जबलपुर ब्यूरो
सार: जबलपुर में महाधिवक्ता कार्यालय के अभिनंदन समारोह में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भारत की न्याय परंपरा केवल अदालतों तक सीमित नहीं है, बल्कि सनातन संस्कृति और जीवन शैली में ही न्याय के मूल रचे-बसे हैं — और प्रदेश में 900 से अधिक पुराने, अनुपयोगी कानून समाप्त कर व्यवस्था को समय के अनुरूप बनाया गया है।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शुक्रवार को जबलपुर पहुंचे, जहां महाधिवक्ता कार्यालय की ओर से आयोजित अभिनंदन समारोह में उन्होंने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे का अभिनंदन किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने न्याय, संविधान और लोकतंत्र की परंपरा पर विस्तार से अपने विचार रखे। समारोह में लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह, महाधिवक्ता प्रशांत सिंह, न्यायमूर्ति विवेक रुसिया सहित न्यायपालिका और अधिवक्ता समुदाय के अनेक प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
अभिनंदन समारोह में क्या हुआ
समारोह का आयोजन महाधिवक्ता कार्यालय, जबलपुर की ओर से किया गया था। इसमें मुख्यमंत्री और मुख्य न्यायाधीश दोनों का अभिनंदन किया गया। मुख्यमंत्री ने मुख्य न्यायाधीश का जबलपुर में स्वागत करते हुए उनके कार्यकाल के लिए शुभकामनाएं दीं और विश्वास जताया कि उनके नेतृत्व में प्रदेश की न्याय परंपरा और अधिक मजबूत होगी। मुख्य न्यायाधीश ने भी इस अवसर पर न्याय व्यवस्था, अधिवक्ताओं की भूमिका और बार-बेंच के बीच समन्वय पर अपने विचार साझा किए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इस तरह के अवसर केवल औपचारिक अभिनंदन तक सीमित नहीं रहते। ये अवसर न्याय के प्रति संकल्प को दोहराने और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को फिर से याद करने का मौका भी होते हैं। जबलपुर को न्यायधानी कहा जाता है, क्योंकि यहां मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय स्थित है, और इस पहचान के साथ न्याय के प्रति जिम्मेदारी भी जुड़ती है।
न्याय परंपरा केवल अदालतों तक सीमित नहीं
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि आजादी के बाद भारत का लोकतंत्र जीवंत और मजबूत बना रहा, तो इसमें न्यायपालिका की भूमिका सबसे अहम रही है। दुनिया के कई देशों में राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के बीच भारत सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में मजबूती से खड़ा है, और इसका श्रेय न्याय की परंपरा को जाता है। देश की गौरवशाली न्यायिक परंपरा, बार और बेंच के बीच समन्वय और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूती दी है।
उन्होंने कहा कि भारत की न्याय परंपरा केवल संवैधानिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है। हमारी संस्कृति, साहित्य और सामाजिक जीवन में भी न्याय के आदर्श गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर का उल्लेख किया, जिसमें पंचों के फैसले को परमेश्वर का फैसला माना गया है। इसी तरह मदर इंडिया जैसी फिल्मों में भी न्याय, नैतिकता और कर्तव्य के उदाहरण देखने को मिलते हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि भारतीय समाज में न्याय और नैतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता कितनी गहरी है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक परंपरा ने अनेक कठिन दौर देखे हैं। आपातकाल के समय भी न्यायपालिका की भूमिका और उसके फैसले देश के लोकतांत्रिक इतिहास में महत्वपूर्ण रहे। न्याय व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं ने लोकतंत्र की मूल भावना को बनाए रखने में योगदान दिया है। यही वजह है कि आज भी आम नागरिक को न्याय व्यवस्था पर भरोसा है।

900 से अधिक पुराने कानून समाप्त किए गए
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश की न्याय व्यवस्था को वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के लिए अंग्रेजों के जमाने के पुराने कानूनों को समाप्त कर नए कानून लागू किए गए हैं। इसी दिशा में मध्यप्रदेश में भी सरकार ने 900 से अधिक अनुपयोगी कानून समाप्त किए हैं। इनमें कई ऐसे पुराने कानून थे, जिनकी वर्तमान समय में कोई उपयोगिता नहीं रह गई थी। कुछ कानून तो दो सौ साल से भी पुराने दौर के थे।
उन्होंने कहा कि ऐसे कानूनों को समाप्त करने का मकसद शासन व्यवस्था को समयानुकूल बनाना है। जब पुराने और बेकार कानून किताबों में बने रहते हैं, तो वे आम लोगों और प्रशासन दोनों के लिए भ्रम पैदा करते हैं। उन्हें हटाने से व्यवस्था सरल होती है और न्याय प्रक्रिया भी तेज होती है। सरकार का प्रयास है कि कानून आम आदमी की समझ में आएं और उसके जीवन को आसान बनाएं, न कि उलझाएं।
इस क्रम में मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि न्यायालय अपना काम स्वतंत्र रूप से करे और जनता द्वारा चुनी गई सरकार अपने दायित्वों का निर्वहन करे। दोनों संस्थाओं की अपनी-अपनी संवैधानिक मर्यादाएं और जिम्मेदारियां हैं। कई बार यह समझना भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है कि किस विषय में ज्ञापन देना चाहिए और किस मामले में न्यायालय की शरण लेनी चाहिए, लेकिन संस्थाओं के बीच स्पष्टता और सम्मान से ही व्यवस्था चलती है।
पड़ोसी देशों का उल्लेख, भारत की लोकतांत्रिक मजबूती पर जोर
