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इंदौर में कचरा गाड़ियों की आवाज़ पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: लाउडस्पीकर की आवाज़ में कम से कम 25 प्रतिशत की कटौती, हर थाने में लगेगा ध्वनि मापक यंत्र

सांकेतिक चित्र: कचरा संग्रहण वाहन सांकेतिक चित्र: कचरा संग्रहण वाहन

इंदौर ब्यूरो

सार: इंदौर ध्वनि प्रदूषण हाईकोर्ट आदेश में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए नगर निगम को कचरा संग्रहण वाहनों के लाउडस्पीकर की आवाज़ में कम से कम 25 प्रतिशत की कटौती करने का निर्देश दिया है। अदालत ने हर थाने में ध्वनि मापक यंत्र उपलब्ध कराने, हर वार्ड में दो स्वयंसेवक नियुक्त करने और तीन सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का भी आदेश दिया है।

इंदौर ध्वनि प्रदूषण हाईकोर्ट आदेश: कचरा गाड़ियों की आवाज़ पर क्या कहा गया

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने सोमवार को हुई अदालत की सुनवाई में इंदौर नगर निगम को निर्देश दिया कि कचरा संग्रहण वाहनों के लाउडस्पीकर की आवाज़ को अनुमेय डेसिबल सीमा तक लाया जाए और इसमें कम से कम 25 प्रतिशत की कमी की जाए। अदालत का कहना था कि कचरा गाड़ियों से बजने वाले स्वच्छता गीत निवासियों को सचेत करने में मदद करते हैं, लेकिन कई बार इनकी आवाज़ कानूनी सीमा से अधिक हो जाती है। यही वजह है कि अदालत ने इस पर सीधा और स्पष्ट निर्देश जारी किया है।

यह निर्देश एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया। खंडपीठ में न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई शामिल थे। याचिका की ओर से अधिवक्ता अभिनव धनोदकर ने पक्ष रखा। अदालत ने नगर निगम से तीन सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट मांगी है, ताकि यह देखा जा सके कि निर्देशों पर जमीन पर कितना अमल हुआ है।

इंदौर देश के सबसे स्वच्छ शहरों में गिना जाता है और यहाँ सुबह-सुबह कचरा गाड़ियों की आवाज़ हर मोहल्ले की पहचान बन गई है। लेकिन अदालत के सामने यह सवाल उठा कि स्वच्छता का संदेश देने वाली आवाज़ जब सीमा से अधिक हो जाए, तो वह लोगों की नींद, स्वास्थ्य और शांति के अधिकार से टकराने लगती है। इसी संतुलन को साधने के लिए अदालत ने आवाज़ घटाने का आदेश दिया है, न कि गाड़ियों के गीत पूरी तरह बंद करने का।

हर थाने में ध्वनि मापक यंत्र और हर वार्ड में दो स्वयंसेवक

इंदौर ध्वनि प्रदूषण हाईकोर्ट आदेश में सबसे अहम बदलाव शिकायत और निगरानी की व्यवस्था में किया गया है। अदालत ने कहा है कि इंदौर के हर थाने में पुलिस कर्मियों को ध्वनि मापक यंत्र उपलब्ध कराए जाएँ, ताकि शोर की शिकायत मिलने पर उसे मापा जा सके और कानून के अनुसार कार्रवाई हो सके। सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि खजराना के सहायक पुलिस आयुक्त आशीष पटेल एक पहले की सुनवाई में ध्वनि मापक यंत्र लेकर आए थे, लेकिन उसका सार्वजनिक रूप से उल्लंघन दर्ज करने और कार्रवाई शुरू करने के लिए इस्तेमाल नहीं हुआ था। अदालत ने इस स्थिति पर नाराज़गी जताई और यंत्रों की वास्तविक उपलब्धता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

