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दीपावली पर जवानों के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह: आज बागडोगरा-सुकना, कल नाथू ला के पास शेरथांग युद्ध स्मारक पर श्रद्धांजलि

सांकेतिक चित्र: पहाड़ों के बीच दीये और जवान सांकेतिक चित्र: पहाड़ों के बीच दीये और जवान

नई दिल्ली ब्यूरो

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जवानों के साथ दीपावली मना रहे हैं। शनिवार को दीपावली की पूर्व संध्या पर वह दार्जिलिंग के बागडोगरा एयरफील्ड और सिलीगुड़ी के सुकना में तैनात जवानों से मिल रहे हैं, और कल दीपावली के दिन सिक्किम के शेरथांग युद्ध स्मारक जाकर देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले वीर सपूतों को श्रद्धांजलि देंगे। शेरथांग वही जगह है, जहाँ से कुछ ही दूरी पर नाथू ला दर्रा है — 1967 में यहीं भारतीय जवानों ने चीन की सेना को पीछे धकेल दिया था।

राजनाथ सिंह जवानों के साथ दीपावली: बागडोगरा से सुकना तक का कार्यक्रम

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शनिवार सुबह सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपने कार्यक्रम की जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि आज, दीपावली की पूर्व संध्या पर, वह दार्जिलिंग में बागडोगरा एयरफील्ड और सुकना (सिलीगुड़ी) में भारतीय सेना के जवानों से मुलाकात करके उनसे बातचीत करेंगे। सुकना में सेना की त्रिशक्ति कोर (33 कोर) का मुख्यालय है, इसलिए यह दौरा पूर्वी सेक्टर की सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।

रक्षा मंत्री जवानों के साथ दीपावली की खुशियाँ साझा करेंगे और उनका हौसला बढ़ाएँगे। दीपावली जैसे बड़े त्योहार पर घर से दूर, सीमा पर तैनात जवानों के बीच पहुँचकर नेतृत्व का सीधा संवाद स्थापित करना इस दौरे का मकसद बताया जा रहा है। जवानों के लिए यह मुलाकात इसलिए भी खास है, क्योंकि त्योहार के दिन परिवार से दूर रहने वाले सैनिकों को यह एहसास होता है कि पूरा देश उनके साथ खड़ा है।

कल दीपावली पर शेरथांग युद्ध स्मारक

रक्षा मंत्री ने अपने संदेश में आगे बताया कि राजनाथ सिंह जवानों के साथ दीपावली मनाने के क्रम में कल, 8 नवंबर को, यानी दीपावली के दिन, सिक्किम स्थित शेरथांग युद्ध स्मारक जाएँगे और देश की सेवा करते हुए अपने प्राण न्योछावर करने वाले भारत के वीर सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। साथ ही, वह इस क्षेत्र में तैनात रक्षा कर्मियों से भी मुलाकात कर उनसे संवाद करेंगे। उन्होंने यह भी लिखा कि उन्हें इस कार्यक्रम का बेसब्री से इंतजार है।

सांकेतिक चित्र: युद्ध स्मारक और अमर ज्योति

शेरथांग युद्ध स्मारक पूर्वी सिक्किम में भारत-चीन सीमा पर नाथू ला दर्रे के पास स्थित है। इसे ‘वाटरशेड शहीद युद्ध स्मारक’ भी कहा जाता है। स्मारक स्थल पर कुछ पट्टिकाएँ लगी हैं और यहाँ एक ‘अमर जवान’ स्मारक भी है, जहाँ हमेशा जलने वाली अमर ज्योति उन बहादुर सैनिकों को श्रद्धांजलि देती है, जिन्होंने सीमा पर हुई लड़ाइयों में अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। रक्षा मंत्री का इस स्मारक पर जाना शहीदों के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जा रहा है।

