सार: भारत और यूरोपीय संघ के बीच शनिवार को एक बड़े वैज्ञानिक समझौते की दिशा में निर्णायक कदम उठा। भारत अब यूरोप के सबसे बड़े शोध और नवाचार कार्यक्रम होराइजन यूरोप से जुड़ने जा रहा है। इसके साथ ही भारतीय शोधकर्ताओं, संस्थानों और उद्योग जगत के लिए 93.5 अरब यूरो के कार्यक्रम के द्वार खुल गए हैं।
भारत और यूरोपीय संघ ने शनिवार, 7 नवंबर 2026 को होराइजन यूरोप कार्यक्रम से भारत के जुड़ाव को लेकर चल रही बातचीत पूरी होने की घोषणा की। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि दोनों पक्षों के बीच समझौते की वार्ता सफलतापूर्वक संपन्न हुई है। यह कदम भारत और यूरोप के बीच विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग को एक स्थायी संस्थागत ढांचे में बदलने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
होराइजन यूरोप यूरोपीय संघ का प्रमुख शोध और नवाचार कार्यक्रम है, जिसका कुल बजट 2021 से 2027 की अवधि के लिए 93.5 अरब यूरो रखा गया है। भारत के इस कार्यक्रम से जुड़ने के बाद देश के शोधकर्ता यूरोपीय संघ की ओर से मिलने वाली शोध निधि के लिए साझा परियोजनाओं के माध्यम से आवेदन कर सकेंगे। उन्हें यूरोप के शोध समूहों और अत्याधुनिक शोध सुविधाओं तक भी पहुंच मिलेगी।
क्या है होराइजन यूरोप कार्यक्रम
होराइजन यूरोप को यूरोपीय संघ का अब तक का सबसे बड़ा शोध और नवाचार कार्यक्रम माना जाता है। यह कार्यक्रम 2021 में शुरू हुआ था और 2027 तक चलेगा। इसके तहत स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक, उद्योग, अंतरिक्ष, जलवायु, ऊर्जा, परिवहन, खाद्य और जैव-अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में शोध को बढ़ावा दिया जाता है। कार्यक्रम का उद्देश्य यूरोप में वैज्ञानिक शोध को गति देना और दुनिया भर के शोधकर्ताओं को साझा मंच देना है।
भारत से पहले भी यूरोपीय संघ के बाहर के कई देश इस कार्यक्रम से जुड़ चुके हैं। भारत के जुड़ने से कार्यक्रम का दायरा और व्यापक होगा, क्योंकि भारत के पास बड़ी संख्या में शोधकर्ता, वैज्ञानिक संस्थान और तकनीकी विशेषज्ञ हैं। जानकारों का मानना है कि भारत की भागीदारी से दोनों पक्षों को लाभ होगा — यूरोप को भारतीय प्रतिभा और शोध क्षमता मिलेगी, जबकि भारत को यूरोपीय शोध तंत्र और संसाधनों तक पहुंच मिलेगी।
जनवरी के शिखर सम्मेलन से नवंबर तक का सफर
भारत के होराइजन यूरोप से जुड़ने की प्रक्रिया इस साल जनवरी में शुरू हुई थी। 27 जनवरी 2026 को हुए भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के बाद इस संभावना पर विचार शुरू हुआ। इसके बाद 15 जुलाई 2026 को ब्रसेल्स में हुई व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद की मंत्रिस्तरीय बैठक के बाद औपचारिक बातचीत शुरू हुई। करीब चार महीने की बातचीत के बाद अब दोनों पक्ष समझौते के अंतिम चरण तक पहुंच गए हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर की प्रक्रिया जनवरी में पूरी होने की संभावना जताई गई है। दोनों पक्षों की ओर से आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ही समझौता औपचारिक रूप से लागू होगा। आधिकारिक बयान में कहा गया है कि यह जुड़ाव दोनों पक्षों के बीच दीर्घकालिक संस्थागत शोध सहयोग की दिशा में एक रणनीतिक कदम है।
होराइजन यूरोप से भारतीय शोधकर्ताओं को क्या मिलेगा
इस समझौते का सबसे सीधा लाभ भारतीय शोधकर्ताओं को मिलेगा। वे अब होराइजन यूरोप के तहत मिलने वाली शोध निधि के लिए यूरोपीय साझेदारों के साथ मिलकर परियोजनाएं तैयार कर सकेंगे। उन्हें यूरोप के बड़े शोध समूहों से जुड़ने और वहां की अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं और शोध सुविधाओं का उपयोग करने का अवसर मिलेगा।