इसके साथ ही अदालत ने हर थाने के थाना प्रभारी को निर्देश दिया है कि हर वार्ड से दो स्वयंसेवक नियुक्त किए जाएँ, जो ध्वनि प्रदूषण के उल्लंघन की सूचना पुलिस को देंगे। ये स्वयंसेवक अत्यधिक शोर करने वाले व्यक्तियों या वाहनों के बारे में पुलिस को सचेत कर सकेंगे और अपने मोबाइल फोन पर उल्लंघन दर्ज कर सकेंगे। जो निवासी सीधे पुलिस के पास जाने में संकोच करते हैं, वे इन स्वयंसेवकों से संपर्क कर सकेंगे। पुलिस को निर्देश दिया गया है कि शिकायतों पर कानून के अनुसार तुरंत कार्रवाई की जाए।

यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि अभी तक शोर की शिकायत करने वाला आम नागरिक अक्सर यह नहीं जानता कि शिकायत कहाँ करें, सबूत कैसे दर्ज करें और कार्रवाई किस स्तर पर होगी। वार्ड स्तर पर स्वयंसेवकों की नियुक्ति से शिकायत का रास्ता छोटा होगा और थाने तक सूचना जल्दी पहुँचेगी। ध्वनि मापक यंत्र मिलने से पुलिस के पास उल्लंघन को साबित करने का एक ठोस आधार भी होगा।

साइलेंस ज़ोन की सूची पर अदालत की नाराज़गी

सुनवाई में अदालत ने 24 सितंबर 2026 के अपने पहले के आदेश के पालन पर भी असंतोष जताया। उस आदेश में राज्य को निर्देश दिया गया था कि निर्धारित साइलेंस ज़ोन की सूची व्यापक प्रसार वाले दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित की जाए। अदालत ने पाया कि अधिकारियों ने सूची का उचित प्रकाशन करने के बजाय केवल समाचार पत्रों की कतरनें पेश की हैं, जिनमें ज़ोन का उल्लेख था।

अब अदालत ने राज्य को निर्देश दिया है कि साइलेंस ज़ोन की सूची का सही तरीके से प्रकाशन किया जाए और लोगों से सुझाव भी आमंत्रित किए जाएँ कि कौन से प्रमुख स्थान ऐसे हैं, जो साइलेंस ज़ोन घोषित किए जाने योग्य हैं, लेकिन सूची में शामिल नहीं हुए हैं। साइलेंस ज़ोन आमतौर पर अस्पताल, शिक्षण संस्थान, न्यायालय और ऐसे ही संवेदनशील स्थानों के आसपास घोषित किए जाते हैं, जहाँ शोर पर विशेष प्रतिबंध लागू होता है। सूची के सार्वजनिक होने से आम नागरिक को यह पता चल सकेगा कि उसके इलाके में कौन से क्षेत्र इस श्रेणी में आते हैं और वहाँ शोर की सीमा क्या है।

अदालत ने संबंधित थाने का संपर्क नंबर भी समाचार पत्रों में और इंदौर पुलिस की वेबसाइट पर प्रकाशित करने का निर्देश दिया है, ताकि ध्वनि प्रदूषण की शिकायत करने के लिए नागरिक को भटकना न पड़े।

सांकेतिक चित्र: कचरा संग्रहण वाहन
सांकेतिक चित्र: कचरा संग्रहण वाहन

नवरात्रि और दशहरा के दौरान क्या देखा गया

सुनवाई के दौरान अदालत ने नवरात्रि और दशहरा के दौरान शहर में अनियंत्रित ध्वनि प्रदूषण पर भी चिंता जताई। अदालत का कहना था कि इस दौरान पुलिस ध्वनि प्रदूषण से निपटने में असहाय सी नजर आई। अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि शहर के थानों में ध्वनि प्रदूषण को लेकर मिली शिकायतें और पुलिस की ओर से स्वतः दर्ज की गई शिकायतें, दोनों का ब्योरा पेश किया जाए।