शेरथांग क्यों खास है: नाथू ला के पास का ऐतिहासिक कस्बा

शेरथांग सिक्किम के गंगटोक जिले में नाथू ला दर्रे के पास स्थित एक कस्बा है। इस जगह को भारत और चीन के बीच व्यापार के लिए सीमा शुल्क और जाँच केंद्र के रूप में चुना गया है। चीन की तरफ इसके सामने ‘रिनकिंगैंग’ नाम की जगह है। भारत में शेरथांग और तिब्बत में रिंचेनगांग स्थानीय सीमा-पार व्यापार के लिए भारत-चीन सीमा व्यापार केंद्र के रूप में निर्धारित किए गए हैं। साल 2003 में भारत और चीन की सरकारों ने इन स्थानों को सीमा व्यापार केंद्र के रूप में इस्तेमाल करने पर सहमति जताई थी।

शेरथांग में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) की एक चौकी है, जो भारत-चीन सीमा कार्मिक बैठक बिंदुओं (BPM पॉइंट्स) में से एक है। यहाँ इंडिया पोस्ट और चाइना पोस्ट के बीच हफ्ते में दो बार अंतरराष्ट्रीय डाक का आदान-प्रदान होता है। इसके अलावा, 1967 में नाथू ला और चो ला में हुई झड़पों के दौरान शहीद हुए भारतीय सेना के जवानों और युद्ध नायकों की याद में शेरथांग में यह युद्ध स्मारक बना हुआ है। यही वजह है कि रक्षा मंत्री का दीपावली के दिन यहाँ जाना केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि इतिहास और बलिदान से जुड़ा एक भावनात्मक पल भी है।

11 सितंबर 1967: कंटीले तार से तीन दिन की झड़प तक

शेरथांग युद्ध स्मारक की कहानी 1967 की नाथू ला और चो ला की झड़पों से जुड़ी है। 13 अगस्त 1967 से चीनी सैनिकों ने सिक्किम की तरफ नाथू ला में खाइयाँ खोदना शुरू कर दिया। भारतीय सैनिकों ने देखा कि इनमें से कुछ खाइयाँ सीमा के स्पष्ट रूप से सिक्किम वाले हिस्से में थीं। उन्होंने स्थानीय चीनी कमांडर का ध्यान इस ओर दिलाया और उनसे वहाँ से हटने को कहा। एक बार तो चीनी सैनिकों ने खाइयों को वापस भर दिया, लेकिन वहाँ पहले से मौजूद 21 लाउडस्पीकरों के साथ 8 और लाउडस्पीकर लगाकर चले गए। भारतीय सैनिकों ने सीमा को दर्शाने के लिए नाथू ला की पहाड़ियों पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने का फैसला किया।

18 अगस्त से सीमा के साथ-साथ तार लगाए जाने लगे, जिसका चीनी सैनिकों ने विरोध किया। दो दिन बाद, हथियारों से लैस चीनी सैनिकों ने उन भारतीय सैनिकों के सामने मोर्चा संभाल लिया जो तार लगाने का काम कर रहे थे, हालांकि उन्होंने कोई गोलीबारी नहीं की। फिर 7 सितंबर को, जब भारतीय सैनिकों ने नाथू ला के दक्षिणी हिस्से में एक और कंटीले तारों की बाड़ लगानी शुरू की, तो स्थानीय चीनी कमांडर अपने सैनिकों के साथ वहाँ पहुँच गए। उन्होंने भारतीय लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव को काम रोकने की ‘गंभीर चेतावनी’ दी। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच हाथापाई हो गई, जिसमें दोनों तरफ के कुछ सैनिक घायल हो गए।

हालात को सुलझाने के लिए भारतीय सैन्य अधिकारियों ने 11 सितंबर 1967 को नाथू ला से सेबू ला तक दर्रे के बीच में एक और तार लगाने का फैसला किया, ताकि वे अपनी समझ के अनुसार सीमा को स्पष्ट कर सकें। 11 सितंबर 1967 की सुबह भारतीय सेना के इंजीनियरों और जवानों ने सीमा के पास नाथू ला से सेबू ला तक बाड़ लगाने का काम शुरू किया। भारतीय पक्ष के अनुसार, तभी चीनी राजनीतिक कमिसार रेन रोंग, पैदल सेना के एक दस्ते के साथ दर्रे के बीच में आ गए, जहाँ भारतीय लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह यादव अपनी कमांडो प्लाटून के साथ मौजूद थे। रोंग ने यादव से बाड़ लगाने का काम रोकने को कहा। भारतीय सैनिकों ने आदेश मिलने का हवाला देते हुए काम रोकने से इनकार कर दिया। इसके बाद बहस शुरू हो गई, जो जल्द ही हाथापाई में बदल गई। इसके बाद चीनी सैनिक अपने बंकरों में वापस चले गए और भारतीय सैनिकों ने फिर से बाड़ लगाने का काम शुरू कर दिया।

