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कैबिनेट का बड़ा फैसला: दुष्कर्म और POCSO मामलों के लिए 850 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें 2031 तक जारी, 3,788 करोड़ मंजूर

सांकेतिक चित्र: स्तंभों वाला भव्य अदालत भवन सांकेतिक चित्र

नई दिल्ली ब्यूरो

सार: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 नवंबर 2026 को दुष्कर्म और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की तेज सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की योजना को पांच साल के लिए और बढ़ा दिया है। अब यह योजना 31 मार्च 2031 तक जारी रहेगी, इसके लिए कुल 3,788.04 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है और अदालतों की संख्या बढ़ाकर 850 तक की जाएगी।

केंद्रीय मंत्रिमंडल की 4 नवंबर 2026 की बैठक में लिए गए इस फैसले के बाद देशभर में दुष्कर्म और POCSO अधिनियम, 2012 के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए बनी विशेष अदालतों का ढांचा अगले पांच साल तक बना रहेगा। बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की और फैसले की जानकारी कैबिनेट ब्रीफिंग में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दी। ब्रीफिंग में कहा गया कि सरकार महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों के मामलों से सख्ती से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है और मौजूदा कानूनों का पूरा उपयोग सुनिश्चित करने के साथ नए कानूनों के निर्माण पर भी काम किया जा रहा है।

यह फैसला उसी मंत्रिमंडल बैठक का हिस्सा है जिसमें ऊर्जा भंडारण, क्रिटिकल मिनरल प्रसंस्करण और सांख्यिकी व्यवस्था से जुड़े फैसले भी लिए गए थे। उन फैसलों की खबर पहले ही प्रकाशित हो चुकी है। इस खबर में केवल फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों से जुड़े फैसले का पूरा ब्योरा दिया जा रहा है, ताकि पाठकों को इस योजना की अवधि, बजट, अदालतों की संख्या और कामकाज की पूरी तस्वीर एक जगह मिल सके।

क्या फैसला हुआ

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की केंद्र प्रायोजित योजना को 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक, यानी पांच साल के लिए जारी रखने की मंजूरी दी है। इस योजना में विशेष POCSO अदालतें भी शामिल हैं। इसका मतलब है कि दुष्कर्म और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए अलग से बनी अदालतें अब 2031 तक काम करती रहेंगी और उनका विस्तार भी किया जाएगा।

योजना को केंद्र प्रायोजित योजना कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकारें तथा केंद्र शासित प्रदेश दोनों का वित्तीय योगदान होता है और इसका क्रियान्वयन राज्यों के सहयोग से होता है। केंद्र सरकार की ओर से न्याय विभाग इस योजना को लागू करने का काम करेगा और राज्य सरकारों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन के साथ मिलकर अदालतों का संचालन सुनिश्चित किया जाएगा।

फैसले का सीधा अर्थ यह है कि इन विशेष अदालतों में लंबित मामलों की सुनवाई रुकेगी नहीं और नई अदालतों के जुड़ने से लंबित मामलों के बोझ को कम करने में मदद मिलेगी। सरकार का कहना है कि इस योजना का उद्देश्य समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित करना, यौन अपराधों से जुड़े मामलों का बैकलॉग कम करना और पीड़ितों के लिए न्याय की प्रक्रिया को अधिक संवेदनशील बनाना है।

कितना पैसा, किसका कितना हिस्सा

विस्तारित योजना के लिए कुल 3,788.04 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान किया गया है। इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 2,353.15 करोड़ रुपये होगा और राज्य सरकारों तथा केंद्र शासित प्रदेशों का हिस्सा 1,434.89 करोड़ रुपये होगा। केंद्र सरकार का योगदान निर्भया फंड से दिया जाएगा। निर्भया फंड महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कामों के लिए बनाया गया कोष है और इसी कोष से केंद्र का हिस्सा वहन किया जाएगा।

रकम का यह बंटवारा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालतों के संचालन में न्यायिक अधिकारी, अभियोजन पक्ष और सहायक कर्मचारियों का खर्च, बुनियादी ढांचा और निगरानी व्यवस्था शामिल होती है। केंद्र और राज्यों के बीच लागत का बंटवारा होने से राज्यों पर पूरा बोझ नहीं पड़ता और योजना को देशभर में एक समान ढंग से चलाना संभव होता है।

पांच साल की अवधि के लिए तय की गई यह रकम योजना के विस्तार को भी संभव बनाएगी। नई अदालतों की स्थापना, मौजूदा अदालतों को मजबूत करना और पीड़ित-केंद्रित सुविधाओं का विकास इसी प्रावधान के दायरे में होगा।

सांकेतिक चित्र: खाली अदालत कक्ष

अदालतों की संख्या कैसे बढ़ेगी

वर्तमान में देशभर में 779 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें कार्यरत हैं, जिनमें 399 विशेष POCSO अदालतें शामिल हैं। यह योजना 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही है। मंत्रिमंडल के फैसले के बाद अदालतों की संख्या बढ़ाकर 850 तक की जाएगी, यानी मौजूदा संख्या से 71 अदालतें अधिक होंगी।

