएं और सुव्यवस्थित तट मिलेगा।
पर्यटन की दृष्टि से भी इस परियोजना के बड़े मायने हैं। जबलपुर पहले से भेड़ाघाट और धुआंधार जलप्रपात के लिए देशभर में जाना जाता है। गौरीघाट का भव्य विकास इस सूची में एक और मजबूत कड़ी जोड़ सकता है। धार्मिक पर्यटन बढ़ने से स्थानीय व्यापार, रोजगार और शहर की अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलने की उम्मीद है।
फिलहाल गौरीघाट का दीपोत्सव अपनी छाप छोड़ चुका है। 51 हजार दीयों की रोशनी, नर्मदा आरती, लेजर शो और आतिशबाजी के साथ-साथ ‘नर्मदा पथ’ का ऐलान — इस दीपावली पर जबलपुर को दोहरी सौगात मिली है। अब देखना यह है कि घोषणा के बाद काम कितनी तेजी से धरातल पर उतरता है।
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