मुख्यमंत्री ने पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक और सर्वाधिक आबादी वाला देश है। इसके बाद भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का दृढ़ता से कायम रहना गौरव की बात है। इसमें न्यायपालिका, बार और न्यायिक परंपरा का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने कहा कि दुनिया भारत की ओर देखती है, क्योंकि यहां लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन शैली का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रदेश सरकार संकल्पित है। संस्कृति और न्याय का संबंध इसलिए भी गहरा है, क्योंकि दोनों का आधार सत्य, धर्म और कर्तव्य है। जब समाज में ये मूल्य मजबूत होते हैं, तो न्याय व्यवस्था को भी बल मिलता है और लोगों के बीच विश्वास बढ़ता है।
बार और बेंच का सम्मान ही न्याय की नींव
मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे ने अपने संबोधन में कहा कि बार और बेंच न्याय प्रशासन के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। दोनों की भूमिकाएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य एक ही है — संविधान की रक्षा करना, नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित रखना और बिना किसी भय या पक्षपात के निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना। बार और बेंच के बीच संबंध आपसी सम्मान, संस्थागत स्वतंत्रता, पेशेवर ईमानदारी और विधि के शासन के प्रति साझा प्रतिबद्धता पर आधारित होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि न्यायिक कार्यवाही के दौरान विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इनका समाधान हमेशा पेशेवर शिष्टाचार और न्याय के प्रति साझा समर्पण के साथ होना चाहिए। बार और बेंच के बीच बेहतर संबंध न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने महाधिवक्ता प्रशांत सिंह की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि न्याय प्रणाली को अधिक सुलभ, संवेदनशील और प्रभावी बनाने के लिए मिलकर काम करना होगा।
मुख्य न्यायाधीश ने मुख्यमंत्री, लोक निर्माण मंत्री, न्यायमूर्तियों, महाधिवक्ता, बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों, अधिवक्ताओं और अन्य अतिथियों की उपस्थिति के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने अधिवक्ताओं से कहा कि वे अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों को समझें और समाज में अपनी भूमिका को गरिमा के साथ निभाएं। सभी अधिवक्ताओं के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उन्होंने कहा कि वे अपने लक्ष्यों को प्राप्त करें और अपने कार्यों से सम्मान अर्जित करें।
महाधिवक्ता कार्यालय अधिवक्ताओं के लिए विश्वविद्यालय जैसा
मुख्य न्यायाधीश ने महाधिवक्ता कार्यालय की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि यह न्यायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ और हितधारक है। महाधिवक्ता की जिम्मेदारी केवल सरकार का पक्ष रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे बार और बेंच के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि महाधिवक्ता प्रशांत सिंह इस जिम्मेदारी का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर रहे हैं।
उन्होंने महाधिवक्ता कार्यालय को एक विश्वविद्यालय के समान बताया, जहां अधिवक्ताओं को व्यापक अनुभव और सीखने के अवसर मिलते हैं। इससे न केवल उनकी पेशेवर क्षमताओं का विकास होता है, बल्कि उन्हें समाज में बड़ी जिम्मेदारियां निभाने के लिए भी तैयार किया जाता है। उन्होंने अपने गृह राज्य में महाधिवक्ता कार्यालय से मिले अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि वे स्वयं भी इस व्यवस्था से लाभान्वित रहे हैं।
जबलपुर: संस्कारधानी के साथ न्यायधानी भी
लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने अभिनंदन समारोह में कहा कि जबलपुर केवल संस्कारधानी ही नहीं, बल्कि न्यायधानी के रूप में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यहां मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय होने के कारण इसे न्यायधानी के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने कहा कि यह अवसर केवल अभिनंदन का नहीं, बल्कि न्याय के संकल्प और उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराने का भी है। न्याय के प्रति प्रतिबद्धता और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का आधार है।
न्यायमूर्ति विवेक रुसिया ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जबलपुर में वकालत के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि उन्होंने यहां वकालत की और बाद में न्यायाधीश बने। वकालत ऐसा पेशा है, जिसमें पीढ़ी दर पीढ़ी परिवारों के लोग जुड़ते रहते हैं। एक पीढ़ी के बाद दूसरी और तीसरी पीढ़ी इस पेशे को आगे बढ़ाती है। यह व्यवस्था और पेशे की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि न्यायपालिका और विधायिका के समन्वय से ही प्रदेश में प्रत्येक नागरिक को सहजता से त्वरित और निष्पक्ष न्याय उपलब्ध कराने का उद्देश्य पूरा हो सकता है। साथ ही राज्य विकास और प्रगति के नए आयाम स्थापित कर सकता है। उन्होंने कहा कि इन दोनों संवैधानिक संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करने में नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका है।
आगे क्या
इस समारोह से दो बातें साफ होती हैं। पहली, प्रदेश सरकार पुराने कानूनों को हटाकर व्यवस्था को सरल बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है, और दूसरी, न्यायपालिका और सरकार के बीच संस्थागत सम्मान को लोकतंत्र की मजबूती का आधार माना जा रहा है। आने वाले समय में इस दिशा में और कदम उठाए जाने की उम्मीद है, ताकि आम नागरिक को न्याय सुलभ, तेज और भरोसेमंद लगे। जबलपुर में हुआ यह समारोह इसी संदेश के साथ संपन्न हुआ कि न्याय केवल अदालतों का विषय नहीं, बल्कि समाज की जीवन शैली और संस्कृति का हिस्सा है।
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