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सूखे की मार झेल रहे महाराष्ट्र के किसानों को प्रधानमंत्री मोदी का भरोसा: चिंता न करें, सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ खड़ी है

सांकेतिक चित्र: सूखे से प्रभावित खेत — दरारें पड़ी सूखी जमीन और मुरझाई फसल सांकेतिक चित्र

नई दिल्ली ब्यूरो

सार: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3 नवंबर 2026 को महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति से जूझ रहे किसानों को केंद्र सरकार की ओर से हर संभव मदद का भरोसा दिया है। उन्होंने कहा कि इस कठिन समय में सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ किसानों के साथ खड़ी है और किसी भी किसान को चिंता करने की जरूरत नहीं है। इस बीच राज्य सरकार ने फसल नुकसान के मुआवजे के लिए केंद्र से लगभग 31,000 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता मांगी है, जबकि सूखाग्रस्त तहसीलों के किसानों को दिवाली से पहले 5,000 रुपये की अग्रिम सहायता भेजने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

प्रधानमंत्री ने किसानों से क्या कहा

प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए पुणे मेट्रो परियोजनाओं के उद्घाटन और शिलान्यास कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सूखे का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वे महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति से अवगत हैं और राज्य सरकार ने किसानों को अग्रिम सहायता भी उपलब्ध कराई है। प्रधानमंत्री ने महाराष्ट्र के हर किसान को आश्वस्त करते हुए कहा कि इस कठिन समय में सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ उनके साथ खड़ी है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “चिंता न करें, हम सभी अपने किसानों के साथ खड़े हैं।” उन्होंने यह भी कहा, “हम सब मिलकर इस संकट का सामना करेंगे।” प्रधानमंत्री ने देश के लोगों से अपील की कि त्योहार के इस मौसम में किसानों को याद रखा जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि सूखे से प्रभावित परिवारों के घरों तक भी दिवाली की खुशियां पहुंचें। उन्होंने कहा कि यह समाज की साझा जिम्मेदारी है कि सूखाग्रस्त नागरिकों, किसानों और गांवों में रहने वाले परिवारों की कठिनाइयों को भुलाया न जाए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि विकसित भारत की यात्रा में किसानों की बड़ी भूमिका है, इसलिए सरकार किसानों को सशक्त बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में राज्य सरकार ने हाल के वर्षों में जल संरक्षण के लिए काफी काम किया है, लेकिन मौजूदा प्राकृतिक आपदा ने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

सूखे का दायरा कितना बड़ा है

सांकेतिक चित्र

राज्य सरकार के आकलन के अनुसार सूखे का दायरा बहुत व्यापक है। कुल 358 तहसीलों में से 304 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। यही आंकड़ा प्रतिशत में लगभग 85 प्रतिशत बैठता है, जिसका उल्लेख विभिन्न रिपोर्टों में किया गया है। इन 304 तहसीलों के 37,496 गांवों में फसलों के नुकसान का आकलन पूरा कर लिया गया है।

आकलन के अनुसार इन गांवों में कुल 166 लाख हेक्टेयर खेती योग्य जमीन में से 141.5 लाख हेक्टेयर में खरीफ की फसलों को 33 प्रतिशत से ज्यादा नुकसान हुआ है। यही वह सीमा है, जिसके आधार पर किसान आर्थिक सहायता के पात्र माने जाते हैं। नुकसान का यह पैमाना ही राज्य सरकार की ओर से केंद्र से मांगी गई सहायता की बुनियाद बना है। खरीफ सीजन में कम बारिश ने महाराष्ट्र की कृषि अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई है, और इसी वजह से किसानों की कर्ज चुकाने की क्षमता भी कमजोर हुई है।

सूखे की यह स्थिति केवल कुछ जिलों तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में लिए हुए है। ऐसे में राहत की मांग भी उसी अनुपात में बड़ी है। राज्य सरकार का कहना है कि जमीनी हालात और खेती पर पड़े असर का जायजा लेने के बाद ही केंद्र से सहायता की राशि तय की गई है।

31,000 करोड़ रुपये की मांग और 5,000 रुपये की अग्रिम सहायता

किसानों को फसल नुकसान का मुआवजा देने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र से लगभग 31,000 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता मांगी है। राज्य सरकार के अनुसार आगामी रबी सीजन की तैयारियों में किसानों की मदद के लिए अलग से अतिरिक्त धन की मांग भी की जाएगी। यानी खरीफ के नुकसान की भरपाई और रबी की बुवाई के लिए मदद को दो अलग-अलग चरणों में देखा जा रहा है।