त्योहारों के मौसम में शहर में धार्मिक कार्यक्रम, जुलूस, विवाह और सार्वजनिक आयोजन बढ़ जाते हैं और इनमें लाउडस्पीकर तथा डीजे का इस्तेमाल भी बढ़ता है। अदालत के सामने यह सवाल था कि त्योहारों की रौनक और लोगों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बने। इसी संदर्भ में अदालत ने शिकायतों के आंकड़े और कार्रवाई का ब्योरा मांगा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि त्योहारों के दौरान नियमों का पालन कितना हुआ और कहाँ चूक रही।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि अनुपालन रिपोर्ट तीन सप्ताह के भीतर पेश की जाए और मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर से शुरू होने वाले सप्ताह में होगी। इसका मतलब है कि अगले कुछ हफ्तों में प्रशासन को अपने किए गए काम का हिसाब अदालत के सामने रखना होगा।

यह मामला कहाँ से शुरू हुआ

यह पूरा मामला 2023 में दायर की गई एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें इंदौर में लाउडस्पीकर, डीजे, धार्मिक कार्यक्रम, जुलूस, विवाह और अन्य सार्वजनिक आयोजनों से होने वाले अनियंत्रित ध्वनि प्रदूषण पर चिंता जताई गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि अत्यधिक शोर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है, जिसमें शांतिपूर्ण नींद का अधिकार भी शामिल है।

24 सितंबर 2026 के आदेश में अदालत ने राज्य और पुलिस अधिकारियों को ध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 और मध्य प्रदेश कोलाहल नियंत्रण अधिनियम, 1985 का पालन सुनिश्चित करने का सख्त निर्देश दिया था। उस आदेश में यह भी कहा गया था कि कानून का खुला उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाए। अदालत ने साइलेंस ज़ोन की सूची प्रकाशित करने और शिकायत के लिए संपर्क नंबर सार्वजनिक करने का भी निर्देश दिया था।

उस सुनवाई में अदालत ने यह भी दर्ज किया था कि पक्षों के वकीलों को विस्तार से सुनने के बाद वह याचिका का निपटारा करने की ओर थी, लेकिन अदालत से घर लौटते समय न्यायाधीशों ने खुद शहर में कई जगह लाउडस्पीकरों को ध्वनि की सीमा से कहीं अधिक तेज़ बजते पाया। अदालत ने एक समाचार रिपोर्ट का भी उल्लेख किया था, जिसमें एक बच्चे की मौत का ज़िक्र था। अदालत ने उस घटना पर कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया था, बल्कि उसे अनियंत्रित शोर के खतरों की एक गंभीर याद के रूप में देखा था। अदालत ने कहा था कि प्रशासन के विस्तृत जवाब के बावजूद जमीनी हकीकत गंभीर दिख रही है।

इसके बाद से यह मामला अदालत की निगरानी में चल रहा है और समय-समय पर राज्य से अनुपालन रिपोर्ट मांगी जाती रही है। ताज़ा सुनवाई उसी क्रम में हुई है, जिसमें कचरा गाड़ियों की आवाज़, थानों में ध्वनि मापक यंत्र और वार्ड स्वयंसेवकों जैसे ठोस कदमों पर निर्देश दिए गए हैं।

कानून क्या कहता है

ध्वनि प्रदूषण के मामले में देश में दो प्रमुख कानूनी ढांचे लागू होते हैं। पहला है ध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम, 2000, जो विभिन्न क्षेत्रों के लिए अनुमेय ध्वनि सीमा तय करता है। दूसरा है मध्य प्रदेश कोलाहल नियंत्रण अधिनियम, 1985, जो राज्य में शोर नियंत्रण के लिए विशेष प्रावधान करता है। इन नियमों के तहत आवासीय क्षेत्रों में दिन के समय 55 डेसिबल और रात के समय 45 डेसिबल की सीमा बताई गई है।

