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इंदौर बनेगा देश का सबसे बड़ा आर्थिक क्षेत्र: नीति आयोग की योजना में 8 जिले, 2047 तक 57 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य

सांकेतिक चित्र: इंदौर शहर का दृश्य सांकेतिक चित्र: इंदौर शहर का दृश्य

इंदौर ब्यूरो

सांकेतिक चित्र: इंदौर शहर का दृश्य
सांकेतिक चित्र

मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर के लिए यह योजना एक बड़े बदलाव की शुरुआत मानी जा रही है। अब तक विकास की योजनाएं अक्सर एक शहर या एक जिले तक सीमित रहती थीं, लेकिन इस बार पूरे क्षेत्र को एक इकाई के रूप में देखा गया है। इंदौर के आसपास के जिलों की अपनी-अपनी आर्थिक ताकत को एक साथ जोड़कर एक ऐसा क्षेत्र बनाने की तैयारी है, जो उद्योग, व्यापार, पर्यटन, शिक्षा और रोजगार के लिहाज से देश में एक अलग पहचान बनाए। इस योजना की औपचारिक घोषणा 28 अक्टूबर को इंदौर में होने वाली अर्बन ग्रोथ कॉन्क्लेव 2.0 में की जाएगी।

इंदौर इकोनॉमिक रीजन में कौन-कौन से जिले शामिल हैं

इंदौर इकोनॉमिक रीजन में कुल आठ जिले शामिल किए गए हैं। इनमें इंदौर के अलावा उज्जैन, धार, रतलाम, देवास, खरगोन, खंडवा और शाजापुर शामिल हैं। यह पूरा क्षेत्र मालवा-निमाड़ के आर्थिक परिदृश्य का केंद्र माना जाता है। इंदौर व्यापार और उद्योग का बड़ा केंद्र है, उज्जैन धार्मिक पर्यटन का प्रमुख स्थान है, धार और रतलाम औद्योगिक गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं, देवास औद्योगिक नगरी के रूप में विकसित हो रहा है, जबकि खरगोन, खंडवा और शाजापुर कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और खाद्य प्रसंस्करण की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

योजना का मूल विचार यह है कि इन जिलों को अलग-अलग देखने के बजाय एक साझा आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए। सड़क, रेल और मेट्रो जैसे संपर्क साधनों से इन जिलों को आपस में जोड़कर उद्योगों के लिए कच्चा माल, बाजार और कामगारों की आवाजाही को आसान बनाया जाएगा। इससे छोटे जिलों को भी बड़े शहरों के विकास का लाभ मिलेगा और पलायन पर भी अंकुश लग सकेगा।

2047 तक 57 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य कैसे हासिल होगा

रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र की मौजूदा अर्थव्यवस्था करीब 3.52 लाख करोड़ रुपये की है। इसे 2047 तक 57.06 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया है। यह लक्ष्य केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इसके पीछे 80 से अधिक विशिष्ट परियोजनाओं और 20 से अधिक नीतिगत सुधारों की सूची तैयार की गई है। इन परियोजनाओं में सड़क और रेल नेटवर्क का विस्तार, नए औद्योगिक क्षेत्र, लॉजिस्टिक सुविधाएं, नई टाउनशिप, कौशल विकास केंद्र और पर्यटन सर्किट शामिल हैं।

आर्थिक विकास के इस रोडमैप को जमीन पर उतारने के लिए नीति आयोग के सहयोग से क्षेत्र के विकास का मास्टर प्लान तैयार किया जाएगा। मास्टर प्लान में यह तय होगा कि किस जिले में कौन सा उद्योग लगेगा, कहां नई टाउनशिप बसेगी, कहां लॉजिस्टिक हब बनेगा और किस तरह निवेशकों को सुविधाएं दी जाएंगी। इससे विकास बेतरतीब नहीं, बल्कि एक सोची-समझी योजना के तहत आगे बढ़ेगा।

28 अक्टूबर को अर्बन ग्रोथ कॉन्क्लेव 2.0 में होगी औपचारिक घोषणा

इंदौर में 28 अक्टूबर को अर्बन ग्रोथ कॉन्क्लेव 2.0 का आयोजन होगा। इसमें इंदौर इकोनॉमिक रीजन की औपचारिक घोषणा की जाएगी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इस कॉन्क्लेव की अध्यक्षता करेंगे। कॉन्क्लेव में शहरी विकास के नए मॉडल, निवेश की संभावनाओं, डिजिटल गवर्नेंस, पर्यावरण संरक्षण और भविष्य की शहरी जरूरतों पर विशेषज्ञों, निवेशकों, स्टार्टअप्स और विभागों के प्रतिनिधियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श होगा।

