डेस्क रिपोर्ट
सार: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की पहली जिला स्तरीय श्रम बाजार रिपोर्ट में मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 29.3 प्रतिशत और भोपाल में 29.2 प्रतिशत युवा ऐसे पाए गए हैं जो न रोजगार में हैं, न शिक्षा में और न किसी प्रशिक्षण में। प्रदेश का औसत 22 प्रतिशत है, जबकि जबलपुर में यह दर सबसे कम 16.5 प्रतिशत दर्ज की गई है।
क्या है NEET, और किसकी गिनती हुई है
NEET का अर्थ है — न रोजगार में, न शिक्षा में, न प्रशिक्षण में। यह श्रेणी उन युवाओं को दर्शाती है जो 15 से 29 वर्ष की उम्र के बीच हैं और जिनका उस समय किसी काम, किसी पढ़ाई या किसी तरह के प्रशिक्षण से जुड़ाव नहीं पाया गया। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की यह रिपोर्ट आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के जनवरी से दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों पर आधारित है। खास बात यह है कि यह पहली बार है जब श्रम बाजार के प्रमुख संकेतक जिला स्तर पर जारी किए गए हैं। मध्य प्रदेश के 10 जिलों को इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है, और उन्हीं जिलों की तस्वीर अब सामने आई है।
ग्वालियर और भोपाल में हर 10 में से लगभग 3 युवा बाहर
रिपोर्ट के अनुसार ग्वालियर में 15 से 29 वर्ष के युवाओं में NEET की दर 29.3 प्रतिशत है, यानी हर 10 में से लगभग 3 युवा न काम में हैं, न पढ़ाई में और न प्रशिक्षण में। भोपाल में यह दर 29.2 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो ग्वालियर के लगभग बराबर है। खरगोन में यह आंकड़ा 28.4 प्रतिशत है। इसके उलट धार में दर 17 प्रतिशत और जबलपुर में 16.5 प्रतिशत है, जो प्रदेश के शामिल जिलों में सबसे कम है। पूरे प्रदेश का औसत 22 प्रतिशत बताया गया है। इन आंकड़ों से साफ है कि प्रदेश के अंदर भी जिलों के बीच बड़ा अंतर है — एक तरफ ग्वालियर-भोपाल जैसे बड़े शहरों में लगभग तीन में से एक युवा इस श्रेणी में है, तो दूसरी तरफ जबलपुर और धार में स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर है।

राजधानियों की तुलना: पटना सबसे ऊपर, भोपाल संयुक्त दूसरे पर
रिपोर्ट में राजधानियों की तुलना भी ध्यान खींचती है। पटना में NEET की दर 30.5 प्रतिशत के साथ सबसे ऊंची पाई गई है। भोपाल 29.2 प्रतिशत के साथ जयपुर के बराबर संयुक्त दूसरे स्थान पर है। यह तुलना इसलिए अहम है क्योंकि राजधानी शहरों में आमतौर पर शिक्षा संस्थानों, कोचिंग, सरकारी दफ्तरों और निजी क्षेत्र के अवसरों की मौजूदगी ज्यादा मानी जाती है, फिर भी वहां बड़ी संख्या में युवा रोजगार, शिक्षा और प्रशिक्षण — तीनों से बाहर मिले हैं। इससे यह सवाल उठता है कि अवसरों की उपलब्धता और युवाओं तक उनकी पहुंच के बीच कहां खाई रह जाती है।
रिपोर्ट कैसे तैयार हुई
यह रिपोर्ट सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी की गई है। इसका शीर्षक है — लेबर मार्केट स्नैपशॉट ऑफ सेलेक्टेड डिस्ट्रिक्ट्स। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण की रूपरेखा में जनवरी 2025 से बदलाव किया गया था, जिसके तहत जिलों को अलग स्तर के रूप में शामिल किया गया और सर्वेक्षण का चक्र कैलेंडर वर्ष के हिसाब से तय किया गया। इसी नई रूपरेखा के चलते पहली बार जिला स्तरीय अनुमान जारी हो सके हैं। पहले इस तरह के आंकड़े क्षेत्रीय स्तर पर ही उपलब्ध होते थे, इसलिए जिलों की अपनी अलग तस्वीर सामने नहीं आ पाती थी।
देश की तस्वीर: तीन-चौथाई से ज्यादा जिलों में दर 30 प्रतिशत से नीचे
राष्ट्रीय स्तर पर रिपोर्ट की तस्वीर यह है कि 45.9 प्रतिशत जिलों में NEET की दर 20 से 30 प्रतिशत के बीच है, 26.1 प्रतिशत जिलों में 10 से 20 प्रतिशत के बीच है, 23.7 प्रतिशत जिलों में 30 प्रतिशत से ऊपर है और 4.2 प्रतिशत जिलों में 10 प्रतिशत से नीचे है। कुल मिलाकर 76.2 प्रतिशत जिलों में यह दर 30 प्रतिशत से नीचे दर्ज की गई है। ज्यादा आबादी वाले जिलों में सबसे कम दर एर्नाकुलम में 9.6 प्रतिशत, कोयंबटूर में 14.5 प्रतिशत और बेंगलुरु अर्बन में 15.0 प्रतिशत पाई गई है। यह राष्ट्रीय पृष्ठभूमि बताती है कि मध्य प्रदेश के ग्वालियर और भोपाल की दरें राष्ट्रीय औसत रुझान से ऊपर की ओर हैं, जबकि जबलपुर और धार की दरें निचले दायरे में आती हैं।