इन नियमों का उद्देश्य यह है कि सार्वजनिक आयोजनों, धार्मिक कार्यक्रमों और रोज़मर्रा की गतिविधियों में शोर एक सीमा के भीतर रहे, ताकि बच्चों, बुजुर्गों, मरीज़ों और पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों को परेशानी न हो। लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के लिए अनुमति की व्यवस्था भी इन्हीं नियमों से जुड़ी है। अदालत के निर्देशों का जोर इसी बात पर है कि नियम कागज़ पर न रहें, बल्कि जमीन पर लागू हों और उल्लंघन पर माप के आधार पर कार्रवाई हो।

इंदौर में पहले भी जिला प्रशासन की ओर से लाउडस्पीकर के अनियंत्रित इस्तेमाल पर प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए जाते रहे हैं। रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक और अनुमति के बिना तेज़ आवाज़ वाले यंत्रों पर पाबंदी जैसे प्रावधान पहले से मौजूद हैं। अदालत के ताज़ा निर्देश इन पुराने नियमों को लागू करने की व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक और कदम माने जा रहे हैं।

इंदौर के लोगों के लिए इसका क्या मतलब है

आम नागरिक के लिए इस आदेश का सीधा असर यह होगा कि सुबह कचरा गाड़ी की आवाज़ अब पहले से धीमी होनी चाहिए। साथ ही, अगर किसी इलाके में देर रात तक तेज़ आवाज़ में डीजे या लाउडस्पीकर बजता है, तो शिकायत करने का रास्ता पहले से साफ होगा। वार्ड स्वयंसेवक से संपर्क करके या थाने के प्रकाशित नंबर पर शिकायत दर्ज कराकर नागरिक अपनी बात पहुँचा सकेगा। पुलिस के पास ध्वनि मापक यंत्र होने से शिकायत केवल कहने-सुनने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसे मापकर दर्ज किया जा सकेगा।

दूसरी ओर, नगर निगम के लिए यह आदेश एक समयबद्ध ज़िम्मेदारी लेकर आया है। तीन सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी होगी, जिसमें यह बताना होगा कि कचरा गाड़ियों की आवाज़ कितनी घटाई गई, थानों में यंत्र कब तक पहुँचे और वार्ड स्वयंसेवकों की नियुक्ति किस स्थिति में है। साइलेंस ज़ोन की सूची का प्रकाशन और सुझाव आमंत्रित करना भी इसी रिपोर्ट का हिस्सा होगा।

त्योहारों के बाद भी शहर में विवाह और सार्वजनिक आयोजनों का सिलसिला जारी रहता है। ऐसे में अदालत की निगरानी और वार्ड स्तर की व्यवस्था से यह उम्मीद की जा रही है कि शोर की शिकायतों पर कार्रवाई अब पहले से तेज़ और पारदर्शी होगी।

इंदौर ध्वनि प्रदूषण हाईकोर्ट आदेश के बाद आगे क्या होगा

मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर से शुरू होने वाले सप्ताह में होगी। इंदौर ध्वनि प्रदूषण हाईकोर्ट आदेश के तहत राज्य और नगर निगम को तीन सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी है। इस रिपोर्ट में थानों में मिली शिकायतों, पुलिस की ओर से स्वतः दर्ज शिकायतों, साइलेंस ज़ोन की सूची के प्रकाशन और कचरा गाड़ियों की आवाज़ में की गई कटौती का ब्योरा शामिल होगा।

अगर अनुपालन रिपोर्ट में खामियाँ पाई जाती हैं, तो अदालत आगे के निर्देश भी दे सकती है। वहीं, अगर निर्देशों का पालन होता दिखता है, तो यह व्यवस्था शहर के लिए एक स्थायी निगरानी तंत्र का रूप ले सकती है। फिलहाल, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि ध्वनि प्रदूषण को लेकर अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि माप, रिपोर्ट और कार्रवाई के आधार पर जवाबदेही तय होगी।

इंदौर जैसे शहर के लिए, जहाँ स्वच्छता और शांति दोनों को पहचान माना जाता है, यह आदेश दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। कचरा गाड़ियों का गीत जारी रहेगा, लेकिन अब उसकी आवाज़ कानून की सीमा के भीतर रहेगी।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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