कॉन्क्लेव के दौरान राज्य सरकार किफायती आवास और पुनर्चक्रित पानी से जुड़ी मसौदा नीतियों को भी सामने रखेगी। किफायती आवास की नीति का मकसद किराये के आवास, पुरानी संपत्तियों के पुनर्विकास और सरकारी जमीन के बेहतर उपयोग से आवास की उपलब्धता बढ़ाना है। वहीं, पुनर्चक्रित पानी की नीति से शहरों की ताजे पानी पर निर्भरता कम करने की कोशिश होगी। कॉन्क्लेव में निवेशकों से वन-टू-वन चर्चा भी होगी और कई शहरी विकास परियोजनाओं का शुभारंभ, भूमि पूजन और लोकार्पण भी किया जाएगा।

सड़क, रेल और मेट्रो: संपर्क का बड़ा जाल बिछेगा

इंदौर इकोनॉमिक रीजन के विकास का सबसे बड़ा आधार संपर्क साधनों का विस्तार है। योजना में 1,100 किलोमीटर लंबी सड़कों और हाईवे के विकास, 864 किलोमीटर के इंटरसिटी रेल नेटवर्क और इंदौर-उज्जैन-देवास को जोड़ने के लिए 118 किलोमीटर की रीजनल मेट्रो और मेट्रो रेल परियोजनाओं पर काम का उल्लेख है। इन परियोजनाओं के पूरा होने पर आठों जिलों के बीच आवाजाही तेज और सस्ती हो जाएगी।

उद्योगों के लिए यह संपर्क बेहद अहम है। कच्चा माल लाने और तैयार माल बाजार तक पहुंचाने में लगने वाला समय और लागत कम होगी तो निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा। साथ ही, कामगारों के लिए भी रोजगार के केंद्रों तक पहुंचना आसान होगा। इंदौर-उज्जैन-देवास के बीच रीजनल मेट्रो से इन तीन शहरों के बीच रोजाना आने-जाने वाले हजारों लोगों को भी बड़ी राहत मिलेगी।

इंदौर फ्यूचर सिटी और नए औद्योगिक हब

योजना में 5,000 एकड़ में इंदौर फ्यूचर सिटी बसाने का प्रस्ताव है। यह एक आधुनिक, नियोजित शहर होगा, जिसमें आवास, उद्योग, शिक्षा और मनोरंजन की सुविधाएं एक साथ विकसित की जाएंगी। इसके अलावा फार्मा, टेक्सटाइल, ऑटोमोटिव और इलेक्ट्रिक व्हीकल उद्योगों के लिए लगभग 6,700 एकड़ में नए औद्योगिक और खाद्य प्रसंस्करण हब विकसित किए जाएंगे।

इनमें उज्जैन और रतलाम के बीच बनने वाला 2,000 एकड़ का इंटरनेशनल फूड प्रोसेसिंग हब प्रमुख है। मालवा-निमाड़ कृषि उत्पादन के लिहाज से समृद्ध क्षेत्र है। यहां सोयाबीन, गेहूं, कपास और बागवानी फसलों का बड़ा उत्पादन होता है। खाद्य प्रसंस्करण हब बनने से किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

धार्मिक पर्यटन और कौशल विकास को भी मिलेगा बढ़ावा

इंदौर इकोनॉमिक रीजन की योजना में धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को भी खास जगह दी गई है। उज्जैन के महाकाल लोक, ओंकारेश्वर के एकात्म धाम और धार जिले के मांडव के ऐतिहासिक स्थलों को मिलाकर एक ज्योतिर्लिंग टेम्पल सर्किट तैयार किया जाएगा। इससे श्रद्धालुओं और पर्यटकों का प्रवाह बढ़ेगा और स्थानीय व्यापार, होटल और परिवहन कारोबार को सीधा लाभ मिलेगा।

रोजगार और कौशल विकास के लिए शिक्षा को उद्योग से जोड़ने की तैयारी है। इसके तहत 500 एकड़ में एक बिजनेस स्कूल हब बनाया जाएगा और क्षेत्र के पांच अलग-अलग जिलों में एकीकृत कौशल प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएंगे। आईआईटी इंदौर के पास 200 एकड़ में आईटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर विकसित करने की योजना है। इससे युवाओं को स्थानीय स्तर पर ही आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में रोजगार के अवसर मिल सकेंगे।

