बुरहानपुर ब्यूरो
सार: बुरहानपुर में दिव्यांग दयाशंकर को मुख्यमंत्री के निर्देश पर ट्राइसाइकिल मिल गई है। पत्नी बिंदू बाई के वीडियो के सामने आने के बाद प्रशासन ने तेजी से कार्रवाई की और परिवार को बेटियों की शिक्षा के लिए भी सहायता दी है।
वीडियो सामने आया तो मुख्यमंत्री ने लिया संज्ञान
बुरहानपुर से सामने आए एक वीडियो ने पूरे प्रदेश का ध्यान खींचा। वीडियो में बिंदू बाई अपने दिव्यांग पति दयाशंकर को कंधे पर उठाकर कलेक्टर कार्यालय जाती हुई दिखाई दीं। यह दृश्य देखते ही यह सवाल उठा कि एक परिवार को मदद के लिए इतनी कठिन राह क्यों तय करनी पड़ रही है। वीडियो के सामने आने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मामले का संज्ञान लिया। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर इस मामले का उल्लेख किया और कहा कि किसी भी जरूरतमंद की पीड़ा अनसुनी नहीं रहनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रत्येक परिवार को सम्मान के साथ जीवन जीने के लिए शासन और प्रशासन की ओर से जरूरी सहयोग मिलना चाहिए। मुख्यमंत्री के इस संदेश के बाद जिला प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई शुरू की। मुख्यमंत्री ने कलेक्टर बुरहानपुर को दयाशंकर और उनके परिवार की जरूरतों के अनुसार मदद उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। इन्हीं निर्देशों के पालन में जिला प्रशासन ने दयाशंकर को ट्राइसाइकिल उपलब्ध कराई। परिवार को बेटियों की शिक्षा के लिए भी सहायता दी गई है।
महाजन कॉलोनी का परिवार और नौ साल का संघर्ष
यह परिवार बुरहानपुर की महाजन कॉलोनी का रहने वाला है। रिपोर्टों के अनुसार दयाशंकर को करीब नौ साल पहले लकवा हुआ था, जिसके बाद उनका एक पैर काटना पड़ा। इसके बाद से उनकी आवाजाही पूरी तरह परिवार के सहारे पर निर्भर हो गई। पत्नी बिंदू बाई पिछले कई वर्षों से पति को पीठ पर उठाकर सरकारी दफ्तरों तक ले जाती रही हैं। यह संघर्ष किसी एक दिन का नहीं था। परिवार का कहना है कि मदद के लिए वह लंबे समय से अलग-अलग अधिकारियों से मिलता रहा, लेकिन राहत नहीं मिल पा रही थी। इसी परेशानी के बीच बिंदू बाई पति को कंधे पर उठाकर कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं। वहां उन्होंने पति के लिए ट्राइसाइकिल और पेंशन की सुविधा दिलाने की मांग रखी। यह मांग किसी विलासिता की नहीं थी। यह एक दिव्यांग व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाने की मांग थी। ट्राइसाइकिल मिलने से पहले दयाशंकर को हर काम के लिए किसी न किसी के सहारे की जरूरत पड़ती थी। घर से बाहर निकलना, दफ्तर जाना या रोजमर्रा के काम करना, हर कदम पर परिवार को शारीरिक मेहनत करनी पड़ती थी।

कलेक्टर कार्यालय में मांग और प्रशासन की कार्रवाई
