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ग्रामीण रोजगार योजना में शिकायत का अब 15 दिन में समाधान: तीन स्तरीय व्यवस्था, डिजिटल ट्रैकिंग और अपील का प्रावधान

सांकेतिक चित्र: ग्रामीण रोजगार योजना के कार्यस्थल पर काम करते मजदूर सांकेतिक चित्र

नई दिल्ली ब्यूरो

सार: ग्रामीण रोजगार योजना से जुड़ी शिकायतों के निपटारे के लिए अब समय-सीमा तय हो गई है। नए नियमों के तहत हर शिकायत की जांच सात कार्यदिवसों में पूरी करनी होगी और उसका समाधान 15 दिनों के भीतर करना होगा। ग्राम पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तर पर तीन स्तरीय व्यवस्था बनेगी, हर शिकायत का डिजिटल पंजीकरण होगा और 15 दिनों में समाधान न होने पर वह अपने आप ऊपर के स्तर पर पहुंच जाएगी।

नया नियम क्या कहता है

केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने ग्रामीण रोजगार योजना के लिए शिकायत निपटारा नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं। ये नियम वर्ष 2025 के अधिनियम के तहत बनाए गए हैं, जो केंद्र की ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का वैधानिक ढांचा है। नए नियमों का मकसद शिकायतों के निपटारे को व्यवस्थित, समयबद्ध और पारदर्शी बनाना है, ताकि ग्रामीण परिवारों की परेशानियां लंबे समय तक लटकी न रहें।

अधिसूचना के अनुसार राज्य सरकारों को ग्राम पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तर पर शिकायत निपटारा व्यवस्था स्थापित करनी होगी। हर स्तर पर नामित शिकायत निपटारा अधिकारी शिकायत प्राप्त करेंगे, उसका पंजीकरण करेंगे, जांच करेंगे और उसका निपटारा करेंगे। जिला स्तर पर जिला कार्यक्रम समन्वयक इस पूरी व्यवस्था की निगरानी करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि शिकायतों का निपटारा नामित व्यवस्था और डिजिटल मंच के माध्यम से हो।

इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत समय-सीमा है। पहले शिकायतों के निपटारे के लिए इस तरह की स्पष्ट और बाध्यकारी समय-सीमा का अभाव अक्सर मजदूरों की सबसे बड़ी शिकायत रहता था। अब जांच और समाधान, दोनों के लिए अलग-अलग समय तय कर दिया गया है, और समय पर समाधान न होने की स्थिति में शिकायत को ऊपर भेजने की व्यवस्था भी नियमों में ही दर्ज है।

मध्य प्रदेश के गांवों के लिए क्यों अहम है

मध्य प्रदेश में बड़ी आबादी गांवों में रहती है और ग्रामीण रोजगार योजना यहां के लाखों परिवारों के लिए आजीविका का एक अहम सहारा है। काम मांगने, मजदूरी मिलने, कार्यस्थल की सुविधाओं और भत्तों से जुड़े सवाल गांव-गांव में उठते रहते हैं। ऐसे में शिकायत निपटारे की एक स्पष्ट व्यवस्था का सीधा असर उन परिवारों पर पड़ता है, जो अपनी रोजी-रोटी के लिए इस योजना पर निर्भर हैं।

ग्रामीण इलाकों में अक्सर यह शिकायत सुनने को मिलती है कि शिकायत दर्ज कराने के बाद उसकी कोई पावती नहीं मिलती, या शिकायत कहां अटकी है, इसका पता नहीं चलता। नए नियम इसी परेशानी को दूर करने की कोशिश करते हैं। पावती, पंजीकरण संख्या, डिजिटल ट्रैकिंग और समय-सीमा के प्रावधानों से मजदूर को अपनी शिकायत की स्थिति जानने का एक स्पष्ट रास्ता मिलेगा।

