नई दिल्ली ब्यूरो
सार: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार, 4 नवंबर 2026 को ऊर्जा, खनिज और आंकड़ा व्यवस्था से जुड़े तीन बड़े फैसले लिए। 92 GWh ऊर्जा भंडारण क्षमता के लिए 14,500 करोड़ रुपये की वायबिलिटी गैप फंडिंग योजना, क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग के लिए 2,814 करोड़ रुपये की पूंजीगत सहायता योजना और सांख्यिकी व्यवस्था के आधुनिकीकरण के लिए 4,371.10 करोड़ रुपये की VISTAR योजना को मंजूरी दी गई। तीनों योजनाएं वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक, यानी पांच वर्षों के लिए लागू रहेंगी।
कैबिनेट बैठक में लिए गए फैसलों की जानकारी सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ब्रीफिंग में दी। सरकारी बयान के अनुसार, इन फैसलों का मकसद बिजली व्यवस्था को लचीला और भरोसेमंद बनाना, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना, आयात पर निर्भरता घटाना और देश की आंकड़ा व्यवस्था को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार करना है। इसी बैठक में अग्निवीरों से जुड़ा फैसला भी हुआ, जिसकी अलग खबर पहले ही तैयार की जा चुकी है।
कैबिनेट बैठक में क्या-क्या मंजूर हुआ
इस बैठक में तीन अलग-अलग योजनाओं को एक साथ मंजूरी दी गई, और तीनों का दायरा एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। पहली योजना बिजली के भंडारण से जुड़ी है, दूसरी उन खनिजों के प्रसंस्करण से जुड़ी है जिनके बिना बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उपकरण नहीं बन सकते, और तीसरी योजना उन आंकड़ों की व्यवस्था से जुड़ी है जिनके आधार पर सरकारें नीतियां बनाती हैं।
ऊर्जा भंडारण योजना के लिए 14,500 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता तय की गई है। क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग के लिए 2,814 करोड़ रुपये का पूंजीगत सहायता कार्यक्रम मंजूर हुआ है। VISTAR योजना के लिए 4,371.10 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। तीनों योजनाओं की अवधि पांच वर्ष रखी गई है, ताकि परियोजनाओं को योजना बनाने, बोली लगाने, निर्माण करने और चालू होने का पर्याप्त समय मिल सके।
इन फैसलों का सीधा संबंध देश के उस लक्ष्य से है, जिसके तहत 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने की बात कही जाती है। सौर और पवन ऊर्जा से बिजली तब बनती है जब धूप या हवा उपलब्ध होती है, लेकिन मांग हर समय एक जैसी नहीं रहती। इसी अंतर को पाटने के लिए भंडारण व्यवस्था जरूरी मानी जाती है।
ऊर्जा भंडारण: 92 GWh का मतलब क्या है
ऊर्जा भंडारण योजना के तहत देशभर में 92 गीगावाट-घंटा (GWh) नई ग्रिड-स्तर भंडारण क्षमता विकसित की जाएगी। यह क्षमता अभी चालू नहीं हुई परियोजनाओं के लिए होगी, यानी ऐसी परियोजनाएं जिन्हें अब विकसित किया जाना है। सरकारी बयान के अनुसार, यह नई क्षमता देश की मौजूदा ग्रिड-स्तर ऊर्जा भंडारण क्षमता की तुलना में करीब 170 प्रतिशत अतिरिक्त क्षमता के बराबर होगी।
इस आंकड़े को समझने का एक तरीका यह है कि भंडारण क्षमता को बिजली की एक बड़ी टंकी की तरह देखा जाए। जब बिजली ज्यादा बन रही हो और मांग कम हो, तो अतिरिक्त बिजली को इस टंकी में सहेजा जा सकता है। जब मांग बढ़ जाए और उत्पादन कम हो, तो सहेजी हुई बिजली ग्रिड में वापस दी जा सकती है। इससे ग्रिड स्थिर रहता है, बिजली कटौती का दबाव कम होता है और नवीकरणीय ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा उपयोग संभव होता है।