कौन चलाएगा इस योजना को: मेट्रोपॉलिटन रीजन अथॉरिटी

इस विकास एजेंडे को जमीन पर उतारने के लिए इंदौर-उज्जैन मेट्रोपॉलिटन रीजन अथॉरिटी का गठन किया जाएगा। मुख्यमंत्री इस अथॉरिटी की अध्यक्षता करेंगे। कमेटी के गठित होने से पहले आठों जिलों के कलेक्टर इसके लिए काम करेंगे। यह अथॉरिटी सभी आठ जिलों के नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों के साथ मिलकर काम करेगी।

अथॉरिटी का काम केवल योजनाएं बनाना नहीं होगा, बल्कि परियोजनाओं के क्रियान्वयन पर नजर रखना, निवेशकों से समन्वय करना और जिलों के बीच तालमेल बैठाना भी होगा। एक ही अथॉरिटी के तहत काम होने से जिलों के बीच विकास की गति में अंतर कम होगा और परियोजनाओं के अटकने की आशंका भी घटेगी।

कॉन्क्लेव में होंगे तीन बड़े समझौते

अर्बन ग्रोथ कॉन्क्लेव में जमीन पर काम शुरू करने के लिए तीन बड़े समझौते भी होंगे। पहला समझौता औद्योगिक उपयोग के लिए पानी से जुड़ा है। इसके तहत प्रदेश के औद्योगिक नीति विभाग और शहरी विकास विभाग के बीच समझौता होगा, जिसके माध्यम से उद्योगों को सीवरेज से उपचारित पानी दिया जाएगा। इससे उद्योगों की ताजे पानी पर निर्भरता कम होगी।

दूसरा समझौता सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देने से जुड़ा है। महाराष्ट्र इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मेशन के साथ मिलकर प्रदेश सरकार सार्वजनिक-निजी भागीदारी की क्षमता निर्माण पर काम करेगी। तीसरा समझौता होटल क्षेत्र में कचरा प्रबंधन से जुड़ा है। इसके तहत होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन वेस्टर्न इंडिया के साथ मिलकर आतिथ्य क्षेत्र में भोजन की बर्बादी रोकने, वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन और रेनवाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किया जाएगा।

निवेश के अवसर: किन परियोजनाओं पर रहेगी नजर

कॉन्क्लेव में निवेशकों के सामने कई बड़ी परियोजनाओं के अवसर रखे जाएंगे। इनमें टॉर्टॉइज सिटी, सेंट्रल विस्टा भोपाल, हुकुमचंद मिल पुनर्विकास, एकाई सिटी, उज्जैन के टेम्पल बॉन्ड प्रोजेक्ट, चित्रकूट विकास और फ्लोटिंग सोलर परियोजनाएं शामिल हैं। इसके अलावा नवीकरणीय ऊर्जा, जल प्रबंधन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों में निवेश पर भी चर्चा होगी।

नगरीय विकास एवं आवास आयुक्त संकेत भोंडवे के अनुसार कॉन्क्लेव शहरों को आधुनिक, सुविधासंपन्न और निवेश के अनुकूल शहरी केंद्रों में बदलने का मंच देगा। निवेशकों और विकास साझेदारों को आवास, बुनियादी ढांचे और अन्य शहरी परियोजनाओं के लिए आकर्षित किया जाएगा। साथ ही, प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत आवास, जलापूर्ति, सीवरेज और कंप्रेस्ड बायोगैस सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं का शुभारंभ और शिलान्यास भी किया जाएगा।

आगे क्या: घोषणा के बाद की राह

28 अक्टूबर को औपचारिक घोषणा के बाद असली काम शुरू होगा। मास्टर प्लान तैयार करना, परियोजनाओं की विस्तृत रिपोर्ट बनाना, जमीन की व्यवस्था करना और निवेशकों से समझौते करना, ये सभी काम चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ेंगे। नीति आयोग की सिटी इकोनॉमिक रीजन पहल के तहत तैयार यह रोडमैप बताता है कि केंद्र और राज्य सरकार इस क्षेत्र को देश के विकास इंजन के रूप में देख रही हैं।

इंदौर पहले से ही स्वच्छता में देश में अग्रणी रहा है और स्मार्ट सिटी के रूप में भी उसकी पहचान है। अब आर्थिक क्षेत्र की योजना से उसकी भूमिका एक शहर से बढ़कर पूरे क्षेत्र के विकास केंद्र की हो जाएगी। अगर परियोजनाएं समय पर जमीन पर उतरती हैं, तो अगले दो दशकों में मालवा-निमाड़ की तस्वीर बदल सकती है। स्थानीय युवाओं को रोजगार के लिए बाहर जाने की जरूरत कम होगी और किसानों व छोटे कारोबारियों को भी बड़े बाजार का लाभ मिलेगा।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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