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उज्जैन: दीपावली से पहले महाकाल मंदिर के गर्भगृह में चांदी की सफाई और पॉलिशिंग शुरू, चमक उठेंगे द्वार-दीवारें और रुद्र यंत्र

सांकेतिक चित्र: उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर फाइल चित्र: महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन

उज्जैन ब्यूरो

सार: दीपावली से पहले उज्जैन के महाकाल मंदिर में गर्भगृह को चमकाने का काम जोरों पर शुरू हो गया है। चांदी के द्वार, दीवारों और रुद्र यंत्र की विशेष सफाई और पॉलिशिंग की जा रही है, ताकि महापर्व के दिन गर्भगृह अपनी पूरी आभा के साथ नजर आए। मंदिर में रंग-रोगन और साज-सज्जा का काम भी साथ-साथ चल रहा है।

गर्भगृह में क्या-क्या चमकाया जा रहा है

दीपावली महापर्व के पहले महाकाल मंदिर के गर्भगृह में लगे चांदी के हिस्सों को चमकाने का काम शुरू हो गया है। इसमें गर्भगृह के चांदी के द्वार, चांदी की दीवारें और गर्भगृह के शिखर पर स्थित रुद्र यंत्र शामिल हैं। कारीगर इन हिस्सों की विशेष तरीके से सफाई कर रहे हैं और उसके बाद पॉलिशिंग की जा रही है, जिससे सफाई पूरी होने पर चांदी के द्वार और दीवारें फिर से पूरी तरह चमक उठेंगी। इसके साथ ही जलाधारी, देहरी पर लगे चांदी के दरवाजे और नंदी हॉल के दरवाजों की भी विशेष सफाई की जा रही है। गर्भगृह के आसपास चांदी से बने अन्य हिस्सों को भी इसी क्रम में साफ किया जा रहा है। मंदिर प्रबंधन की ओर से यह काम इस तरह कराया जा रहा है कि दीपावली के दिन दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को गर्भगृह का भव्य और स्वच्छ स्वरूप देखने को मिले।

चांदी की सफाई की परंपरा क्यों खास है

महाकाल मंदिर में चांदी के द्वारों, दीवारों और यंत्रों की विशेष सफाई और पॉलिशिंग कोई नया काम नहीं है। मंदिर समिति के अनुसार महाशिवरात्रि, श्रावण मास और दीपावली जैसे प्रमुख पर्वों से ठीक पहले यह सफाई नियमित रूप से कराई जाती है। इसी परंपरा के तहत इस बार भी महापर्व की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। इस परंपरा का सीधा संबंध पर्व की पवित्रता और मंदिर की भव्यता से है। बड़े पर्वों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है और गर्भगृह का स्वरूप ही दर्शन का केंद्र होता है। इसलिए पर्व से पहले चांदी के हिस्सों की बारीकी से सफाई की जाती है, ताकि वर्षों से लगी चांदी अपनी मूल चमक के साथ नजर आए। कारीगरों का काम धीमा और सावधानी भरा होता है, क्योंकि चांदी के द्वार, दीवारें और यंत्र मंदिर की धरोहर का हिस्सा हैं।

सांकेतिक चित्र: दीपावली के दीये
सांकेतिक चित्र: दीपावली के दीये

रंग-रोगन और साज-सज्जा का काम भी साथ-साथ

गर्भगृह की चांदी की सफाई के साथ-साथ मंदिर में रंग-रोगन और साज-सज्जा का काम भी तेजी से चल रहा है। दीपावली के पावन पर्व के लिए मंदिर परिसर को सजाने की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। मंदिर दीपों, पुष्पों और विद्युत रोशनी से जगमगाएगा, जिससे दीपोत्सव की रौनक पूरे परिसर में नजर आएगी। मंदिर प्रबंधन की ओर से सभी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। पर्व के दिनों में दर्शन व्यवस्था, सफाई और साज-सज्जा — तीनों पर एक साथ ध्यान दिया जा रहा है। यही कारण है कि चांदी की सफाई को केवल एक रखरखाव का काम नहीं, बल्कि दीपोत्सव की समग्र तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है।

दीपावली का पांच दिवसीय क्रम इस बार अलग अंदाज में

इस वर्ष दीपोत्सव का क्रम तिथियों की घट-बढ़ के कारण कुछ अलग नजर आ रहा है। धनतेरस 6 नवंबर को, दीपावली 8 नवंबर को और गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को मनाई जाएगी। प्रत्येक उत्सव के बीच एक दिन का अंतर रहेगा, लेकिन दीपोत्सव की रौनक पांच दिन बनी रहेगी। महाकाल मंदिर में पूजा-अर्चना और उत्सवों के लिए ग्वालियर के पंचांग को प्रधानता दी जाती है। इस बार पंचांगीय गणना में तिथियों की घट-बढ़ से धनत्रयोदशी से गोवर्धन पूजा तक एक दिन उत्सव और अगले दिन विराम की स्थिति बनेगी। इसके बावजूद परंपरा के अनुसार पुजारी पांच दिन महाकाल की फुलझड़ियों से आरती करेंगे। मंदिर समिति ने इस क्रम को पहले से स्पष्ट किया है, ताकि श्रद्धालुओं में तिथियों को लेकर कोई भ्रम न रहे।

