नई दिल्ली ब्यूरो
सार: सर्वोच्च न्यायालय ने छह अंतरा वाले वंदे मातरम को निर्धारित अवसरों पर गाने और बजाने के सरकारी आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने इन याचिकाओं को पहले से लंबित समान मामलों के साथ जोड़ दिया है और अगली सुनवाई 30 नवंबर को तय की है। इस चरण में अदालत ने सिर्फ केंद्र का जवाब मांगा है, कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
देश की शीर्ष अदालत में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के स्वरूप को लेकर चल रही कानूनी बहस में मंगलवार को एक नया मोड़ आया। सर्वोच्च न्यायालय ने छह अंतरा वाले वंदे मातरम को अनिवार्य रूप से गाने और बजाने के निर्देशों को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया। अदालत का यह कदम इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे यह तय होगा कि सरकार कार्यकारी आदेशों के जरिए राष्ट्रीय गीत के निर्धारित स्वरूप में बदलाव कर सकती है या नहीं, और किसी नागरिक को राष्ट्रीय गीत गाने के लिए बाध्य किया जा सकता है या नहीं। याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ये मामले पहले से अदालत में लंबित समान याचिकाओं के साथ ही सुने जाएंगे, ताकि इस विषय पर एक समग्र और सुसंगत फैसला आ सके।
अदालत ने क्या किया
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मंगलवार, 27 अक्टूबर को इन याचिकाओं पर सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के बाद पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, जिसका अर्थ है कि अब केंद्र को इन याचिकाओं पर अपना पक्ष अदालत के सामने रखना होगा। अदालत ने दोनों याचिकाओं को पहले से लंबित समान मामलों के साथ जोड़ दिया है और अगली सुनवाई के लिए 30 नवंबर की तारीख तय की है। कानूनी प्रक्रिया के जानकारों के अनुसार नोटिस जारी होना किसी याचिका की स्वीकार्यता या उसके गुण-दोष पर अंतिम मुहर नहीं होता, बल्कि यह मामले की गंभीरता को देखते हुए दूसरे पक्ष को सुनने की औपचारिक शुरुआत होती है। इसलिए इस चरण में यह नहीं कहा जा सकता कि अदालत ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में कोई फैसला दिया है या सरकार के आदेशों पर कोई रोक लगाई है। अभी तक की कार्यवाही के अनुसार अदालत ने सिर्फ जवाब तलब किया है और मामले को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
किन याचिकाओं पर नोटिस जारी हुआ
जिन दो याचिकाओं पर नोटिस जारी हुआ है, वे बी. डी. बोरकर और पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी बालाकृष्णन सत्यभामा मावोजी की ओर से दायर की गई हैं। बोरकर को फुले-अंबेडकरवादी कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता है। इन याचिकाओं में केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से 28 जनवरी और 9 जुलाई 2026 को जारी किए गए दो आदेशों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन आदेशों के जरिए निर्धारित अवसरों पर वंदे मातरम के छह अंतरा वाले पूर्ण संस्करण को गाने और बजाने का निर्देश दिया गया है। याचिकाओं में इन आदेशों को रद्द करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में पक्ष रखते हुए यह दलील दी गई है कि ये आदेश संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से टकराते हैं। याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि सरकार के इन निर्देशों से देश की धर्मनिरपेक्ष छवि और विभिन्न समुदायों के बीच आपसी बंधुत्व प्रभावित हो सकता है।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें क्या हैं
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि आजादी के बाद से लगभग 79 वर्षों तक देश में वंदे मातरम का दो अंतरा वाला संस्करण ही सार्वजनिक समारोहों और सरकारी अवसरों पर गाया और बजाया जाता रहा है। याचिका में कहा गया है कि यह दो अंतरा वाला संस्करण मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन करता है और इसमें किसी देवी-देवता की स्तुति नहीं की गई है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार छह अंतरा वाला पूर्ण संस्करण बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ से लिया गया है, और उसके बाद के चार अंतरा में देवियों का आह्वान किया गया है। याचिका में यह दावा किया गया है कि इस पूर्ण संस्करण को अनिवार्य करने से अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं और समाज में विभाजन गहरा सकता है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि कार्यकारी आदेशों के जरिए राष्ट्रीय गीत के स्वरूप में बदलाव करना सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है, क्योंकि राष्ट्रीय गीत का स्वरूप कोई ऐसा विषय नहीं है जिसे केवल प्रशासनिक निर्देशों से बदला जा सके। याचिकाओं में मांग की गई है कि दोनों आदेशों को रद्द किया जाए, दो अंतरा वाले स्वतंत्र संस्करण को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दी जाए और किसी भी व्यक्ति को, विशेष रूप से स्कूली बच्चों को, छह अंतरा वाला संस्करण गाने या बजाने के लिए बाध्य न किया जाए। याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना है कि किसी व्यक्ति को गाने से इनकार करने पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
