नई दिल्ली ब्यूरो
नई दिल्ली में सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का आयोजन हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उद्घाटन समारोह में पहुंचे और मंच के मौके पर विदेशी प्रतिनिधिमंडलों का स्वागत किया। संसद भवन परिसर में दिन भर ब्रिक्स के सदस्य और साझेदार देशों के संसदीय प्रतिनिधियों की मौजूदगी रही। मंच का विषय जन-केंद्रित विकास रखा गया है, जिसके तहत लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक-केंद्रित विकास और विधायी संस्थाओं को मजबूत करने पर चर्चा हो रही है।
दो दिन चलने वाला यह मंच 27 अक्टूबर को समाप्त होगा। इसमें 11 सदस्य देशों और 10 साझेदार देशों के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए हैं। मंच की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला कर रहे हैं। उद्घाटन संबोधन में उन्होंने भारत आने वाले प्रतिनिधिमंडलों का स्वागत किया और संवाद, आपसी सम्मान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों में साझा भरोसे की बात कही।
संसद भवन परिसर में दिन भर रही हलचल
सुबह से ही संसद भवन परिसर में विदेशी प्रतिनिधिमंडलों के आगमन का सिलसिला रहा। यूगांडा, क्यूबा, ब्राजील और रूस सहित कई देशों के प्रतिनिधिमंडल परिसर पहुंचे। अधिकारियों और सांसदों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी परिसर में मौजूद रहे।
प्रधानमंत्री मोदी के पहुंचने के बाद मंच की गतिविधियां और तेज हो गईं। उन्होंने मंच के मौके पर कई प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात की और उनका स्वागत किया। यह मुलाकातें औपचारिक स्वागत तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि संसदीय सहयोग और द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के संदेश के रूप में भी देखी जा रही हैं।
मंच का आयोजन संसद भवन परिसर के संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में हो रहा है। इसमें ब्रिक्स देशों के पीठासीन अधिकारी, संसदीय नेता, केंद्रीय मंत्री, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, राज्य विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारी और सांसद शामिल हुए हैं। इतने देशों के संसदीय प्रतिनिधियों का एक साथ दिल्ली में जुटना इस मंच के महत्व को दर्शाता है।
ईरानी प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात
मंच के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने ईरानी संसदीय प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की। इस मुलाकात में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वरिष्ठ सांसद शशि थरूर भी मौजूद रहे। ईरानी दूतावास की ओर से इस मुलाकात की जानकारी साझा की गई, जिसमें कहा गया कि यह शिष्टाचार मुलाकात भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय संबंधों के महत्व को रेखांकित करती है।
ईरान ब्रिक्स का सदस्य देश है और दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। संसदीय स्तर पर इस तरह की मुलाकातें दोनों देशों के विधायी संस्थानों के बीच संवाद को बढ़ाती हैं। इससे आपसी समझ बेहतर होती है और वैश्विक मंचों पर सहयोग के रास्ते खुलते हैं।
मुलाकात के दौरान भारत और ईरान के बीच संसदीय सहयोग को मजबूत करने पर जोर दिया गया। यह भी स्पष्ट किया गया कि ब्रिक्स संसदीय मंच केवल औपचारिक बैठकों का मंच नहीं है, बल्कि यह देशों के बीच सीधे संवाद का भी अवसर देता है। इसी संवाद के जरिए विकास, शांति और स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर साझा समझ बनती है।
रूसी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत और द्विपक्षीय संवाद
प्रधानमंत्री मोदी ने मंच के मौके पर रूस के संघीय विधानसभा के राज्य ड्यूमा के अध्यक्ष व्याचेस्लाव वोलोडिन का भी स्वागत किया। वोलोडिन रूसी संसदीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं। मंच से पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी वोलोडिन के साथ द्विपक्षीय बैठक की थी।
उस बैठक में भारत और रूस के बीच विशेष और समय की कसौटी पर खरे उतरे संबंधों की चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने वैश्विक मंचों पर सहयोग मजबूत करने और आतंकवाद से सामूहिक रूप से निपटने की आवश्यकता पर जोर दिया। बिरला ने वोलोडिन और उनके प्रतिनिधिमंडल का भारत की संसद और देश के लोगों की ओर से स्वागत किया था।
भारत और रूस के बीच रक्षा, ऊर्जा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहित कई क्षेत्रों में सहयोग रहा है। संसदीय स्तर पर इस तरह की बैठकों से दोनों देशों के विधायी संस्थानों के बीच विश्वास और बढ़ता है। ब्रिक्स मंच के मौके पर हुई यह मुलाकात इसी निरंतर संवाद की एक कड़ी के रूप में देखी जा रही है।
21 देशों के प्रतिनिधि, जन-केंद्रित विकास पर मंथन
इस मंच में कुल 21 देशों के प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए हैं। इनमें 11 सदस्य देश और 10 साझेदार देश शामिल हैं। मंच में बताया गया कि इसमें शामिल देश मिलकर दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। साथ ही, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में इनकी हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार में करीब 24 प्रतिशत बताई गई।