तत्काल राहत के तौर पर राज्य सरकार ने 304 सूखाग्रस्त तहसीलों के किसानों को 5,000 रुपये की अग्रिम सहायता भेजनी शुरू कर दी है। इसके लिए राज्य मंत्रिमंडल ने लगभग 1.5 करोड़ किसानों को अग्रिम भुगतान करने की मंजूरी दी थी। यह अग्रिम सहायता पूरा मुआवजा नहीं है, बल्कि तत्काल जरूरतों के लिए दी जा रही शुरुआती मदद है। फसल नुकसान का बाकी मुआवजा सर्वेक्षण और तय नियमों के आधार पर बाद में दिया जाएगा।

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में राज्य सरकार की ओर से दी जा रही अग्रिम सहायता का उल्लेख किया और कहा कि केंद्र सरकार भी हर संभव मदद देगी। हालांकि केंद्र की ओर से 31,000 करोड़ रुपये की मांग पर अभी कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। इस खबर में केंद्र की मंजूरी का दावा नहीं किया जा रहा है, केवल यह दर्ज किया जा रहा है कि राज्य सरकार ने मांग रखी है और प्रधानमंत्री ने मदद का भरोसा दिया है।

मुआवजे की दरें क्या बताई गई हैं

रिपोर्टों के अनुसार सरकारी नियमों के तहत जिन किसानों की 33 प्रतिशत या उससे ज्यादा फसल खराब हुई है, वे आर्थिक सहायता पाने के पात्र हैं। बारिश पर निर्भर खेती वाले क्षेत्रों में 8,500 रुपये प्रति हेक्टेयर, सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्रों में 17,000 रुपये प्रति हेक्टेयर और बहुवर्षीय फसलों के लिए 22,500 रुपये प्रति हेक्टेयर का मुआवजा तय किया गया है।

ये दरें राहत के सामान्य नियमों के रूप में बताई गई हैं। किसी किसान को वास्तव में कितनी राशि मिलेगी, यह उसके क्षेत्र की श्रेणी, फसल के प्रकार और नुकसान के आकलन पर निर्भर करेगा। इसलिए इन दरों को हर किसान के लिए तय राशि के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। यह भी साफ किया गया है कि 5,000 रुपये की अग्रिम सहायता इन दरों से अलग है और वह तत्काल मदद के रूप में दी जा रही है।

किसानों के लिए यह समझना जरूरी है कि अग्रिम सहायता और अंतिम मुआवजा दो अलग चीजें हैं। अग्रिम सहायता का मकसद दिवाली के समय तत्काल जरूरतों में हाथ बंटाना है, जबकि अंतिम मुआवजा फसल नुकसान के विस्तृत आकलन के बाद तय होगा।

प्रधानमंत्री-किसान योजना और जल संरक्षण का उल्लेख

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री-किसान योजना के तहत दी जा रही सहायता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री-किसान योजना की राशि हस्तांतरित की है। इस खबर में किसी नई किस्त की तारीख या राशि का दावा नहीं किया जा रहा है, क्योंकि इसकी पुष्टि के लिए अलग से ब्योरा उपलब्ध नहीं है। केवल यही दर्ज किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इस योजना का उल्लेख किया।

जल संरक्षण के मुद्दे पर प्रधानमंत्री ने कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में राज्य सरकार ने हाल के वर्षों में इस दिशा में काफी काम किया है। इसके बावजूद मौजूदा प्राकृतिक आपदा ने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। यह बात इसलिए अहम है, क्योंकि सूखे से निपटने में जल संरक्षण की संरचनाओं की भूमिका लंबे समय में तय होती है, लेकिन एक ही सीजन में कम बारिश का असर तत्काल राहत की मांग को बढ़ा देता है।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि सड़क, रेल, हवाई अड्डा और मेट्रो नेटवर्क के साथ-साथ बिजली, पेयजल और गैस पाइपलाइन जैसी बुनियादी सुविधाओं में निवेश से लोगों का जीवन बेहतर हो रहा है और रोजगार के अवसर बन रहे हैं। गरीब परिवारों को मकान, शौचालय, नल का पानी और एलपीजी कनेक्शन मिलने से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और अतिरिक्त आय के अवसर बने हैं।