सरकारी बयान के अनुसार, 2031-32 तक देश को कुल 411 GWh ग्रिड-स्तर ऊर्जा भंडारण क्षमता की जरूरत होगी। इस लिहाज से नई मंजूर 92 GWh क्षमता उस कुल जरूरत का एक बड़ा हिस्सा पूरा करेगी। योजना के तहत कुल अनुमानित निवेश 97,600 करोड़ रुपये बताया गया है, जिसमें सरकारी सहायता के अलावा परियोजना विकासकों का निवेश भी शामिल होगा।

तीन तकनीकें: बैटरी, पंप स्टोरेज और नई तकनीक
92 GWh क्षमता को तीन तकनीकों में बांटा गया है। सबसे बड़ा हिस्सा हाइड्रो पंप स्टोरेज प्लांट का होगा, जिसके लिए 60 GWh क्षमता तय की गई है। बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली के लिए 30 GWh क्षमता तय की गई है। वैकल्पिक ऊर्जा भंडारण तकनीकों के लिए 2 GWh क्षमता रखी गई है।
पंप स्टोरेज की व्यवस्था में पानी को ऊंचाई पर बने जलाशय में पंप करके ऊर्जा सहेजी जाती है। जरूरत पड़ने पर पानी को नीचे छोड़कर टरबाइन चलाई जाती है और बिजली बनाई जाती है। यह तकनीक लंबे समय से इस्तेमाल हो रही है और बड़ी मात्रा में भंडारण के लिए उपयुक्त मानी जाती है। बैटरी भंडारण में बिजली को रासायनिक ऊर्जा के रूप में सहेजा जाता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत वापस लिया जा सकता है। यह तकनीक तेज प्रतिक्रिया के लिए जानी जाती है।
वैकल्पिक तकनीकों के लिए रखा गया छोटा हिस्सा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे नई तकनीकों को भी मैदान में उतरने और परखे जाने का मौका मिलेगा। अगर कोई नई तकनीक कम लागत या ज्यादा टिकाऊ साबित होती है, तो आगे चलकर उसका दायरा बढ़ाया जा सकता है। तीनों तकनीकों का मिश्रण इसलिए चुना गया है ताकि अलग-अलग जरूरतों के लिए अलग-अलग समाधान उपलब्ध रहें।
पैसा कैसे मिलेगा: वायबिलिटी गैप फंडिंग, बोली और घरेलू उत्पादन की शर्त
वायबिलिटी गैप फंडिंग का मतलब यह है कि सरकार उन परियोजनाओं की लागत का एक हिस्सा वहन करेगी जो शुरुआत में आर्थिक रूप से पूरी तरह व्यवहार्य नहीं होतीं, लेकिन व्यवस्था के लिए जरूरी होती हैं। ऊर्जा भंडारण परियोजनाएं महंगी होती हैं और उनका लाभ लंबे समय में ग्रिड स्थिरता और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग के रूप में मिलता है। सरकारी सहायता से इन परियोजनाओं की वित्तीय व्यवहार्यता सुधरेगी और बड़े पैमाने पर भंडारण ढांचे का विकास तेज होगा।
ऊर्जा भंडारण क्षमता का आवंटन टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के जरिये किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि परियोजना विकासक बिजली की दर के आधार पर बोली लगाएंगे और प्रतिस्पर्धा के जरिये क्षमता आवंटित की जाएगी। बैटरी और हाइड्रो पंप स्टोरेज परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की बिजली वितरण कंपनियां वायबिलिटी गैप फंडिंग के लिए पात्र होंगी। वैकल्पिक भंडारण तकनीकों पर आधारित परियोजनाएं सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की इकाइयों द्वारा लागू की जाएंगी।
घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए बैटरी भंडारण परियोजनाओं पर कम से कम 40 प्रतिशत घरेलू सामग्री की शर्त लागू की जाएगी। इसका उद्देश्य देश में बैटरी भंडारण प्रणाली के विनिर्माण को मजबूत करना और आयातित कलपुर्जों पर निर्भरता घटाना है। सरकारी बयान के अनुसार, मांग पक्ष की इस वित्तीय सहायता से भारतीय उद्योग के लिए अवसर बनेंगे और बैटरी विनिर्माण के लिए पहले से मौजूद आपूर्ति पक्ष के प्रोत्साहनों को पूरक समर्थन मिलेगा।
