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रतलाम के महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली पर करोड़ों के नोटों और जेवरों से सजा मां का दरबार

सांकेतिक चित्र: नोटों और जेवरों से सजा महालक्ष्मी मंदिर का दरबार सांकेतिक चित्र

रतलाम ब्यूरो

सार: रतलाम के माणकचौक स्थित प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली पर मां का दरबार करीब दो करोड़ रुपये के नोटों, 40 देशों की विदेशी करेंसी और सोने-चांदी के जेवरों से सजाया गया है। भक्तों की ओर से जमा कराई गई अमानत से सजा यह दरबार धनतेरस से भाईदूज तक पांच दिनों तक ऐसे ही रहेगा और दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है।

देशभर में दीपावली पर मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है, लेकिन रतलाम का महालक्ष्मी मंदिर अपनी परंपरा के कारण सबसे अलग है। यहां मां लक्ष्मी का दरबार फूलों से नहीं, करोड़ों रुपये की नकदी और सोने-चांदी के आभूषणों से सजता है। इस वर्ष भी मंदिर में करीब दो करोड़ रुपये के भारतीय नोट, 40 देशों की विदेशी करेंसी और बेशकीमती आभूषण सजावट का हिस्सा बने हैं। धनतेरस के दिन ब्रह्म मुहूर्त में मां महालक्ष्मी की पूजा के बाद से श्रद्धालु इस अनूठे शृंगार के दर्शन कर रहे हैं और आज दीपावली के दिन मंदिर में भारी भीड़ है।

दो करोड़ के नोट, 40 देशों की करेंसी और सोने-चांदी के जेवर

मंदिर की सजावट का पैमाना इस बार भी भव्य है। मंदिर को लगभग दो करोड़ रुपये के नोटों से सजाया गया है। इसके साथ 40 अलग-अलग देशों की विदेशी करेंसी और सोने-चांदी के जेवरों का भी सजावट में व्यापक उपयोग किया गया है। मंदिर की दीवारों, दरवाजों और खंभों पर नोटों की गड्डियों से बनाए गए आकर्षक वंदनवार और कलात्मक सजावट बरबस ही सबका ध्यान खींच रही है। एक रुपये से लेकर 500 रुपये तक के नोटों का सजावट में खूबसूरती से इस्तेमाल किया गया है। नोटों से फूल, गुलदस्ते, गमले और वंदनवार तैयार किए गए हैं। सौ और दो सौ रुपये के नोटों से सुंदर मोरपंख बनाए गए हैं, जबकि नोटों से बना एक विशेष पेड़ भी इस वर्ष के प्रमुख आकर्षणों में से एक है। मंदिर के गर्भगृह से लेकर परिसर के हर कोने तक धन-धान्य का यह नजारा श्रद्धालुओं को बरबस ही अपनी ओर खींच रहा है।

चांदी के हाथी और सिक्कों वाली साड़ी बनी आकर्षण

इस वर्ष महालक्ष्मी मंदिर के शृंगार में चांदी की कलाकृतियां विशेष आकर्षण बनी हुई हैं। गर्भगृह में ढाई-ढाई किलो वजन के पांच बड़े चांदी के हाथियों के साथ 52 छोटे चांदी के हाथी सजाए गए हैं। इसके अलावा 45 चांदी के सिक्कों से तैयार की गई विशेष साड़ी भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। मंदिर में मां महालक्ष्मी के साथ भगवान गणेश और माता सरस्वती विराजमान हैं, जबकि मां के साथ भगवान कुबेर भी विराजमान हैं। सोने-चांदी के आभूषणों से मां का शृंगार किया गया है और चांदी की इन कलाकृतियों के साथ पूरा दरबार जगमगा रहा है।

सांकेतिक चित्र: नोटों की लड़ियों और चांदी के हाथियों से सजावट
सांकेतिक चित्र

शरद पूर्णिमा से शुरू होती है सजावट की तैयारी

मंदिर की इस अनूठी सजावट का काम दीपावली से कई दिन पहले शरद पूर्णिमा से शुरू हो जाता है। करीब 35 कलाकारों की टीम कई दिनों की मेहनत के बाद नोटों की लड़ियां, वंदनवार और आकर्षक सजावट तैयार करती है। सजावट में पिन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। नोटों को पॉलीथिन में सुरक्षित रखकर धागे और सुई की मदद से पिरोया जाता है, ताकि आयोजन पूरा होने के बाद उन्हें बिना नुकसान भक्तों को वापस किया जा सके। मंदिर के पुजारी अश्विन पुजारी के अनुसार इस वर्ष भी माता का दरबार नोटों और सोने-चांदी के आभूषणों से सजाया जा रहा है। पहले आम श्रद्धालुओं से भी जेवर लिए जाते थे, लेकिन अब कुछ चुनिंदा दुकानदारों से ही आभूषण लिए जाते हैं।

