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सुप्रीम कोर्ट में अटकी मध्य प्रदेश सरकार की ओबीसी आरक्षण याचिका: रजिस्ट्री ने निकालीं 10 तकनीकी खामियां, तीन कैविएट भी दाखिल

सांकेतिक चित्र: सर्वोच्च न्यायालय सांकेतिक चित्र: सर्वोच्च न्यायालय

जबलपुर ब्यूरो

मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचने के बाद अब याचिका की तकनीकी खामियों को लेकर चर्चा में है। राज्य सरकार ने जबलपुर उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की है। इस याचिका को डायरी क्रमांक 65767/2026 मिला है। जानकारी के अनुसार, याचिका दायर होने के बाद 22 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री ने इसमें 10 तकनीकी आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों के कारण याचिका को अब तक नियमित नंबर जारी नहीं हो पाया है और वह नियमित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध भी नहीं हो सकी है।

रजिस्ट्री ने कौन सी खामियां निकालीं

रजिस्ट्री की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों का संबंध याचिका के दस्तावेजों की औपचारिकताओं से है। याचिका के आवरण पृष्ठ, अनुक्रमणिका और संलग्न दस्तावेजों पर दर्ज तारीखों में अंतर पाया गया है। पेज संख्या 1 से 11 और पेज 13 पर प्रस्तुत दस्तावेज स्पष्ट न होने के कारण उनकी साफ और टाइप की हुई प्रतियां जमा करने का निर्देश दिया गया है। बहुरंगी चार्ट और सूचना से जुड़े पन्नों की चार अलग-अलग प्रतियां भी मांगी गई हैं। पेज 18 की तारीख, अन्य आवेदनों की पेज नंबरिंग और पेज 392-393 की अस्पष्ट प्रतियों पर भी आपत्ति दर्ज की गई है। वकालतनामे में प्रमाणीकरण संबंधी आवश्यक उल्लेख छूट गए हैं और दूसरे याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर भी दर्ज नहीं हैं। राहत वाले भाग से अतिरिक्त विवरण हटाने को भी कहा गया है। इसके साथ ही उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के नाम दर्ज करने और पेज नंबरिंग दुरुस्त करने का निर्देश भी दिया गया है।

खामियां दूर होने तक सुनवाई क्यों नहीं

सर्वोच्च न्यायालय में किसी याचिका की नियमित सुनवाई से पहले रजिस्ट्री उसके दस्तावेजों की जांच करती है। यह जांच इसलिए होती है ताकि अदालत के सामने पेश होने वाला रिकॉर्ड साफ, पूरा और नियमों के अनुसार हो। जब रजिस्ट्री को कोई कमी मिलती है तो वह उसे डिफाल्ट के रूप में दर्ज करती है और याचिकाकर्ता को उसे दूर करने का मौका देती है। जब तक ये कमियां दूर नहीं हो जातीं, याचिका को नियमित नंबर नहीं मिलता और वह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं होती। मध्य प्रदेश सरकार की याचिका के मामले में भी यही स्थिति है। इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने याचिका के गुण-दोष पर कोई फैसला दे दिया है। ये आपत्तियां पूरी तरह प्रक्रियागत हैं और इन्हें दूर किया जा सकता है। खामियां दूर होने के बाद याचिका की नियमित प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

तीन कैविएट क्यों दाखिल हुए

इस मामले में तीन कैविएट भी दाखिल किए गए हैं। कैविएट एक कानूनी एहतियात है, जिसके जरिए कोई पक्ष अदालत से कहता है कि उसके हितों को प्रभावित करने वाला कोई आदेश उसकी अनुपस्थिति में न दिया जाए। जानकारी के अनुसार, 13 से 26 अक्टूबर के बीच यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन, सत्यम नंदन और रितु बड़ोले की ओर से कैविएट दाखिल किए गए। इन कैविएट में मांग की गई है कि उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने या कोई अन्य अंतरिम आदेश पारित करने से पहले उनका पक्ष अनिवार्य रूप से सुना जाए। कैविएट दाखिल होने का मतलब यह है कि अगर अदालत इस मामले में कोई अंतरिम राहत देने पर विचार करती है तो उसे पहले इन पक्षों को सुनवाई का अवसर देना होगा। इससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी एक पक्ष की बात सुनकर ऐसा आदेश न दिया जाए जो दूसरे पक्ष के हितों को प्रभावित करे।

सांकेतिक चित्र: सर्वोच्च न्यायालय
सांकेतिक चित्र: सर्वोच्च न्यायालय

उच्च न्यायालय ने क्या फैसला दिया था

इस पूरे मामले की जड़ जबलपुर उच्च न्यायालय का 9 अक्टूबर 2026 का फैसला है। उच्च न्यायालय ने 27 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण संबंधी प्रावधान को असंवैधानिक ठहराते हुए 14 प्रतिशत आरक्षण लागू रखने के निर्देश दिए थे। अदालत ने यह भी कहा था कि 13 प्रतिशत रोके गए पदों को अनारक्षित वर्ग से भरने की प्रक्रिया तीन महीने में पूरी की जाए। राज्य सरकार इसी फैसले को चुनौती देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय गई है। सरकार की कोशिश 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को बरकरार रखने की है, जबकि उच्च न्यायालय के फैसले के बाद फिलहाल 14 प्रतिशत की व्यवस्था लागू है। सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण का यह सवाल लाखों अभ्यर्थियों और छात्रों से जुड़ा है, इसलिए इस मामले पर पूरे प्रदेश की नजर है।