क्रिटिकल मिनरल: लिथियम-निकेल से लेकर सभी 24 खनिज
दूसरी बड़ी योजना क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग से जुड़ी है। इसके तहत 2,814 करोड़ रुपये की पूंजीगत व्यय सहायता योजना को मंजूरी दी गई है। यह योजना सरकार द्वारा चिह्नित सभी 24 क्रिटिकल मिनरलों को कवर करेगी। इसमें लिथियम और निकेल जैसे खनिज प्रमुख रूप से शामिल हैं, जिनका उपयोग बैटरी और कई आधुनिक उपकरणों में होता है।
इस योजना का केंद्र खनिजों का प्रसंस्करण होगा। कच्चा माल चाहे खनन से प्राप्त हो या रीसाइक्लिंग से, उसे प्रसंस्कृत करके विनिर्माण के लिए तैयार अवस्था तक पहुंचाया जाएगा। ब्रीफिंग में बताया गया कि क्रिटिकल मिनरल मिशन व्यवस्थित और क्रमबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहा है, और यह नई योजना उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
इस योजना से इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, बैटरी, रक्षा उपकरण, भारी उपकरण और मशीनरी जैसे विनिर्माण क्षेत्रों को लाभ मिलने की उम्मीद जताई गई है। ये सभी क्षेत्र क्रिटिकल मिनरलों का उपयोग करते हैं। अगर प्रसंस्करण देश के भीतर होगा, तो कच्चे माल के निर्यात और तैयार उत्पाद के आयात पर निर्भरता घटेगी, आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी और घरेलू उद्योग को स्थिर कच्चा माल मिलेगा।
यह योजना आत्मनिर्भरता के उद्देश्य से भी जुड़ी है। ऊर्जा भंडारण योजना में बैटरी की जरूरत होगी और बैटरी के लिए क्रिटिकल मिनरलों की जरूरत होगी। इसलिए दोनों योजनाओं को एक साथ देखना जरूरी है। एक योजना भंडारण ढांचा बनाएगी और दूसरी उसके लिए जरूरी सामग्री की घरेलू प्रसंस्करण क्षमता तैयार करेगी।
VISTAR: आंकड़ों की व्यवस्था क्यों बदली जा रही है
तीसरी योजना का नाम VISTAR है, जिसका पूरा नाम विकसित भारत इनिशिएटिव फॉर स्टैटिस्टिकल ट्रांसफॉर्मेशन, एनालिटिक्स एंड रिसर्च है। इसके लिए 4,371.10 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस योजना को सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के जरिये लागू किया जाएगा। इसका उद्देश्य देश की आधिकारिक सांख्यिकी व्यवस्था को डिजिटलीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बेहतर डेटा संग्रह और सरकारी एजेंसियों के बीच मजबूत समन्वय के जरिये आधुनिक बनाना है।
योजना के तहत 16वें वित्त आयोग चक्र के दौरान 59 सर्वेक्षण कराए जाने का प्रस्ताव है, जबकि पहले 43 बड़े सर्वेक्षण कराए गए थे। नए सांख्यिकीय संकेतक भी शुरू किए जाएंगे, जिनमें सेवाओं के उत्पादन का प्रमुख सूचकांक और गैर-निगमित क्षेत्र के उद्यमों का सूचकांक शामिल है। इससे अर्थव्यवस्था के उन हिस्सों की तस्वीर भी साफ होगी जो अब तक आंकड़ों में पूरी तरह नहीं आ पाते थे।
VISTAR के तहत आठवीं आर्थिक गणना भी कराई जाएगी। इसमें गैर-कृषि प्रतिष्ठानों और उनके कामगारों के बारे में ग्राम पंचायत और वार्ड स्तर तक विस्तृत जानकारी जुटाई जाएगी। इस अभ्यास से असंगठित अर्थव्यवस्था का आकलन करने और राष्ट्रीय सांख्यिकीय व्यापार रजिस्टर स्थापित करने में मदद मिलेगी। योजना राज्यों की सांख्यिकीय व्यवस्थाओं को मजबूत करेगी और जिला स्तर के आर्थिक अनुमानों को भी सहारा देगी।
