भोपाल ब्यूरो
सार: वंदे मातरम 151वीं वर्षगांठ आज मनाई जा रही है। राष्ट्रगीत की रचना के 151 वर्ष पूरे होने पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, मुख्यमंत्री मोहन यादव समेत देशभर के नेताओं ने देशवासियों को बधाई दी है। मध्य प्रदेश में राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूरे होने पर 7 नवंबर 2025 से शुरू हुआ वर्षभर का जन-उत्सव भी आज ही संपन्न हो रहा है। डेढ़ शताब्दी से यह गीत भारत की राष्ट्रीय चेतना का स्वर बना हुआ है, और आज भी हर पीढ़ी को मातृभूमि के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है।
वंदे मातरम 151वीं वर्षगांठ पर राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा — राष्ट्र-प्रथम की भावना अपनाएं
राष्ट्रगीत वंदे मातरम की रचना के 151 वर्ष पूरे होने के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने देशवासियों को बधाई दी। राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी संदेश में उन्होंने कहा, “राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम’ की रचना के 151 वर्ष पूरे होने पर सभी देशवासियों को मैं हार्दिक बधाई देती हूं। स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान इस गीत ने देशभक्तों के लिए साहस, एकता और संकल्प के उद्घोष के रूप में कार्य किया। आज भी यह हमारी राष्ट्रीय अस्मिता, स्वाभिमान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक है। मेरी कामना है कि देशवासी ‘वंदे मातरम्’ की राष्ट्र-प्रथम की भावना को अपनाते हुए राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें।”
राष्ट्रपति के संदेश के साथ ही देशभर के नेताओं ने भी राष्ट्रगीत की वर्षगांठ पर अपनी शुभकामनाएं व्यक्त कीं। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने लिखा, “समस्त देशवासियों को राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ की वर्षगांठ पर शुभकामनाएं।” केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने संदेश में कहा, “राष्ट्र भक्ति, राष्ट्रीय एकता और मातृभूमि के गौरव का प्रतीक राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ की 151वीं वर्षगांठ पर समस्त देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं। यह अमर गीत सदैव देशप्रेम, त्याग और समर्पण की भावना जागृत करता रहेगा।”
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने लिखा, “‘वंदे मातरम’ भारत की राष्ट्रीय चेतना का वह अमर स्वर है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में असंख्य देशवासियों को मातृभूमि की मुक्ति के लिए प्रेरित किया। पराधीनता के दौर में प्रतिरोध का मंत्र बना ‘वंदे मातरम’ आज भी राष्ट्र के प्रति समर्पण, सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय एकता की भावना को अभिव्यक्त करता है। डेढ़ शताब्दी बाद भी इसकी गूंज हमें स्मरण कराती है कि राष्ट्र सर्वोपरि है।”
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपने संदेश में लिखा, “वंदे मातरम भारत की आत्मा का उद्घोष है, मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का मंत्र है, राष्ट्रभक्ति की ऊर्जा है और विकसित भारत का संकल्प है। इस अमर राष्ट्र गीत के रचयिता, महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को शत-शत नमन। स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा से लेकर आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत के निर्माण तक, वंदे मातरम हर पीढ़ी के राष्ट्र प्रेम और संकल्प का स्वर है।”
मुख्यमंत्री मोहन यादव का संदेश: आजादी की अलख जगाने वाला गीत
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी वंदे मातरम 151वीं वर्षगांठ पर देशवासियों को बधाई दी। उन्होंने अपने संदेश में लिखा, “‘वंदे मातरम’ मां भारती के प्रति असीम श्रद्धा, गौरव और राष्ट्र समर्पण का उद्घोष है। स्वतंत्रता संग्राम के कठिन दौर में इस अमर गीत ने देशवासियों के हृदय में आजादी की अलख जगाई और राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया। राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ की 151वीं वर्षगांठ पर समस्त देशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।”
मुख्यमंत्री का यह संदेश मध्य प्रदेश के लिए इसलिए भी विशेष है, क्योंकि प्रदेश में राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूरे होने पर बीते एक साल से जन-उत्सव मनाया जा रहा था। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में 7 नवंबर 2025 को भोपाल के शौर्य स्मारक से इस वर्षभर के आयोजन की शुरुआत हुई थी, और आज 7 नवंबर 2026 को इसका समापन सप्ताह पूरा हो रहा है। इस तरह मध्य प्रदेश वह प्रदेश रहा, जिसने राष्ट्रगीत के डेढ़ सौ साल को केवल एक दिन के कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पूरे एक वर्ष तक गांव-गांव और शहर-शहर इसका गायन कराया।
1875 से 2026: वंदे मातरम का डेढ़ सौ साल का सफर
वंदे मातरम की कहानी 1875 से शुरू होती है, जब महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इस गीत की रचना की थी। संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में लिखा गया यह गीत भारत को मां के रूप में चित्रित करता है। ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ है — मां, मैं तुझे प्रणाम करता हूं। यही भावना इस गीत को केवल एक कविता से बढ़कर राष्ट्र की वंदना बना देती है।
