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इंदौर जिला जल अभावग्रस्त घोषित, निजी बोरवेल खुदाई पर तत्काल रोक: उल्लंघन पर मशीन जब्त, 2 साल तक की जेल का प्रावधान

सांकेतिक चित्र: सूखी नदी तल — जल संकट का प्रतीकात्मक दृश्य सांकेतिक चित्र: सूखी नदी तल — जल संकट का प्रतीकात्मक दृश्य

इंदौर ब्यूरो

इंदौर शहर और जिले के लिए पेयजल को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक फैसला सामने आया है। कम बारिश और भूजल स्तर में लगातार गिरावट को देखते हुए जिला प्रशासन ने पूरे इंदौर जिले को जल अभावग्रस्त क्षेत्र घोषित कर दिया है। इसके साथ ही निजी स्तर पर नए बोरवेल खोदने पर पाबंदी लगा दी गई है। यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है और अगले आदेश तक जारी रहेगा। प्रशासन का कहना है कि आने वाले महीनों में पेयजल संकट की आशंका को देखते हुए यह कदम समय रहते उठाया गया है, ताकि भूजल के अत्यधिक दोहन पर रोक लगाई जा सके।

क्या आदेश जारी हुआ है

कलेक्टर के आदेश के अनुसार, इंदौर जिले के संपूर्ण शहरी और ग्रामीण क्षेत्र को जल अभावग्रस्त क्षेत्र घोषित किया गया है। जिले में निजी और अशासकीय नलकूपों के खनन पर तत्काल प्रभाव से आगामी आदेश तक प्रतिबंध लगा दिया गया है। यानी अब कोई भी व्यक्ति या संस्था अपनी निजी जमीन या परिसर में बिना अनुमति के नया बोरवेल नहीं खुदवा सकेगी। प्रतिबंध का दायरा शहर के साथ-साथ गांवों तक फैला हुआ है, क्योंकि भूजल स्तर में गिरावट की समस्या केवल शहरी क्षेत्र तक सीमित नहीं है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह प्रतिबंध अस्थायी नहीं, बल्कि स्थिति में सुधार होने तक लागू रहेगा। आदेश में यह भी कहा गया है कि प्रतिबंधित क्षेत्रों में अवैध रूप से प्रवेश करने या नलकूप खनन का प्रयास करने वाली मशीनों को जब्त किया जाएगा।

क्यों लिया गया यह फैसला

इस फैसले के पीछे दो बड़ी वजहें हैं — कम बारिश और भूजल का अत्यधिक दोहन। वर्षाकाल के दौरान जिले में अब तक 642.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है, जो सामान्य से काफी कम है। एक आकलन के अनुसार, बारिश में करीब 27 प्रतिशत की कमी रही है। कम बारिश का सीधा असर भूजल के पुनर्भरण पर पड़ा है। दूसरी ओर, पेयजल स्रोतों और नलकूपों से लगातार पानी निकालने के कारण जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के शहरी और ग्रामीण अधिकारियों ने स्थिति का आकलन करने के बाद निजी नलकूप खनन पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की थी। नगर पालिक निगम इंदौर के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (जल प्रदाय) कार्यपालन यंत्री और ग्रामीण क्षेत्र के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने गिरते भूजल स्तर और संभावित पेयजल संकट की ओर ध्यान दिलाया था। इसी अनुशंसा के आधार पर कलेक्टर ने मध्यप्रदेश पेयजल परिरक्षण अधिनियम, 1986 और संशोधन अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया है।

सांकेतिक चित्र: बोरवेल से पानी निकालने का दृश्य
सांकेतिक चित्र: सूखी नदी तल — जल संकट का प्रतीकात्मक दृश्य

उल्लंघन पर क्या कार्रवाई होगी

आदेश में उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। प्रतिबंध के बावजूद बोरिंग कराने या इसकी कोशिश करने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। अवैध रूप से बोरिंग करने पहुंचने वाली मशीनों को जब्त किया जा सकेगा। राजस्व, पुलिस और नगर निगम के अधिकारियों को मशीनें जब्त करने तथा जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है। अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर दो हजार रुपये तक का जुर्माना, दो साल तक का कारावास या दोनों सजाएं हो सकती हैं। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रतिबंधित स्थानों पर अवैध रूप से प्रवेश करने वाली मशीनों को भी जब्त किया जाएगा। यानी केवल बोरिंग करा लेने के बाद ही नहीं, बल्कि बोरिंग के प्रयास की स्थिति में भी कार्रवाई हो सकेगी। इस सख्ती का उद्देश्य यह है कि प्रतिबंध केवल कागज पर न रहे, बल्कि जमीन पर भी इसका असर दिखे।

