दिल्ली ब्यूरो। नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में शुक्रवार को 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार का ऐलान कर दिया गया। यह प्रतिष्ठित सम्मान दक्षिण अफ्रीका की वरिष्ठ न्यायविद और मानवाधिकार कार्यकर्ता नवानेथेम ‘नवी’ पिल्लै को दिया गया है। नोबेल समिति के अध्यक्ष जोर्गेन वात्ने फ्रायडनेस ने घोषणा करते हुए कहा कि यह पुरस्कार उन्हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों के लिए दिया जा रहा है।
पिल्लै का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन में भारतीय मूल के तमिल परिवार में हुआ। वे 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त रहीं और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की न्यायाधीश भी रह चुकी हैं। मानवाधिकारों के क्षेत्र में दशकों से उनकी सक्रियता को पूरी दुनिया में सम्मान की नज़र से देखा जाता है।
शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए सम्मान
नोबेल समिति ने अपने प्रशस्ति पत्र में कहा कि पिल्लै को यह पुरस्कार शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए उनके योगदान के सम्मान में दिया गया है। उनके करियर में कानून के शासन, युद्ध अपराधों के खिलाफ न्याय और पीड़ितों के अधिकारों के लिए निरंतर आवाज़ उठाना शामिल है।
ट्रम्प की उम्मीदों पर पानी
इस बार पुरस्कार की दौड़ में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का नाम भी चर्चा में रहा। ट्रम्प ने खुलकर इस पुरस्कार की पैरवी की थी और दावा किया था कि उन्होंने आठ युद्ध रुकवाए हैं। हालांकि नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने उनका चयन नहीं किया। घोषणा से कुछ दिन पहले ट्रम्प ने पत्रकारों से कहा था कि उन्हें यह सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन उन्हें संदेह था कि समिति उन्हें चुनेगी।
गौरतलब है कि पिछले साल 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना माचादो को मिला था। इस साल जनवरी में माचादो ने व्हाइट हाउस में ट्रम्प को अपना भौतिक पदक सौंप दिया था, जिसके बाद नोबेल संस्थान ने स्पष्ट किया था कि पुरस्कार को किसी और को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।
287 उम्मीदवारों में से चुनाव
नोबेल समिति के अनुसार इस बार पुरस्कार के लिए कुल 287 उम्मीदवार थे, जिनमें 208 व्यक्ति और 79 संगठन शामिल थे। उम्मीदवारों के नाम गोपनीय रखे जाते हैं, इसलिए यह कभी सार्वजनिक नहीं होता कि कौन-कौन दौड़ में था।
फैसले के साथ ही ओस्लो में दिसंबर में होने वाले पुरस्कार समारोह की तैयारियां शुरू हो गई हैं। नवी पिल्लै को यह सम्मान उनके आजीवन मानवाधिकार संघर्ष की मान्यता के रूप में देखा जा रहा है।
फोटो: Antônio Cruz (Agência Brasil), CC BY 3.0 — Wikimedia Commons