बिंदू बाई जब कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं, तब उन्होंने कलेक्टर विवेक कुमार के सामने अपनी परेशानी रखी। उन्होंने बताया कि पति के लिए ट्राइसाइकिल और पेंशन की सुविधा चाहिए। विभाग की ओर से पहले यह जानकारी दी गई थी कि करीब दो साल पहले एक कार्यक्रम में दयाशंकर को व्हीलचेयर दी गई थी। व्हीलचेयर की एक निर्धारित अवधि होती है और नियमों के अनुसार एक तय समय के बाद ही ट्राइसाइकिल उपलब्ध कराई जा सकती है। अधिकारियों ने तब यह भी कहा था कि मामला वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में पहुंचाया गया है और जल्द व्यवस्था कराने का प्रयास किया जाएगा। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद यह प्रक्रिया तेज हुई। कलेक्टर बुरहानपुर ने मुख्यमंत्री के निर्देशों के पालन में दयाशंकर को ट्राइसाइकिल उपलब्ध कराने की व्यवस्था की। ट्राइसाइकिल मिलने के बाद दयाशंकर की आवाजाही में बड़ी सहूलियत होगी। अब वह एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए पहले की तरह पूरी तरह परिवार के कंधों पर निर्भर नहीं रहेंगे। बिंदू बाई ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और बुरहानपुर कलेक्टर का आभार जताया है। उन्होंने प्रशासन की ओर से मिली सहायता पर खुशी जाहिर की है।
ट्राइसाइकिल मिलने से बदलेगी रोजमर्रा की जिंदगी
ट्राइसाइकिल किसी दिव्यांग व्यक्ति के लिए केवल एक वाहन नहीं होती। यह उसकी स्वतंत्रता का साधन होती है। ट्राइसाइकिल मिलने से दयाशंकर अब घर के आसपास के काम खुद कर सकेंगे। दफ्तर, बाजार या किसी जरूरी काम के लिए उन्हें हर बार किसी के कंधे का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। इससे परिवार के दूसरे सदस्यों पर पड़ने वाला शारीरिक और मानसिक बोझ भी कम होगा। बिंदू बाई के लिए भी यह बड़ी राहत है। पिछले कई वर्षों से वह पति को पीठ पर उठाकर चलती रही हैं। इस मेहनत का असर उनके अपने स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। ट्राइसाइकिल मिलने से उनकी यह रोज की कठिन यात्रा अब आसान होगी। परिवार की जिंदगी में यह बदलाव छोटा दिख सकता है, लेकिन जिसके लिए आवाजाही ही सबसे बड़ी चुनौती हो, उसके लिए यह बदलाव बहुत बड़ा है। ट्राइसाइकिल से दयाशंकर की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और वह समाज की मुख्यधारा से और मजबूती से जुड़ सकेंगे।
बेटियों की शिक्षा के लिए सहायता का क्या मतलब है
इस मामले में केवल ट्राइसाइकिल ही नहीं मिली है। परिवार को बेटियों की पढ़ाई के लिए भी सहायता दी गई है। यह पहलू इसलिए अहम है क्योंकि किसी परिवार की मुश्किल केवल एक व्यक्ति की आवाजाही तक सीमित नहीं रहती। जब घर का मुखिया दिव्यांग हो और परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो, तब बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ता है। बेटियों की शिक्षा के लिए मिली सहायता का मतलब है कि परिवार की अगली पीढ़ी की पढ़ाई नहीं रुकेगी। शिक्षा ही वह रास्ता है जिससे परिवार लंबे समय में अपनी स्थिति बदल सकता है। प्रशासन की ओर से बेटियों की पढ़ाई के लिए सहायता देना यह संदेश देता है कि मदद केवल तत्काल जरूरत तक सीमित नहीं है। यह परिवार के भविष्य को भी ध्यान में रखकर दी जा रही है। बिंदू बाई के परिवार के लिए यह भरोसा अहम है कि उनकी बेटियों की पढ़ाई जारी रहेगी। इस तरह की सहायता से परिवार को यह हौसला मिलता है कि शासन उनकी पूरी स्थिति को समझ रहा है, न कि केवल एक मांग को।
दिव्यांगजनों के लिए सरकारी सहायता की व्यवस्था