अधिवक्ता संगठन ने क्या कहा

ओबीसी एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने 26 अक्टूबर को जारी पत्र में कहा है कि सरकार की अपील दायर होने के बाद से ही डिफाल्ट में है। उनके अनुसार, रजिस्ट्री ने याचिका, आवेदनों और संलग्न दस्तावेजों को स्पष्ट, पठनीय तथा कागज के एक तरफ डबल स्पेस में टाइप करने संबंधी आपत्तियां दर्ज की हैं। एसोसिएशन का आरोप है कि सरकार ने अब तक इन कमियों को दूर करने के लिए प्रभावी पहल नहीं की है। रामेश्वर सिंह ठाकुर ने यह भी कहा है कि सरकार को उच्च न्यायालय के फैसले का स्वतंत्र विधि विशेषज्ञों से अध्ययन कराकर पिछड़ा वर्ग आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर नया कानून बनाने पर विचार करना चाहिए। एसोसिएशन ने यह आशंका भी जताई है कि सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने से अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण का मुद्दा लंबा खिंच सकता है। यह एसोसिएशन की राय है, जिसे उसी रूप में दर्ज किया जा रहा है।

विपक्ष ने क्या आरोप लगाया

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी इस मामले पर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अपने सार्वजनिक संदेश में कहा है कि 27 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय में लगाई गई याचिका में 10 खामियां निकली हैं, जिससे याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध तक नहीं हो सकी। उन्होंने यह भी कहा है कि सरकार के पास महाधिवक्ता, अतिरिक्त महाधिवक्ताओं और उप महाधिवक्ताओं की बड़ी टीम होने के बावजूद तारीखों में अंतर, अस्पष्ट दस्तावेज और बिना हस्ताक्षर के वकालतनामा पेश किए गए। उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव से सवाल करते हुए इसे वकीलों की अक्षमता या जानबूझकर अन्य पिछड़ा वर्ग को उसके हक से वंचित रखने की साजिश बताने तक की बात कही है। यह विपक्ष का राजनीतिक आरोप है, जिसकी पुष्टि के लिए सरकार का पक्ष भी जरूरी है।

सरकार की ओर से क्या कदम उठाए गए

राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपनी पैरवी मजबूत करने के लिए कई वरिष्ठ वकील नियुक्त किए हैं। जानकारी के अनुसार, सरकार ने इस मामले में सात अतिरिक्त महाधिवक्ता और चार उप महाधिवक्ता नियुक्त किए हैं। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह सहित कई वरिष्ठ वकील इस मामले से जुड़े हैं। हालांकि, याचिका में तकनीकी आपत्तियां सामने आने के बाद अब सरकार के सामने पहले इन कमियों को दूर करने की चुनौती है। इसके बाद ही सर्वोच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक सरकार की ओर से इन तकनीकी आपत्तियों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने की जानकारी नहीं मिली है। सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया आती है तो वह इस मामले की अगली कड़ी होगी।

आगे क्या होगा

अब इस मामले की अगली प्रक्रिया रजिस्ट्री की आपत्तियां दूर किए जाने और मामले की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने पर निर्भर करेगी। सरकार को पहले कवर पेज, अनुक्रमणिका और दस्तावेजों की तारीखों में अंतर दूर करना होगा। इसके बाद साफ और टाइप की हुई प्रतियां, बहुरंगी चार्ट की चार प्रतियां, सही पेज नंबरिंग और पूरा वकालतनामा जमा करना होगा। इन कमियों के दूर होते ही याचिका को नियमित नंबर मिलेगा और वह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो सकेगी। सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी ध्यान रखना होगा कि तीन कैविएट दाखिल हैं, इसलिए कोई अंतरिम आदेश देने से पहले कैविएट दाखिल करने वालों को सुना जाना जरूरी होगा। तब तक उच्च न्यायालय का फैसला प्रभावी रहेगा और 14 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू रहेगी।

इस मामले का व्यापक असर

अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण का मामला केवल एक कानूनी बहस नहीं है। इसका सीधा असर सरकारी नौकरियों की भर्तियों और उच्च शिक्षा में प्रवेश पर पड़ता है। 27 प्रतिशत और 14 प्रतिशत के बीच का अंतर हजारों पदों और सीटों से जुड़ा है। 13 प्रतिशत रोके गए पदों को अनारक्षित वर्ग से भरने की प्रक्रिया भी इसी फैसले से जुड़ी है। इसलिए इस मामले में होने वाली हर प्रक्रियागत देरी भी अभ्यर्थियों के लिए मायने रखती है। अगर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका जल्द सूचीबद्ध होती है तो मामले की दिशा साफ होगी। अगर खामियां दूर करने में देर होती है तो अनिश्चितता बनी रहेगी। यही वजह है कि इस मामले की तकनीकी प्रगति पर भी प्रदेश भर के अभ्यर्थियों, अधिवक्ताओं और राजनीतिक दलों की नजर टिकी हुई है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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