यह भी अहम है कि यह व्यवस्था सिर्फ शिकायत दर्ज करने तक सीमित नहीं है। जांच, सुधारात्मक कार्रवाई, नतीजे की सूचना और अपील तक का पूरा चक्र नियमों में तय किया गया है। यानी शिकायत दर्ज करने वाला व्यक्ति सिर्फ इंतजार करने वाला नहीं रहेगा, बल्कि उसे हर चरण की जानकारी मिलेगी और असंतोष की स्थिति में आगे का रास्ता भी खुला रहेगा।

सांकेतिक चित्र: पंचायत कार्यालय में शिकायत देते ग्रामीण

तीन स्तर की व्यवस्था कैसे काम करेगी

नई व्यवस्था तीन स्तरों पर काम करेगी। पहला स्तर ग्राम पंचायत का होगा, जहां गांव के लोग अपनी शिकायत सबसे नजदीक के स्तर पर दर्ज करा सकेंगे। दूसरा स्तर ब्लॉक का होगा और तीसरा स्तर जिला का होगा। हर स्तर पर नामित अधिकारी शिकायतों को प्राप्त करने, पंजीकृत करने, जांच करने और निपटाने के लिए जिम्मेदार होंगे।

इस ढांचे का मकसद शिकायतों को स्थानीय स्तर पर ही सुलझाना है, ताकि छोटे मामलों के लिए मजदूर को दूर-दराज के दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें। जब कोई शिकायत एक स्तर पर तय समय में नहीं सुलझती, तो वह अगले स्तर पर पहुंच जाएगी। इस तरह व्यवस्था में एक तरह की सीढ़ी बनी रहेगी, जिसमें हर कदम पर जिम्मेदारी तय होगी।

जिला स्तर पर जिला कार्यक्रम समन्वयक की भूमिका निगरानी की होगी। वे यह देखेंगे कि जिले में शिकायतों का निपटारा नामित व्यवस्था के अनुसार हो रहा है या नहीं और डिजिटल मंच पर हर शिकायत की स्थिति दर्ज हो रही है या नहीं। इससे जिले के स्तर पर एक जवाबदेही बनेगी, जो पहले अक्सर बिखरी हुई नजर आती थी।

शिकायत दर्ज करने के चार रास्ते

नियमों में शिकायत दर्ज करने के चार रास्ते दिए गए हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार शिकायत कर सके। पहला रास्ता है नामित शिकायत निपटारा अधिकारी के सामने व्यक्तिगत रूप से शिकायत देना। दूसरा रास्ता है डाक के माध्यम से शिकायत भेजना, जिसमें डिलीवरी का प्रमाण साथ होना चाहिए।

तीसरा रास्ता डिजिटल मंच का है, जिसे केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाएगा। इस मंच पर शिकायत दर्ज की जा सकेगी और उसकी स्थिति को भी देखा जा सकेगा। चौथा रास्ता टेलीफोन, नामित हेल्पलाइन या राज्य सरकार द्वारा तय किए गए किसी अन्य माध्यम का है। यानी शिकायत दर्ज करने के लिए सिर्फ एक ही तरीका अपनाना जरूरी नहीं होगा।

यह विविधता इसलिए अहम है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में हर व्यक्ति के पास एक ही तरह की सुविधा नहीं होती। कोई व्यक्ति पंचायत कार्यालय जाकर शिकायत दे सकता है, तो कोई डाक या फोन का इस्तेमाल कर सकता है। डिजिटल मंच उन लोगों के लिए होगा, जो ऑनलाइन माध्यम से अपनी शिकायत की स्थिति पर नजर रखना चाहते हैं।

पंजीकरण से इनकार नहीं, पावती हर हाल में

नए नियमों का एक सबसे मजबूत प्रावधान यह है कि किसी भी शिकायत का पंजीकरण उसके प्रारूप, भाषा, जमा करने के तरीके या किसी प्रक्रियात्मक कमी के आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकेगा। यानी सिर्फ इसलिए शिकायत नहीं लौटाई जा सकेगी कि वह किसी तय प्रारूप में नहीं लिखी गई है, या किसी खास भाषा में नहीं है, या उसमें कोई छोटी प्रक्रियात्मक कमी रह गई है।