भक्तों की अमानत है यह सजावट, पांच दिन बाद लौटाई जाती है

इस सजावट की सबसे खास बात यह है कि इसके लिए मंदिर प्रबंधन किसी बाहरी एजेंसी से धन या आभूषण नहीं जुटाता। देशभर के श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार नकदी, सोने-चांदी के जेवर और अन्य कीमती वस्तुएं मंदिर में जमा कराते हैं। इस बार दो से तीन हजार भक्तों ने अपनी अमानत मंदिर को सौंपी है। शरद पूर्णिमा से ही मंदिर में सजावट के लिए नोट जमा करने का सिलसिला शुरू हो गया था और 5 नवंबर की रात तक भक्तों से रुपये स्वीकार किए गए। भक्तों का धन स्थायी रूप से मंदिर में नहीं रखा जाता। पांच दिन का आयोजन पूरा होने के बाद उनकी जमा की गई राशि और आभूषण टोकन के आधार पर उन्हें वापस कर दिए जाते हैं। मंदिर समिति जमा राशि और आभूषणों का पूरा हिसाब रखती है। इसके लिए इस बार ऑनलाइन पंजीयन और टोकन की व्यवस्था भी की गई है। श्रद्धालुओं को ऑनलाइन फॉर्म में अपना नाम, मोबाइल नंबर, ई-मेल आईडी, शहर, राज्य, पिन कोड और पता दर्ज करना होता है। करोड़ों रुपये की नकदी और बेशकीमती जेवरात की मौजूदगी को देखते हुए मंदिर में सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए हैं और परिसर में 24 घंटे निगरानी के लिए 24 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।

प्रसाद में मिठाई नहीं, रुपये-पैसे और कुबेर पोटली

रतलाम के महालक्ष्मी मंदिर की सबसे अनोखी पहचान यहां मिलने वाला प्रसाद है। आमतौर पर मंदिरों में दर्शन के बाद भक्तों को मिठाई या लड्डू दिए जाते हैं, लेकिन इस मंदिर में रुपये-पैसे प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा है। दीपावली पर मां लक्ष्मी को अर्पित की गई धनराशि और आभूषण बाद में भक्तों को प्रसाद के रूप में लौटाए जाते हैं। धनतेरस के अवसर पर श्रद्धालुओं को कुबेर पोटली भी वितरित की जाती है। इस पोटली में कमलगट्टा, कौड़ी, चावल, सुपारी, पिस्ता और गोमती चक्र रखे जाते हैं। मान्यता है कि इन्हें मां लक्ष्मी को अर्पित करने से व्यापार में उन्नति और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।

करीब तीन सौ साल पुरानी है यह परंपरा

महालक्ष्मी मंदिर में धन-संपदा अर्पित करने और उसे प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा करीब तीन सौ साल पुरानी बताई जाती है। मान्यता के अनुसार रतलाम रियासत के महाराजा रतन सिंह राठौर दीपावली और धनतेरस के अवसर पर मां लक्ष्मी के शृंगार के लिए शाही खजाने से सोने-चांदी के आभूषण और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं अर्पित करते थे। वही परंपरा आज भी निभाई जा रही है और दीपावली के दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु रतलाम पहुंचते हैं। माणकचौक क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन मंदिर दीपावली और भाईदूज के अवसर पर अपने विशेष शृंगार के लिए प्रसिद्ध है।

दीपावली पर दर्शन की व्यवस्था

धनतेरस पर 6 नवंबर 2026 को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मां महालक्ष्मी की पूजा की गई। इसके बाद श्रद्धालु नोटों और जेवरों से सजे मंदिर में दर्शन कर रहे हैं। मंदिर में यह विशेष सजावट पांच दिनों तक रहेगी और भाईदूज के बाद श्रद्धालुओं को उनकी जमा कराई गई नकदी और आभूषण लौटाने की प्रक्रिया शुरू होगी। आज दीपावली के दिन मंदिर में बड़ी संख्या में भक्त पहुंच रहे हैं और मां लक्ष्मी के चरणों में रुपये-पैसे, सोने-चांदी के सिक्के तथा आभूषण अर्पित कर रहे हैं। श्रद्धालुओं को लंबी कतारों से बचाने के लिए इस बार ऑनलाइन पंजीयन की व्यवस्था की गई है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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