आंकड़े अनुमान हैं, गिनती नहीं — सीमा समझना जरूरी
इन आंकड़ों को पढ़ते समय एक सावधानी बहुत जरूरी है। ये आंकड़े नमूना सर्वेक्षण पर आधारित अनुमान हैं, न कि हर युवा की गिनती। नमूना आधारित अनुमानों में उतार-चढ़ाव की गुंजाइश रहती है, इसलिए किसी एक जिले के आंकड़े को अंतिम सत्य की तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए। साथ ही, इस रिपोर्ट की तुलना पहले के क्षेत्रीय आधार वाले अनुमानों से सीधे नहीं की जा सकती, क्योंकि सर्वेक्षण की रूपरेखा ही बदल गई है। रिपोर्ट के अपने नोट में यह भी साफ किया गया है कि ये अनुमान किसी एक खास कारण की भूमिका को चिह्नित नहीं करते — यानी आंकड़े स्थिति बताते हैं, उसके पीछे का इकलौता कारण नहीं।
विशेषज्ञों की राय: पढ़ाई और रोजगार के बीच की खाई
इस रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए इंदौर स्कूल ऑफ सोशल वर्क की सेवानिवृत्त प्रोफेसर रंजना सहगल और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर के स्कूल ऑफ सोशल साइंस की प्रमुख रेखा आचार्य ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई ही सबसे बड़ी चुनौती है। उनके अनुसार युवाओं को सिर्फ डिग्री तक पहुंचाना काफी नहीं है — उन्हें ऐसा कौशल और ऐसा मार्गदर्शन चाहिए जो उन्हें काम तक पहुंचाए। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण, इंटर्नशिप और रोजगार से जुड़े अवसर बढ़ाए बिना यह दर नीचे लाना मुश्किल होगा। यह राय इसलिए भी अहम है क्योंकि ग्वालियर और भोपाल जैसे शहरों में शिक्षण संस्थान तो हैं, लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद काम तक का रास्ता हर युवा के लिए साफ नहीं है।
रोजगार की तलाश: 17.71 लाख पंजीकरण
रोजगार की तलाश में युवाओं की सक्रियता का एक और संकेत रोजगार पोर्टल के पंजीकरण से मिलता है। 30 जून 2026 तक इस पोर्टल पर 17.71 लाख पंजीकरण दर्ज किए गए थे। यह संख्या बताती है कि बड़ी तादाद में युवा काम की तलाश में औपचारिक व्यवस्था से जुड़ रहे हैं। सवाल यह है कि पंजीकरण और वास्तविक नियुक्ति के बीच का फासला कितना है, और किन क्षेत्रों में मांग और उपलब्ध कौशल के बीच मेल नहीं बैठ रहा है। जिला स्तरीय आंकड़े अब इस फासले को जिलेवार समझने का मौका देते हैं, ताकि हर जिले की जरूरत के हिसाब से योजना बनाई जा सके।
आगे का रास्ता: कौशल, स्थानीय मौके और मार्गदर्शन
इस रिपोर्ट के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगे क्या किया जाए। राज्य सरकार के स्तर पर रोजगार और कौशल से जुड़े कार्यक्रमों पर इस रिपोर्ट के बाद नजर रहेगी, क्योंकि जिला स्तरीय आंकड़े अब यह बताते हैं कि किस जिले में समस्या ज्यादा गहरी है। शहरी विकास से जुड़े मंथन में भी छोटे शहरों में रोजगार के अवसरों पर चर्चा हो रही है, और ऐसे मंचों पर यह मुद्दा उठना स्वाभाविक है। जानकारों के अनुसार तीन बातों पर एक साथ काम करना होगा — पहला, युवाओं को बाजार की मांग के हिसाब से कौशल प्रशिक्षण देना; दूसरा, स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के मौके पैदा करना ताकि पलायन ही इकलौता रास्ता न रहे; और तीसरा, पढ़ाई के दौरान ही करियर मार्गदर्शन देना ताकि युवा बीच में पढ़ाई छोड़ने के बजाय किसी न किसी प्रशिक्षण से जुड़े रहें।
क्यों मायने रखती है यह रिपोर्ट
यह रिपोर्ट इसलिए भी खास है क्योंकि अब तक नीति बनाने वालों के पास जिलों की अलग-अलग तस्वीर नहीं थी। राज्य के औसत से यह पता नहीं चलता था कि ग्वालियर में स्थिति जबलपुर से कितनी अलग है। अब जिला स्तरीय आंकड़े मिलने से हर जिले की अपनी योजना बन सकती है — कहां प्रशिक्षण केंद्र चाहिए, कहां उद्योगों से जुड़ाव बढ़ाना है और कहां पढ़ाई छोड़ने वाले युवाओं को वापस लाना है। युवा आबादी को देश की सबसे बड़ी ताकत कहा जाता है, लेकिन यह रिपोर्ट याद दिलाती है कि यह ताकत तभी काम आएगी जब युवा काम, पढ़ाई या प्रशिक्षण — किसी एक से जुड़े रहें।
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