शिकायत के पंजीकरण के बाद शिकायतकर्ता को एक पावती दी जाएगी, जिसमें पंजीकरण संख्या, प्राप्ति की तारीख और प्राप्त करने वाले प्राधिकारी का पदनाम दर्ज होगा। डिजिटल माध्यम से की गई शिकायत पर पावती इलेक्ट्रॉनिक रूप में मिलेगी, जबकि व्यक्तिगत रूप से दी गई शिकायत पर पावती भौतिक रूप में भी दी जाएगी। यह पावती ही आगे शिकायत की स्थिति जानने का आधार बनेगी।

पंचायत, ब्लॉक या जिला स्तर पर भौतिक रूप में मिली हर शिकायत को उसी दिन, और यदि वह संभव न हो तो अगले कार्यदिवस तक, नामित डिजिटल मंच पर दर्ज करना अनिवार्य होगा। इससे कागज पर दी गई शिकायत भी डिजिटल व्यवस्था का हिस्सा बन जाएगी और उसकी निगरानी संभव हो सकेगी। यह प्रावधान शिकायतों के गुम होने या दब जाने की आशंका को कम करता है।

समय-सीमा: सात दिन जांच, 15 दिन समाधान

नियमों में दो समय-सीमाएं साफ तौर पर तय की गई हैं। शिकायत की जांच उसकी प्राप्ति की तारीख से सात कार्यदिवसों के भीतर पूरी करनी होगी। जांच के दौरान नामित अधिकारी संबंधित प्राधिकारियों से रिकॉर्ड, रजिस्टर, दस्तावेज, रिपोर्ट या इलेक्ट्रॉनिक आंकड़े मांग सकेंगे। जहां जरूरी होगा, शिकायतकर्ता को व्यक्तिगत रूप से या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सुनवाई का उचित अवसर भी दिया जाएगा।

जांच पूरी होने के बाद अधिकारी अपने निष्कर्ष दर्ज करेंगे और अधिनियम तथा नियमों के अनुसार उचित सुधारात्मक या उपचारात्मक कार्रवाई करेंगे या कराएंगे। शिकायत का समाधान उसकी प्राप्ति की तारीख से 15 दिनों के भीतर करना होगा। निष्कर्ष और की गई कार्रवाई को नामित डिजिटल मंच पर दर्ज किया जाएगा और शिकायतकर्ता को इसकी सूचना दी जाएगी। भौतिक रूप में मिली शिकायत के मामले में नतीजा और कार्रवाई की सूचना भौतिक रूप में भी दी जाएगी।

यदि कोई शिकायत तय 15 दिनों की अवधि में नहीं सुलझती है, तो वह राज्य सरकार द्वारा स्थापित व्यवस्था के माध्यम से अगले उच्च स्तर पर भेज दी जाएगी। ऊपर पहुंची शिकायत की जांच वहां की प्राधिकारी करेंगे और उसके निपटारे के लिए उचित कार्रवाई करेंगे। ऐसी शिकायतों की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी तब तक जारी रहेगी, जब तक उनका निपटारा नहीं हो जाता। यानी समय बीतने पर शिकायत बंद नहीं होगी, बल्कि वह ऊपर के स्तर पर निगरानी में बनी रहेगी।

किन मामलों में शिकायत की जा सकती है

नियमों के तहत शिकायत योजना के क्रियान्वयन से जुड़े किसी भी मामले में की जा सकती है। अधिनियम की धारा 25(2) के तहत जिन विषयों को शिकायत के दायरे में रखा गया है, उनमें काम देने से इनकार, मजदूरी में देरी या भुगतान न होना, बेरोजगारी भत्ता न मिलना, कार्यस्थल पर सुविधाओं की कमी, भेदभाव और उत्पीड़न जैसे मामले शामिल हैं।