अदालतों की संख्या में यह बढ़ोतरी जिलों में लंबित मामलों की स्थिति को देखकर की जाएगी। जिन जिलों में दुष्कर्म और POCSO अधिनियम के तहत मामलों का बोझ अधिक है, वहां अतिरिक्त अदालतों को प्राथमिकता दी जाएगी। इस तरह विस्तार का आधार मामलों की लंबित संख्या होगी, न कि एक समान बंटवारा।

एक पुरानी स्थिति का ब्योरा भी सामने आया है, जिसके अनुसार 30 अप्रैल 2026 तक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 398 विशेष POCSO अदालतों सहित 775 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें काम कर रही थीं। वर्तमान 779 की संख्या और 30 अप्रैल की 775 की संख्या के बीच का अंतर समय के साथ अदालतों की संख्या में हुई वृद्धि को दर्शाता है। इसलिए इस खबर में वर्तमान संख्या के रूप में 779 और विशेष POCSO अदालतों के रूप में 399 का आंकड़ा दिया गया है।

हर अदालत में कौन-कौन होगा

योजना के तहत हर फास्ट ट्रैक विशेष अदालत में एक समर्पित न्यायिक अधिकारी, एक विशेष लोक अभियोजक और छह सहायक कर्मचारी होंगे। यह ढांचा इसलिए तय किया गया है ताकि अदालत का काम केवल सुनवाई तक सीमित न रहे, बल्कि मामलों की तैयारी, गवाहों की व्यवस्था, दस्तावेजों का प्रबंधन और फैसलों के क्रियान्वयन से जुड़े काम भी समय पर पूरे हो सकें।

समर्पित न्यायिक अधिकारी का अर्थ है कि अदालत के न्यायाधीश का काम इन्हीं मामलों की सुनवाई पर केंद्रित रहेगा। विशेष लोक अभियोजक अभियोजन पक्ष का काम संभालेगा और सहायक कर्मचारी अदालत के रोजमर्रा के कामकाज में मदद करेंगे। इस पूरी टीम का उद्देश्य मामलों के निपटारे की गति बढ़ाना और सुनवाई में अनावश्यक देरी को कम करना है।

यह व्यवस्था सामान्य अदालतों से अलग इसलिए है क्योंकि सामान्य अदालतों में हर तरह के मामले आते हैं और उनका बोझ बहुत अधिक होता है। विशेष अदालतों में केवल एक तय श्रेणी के मामलों की सुनवाई होती है, जिससे न्यायाधीश और अभियोजन पक्ष का ध्यान बंटता नहीं है और मामलों की सुनवाई लगातार आगे बढ़ती है।

पीड़ित-केंद्रित व्यवस्था क्या होगी

योजना में पीड़ितों के लिए संवेदनशील न्यायिक वातावरण बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। इसके तहत कमजोर गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए विशेष केंद्र बनाए जाने को प्रोत्साहन दिया जाएगा और बच्चों के अनुकूल अदालत कक्षों का विकास किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि पीड़ित अपना बयान सहज वातावरण में, कम से कम मानसिक दबाव के साथ दर्ज करा सकें।

बच्चों से जुड़े मामलों में यह व्यवस्था और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि बच्चे को अदालत के औपचारिक वातावरण में बयान देना कठिन लग सकता है। बच्चों के अनुकूल कक्ष और सहायक वातावरण से बच्चे की गवाही की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और कम भयावह बनाने की कोशिश की जाती है। महिलाओं से जुड़े मामलों में भी गोपनीयता और सम्मान के साथ सुनवाई की व्यवस्था को योजना का हिस्सा बनाया गया है।

योजना की निगरानी के लिए भी एक तय व्यवस्था होगी। अदालतों के प्रदर्शन की निगरानी ऑनलाइन डैशबोर्ड के माध्यम से की जाएगी और समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट, खर्च के ब्योरे और उच्च न्यायालयों तथा राज्य सरकारों के साथ विचार-विमर्श के जरिए समीक्षा की जाएगी। इससे यह पता चल सकेगा कि किन जिलों में अदालतें बेहतर काम कर रही हैं और कहां अतिरिक्त मदद की जरूरत है।

योजना की शुरुआत और अब तक का सफर

फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की योजना 2 अक्टूबर 2019 को शुरू हुई थी। इसकी शुरुआत आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2018 के लागू होने और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के बाद हुई थी। उच्चतम न्यायालय ने 25 जुलाई 2019 को स्वतः संज्ञान वाले एक मामले में निर्देश दिया था कि जिन जिलों में POCSO अधिनियम के तहत 100 से अधिक मामले लंबित हैं, वहां विशेष अदालतें स्थापित की जाएं।