इसके साथ ही प्रतिभाओं की आवाजाही भी बढ़ेगी। भारतीय वैज्ञानिक और शोध छात्र यूरोपीय संस्थानों में काम कर सकेंगे, जबकि यूरोपीय शोधकर्ता भारतीय संस्थानों के साथ जुड़ सकेंगे। आधिकारिक बयान के अनुसार, इस सहयोग से महत्वपूर्ण तकनीकों, मानकों और समाधानों का साझा विकास बड़े पैमाने पर संभव होगा। इससे भारत के नवाचार तंत्र को भी मजबूती मिलेगी।
पिलर-दो: स्वास्थ्य से अंतरिक्ष तक
होराइजन यूरोप के दूसरे स्तंभ के तहत आने वाले विषय भारत की शोध प्राथमिकताओं से काफी हद तक मेल खाते हैं। इनमें स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक, उद्योग और अंतरिक्ष, जलवायु, ऊर्जा और परिवहन, खाद्य और जैव-अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्र शामिल हैं। ये वही क्षेत्र हैं, जिनमें भारत पहले से काम कर रहा है और जिनमें देश की वैज्ञानिक ताकत मानी जाती है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई दवाओं और इलाज की विधियों पर शोध, डिजिटल तकनीक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कंप्यूटिंग, अंतरिक्ष में उपग्रह तकनीक और जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपाय — इन सभी में भारत और यूरोप मिलकर काम कर सकते हैं। खाद्य सुरक्षा और जैव-अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भी दोनों पक्षों के बीच सहयोग की बड़ी संभावना है, क्योंकि भारत कृषि प्रधान देश है और यूरोप के पास इस क्षेत्र में उन्नत तकनीक है।
भारत-यूरोपीय संघ विज्ञान सहयोग की पृष्ठभूमि
भारत और यूरोपीय संघ के बीच वैज्ञानिक सहयोग कोई नया नहीं है। दोनों पक्षों के बीच विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहयोग का समझौता पहली बार 2001 में हुआ था। इस समझौते को हाल ही में 2030 तक के लिए बढ़ाया गया है। इसके तहत दोनों पक्ष पहले से ही कई शोध परियोजनाओं पर साथ काम कर रहे हैं।
जनवरी 2026 के शिखर सम्मेलन में भारत और यूरोपीय संघ ने 2030 तक के लिए एक साझा व्यापक रणनीतिक एजेंडा भी अपनाया था। शोध और नवाचार इस एजेंडे का एक प्रमुख स्तंभ है। होराइजन यूरोप से जुड़ाव उसी एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है। इससे दोनों पक्षों के बीच विज्ञान, तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में सहयोग और गहरा होगा।
विकसित भारत 2047 से जुड़ाव
आधिकारिक बयान में कहा गया है कि यह जुड़ाव देश के नवाचार तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। वैज्ञानिक शोध और तकनीकी नवाचार इस लक्ष्य की नींव माने जाते हैं। यूरोप के साथ सहयोग से भारत को उन्नत तकनीक, शोध पद्धतियों और वैश्विक मानकों तक पहुंच मिलेगी, जिससे देश की शोध क्षमता और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
जानकारों का कहना है कि भारत के लिए यह समझौता सिर्फ शोध निधि तक पहुंच का मामला नहीं है। यह भारत को वैश्विक विज्ञान और तकनीक के केंद्र में लाने वाला कदम है। यूरोपीय संघ के साथ इस तरह का संस्थागत सहयोग भारत की वैज्ञानिक साख को भी मजबूत करेगा और देश के युवाओं के लिए शोध के क्षेत्र में नए अवसर खोलेगा।
आगे क्या होगा
बातचीत पूरी होने के बाद अब दोनों पक्ष औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर की तैयारी करेंगे। इसके लिए दोनों ओर से आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी। हस्ताक्षर के बाद समझौता लागू होगा और भारतीय शोधकर्ता होराइजन यूरोप की निधि के लिए आवेदन कर सकेंगे। शोध संस्थानों और उद्योग जगत को भी इस प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी आने वाले समय में दी जाएगी।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। जनवरी 2026 में शुरू हुई यह प्रक्रिया नवंबर 2026 में एक ठोस परिणाम तक पहुंच गई है। अब सबकी नजर औपचारिक हस्ताक्षर और समझौते के लागू होने पर रहेगी।
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