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राजनाथ सिंह ने IITs से मांगा रक्षा क्षेत्र के साथ तालमेल, कहा — स्वदेशी तकनीक से ही मजबूत होगी सैन्य ताकत

सांकेतिक चित्र — रक्षा तकनीक का प्रतीकात्मक दृश्य

नई दिल्ली ब्यूरो

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) अपने शैक्षणिक अनुसंधान को रक्षा क्षेत्र की परिचालन संबंधी जरूरतों और उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाकर देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। उन्होंने तेजी से बदलते युद्ध परिदृश्य के बीच स्वदेशी तकनीक के विकास और उसके इस्तेमाल में तेजी लाने के लिए सशस्त्र बलों, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), शैक्षणिक संस्थानों, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी उद्योग के बीच करीबी सहयोग का भी आह्वान किया। रक्षा मंत्री ने यह बात बुधवार, 14 अक्टूबर को दिल्ली में आईआईटी-कानपुर के ‘ग्रेटर देन अस’ धनसंग्रह अभियान की शुरुआत के अवसर पर अपने संबोधन में कही।

दिल्ली में क्या कार्यक्रम था

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह दिल्ली में आईआईटी-कानपुर के ‘ग्रेटर देन अस’ धनसंग्रह अभियान की शुरुआत के अवसर पर संबोधित कर रहे थे। यह अवसर शैक्षणिक संस्थान और राष्ट्र निर्माण के बीच संबंधों पर विचार करने का एक मंच बना। अपने संबोधन में उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी क्षमता के बीच बढ़ते संबंधों को रेखांकित किया।

इस तरह के कार्यक्रमों में आमतौर पर संस्थान की भूमिका, उसकी उपलब्धियों और आगे की योजनाओं पर चर्चा होती है। लेकिन रक्षा मंत्री के संबोधन ने इस अवसर को केवल एक संस्थान के कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने इसे देश की सुरक्षा, तकनीकी आत्मनिर्भरता और शोध की दिशा जैसे व्यापक विषयों से जोड़ दिया। यही वजह है कि उनका संबोधन रक्षा और शिक्षा दोनों क्षेत्रों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

आईआईटी से क्या अपेक्षा जताई गई

रक्षा मंत्री ने कहा कि आईआईटी शैक्षणिक अनुसंधान को रक्षा क्षेत्र की परिचालन संबंधी जरूरतों और उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाकर महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। इस बात का अर्थ यह है कि शोध केवल प्रयोगशाला तक सीमित न रहे, बल्कि वह जमीन पर काम आने वाली जरूरतों से जुड़ा हो।

रक्षा क्षेत्र की परिचालन संबंधी जरूरतों का अर्थ उन वास्तविक परिस्थितियों से है, जिनमें सशस्त्र बल काम करते हैं। इन परिस्थितियों में तकनीक की विश्वसनीयता, गति, सटीकता और कठिन हालात में काम करने की क्षमता जैसे पहलू शामिल होते हैं। रक्षा मंत्री का संदेश यह था कि आईआईटी जैसे संस्थानों का शोध इन जरूरतों को ध्यान में रखकर हो, ताकि उसका सीधा लाभ देश की सुरक्षा को मिल सके। इसी तरह, उद्योग की आवश्यकताओं से तालमेल का अर्थ यह है कि शोध का परिणाम उत्पादन और इस्तेमाल की प्रक्रिया से भी जुड़ा हो।

सभी पक्षों के बीच करीबी सहयोग का आह्वान

रक्षा मंत्री ने स्वदेशी तकनीक के विकास और उसके इस्तेमाल में तेजी लाने के लिए सभी संबंधित पक्षों के बीच करीबी सहयोग का आह्वान किया। उन्होंने जिन पक्षों का नाम लिया, उनमें सशस्त्र बल, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), शैक्षणिक संस्थान, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और निजी उद्योग शामिल हैं।

यह सहयोग इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि रक्षा तकनीक का विकास किसी एक संस्था के अकेले प्रयास से पूरा नहीं होता। सशस्त्र बल बताते हैं कि उन्हें मैदान में किस तरह की तकनीक चाहिए। डीआरडीओ जैसी अनुसंधान संस्थाएं उस तकनीक को विकसित करने का काम करती हैं। शैक्षणिक संस्थान बुनियादी शोध और नई सोच लेकर आते हैं। रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और निजी उद्योग उस तकनीक को बड़े पैमाने पर बनाने और उपलब्ध कराने की भूमिका निभाते हैं। रक्षा मंत्री का आह्वान यही था कि इन सभी के बीच तालमेल और तेज हो, ताकि स्वदेशी तकनीक का विकास और उसका इस्तेमाल दोनों में तेजी आए।

आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत का संबंध

अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने कहा कि सरकार की आत्मनिर्भर भारत के लिए प्रतिबद्धता उसके विकसित भारत के दृष्टिकोण के केंद्र में है। उन्होंने इसका उद्देश्य समझाते हुए कहा कि एक ऐसा राष्ट्र बनाना है जो तकनीकी रूप से सक्षम, आर्थिक रूप से प्रतिस्पर्धी, नवोन्मेषी और आत्मविश्वास से भरपूर हो।

इस बात में एक महत्वपूर्ण संदेश छिपा है। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल बाहर से चीजें न मंगाना नहीं है। इसका अर्थ यह है कि देश अपनी जरूरत की तकनीक को खुद समझे, खुद विकसित करे और खुद उसके इस्तेमाल की क्षमता रखे। रक्षा मंत्री ने कहा कि देश केवल ज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपभोक्ता न होकर उनके सृजन में भी “सक्रिय योगदानकर्ता” बने। यानी भारत केवल दूसरों द्वारा बनाई गई तकनीक का इस्तेमाल करने वाला देश न रहे, बल्कि नई तकनीक बनाने में भी आगे रहे। यही विकसित भारत के दृष्टिकोण की बुनियाद बताई गई।

युद्ध का बदलता परिदृश्य क्यों चिंता का विषय है

रक्षा मंत्री ने तेजी से बदलते युद्ध परिदृश्य का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करना रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। इसकी वजह यह है कि युद्ध का स्वरूप अब पहले जैसा नहीं रहा। अब युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों और आमने-सामने की लड़ाई तक सीमित नहीं है।

बदलते युद्ध परिदृश्य में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। सूचना, संचार, निगरानी, सटीक निशाना, तेज निर्णय और नेटवर्क से जुड़ी क्षमताएं अब युद्ध की रणनीति का अहम हिस्सा बन गई हैं। ऐसे में जो देश तकनीक में आगे होगा, उसकी सुरक्षा व्यवस्था भी उतनी ही मजबूत मानी जाएगी। रक्षा मंत्री का संदेश यही था कि भारत को इस बदलते परिदृश्य के अनुसार अपनी तकनीकी क्षमता को लगातार मजबूत करते रहना होगा।

किन तकनीकों का किया गया उल्लेख

अपने संबोधन में रक्षा मंत्री ने उन तकनीकों का भी उल्लेख किया जो “सैन्य परिदृश्य को बदल रही हैं”। इनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त प्रणालियां, मानवरहित प्लेटफॉर्म, उन्नत सेंसर, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष आधारित प्रौद्योगिकियां शामिल हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अर्थ उन प्रणालियों से है जो बड़ी मात्रा में जानकारी का विश्लेषण करके तेज और बेहतर निर्णय में मदद कर सकती हैं। स्वायत्त प्रणालियां वे प्रणालियां हैं जो मानवीय हस्तक्षेप के बिना या कम हस्तक्षेप के साथ काम कर सकती हैं। मानवरहित प्लेटफॉर्म ऐसे साधन हैं जो बिना मानव चालक के काम करते हैं। उन्नत सेंसर जानकारी जुटाने और स्थिति को समझने में मदद करते हैं। साइबर सुरक्षा डिजिटल प्रणालियों और सूचनाओं की सुरक्षा से जुड़ी है। अंतरिक्ष आधारित प्रौद्योगिकियां संचार, निगरानी और दिशा-निर्देशन जैसे कामों में भूमिका निभाती हैं। रक्षा मंत्री ने कहा कि ये सभी तकनीकें मिलकर सैन्य परिदृश्य को बदल रही हैं। इसलिए इन क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमता को मजबूत करना रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।

आगे की दिशा क्या होगी

रक्षा मंत्री के संबोधन से आगे की दिशा को लेकर एक स्पष्ट संकेत मिलता है। पहला संकेत यह है कि शैक्षणिक संस्थानों, विशेषकर आईआईटी जैसे संस्थानों, को रक्षा क्षेत्र से और अधिक जोड़ा जाएगा। शोध की दिशा को रक्षा जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया जाएगा।

दूसरा संकेत यह है कि डीआरडीओ, सशस्त्र बलों, शैक्षणिक संस्थानों, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी उद्योग के बीच सहयोग को और तेज किया जाएगा। तीसरा संकेत यह है कि स्वदेशी तकनीक के विकास को केवल एक नीतिगत नारे के रूप में नहीं, बल्कि व्यावहारिक और परिणाम देने वाली प्रक्रिया के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा। इस संबोधन के बाद अब यह देखा जाएगा कि इन बातों को जमीन पर उतारने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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