ये वे मामले हैं, जो ग्रामीण मजदूरों के रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़े हैं। काम मांगने के बाद काम न मिलना, काम करने के बाद मजदूरी अटक जाना, या कार्यस्थल पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव — ये सभी ऐसी परेशानियां हैं, जिनका समाधान समय पर न होने पर परिवार की आजीविका पर सीधा असर पड़ता है। नए नियम इन मामलों को एक तय समय-सीमा के भीतर सुलझाने की व्यवस्था देते हैं।

शिकायत की जांच के दौरान अधिकारी को संबंधित रिकॉर्ड देखने और तथ्यों की पड़ताल करने का अधिकार होगा। शिकायतकर्ता को सुनवाई का अवसर मिलने से यह व्यवस्था एकतरफा नहीं रहेगी। निष्कर्ष दर्ज करने और कार्रवाई की सूचना देने की अनिवार्यता से यह भी तय होगा कि जांच का नतीजा सिर्फ फाइल में दर्ज होकर न रह जाए, बल्कि शिकायतकर्ता तक पहुंचे।

अपील का रास्ता, और मसौदे से क्या अलग है

यदि कोई व्यक्ति शिकायत पर दिए गए आदेश से असंतुष्ट है, तो वह अपील कर सकेगा। अपील अधिनियम की अनुसूची के प्रावधानों के अनुसार दायर की जाएगी और उसी के अनुसार उसका निपटारा होगा। नियमों में अपील के लिए क्रमिक स्तरों की व्यवस्था का उल्लेख है, जिसमें एक स्तर के आदेश के खिलाफ अगले स्तर पर अपील की जा सकेगी। इस व्यवस्था के तहत अपील 45 दिनों के भीतर दायर की जा सकेगी और उसका निपटारा 30 दिनों के भीतर होगा।

इस अधिसूचना पर एक बहस भी सामने आई है, जो अंतिम नियमों और मई के मसौदे के बीच के अंतर से जुड़ी है। मसौदे में कुछ प्रावधान स्पष्ट रूप से दर्ज थे, जो अंतिम अधिसूचना में स्पष्ट तौर पर नहीं रखे गए हैं। इनमें मजदूरों के लिए साप्ताहिक शिकायत दिवस का प्रावधान, देरी के लिए अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान, वित्तीय अनियमितता के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने का प्रावधान, और पंचायत स्तर की समीक्षा तथा राज्य सरकारों को त्रैमासिक रिपोर्ट भेजने से जुड़े प्रावधान शामिल बताए गए हैं।

दूसरी ओर, यह भी कहा गया है कि अधिनियम की अनुसूची में ही इन सुरक्षाओं के घटक पहले से मौजूद हैं, और नियम अधिनियम के अधीन बनाए गए अधीनस्थ कानून हैं, जो संसद द्वारा तय की गई आवश्यकताओं को हटा नहीं सकते। अधिनियम में गलत तरीके से ली गई राशि की वसूली का भी प्रावधान है, और जहां आपराधिक गलत काम का संदेह हो, वहां लागू आपराधिक कानून का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इसलिए असली सवाल यह है कि अंतिम नियमों में इन मौजूदा वैधानिक सुरक्षाओं के क्रियान्वयन और निगरानी की स्पष्टता कितनी है।

आगे क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य सरकारें तीन स्तरों पर अधिकारियों की नियुक्ति, डिजिटल मंच का संचालन और समय-सीमा का पालन कितनी तेजी और गंभीरता से करती हैं। मजदूरों के लिए सबसे व्यावहारिक बात यह है कि वे अपनी शिकायत की पावती और पंजीकरण संख्या संभालकर रखें, 15 दिनों की अवधि पर नजर रखें और समय पर समाधान न होने पर शिकायत के ऊपर भेजे जाने की स्थिति के बारे में पूछताछ करें। नियम कागज पर एक मजबूत ढांचा देते हैं, लेकिन उनकी असली परीक्षा गांव के स्तर पर उनके पालन से होगी।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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