गरीबी घटने का दावा: प्रधानमंत्री ने किस रिपोर्ट का हवाला दिया

प्रधानमंत्री ने विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पिछले 10 से 12 वर्षों में भारत में लगभग 50 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर आए हैं। उन्होंने कहा कि भारत अब सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और सबसे तेजी से गरीबी घटाने वाले देशों में से एक है। यह दावा प्रधानमंत्री के भाषण के रूप में दर्ज किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आर्थिक वृद्धि और गरीबी में कमी एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि गरीबी से बाहर आने वाले परिवारों को फायदा होने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है, क्योंकि मध्य वर्ग का विस्तार होता है और क्रय शक्ति बढ़ती है। उन्होंने कहा कि सामूहिक प्रयास ही विकसित भारत की यात्रा की जीवनरेखा हैं।

इस खबर में विश्व बैंक की रिपोर्ट के ब्योरे की स्वतंत्र पुष्टि का दावा नहीं किया जा रहा है। प्रधानमंत्री के भाषण में कही गई बातों को उनके बयान के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठक बयान और तथ्य के बीच का फर्क साफ देख सकें।

मेट्रो कार्यक्रम की पृष्ठभूमि

प्रधानमंत्री ने यह संबोधन पुणे मेट्रो परियोजनाओं के कार्यक्रम के दौरान दिया। इस कार्यक्रम में पुणे मेट्रो लाइन 3, जिसे पिंक लाइन कहा जाता है, का उद्घाटन किया गया और फेज-2 की चार नई गलियारों की आधारशिला रखी गई। इन परियोजनाओं की कुल लागत लगभग 21,800 करोड़ रुपये बताई गई है। पिंक लाइन लगभग 23 किलोमीटर लंबी है और इसकी लागत 8,300 करोड़ रुपये से ज्यादा है। यह गलियारा हिंजेवाड़ी आईटी केंद्र को शिवाजीनगर से जोड़ता है।

फेज-2 की लागत लगभग 13,500 करोड़ रुपये है और इसमें चार गलियारे शामिल हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का मेट्रो नेटवर्क 2014 में 248 किलोमीटर था, जो अब लगभग 1,200 किलोमीटर तक पहुंच गया है। मेट्रो परियोजनाओं का विस्तृत ब्योरा इससे पहले प्रकाशित किया जा चुका है, इसलिए इस खबर में मेट्रो पर विस्तार से नहीं, बल्कि सूखे और किसानों की राहत पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

आगे क्या होगा

अब सबकी नजर केंद्र सरकार के फैसले पर है। राज्य सरकार ने 31,000 करोड़ रुपये की सहायता मांगी है, लेकिन इस मांग पर केंद्र की ओर से अभी कोई अंतिम घोषणा सामने नहीं आई है। रबी सीजन के लिए अलग से सहायता की मांग भी की जाएगी, जैसा कि राज्य सरकार ने कहा है। तब तक सूखाग्रस्त तहसीलों में 5,000 रुपये की अग्रिम सहायता भेजने की प्रक्रिया जारी है।

किसानों के लिए आने वाले दिन इसलिए अहम हैं, क्योंकि दिवाली के समय तत्काल मदद और रबी की बुवाई की तैयारी दोनों एक साथ चल रही हैं। प्रधानमंत्री के भरोसे के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि केंद्र और राज्य के बीच तालमेल से राहत का काम तेज होगा। हालांकि किसी भी नई घोषणा या राशि की पुष्टि होने तक इस खबर में केवल वही दर्ज किया गया है, जो अब तक सामने आया है।

महाराष्ट्र के किसानों के लिए यह संकट एक सीजन का नहीं, बल्कि आने वाले महीनों की तैयारी का भी सवाल है। खरीफ के नुकसान की भरपाई, रबी की बुवाई और कर्ज की किस्तों का दबाव — ये तीनों मुद्दे एक साथ खड़े हैं। प्रधानमंत्री के आश्वासन ने इस संकट में सरकार के साथ खड़े होने का संदेश दिया है, लेकिन राहत की असली कसौटी यह होगी कि सहायता कितनी तेजी से और कितने किसानों तक पहुंचती है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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