8 नवंबर की सुबह: भस्म आरती से उत्सव की शुरुआत

महाकाल मंदिर में दीपावली का उत्सव अपनी अनूठी परंपराओं के साथ मनाया जाएगा। देश के अधिकांश मंदिरों में अमावस्या को दीपावली मनाई जाती है, लेकिन महाकाल मंदिर में चतुर्दशी पर ही दीपोत्सव मनाने की परंपरा है। इस बार 8 नवंबर को चतुर्दशी और अमावस्या एक ही दिन पड़ने के कारण तड़के भस्म आरती के दौरान ही महाकाल के दरबार में दीपावली का उत्सव शुरू होगा। दीपावली के दिन सुबह चार बजे मंदिर के पट खुलने के बाद महाकाल का विशेष अभिषेक और पूजन किया जाएगा। सबसे पहले तिल्ली के तेल से अभ्यंग स्नान कराया जाएगा। इसके बाद पुजारी परिवार की महिलाएं केसर-चंदन का उबटन लगाकर महाकाल का रूप निखारेंगी। सोने-चांदी के आभूषणों से विशेष श्रृंगार किया जाएगा। रूपचतुर्दशी पर तड़के चार बजे भस्म आरती में महाकाल के आंगन में दीपावली मनाई जाएगी और इसी दिन से गर्म जल से स्नान कराने की परंपरा शुरू होगी, जो होली तक चलेगी।

अन्नकूट और फुलझड़ियों वाली आरतियां

दीपावली के अवसर पर महाकाल को पारंपरिक पकवानों का भोग अर्पित किया जाएगा। इसके लिए अन्नकूट सजाया जाएगा, जिसमें गुजिया, पपड़ी, खुरमे, खीर, पूड़ी, भजिया, चावल, दाल, विभिन्न सब्जियां और चटनियां शामिल होंगी। यह अन्नकूट दीपावली के भोग की परंपरा का सबसे भव्य हिस्सा माना जाता है। महाकाल मंदिर की दीपावली का सबसे खास आकर्षण फुलझड़ियों से होने वाली आरती होगी। सुबह से लेकर रात तक होने वाली पांचों आरतियों में फुलझड़ियां जलाई जाएंगी। दीपों और फुलझड़ियों की रोशनी से महाकाल का पूरा दरबार जगमगा उठेगा। शाम को नगरवासी अपने घरों में दीप जलाकर दीपोत्सव मनाएंगे, जबकि मंदिर में तड़के ही दीपावली का उल्लास छा जाएगा।

दर्शन के लिए आने वालों के लिए क्या ध्यान रखें

दीपावली के दिनों में उज्जैन आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर की तैयारी का सीधा संदेश यही है कि पर्व के दिन गर्भगृह का स्वरूप सबसे भव्य होगा। चांदी की सफाई और पॉलिशिंग का काम पर्व से पहले पूरा किया जा रहा है, ताकि दर्शन के समय गर्भगृह की चमक में कोई कमी न रहे। श्रद्धालुओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि महाकाल मंदिर में दीपावली का मुख्य उत्सव तड़के भस्म आरती में मनाया जाता है, जबकि नगर में दीपोत्सव शाम को मनाया जाता है। इसलिए दर्शन की योजना बनाते समय इस अंतर को समझना जरूरी है। पर्व के दिनों में मंदिर परिसर में भीड़ बढ़ने की संभावना रहती है, इसलिए समय का ध्यान रखकर और मंदिर प्रबंधन के निर्देशों का पालन करके दर्शन करना सुविधाजनक रहेगा।

आगे क्या: दीपोत्सव की रौनक पांच दिन बनी रहेगी

चांदी की सफाई और साज-सज्जा के बाद महाकाल मंदिर में दीपोत्सव का क्रम धनतेरस से शुरू होकर गोवर्धन पूजा तक चलेगा। धनतेरस पर महाकाल को चांदी के सिक्के अर्पित किए जाएंगे और देश, प्रदेश और नगर की सुख-समृद्धि के लिए विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। दीपावली पर अभ्यंग स्नान, उबटन, श्रृंगार, अन्नकूट और फुलझड़ियों वाली आरतियां होंगी। गोवर्धन पूजा पर गोवर्धन और गोवंश का विधि-विधान से पूजन किया जाएगा। इस तरह दीपावली से पहले शुरू हुई चांदी की सफाई केवल एक तैयारी नहीं, बल्कि उस उत्सव की पहली झलक है, जो आने वाले दिनों में महाकाल के दरबार को दीपों और फुलझड़ियों की रोशनी से भर देगा। गर्भगृह की चमक, मंदिर की सजावट और पांच दिनों तक चलने वाली आरतियों की परंपरा मिलकर इस बार के दीपोत्सव को श्रद्धालुओं के लिए यादगार बनाएगी।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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