दूसरी दिशा की याचिका भी अदालत के सामने
इसी विषय पर अदालत के सामने एक बिल्कुल दूसरी दिशा की मांग भी लंबित है। अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर एक याचिका में दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित एक जनहित याचिका को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की गई है। उस जनहित याचिका में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के बराबर दर्जा दिए जाने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि वंदे मातरम देश के इतिहास, संप्रभुता, एकता और गौरव का प्रतीक है और इसलिए इसे राष्ट्रगान के समान सम्मान मिलना चाहिए। अदालत ने इस याचिका पर भी केंद्र को नोटिस जारी किया है और इसे समान याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है। इस तरह शीर्ष अदालत के सामने अब इस विषय के दोनों पहलू मौजूद हैं। एक ओर वे याचिकाएं हैं जो छह अंतरा वाले संस्करण की अनिवार्यता का विरोध करती हैं, और दूसरी ओर वह मांग है जो वंदे मातरम के दर्जे को और ऊंचा करने की पक्षधर है। अदालत को अब इन सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करना होगा, जिससे इस विषय पर एक संतुलित और व्यापक फैसला आ सके।
पहले की सुनवाई में अदालत क्या कह चुकी है
यह विषय अदालत के सामने पहली बार नहीं आया है। इससे पहले कर्नाटक संगीत की गायिका और लेखिका टी. एम. कृष्णा की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। सितंबर में हुई उस सुनवाई में अदालत ने कहा था कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार राष्ट्रीय गीत की लंबाई तय कर सकती है, लेकिन दंड की धमकी देकर किसी नागरिक को उसके सभी या किसी एक अंतरा को गाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। अदालत ने यह भी कहा था कि विवेक के आधार पर गाने से इनकार करने वाले व्यक्ति का सम्मान किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में अदालत ने 1986 के बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य के फैसले का भी उल्लेख किया था, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक सहिष्णुता और मौन आपत्ति के अधिकार को मान्यता दी गई थी। उस फैसले में कहा गया था कि किसी व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था के आधार पर किसी गीत को गाने से इनकार करने का अधिकार है और इस आधार पर उसे दंडित नहीं किया जा सकता। टी. एम. कृष्णा की याचिका में भी यही दलील दी गई है कि छह अंतरा वाले संस्करण को अनिवार्य करना धर्मनिरपेक्ष चरित्र से टकराता है। इन पहले की टिप्पणियों को देखते हुए अब 30 नवंबर की सुनवाई पर सबकी नजर रहेगी, क्योंकि अदालत को इन सिद्धांतों को मौजूदा आदेशों के संदर्भ में लागू करना होगा।
वंदे मातरम का इतिहास: दो अंतरा बनाम छह अंतरा
वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक की शुरुआत में की थी। इसके पहले दो अंतरा मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन करते हैं, जिसमें देश को एक सुंदर और समृद्ध भूमि के रूप में चित्रित किया गया है। बाद में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ में वंदे मातरम का छह अंतरा वाला पूर्ण संस्करण सामने आया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आजादी के बाद से लगभग 79 वर्षों तक देश में सार्वजनिक रूप से दो अंतरा वाला संस्करण ही गाया और बजाया जाता रहा, जिसे किसी देवी-देवता की स्तुति से अलग, मातृभूमि के सौंदर्य का गीत माना जाता था। याचिका के अनुसार यही संस्करण राष्ट्रीय गीत के रूप में प्रचलित रहा, भले ही इसे औपचारिक रूप से घोषित न किया गया हो। वर्ष 2026 में गृह मंत्रालय की ओर से जारी दो आदेशों के बाद निर्धारित अवसरों पर छह अंतरा वाले पूर्ण संस्करण को गाने और बजाने का निर्देश दिया गया, जिसके बाद यह कानूनी विवाद शुरू हुआ। अब अदालत को यह तय करना है कि क्या सरकार के पास इस तरह के बदलाव का अधिकार है और क्या इस बदलाव से किसी नागरिक के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं।
आगे क्या होगा
नोटिस जारी होने के बाद अब केंद्र सरकार को इन याचिकाओं पर अपना जवाब अदालत में दाखिल करना होगा। केंद्र की ओर से यह बताया जाएगा कि 28 जनवरी और 9 जुलाई 2026 के आदेश क्यों जारी किए गए, उनका कानूनी आधार क्या है और क्या इन आदेशों से किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन होता है। इसके बाद 30 नवंबर को अदालत सभी जुड़ी हुई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करेगी, जिसमें याचिकाकर्ताओं और केंद्र सरकार दोनों की दलीलें सुनी जाएंगी। इस सुनवाई में यह भी देखा जाएगा कि पहले की सुनवाइयों में अदालत की ओर से की गई मौखिक टिप्पणियों और 1986 के फैसले के सिद्धांत मौजूदा आदेशों पर कैसे लागू होते हैं। अदालत के फैसले का असर सिर्फ इस मामले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े भविष्य के विवादों के लिए भी एक दिशा तय कर सकता है। तब तक इस विषय पर अंतिम फैसला आना बाकी है और दोनों पक्षों की दलीलों का इंतजार किया जा रहा है। पाठकों को इस मामले की अगली सुनवाई की खबर भी समय पर दी जाएगी।
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