इसके कुछ ही मिनटों बाद, चीनी पक्ष की ओर से एक सीटी बजाई गई और फिर उत्तरी हिस्से से भारतीय सैनिकों पर मीडियम मशीन गन से गोलीबारी शुरू हो गई। दर्रे में आड़ न होने के कारण, शुरुआत में भारतीय सैनिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसके कुछ ही देर बाद, चीनी सेना ने भारतीय सैनिकों पर तोपखाने से हमला कर दिया। थोड़ी देर बाद, भारतीय सैनिकों ने भी अपनी तरफ से तोपखाने से जवाबी हमला किया। अगले तीन दिनों तक दिन-रात झड़पें चलती रहीं, जिसमें तोपखाने, मोर्टार और मशीन गनों का इस्तेमाल हुआ। इस दौरान भारतीय सैनिकों ने चीनी सेना को पीछे धकेल दिया। झड़पें शुरू होने के पाँच दिन बाद एक अस्थिर युद्धविराम हुआ।

सेबू ला और ‘कैमल्स बैक’ जैसे ऊँचे स्थानों पर कब्जा होने के कारण भारतीय सैनिकों को रणनीतिक बढ़त हासिल थी, जिसकी मदद से वे नाथू ला में चीनी सेना के कई बंकरों को नष्ट करने में सफल रहे। 11 से 15 सितंबर 1967 को नाथू ला में जब चीनी सैनिकों ने भारतीय चौकियों पर हमला किया, तो उस वक्त लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह जैसे कमांडरों के मजबूत नेतृत्व में भारतीय सेना डटी रही। उन्होंने भारी तोपखाने का इस्तेमाल किया और इस दर्रे पर अपना रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखा। सगत सिंह की प्रतिमा का अनावरण नाथू ला में वर्षगाँठ समारोह के दौरान किया गया था।

इस झड़प के कुछ समय बाद ही 1 अक्टूबर 1967 में चो ला झड़प हो गई। यहाँ भी भारतीय सैनिकों ने एक बार फिर अपनी स्थिति को मजबूती से संभाले रखा। यह सैन्य संघर्ष एक दिन तक चला, जिसमें चीनी सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया गया। इससे भारतीय सैनिकों का मनोबल बढ़ा। भारतीय मेजर जनरल शेरू थपलियाल के अनुसार, इस झड़प के दौरान चीनी सैनिकों को चो ला में लगभग तीन किलोमीटर पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। 15 और 16 सितंबर को शहीद हुए सैनिकों के शवों का आदान-प्रदान किया गया।

इन झड़पों में हुए नुकसान को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। भारत के रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, इन दो घटनाओं में भारतीय पक्ष के 88 सैनिक मारे गए और 163 घायल हुए, जबकि चीनी पक्ष के 340 सैनिक मारे गए और 450 घायल हुए। वहीं, चीन के दावों के अनुसार, नाथू ला की घटना में चीनी पक्ष के 32 और भारतीय पक्ष के 65 सैनिक मारे गए थे। चो ला की घटना में 36 भारतीय सैनिक और ‘अज्ञात’ संख्या में चीनी सैनिक मारे गए। स्वतंत्र स्रोतों के अनुसार, नाथू ला और चो ला में हुई इन झड़पों में भारत को ‘निर्णायक रणनीतिक बढ़त’ मिली। जानकारों का मानना है कि इन झड़पों से पता चलता है कि भारत के खिलाफ बल प्रयोग करने के चीन के फैसले में उसके दावों की मजबूती कम हो गई थी। साथ ही नाथू ला की झड़पों में अपने सैनिकों के शानदार प्रदर्शन से भारत काफी संतुष्ट था। इसे 1962 के भारत-चीन युद्ध में मिली हार के बाद, भारतीय सेना की कार्यक्षमता में आए बड़े सुधार के संकेत के रूप में देखा गया।