शुरुआत में यह योजना केवल एक साल के लिए लाई गई थी, लेकिन बाद में इसे 31 मार्च 2026 तक बढ़ा दिया गया था। अब 4 नवंबर 2026 के फैसले से यह योजना 31 मार्च 2031 तक जारी रहेगी। इस तरह 2019 से 2031 तक यह योजना लगातार बारह साल के सफर को पूरा करेगी, जिसमें तीन चरणों में इसका विस्तार और नवीनीकरण हुआ है।

अब तक के कामकाज का एक महत्वपूर्ण आंकड़ा भी सामने आया है। योजना शुरू होने के बाद से इन विशेष अदालतों ने दुष्कर्म और POCSO अधिनियम से जुड़े 4,02,457 मामलों का निपटारा किया है। यह आंकड़ा बताता है कि विशेष अदालतों ने लंबित मामलों के बोझ को कम करने में ठोस भूमिका निभाई है, हालांकि अभी भी बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं और इसीलिए योजना को आगे बढ़ाने और अदालतों की संख्या बढ़ाने का फैसला लिया गया है।

लंबित मामलों पर क्या असर पड़ेगा

विशेष अदालतों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि मामलों की सुनवाई के लिए एक तय समय-सीमा का लक्ष्य रखा जाता है। जब एक ही श्रेणी के मामले एक अदालत में लगातार सुने जाते हैं, तो सुनवाई की तारीखों के बीच का अंतर कम होता है और गवाहों तथा पीड़ितों को बार-बार अदालत नहीं आना पड़ता। इससे मामलों के निपटारे की गति बढ़ती है और पीड़ितों को न्याय के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता।

अदालतों की संख्या 779 से बढ़कर 850 होने से उन जिलों को राहत मिलेगी जहां मामलों का बोझ अधिक है। नए जिलों को भी योजना के दायरे में लाया जाएगा और लंबित मामलों की स्थिति के आधार पर अदालतों का आवंटन किया जाएगा। इससे उन क्षेत्रों में भी विशेष अदालतों की सुविधा पहुंचेगी जहां अब तक सामान्य अदालतों में ही इन मामलों की सुनवाई हो रही थी।

हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि अदालतों की संख्या बढ़ाना अकेला समाधान नहीं है। मामलों के निपटारे की गति जांच, अभियोजन, गवाहों की उपलब्धता और न्यायिक प्रक्रिया की गति पर भी निर्भर करती है। इसलिए योजना में निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है, ताकि अदालतों के कामकाज की नियमित समीक्षा हो सके और जहां देरी हो रही है, वहां कारणों का पता लगाकर सुधार किया जा सके।

राज्यों की भूमिका और आगे क्या होगा

योजना के क्रियान्वयन में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की भूमिका केंद्रीय होगी। केंद्र सरकार धन और नीतिगत ढांचा देगी, लेकिन अदालतों का संचालन, न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों की व्यवस्था तथा बुनियादी ढांचा राज्यों के सहयोग से ही संभव होगा। उच्च न्यायालयों के साथ विचार-विमर्श से यह तय किया जाएगा कि किन जिलों में नई अदालतें खोली जाएं और मौजूदा अदालतों को कैसे मजबूत किया जाए।

आगे की प्रक्रिया में न्याय विभाग राज्य सरकारों के साथ मिलकर अदालतों के आवंटन की योजना बनाएगा और लंबित मामलों के आंकड़ों के आधार पर प्राथमिकता तय करेगा। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से नई अदालतें शुरू की जाएंगी और उनके कामकाज की निगरानी डैशबोर्ड के माध्यम से की जाएगी।

इस फैसले को महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा की दिशा में एक निरंतर प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। योजना का उद्देश्य केवल अदालतों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़ितों को समय पर न्याय मिले और न्याय की प्रक्रिया उनके लिए कम कष्टदायक हो।

उसी बैठक के अन्य फैसले

4 नवंबर 2026 की उसी मंत्रिमंडल बैठक में ऊर्जा भंडारण के लिए 92 गीगावाट क्षमता के विकास के लिए 14,500 करोड़ रुपये की व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण योजना, क्रिटिकल मिनरल प्रसंस्करण के लिए 2,814 करोड़ रुपये की पूंजीगत व्यय सहायता योजना और सांख्यिकी व्यवस्था के आधुनिकीकरण के लिए VISTAR योजना को मंजूरी दी गई थी। इन फैसलों की विस्तृत खबर पहले ही प्रकाशित हो चुकी है।

उसी बैठक में अग्निवीरों के लिए दूसरे दौर की सेवा से जुड़ा फैसला भी लिया गया था, जिसके तहत अग्निवीरों को चार साल के बजाय छह साल तक सेवा का अवसर मिलेगा। वह खबर भी पहले ही प्रकाशित हो चुकी है। फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों का फैसला इन सभी फैसलों के साथ उसी दिन लिया गया था, लेकिन इसका विषय और प्रभाव अलग है, इसलिए इसे अलग खबर के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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