यह गीत बंकिमचंद्र के प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल हुआ, जो 1882 में प्रकाशित हुआ। उपन्यास के माध्यम से यह गीत देशभर के पाठकों तक पहुंचा और धीरे-धीरे स्वतंत्रता संग्राम का स्वर बन गया। 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को गाया, जिससे इसे राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली। इसके बाद 1905 में बंगाल के विभाजन के विरोध में चले स्वदेशी आंदोलन के दौरान वंदे मातरम जन-जन का नारा बन गया। सभाओं, जुलूसों और आंदोलनों में इस गीत के स्वर गूंजने लगे।
1937 में कांग्रेस ने तय किया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल इसके पहले दो अंतरे गाए जाएंगे। आजादी के बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया, जबकि जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया। तब से लेकर आज तक यह गीत हर राष्ट्रीय अवसर पर गाया जाता है और भारत की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बना हुआ है।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय: साहित्य सम्राट की कहानी
राष्ट्रगीत के रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 26 जून 1838 को बंगाल के नैहाटी के पास कांठलपाड़ा गांव में हुआ था। वे बांग्ला साहित्य के सबसे बड़े उपन्यासकारों में गिने जाते हैं और उन्हें साहित्य सम्राट की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने दुर्गेशनंदिनी, कपालकुंडला, देवी चौधुरानी और आनंदमठ जैसे चौदह उपन्यास लिखे, जिन्होंने आधुनिक भारतीय साहित्य की नींव रखी।

बंकिमचंद्र ने लेखन के साथ-साथ करीब तीन दशक तक सरकारी सेवा भी की और 1891 में सेवानिवृत्त हुए। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें राय बहादुर और कंपेनियन ऑफ द इंडियन एम्पायर की उपाधि से सम्मानित किया। 8 अप्रैल 1894 को उनका निधन हो गया, लेकिन वंदे मातरम के रूप में उनकी रचना आज भी जीवित है। हर वर्ष उनकी जयंती और राष्ट्रगीत की वर्षगांठ पर देश उन्हें नमन करता है।
मध्य प्रदेश में वर्षभर गूंजा वंदे मातरम
मध्य प्रदेश में वंदे मातरम 151वीं वर्षगांठ के अवसर पर राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूरे होने का वर्षभर चला उत्सव संपन्न हो रहा है। संस्कृति, पर्यटन और धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व राज्यमंत्री धर्मेंद्र भाव सिंह लोधी ने इस आयोजन की घोषणा करते हुए बताया था कि यह जन-उत्सव 7 नवंबर 2025 से शुरू होकर 7 नवंबर 2026 तक चलेगा। राज्य स्तरीय मुख्य समारोह 7 नवंबर 2025 को सुबह साढ़े नौ बजे भोपाल के शौर्य स्मारक में आयोजित किया गया था, जिसमें मुख्यमंत्री समेत अधिकारी और कर्मचारी शामिल हुए थे।
यह आयोजन चार चरणों में बांटा गया था। पहला चरण 7 से 14 नवंबर 2025 तक चला। दूसरा चरण 19 से 26 जनवरी 2026 तक गणतंत्र दिवस के अवसर पर आयोजित हुआ। तीसरा चरण 7 से 15 अगस्त 2026 तक हर घर तिरंगा अभियान के साथ चला। चौथा और अंतिम चरण 1 से 7 नवंबर 2026 तक समापन सप्ताह के रूप में मनाया गया। इस दौरान प्रदेश के सभी जिलों, तहसीलों और विकासखंड मुख्यालयों पर वंदे मातरम का सामूहिक गायन हुआ। शासकीय और अशासकीय विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी गीत का गायन कराया गया। पंचायतों और नगरीय निकायों में भी कार्यक्रम आयोजित हुए, ताकि राष्ट्रगीत की गूंज प्रदेश के हर कोने तक पहुंचे।
दो अंतरा या छह: सुप्रीम कोर्ट में चल रहा मामला
वंदे मातरम को लेकर एक कानूनी बहस भी चल रही है। वर्तमान में राष्ट्रगीत के रूप में इसके पहले दो अंतरे ही गाए जाते हैं। कुछ याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर मांग की है कि पूरे छह अंतरे वाले वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जाए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पूरा गीत ही राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता पाने का हकदार है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका पर 28 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है और इस मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर को होगी। अदालत ने अभी इस पर कोई फैसला नहीं सुनाया है, इसलिए यह मामला विचाराधीन है। इस बहस से अलग, राष्ट्रगीत के पहले दो अंतरे ही आधिकारिक रूप से गाए जाते हैं और देशभर में इन्हीं का गायन होता है।
आगे क्या: युवा पीढ़ी तक पहुंचे राष्ट्रगीत का संदेश
वंदे मातरम 151वीं वर्षगांठ केवल इतिहास को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह युवा पीढ़ी तक इसके संदेश को पहुंचाने का भी मौका है। मध्य प्रदेश में वर्षभर चले जन-उत्सव ने स्कूलों और कॉलेजों के लाखों विद्यार्थियों को इस गीत से जोड़ा है। आने वाले दिनों में भी शिक्षण संस्थानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के गायन की परंपरा जारी रहेगी।
वंदे मातरम का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना डेढ़ सौ साल पहले था। राष्ट्र-प्रथम की भावना, मातृभूमि के प्रति समर्पण और एकता का संदेश हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा है। 151वीं वर्षगांठ पर राष्ट्रपति से लेकर मुख्यमंत्री तक के संदेशों में यही भावना झलकती है कि यह गीत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य के भारत के निर्माण की प्रेरणा भी है।
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