जवानों के साथ त्योहार मनाने की परंपरा

भारत में नेताओं का जवानों के साथ त्योहार मनाने की परंपरा पुरानी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीमा पर तैनात सैनिकों के साथ दीपावली मनाने का सिलसिला वर्ष 2014 से लगातार जारी है। वर्ष 2014 में उन्होंने सियाचिन में जवानों के साथ दीपावली मनाई थी। इसके बाद 19 अक्टूबर 2017 को उत्तरी कश्मीर के गुरेज सेक्टर, 27 अक्टूबर 2019 को राजौरी और चार नवंबर 2021 को नौशहरा में सैनिकों के बीच पहुँचकर दीपावली मनाई थी।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी पहले प्रमुख त्योहारों के अवसर पर अग्रिम सैन्य चौकियों पर जाकर जवानों के साथ समय बिताते रहे हैं। दशहरे के मौके पर भी वह सैनिकों के बीच जाकर त्योहार मनाने की परंपरा निभाते रहे हैं। हालांकि, इस साल विदेश यात्रा के कारण वह दशहरे पर जवानों के बीच नहीं पहुँच पाए थे। दीपावली 2026 पर जवानों के बीच उनकी मौजूदगी उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहली दीपावली जवानों के साथ मना रहे हैं। वह 8 नवंबर को उत्तर 24-परगना जिले के हकीमपुर सीमा चौकी पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों के साथ समय बिताएँगे। वह सुबह लगभग 11 बजे बीएसएफ कैंप पहुँचेंगे और वहाँ तैनात जवानों से मिलकर दीपावली की शुभकामनाएँ साझा करेंगे। उनका यह फैसला भी उसी परंपरा से जुड़ा है, जिसमें त्योहार के दिन नेता सीमा पर तैनात जवानों के बीच पहुँचते हैं।

सीमा पर मनोबल और संदेश

रक्षा मंत्री का सिक्किम दौरा भारत और चीन के बीच सीमा पर जारी गतिविधियों के बीच हो रहा है। इस यात्रा के दौरान रक्षा मंत्री शेरथांग युद्ध स्मारक जाएँगे। यह दौरा भारतीय सेना के जवानों के योगदान और सीमा सुरक्षा में उनके बलिदान को सम्मान देने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण है। रक्षा मंत्री की यात्रा से सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात सैनिकों का मनोबल बढ़ाने और उनके साथ नेतृत्व का सीधा संवाद स्थापित करने पर भी जोर रहेगा।

त्योहार के मौके पर जवानों के बीच पहुँचना केवल एक औपचारिकता नहीं होती। जब देश का रक्षा मंत्री खुद सीमा पर आकर जवानों से मिलता है, तो इसका असर पूरे बल पर पड़ता है। राजनाथ सिंह जवानों के साथ दीपावली मनाकर यह संदेश दे रहे हैं कि जवानों की मेहनत और बलिदान को देश देख रहा है और उसकी कद्र करता है। शेरथांग जैसे स्मारक पर श्रद्धांजलि देना इस संदेश को और मजबूत करता है कि शहीदों की कुर्बानी को भुलाया नहीं गया है और उनकी याद आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

आगे क्या

कल दीपावली के दिन रक्षा मंत्री का शेरथांग युद्ध स्मारक का कार्यक्रम इस दौरे का सबसे भावनात्मक हिस्सा होगा। वहाँ वह शहीदों को श्रद्धांजलि देने के साथ-साथ इस क्षेत्र में तैनात जवानों से भी मुलाकात कर उनसे संवाद करेंगे। इस दौरे से जुड़े अपडेट और तस्वीरें सामने आने पर पूरी जानकारी सामने आएगी।

दीपावली का त्योहार देश भर में 8 नवंबर को मनाया जा रहा है। घर-घर दीये जलाए जाएँगे और लक्ष्मी पूजन होगा। ऐसे में सीमा पर तैनात जवानों के साथ नेताओं की मौजूदगी इस बात का संदेश देती है कि त्योहार की रोशनी सरहद तक पहुँचती है। राजनाथ सिंह जवानों के साथ दीपावली मनाकर यह बता रहे हैं कि जवानों के मनोबल के साथ-साथ सीमा सुरक्षा के प्रति देश की प्रतिबद्धता अडिग है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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