योजना के प्रमुख उद्देश्यों में समयबद्धता बढ़ाना, आंकड़ों की बारीकी सुधारना, सामंजस्यपूर्ण डेटासेट के साथ अंतर-संचालन क्षमता बढ़ाना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए तैयार डेटाबेस बनाना शामिल है। कुल मिलाकर इसका लक्ष्य एक गतिशील, वास्तविक समय पर आधारित और भविष्य के लिए तैयार आधिकारिक सांख्यिकीय ढांचा स्थापित करना है।
आम आदमी और उद्योग पर असर
इन तीनों फैसलों का असर सीधे तौर पर आम उपभोक्ता की बिजली और अप्रत्यक्ष रूप से उद्योग और रोजगार पर पड़ेगा। भंडारण क्षमता बढ़ने से ग्रिड ज्यादा स्थिर होगा और नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ेगा। इससे चौबीसों घंटे भरोसेमंद और किफायती बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिलने की बात सरकारी बयान में कही गई है।
उद्योग के लिए इसका मतलब यह है कि बैटरी भंडारण, पंप स्टोरेज और खनिज प्रसंस्करण के क्षेत्र में नई परियोजनाएं आएंगी। घरेलू सामग्री की शर्त से भारतीय विनिर्माताओं को अवसर मिलेगा। खनिज प्रसंस्करण क्षमता बढ़ने से इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और रक्षा उपकरण बनाने वाली इकाइयों को कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति मिलने की उम्मीद है।
राज्यों और जिलों के लिए VISTAR योजना का असर यह होगा कि नीतियां बनाने के लिए ज्यादा बारीक और समय पर आंकड़े उपलब्ध होंगे। जिला स्तर के आर्थिक अनुमान और ग्राम पंचायत स्तर तक की जानकारी से योजनाओं का लक्ष्य निर्धारण और मूल्यांकन बेहतर हो सकेगा। इससे जनता के हित की योजनाओं को जमीन पर उतारने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के लिए भी ये फैसले प्रासंगिक हैं, क्योंकि प्रदेश में सौर ऊर्जा की क्षमता और औद्योगिक विकास की दिशा में काम चल रहा है। भंडारण ढांचा और खनिज प्रसंस्करण क्षमता बढ़ने से राज्यों में भी नई परियोजनाओं के अवसर बन सकते हैं, हालांकि किसी राज्य विशेष के लिए आवंटन की घोषणा इस बैठक में नहीं की गई है। इसलिए किसी राज्य के हिस्से के बारे में अनुमान लगाना सही नहीं होगा।
आगे क्या होगा
अब इन योजनाओं का अगला चरण उनके विस्तृत दिशा-निर्देश, बोली प्रक्रिया और कार्यान्वयन व्यवस्था का होगा। ऊर्जा भंडारण योजना में टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली के जरिये क्षमता आवंटित की जाएगी। क्रिटिकल मिनरल योजना में प्रसंस्करण इकाइयों के लिए सहायता की शर्तें तय की जाएंगी। VISTAR योजना में सर्वेक्षणों और आर्थिक गणना का कार्यक्रम आगे बढ़ेगा।
इन योजनाओं की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि परियोजनाएं समय पर चालू हों, लागत नियंत्रण में रहे और घरेलू विनिर्माण की शर्त का पालन हो। भंडारण परियोजनाओं का निर्माण और चालू होना कई वर्षों का काम है, इसलिए इनके परिणाम धीरे-धीरे सामने आएंगे। लेकिन मंजूरी का चरण पूरा होने से दिशा स्पष्ट हो गई है और उद्योग तथा राज्यों को योजना बनाने का आधार मिल गया है।
कुल मिलाकर, 4 नवंबर की कैबिनेट बैठक में लिए गए ये फैसले ऊर्जा सुरक्षा, विनिर्माण क्षमता और आंकड़ा व्यवस्था — तीनों मोर्चों पर एक साथ आगे बढ़ने की कोशिश दिखाते हैं। बिजली के भंडारण के बिना नवीकरणीय ऊर्जा का बड़ा लक्ष्य पूरा करना कठिन होगा, खनिज प्रसंस्करण के बिना बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स का घरेलू उत्पादन सीमित रहेगा, और भरोसेमंद आंकड़ों के बिना नीतियों का आकलन अधूरा रहेगा। तीनों योजनाएं इन्हीं तीन कड़ियों को जोड़ने का प्रयास हैं।
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