दिव्यांगजनों के लिए सरकार की ओर से कई तरह की सहायता की व्यवस्था है। इसमें सहायक उपकरण, पेंशन और शिक्षा से जुड़ी सहायता शामिल होती है। व्हीलचेयर और ट्राइसाइकिल जैसे उपकरण दिव्यांग व्यक्ति की गतिशीलता बढ़ाने के लिए दिए जाते हैं। इन उपकरणों के लिए पात्रता और समय से जुड़े नियम होते हैं। इसी वजह से कई बार एक उपकरण मिलने के बाद दूसरे उपकरण के लिए कुछ समय तक इंतजार करना पड़ता है। इस मामले में भी पहले व्हीलचेयर दी गई थी और अब ट्राइसाइकिल दी गई है। पेंशन की मांग भी परिवार ने रखी थी। पेंशन जैसी सुविधा के लिए संबंधित विभाग तक मांग पहुंचाई जाती है और पात्रता की जांच के बाद आगे की प्रक्रिया होती है। इस मामले में अब तक पुष्ट जानकारी ट्राइसाइकिल और बेटियों की शिक्षा के लिए सहायता की है। पेंशन को लेकर आगे की प्रक्रिया प्रशासनिक नियमों के अनुसार पूरी होगी। यह मामला यह भी दिखाता है कि जब किसी जरूरतमंद की आवाज सही मंच तक पहुंचती है, तब व्यवस्था तेजी से काम कर सकती है।
संवेदनशील शासन का संदेश
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस मामले में जिस तरह संज्ञान लिया, वह संवेदनशील शासन का उदाहरण है। मुख्यमंत्री ने वीडियो देखने के बाद तुरंत कलेक्टर को निर्देश दिए। मुख्यमंत्री का संदेश साफ था कि किसी भी जरूरतमंद की पीड़ा अनसुनी नहीं रहनी चाहिए। यह संदेश केवल इस एक परिवार के लिए नहीं है। यह प्रदेश के हर जरूरतमंद परिवार के लिए है। शासन की संवेदनशीलता की पहचान इसी से होती है कि वह आम व्यक्ति की परेशानी को कितनी गंभीरता से लेता है। बुरहानपुर के इस मामले में मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद जिला प्रशासन ने तेजी से काम किया। इससे यह भरोसा मजबूत होता है कि सही जानकारी सही समय पर सही व्यक्ति तक पहुंचे, तो मदद में देर नहीं होती। हाल के दिनों में मुख्यमंत्री ने किसानों और आम परिवारों से जुड़े कई मामलों में इसी तरह संवेदनशीलता दिखाई है। बालाघाट में किसानों की सराहना और राज्योत्सव में किसानों व मेधावी छात्रों का सम्मान भी इसी सोच का हिस्सा है। बुरहानपुर का मामला उसी कड़ी में एक और उदाहरण है, जहां एक परिवार की आवाज पर शासन ने तुरंत कदम उठाया।
आगे क्या होगा
अब दयाशंकर के पास ट्राइसाइकिल है और बेटियों की पढ़ाई के लिए सहायता मिली है। आगे की नजर इस बात पर रहेगी कि परिवार की पेंशन से जुड़ी मांग पर क्या प्रक्रिया पूरी होती है। प्रशासनिक नियमों के अनुसार पेंशन की पात्रता और दस्तावेजों की जांच के बाद ही इस पर निर्णय होगा। परिवार की उम्मीद है कि बाकी औपचारिकताएं भी जल्द पूरी होंगी। इस मामले से एक और सबक भी मिलता है। जरूरतमंद परिवारों तक सहायता पहुंचाने के लिए व्यवस्था को और सरल और तेज होना चाहिए, ताकि किसी पत्नी को अपने पति को कंधे पर उठाकर दफ्तर तक न जाना पड़े। जब व्यवस्था समय पर काम करती है, तब परिवारों को संघर्ष नहीं करना पड़ता। बुरहानपुर के इस परिवार की कहानी अब उम्मीद की कहानी बन गई है। एक वीडियो ने उनकी आवाज को प्रदेश तक पहुंचाया और मुख्यमंत्री के निर्देश ने उस आवाज को मदद में बदल दिया। यही इस खबर का सबसे बड़ा संदेश है।
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