इन आंकड़ों से यह समझा जा सकता है कि ब्रिक्स संसदीय मंच केवल एक क्षेत्रीय बैठक नहीं है, बल्कि इसका दायरा वैश्विक है। विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक मंचों पर मजबूत करने में इस मंच की भूमिका अहम मानी जाती है। भारत इस समय मंच की अध्यक्षता कर रहा है, इसलिए दिल्ली में इसका आयोजन भारत के लिए विशेष महत्व रखता है।
मंच के तहत चार विषयगत उच्च स्तरीय सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। ये सत्र लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता जैसे मुख्य स्तंभों पर केंद्रित हैं। इनमें संस्थागत क्षमता निर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में विधायी निगरानी की बढ़ती भूमिका, उभरती डिजिटल प्रौद्योगिकियां और सतत विकास लक्ष्यों पर चर्चा हो रही है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक और सतत विकास पर चर्चा
आज की दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल प्रौद्योगिकी का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में संसदों की भूमिका भी बदल रही है। मंच के सत्रों में इस बात पर चर्चा हो रही है कि विधायी संस्थाएं तकनीक के इस्तेमाल पर निगरानी कैसे रखें, ताकि नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहें और तकनीक का लाभ सभी तक पहुंचे।
सतत विकास लक्ष्यों पर भी मंच में विशेष ध्यान दिया जा रहा है। गरीबी दूर करना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर संसदीय सहयोग की जरूरत पर बल दिया जा रहा है। सदस्य देशों के अनुभवों को साझा करने से एक-दूसरे की अच्छी नीतियों को अपनाने में मदद मिलती है।
मंच के मौके पर सदस्य और साझेदार देशों की अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी संसदीय समितियों के अध्यक्षों की एक विशेष बैठक भी आयोजित की जा रही है। इसमें संसदीय कूटनीति, क्षमता निर्माण और सर्वोत्तम विधायी प्रथाओं के आदान-प्रदान पर चर्चा हो रही है। इस तरह की बैठकों से संसदों के बीच स्थायी संवाद की परंपरा मजबूत होती है।
ब्रिक्स संसदीय मंच क्या है और क्यों है अहम
ब्रिक्स संसदीय मंच ब्रिक्स देशों की संसदों के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच है। इसमें सदस्य देशों के पीठासीन अधिकारी और संसदीय नेता एक साथ बैठकर विकास, लोकतंत्र और वैश्विक सहयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते हैं। यह मंच सरकारों के बीच होने वाली बैठकों से अलग है, क्योंकि इसमें विधायी संस्थानों की सीधी भागीदारी होती है।
संसदें किसी भी लोकतंत्र की आत्मा होती हैं। वे कानून बनाती हैं, सरकार के कामकाज पर निगरानी रखती हैं और नागरिकों की आवाज को नीति तक पहुंचाती हैं। जब अलग-अलग देशों की संसदें एक साथ बैठती हैं, तो वे एक-दूसरे के अनुभवों से सीखती हैं और साझा चुनौतियों के समाधान खोजती हैं।
भारत के लिए इस मंच का आयोजन इसलिए भी अहम है, क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। दिल्ली में इतने देशों के संसदीय प्रतिनिधियों का आना भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और संसदीय व्यवस्था के प्रति भरोसे को दर्शाता है। साथ ही, यह भारत को विकासशील देशों की आवाज को और मजबूती से उठाने का अवसर देता है।
उद्घाटन संबोधन में लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने उद्घाटन संबोधन में कहा कि ब्रिक्स देशों के संसदीय प्रतिनिधिमंडलों की भारत में मौजूदगी अपने आप में एक विशेष अनुभव है। उन्होंने कहा कि यह मौजूदगी संवाद, आपसी सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों में साझा भरोसे के प्रति साझा प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
बिरला ने यह भी कहा कि ब्रिक्स संसदीय सहयोग में भारत की मौजूदगी संवाद और आपसी सम्मान के प्रति साझा प्रतिबद्धता का प्रतीक है। उन्होंने प्रतिनिधिमंडलों का स्वागत करते हुए कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आकर साझा प्रतिबद्धता साझा करना अपने आप में महत्वपूर्ण है।
उद्घाटन संबोधन में जन-केंद्रित विकास की अवधारणा पर भी जोर दिया गया। इसका अर्थ है कि विकास की नीतियों के केंद्र में आम नागरिक होना चाहिए। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पर्यावरण से जुड़ी नीतियां तभी सफल मानी जाएंगी, जब उनका लाभ आम आदमी तक पहुंचे। मंच के सत्रों में इसी अवधारणा को आगे बढ़ाने पर चर्चा हो रही है।
आगे क्या होगा
मंच का दूसरा और अंतिम दिन 27 अक्टूबर को होगा। उस दिन भी विषयगत सत्रों में चर्चा जारी रहेगी और मंच के समापन पर आगे की दिशा तय की जाएगी। जानकारी के अनुसार, मंच के समापन के साथ चीन अगले वर्ष की अध्यक्षता संभालेगा।
मंच के समापन के बाद सदस्य देशों के बीच संसदीय सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए साझा समझ बनने की उम्मीद है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, सतत विकास और संस्थागत क्षमता निर्माण जैसे विषयों पर हुई चर्चा के नतीजे आने वाले समय में सदस्य देशों की संसदीय कार्यप्रणाली में भी दिखाई दे सकते हैं।
भारत के लिए इस मंच का संदेश स्पष्ट है। भारत न केवल वैश्विक मंचों पर अपनी आवाज उठा रहा है, बल्कि विकासशील देशों के बीच संवाद और सहयोग का सेतु भी बन रहा है। दिल्ली में हुआ यह आयोजन इसी भूमिका को और मजबूत करता है। आने वाले दिनों में मंच की चर्चाओं और उसके निष्कर्षों पर सभी की नजर रहेगी।
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