किन्हें छूट मिलेगी

प्रतिबंध से सरकारी योजनाओं के तहत होने वाले नलकूप खनन को छूट दी गई है। यानी सरकार की ओर से पेयजल व्यवस्था के लिए कराए जाने वाले बोरवेल इस रोक के दायरे से बाहर रहेंगे। इसके अलावा, जरूरत पड़ने पर सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था बनाए रखने के लिए निजी नलकूपों और अन्य मौजूदा निजी जलस्रोतों का अधिग्रहण भी किया जा सकेगा। यह अधिग्रहण अधिनियम के प्रावधानों के तहत किया जाएगा। प्रशासन का तर्क है कि संकट की स्थिति में सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, इसलिए यह व्यवस्था आदेश में रखी गई है। हालांकि, यह कदम तभी उठाया जाएगा जब पेयजल व्यवस्था बनाए रखने के लिए इसकी आवश्यकता महसूस होगी। आम लोगों के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि निजी स्तर पर नया बोरवेल खोदने की योजना फिलहाल टालनी होगी और नगर निगम की पेयजल व्यवस्था पर निर्भरता बढ़ेगी।

तालाबों को नर्मदा जल से भरने की तैयारी

केवल प्रतिबंध लगाना ही प्रशासन की रणनीति नहीं है। भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए यशवंत सागर और बिलावली जैसे तालाबों को नर्मदा के पानी से भरने की तैयारी भी की जा रही है। इस योजना पर कार्य किया जा रहा है। साथ ही अन्य तालाबों में भी पानी पहुंचाया जा सकता है। इन तालाबों से कुछ क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति होती है और आसपास का भूजल बना रहता है। तालाबों में पानी भरने से न केवल सीधी आपूर्ति को सहारा मिलेगा, बल्कि आसपास के इलाकों में भूजल के पुनर्भरण में भी मदद मिलेगी। इससे पहले शहर की पेयजल व्यवस्था को लेकर महेश्वर बांध के गेटों की स्थिति भी चर्चा में रही थी। शहर में उपचारित पानी के दोबारा इस्तेमाल की योजना पर भी काम चल रहा है। इन सभी प्रयासों का एक ही लक्ष्य है — शहर और जिले की पेयजल व्यवस्था को आने वाले महीनों में स्थिर बनाए रखना।

इंदौर के लिए इसका क्या मतलब है

इंदौर तेजी से बढ़ता हुआ शहर है। बढ़ती आबादी के साथ पेयजल की मांग भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में भूजल पर निर्भरता बढ़ती जा रही थी। नए निजी बोरवेल खोदने पर रोक लगने से भूजल के दोहन की गति पर अंकुश लगेगा। हालांकि, इसका एक दूसरा पहलू भी है। जिन इलाकों में नगर निगम की पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति सीमित है, वहां के लोगों को फिलहाल वैकल्पिक व्यवस्था पर निर्भर रहना होगा। प्रशासन का मानना है कि समय रहते उठाया गया यह कदम गर्मी के महीनों में बड़े संकट से बचा सकता है। गर्मी में पानी की मांग सबसे अधिक होती है और उसी समय भूजल स्तर सबसे नीचे होता है। इसलिए सर्दी के मौसम में ही प्रतिबंध लगाकर प्रशासन ने आने वाले संकट की तैयारी शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रतिबंध का पालन कितनी सख्ती से कराया जाता है और क्या अवैध बोरिंग के मामले सामने आते हैं।

आगे क्या होगा

यह आदेश अगले आदेश तक लागू रहेगा। यानी जब तक प्रशासन स्थिति में सुधार नहीं देखता, तब तक निजी बोरिंग पर रोक जारी रहेगी। इस दौरान लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग और नगर निगम भूजल स्तर की निगरानी करते रहेंगे। बारिश, तालाबों में पानी की स्थिति और पेयजल स्रोतों के जलस्तर के आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा। यदि स्थिति में सुधार होता है तो प्रतिबंध में ढील दी जा सकती है और यदि संकट गहराता है तो और सख्त कदम भी उठाए जा सकते हैं। फिलहाल प्रशासन की प्राथमिकता यह है कि मौजूदा जलस्रोतों को बचाया जाए और पेयजल व्यवस्था को स्थिर रखा जाए। लोगों से भी यह अपेक्षा की जा रही है कि वे पानी का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करें और प्रतिबंध का पालन करें, ताकि आने वाले महीनों में शहर और जिले को पेयजल संकट का सामना न करना पड़े।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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