उज्जैन ब्यूरो
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में इस बार दीपावली का उत्सव अपनी अनूठी परंपरा के अनुसार चतुर्दशी पर मनाया जाएगा। 8 नवंबर को तड़के भस्म आरती में ही राजाधिराज के दरबार में दीपोत्सव की शुरुआत हो जाएगी, जबकि शाम को नगरवासी दीपावली मनाएंगे। अभ्यंग स्नान, उबटन, अन्नकूट का महाभोग और पांचों आरतियों में फुलझड़ियों की जगमगाहट इस उत्सव की पहचान होगी।
उज्जैन की पहचान महाकाल की नगरी के रूप में है और यहां का हर पर्व अपनी अलग परंपरा के साथ मनाया जाता है। दीपावली का पर्व भी इससे अलग नहीं है। देश के अधिकांश मंदिरों और घरों में दीपावली अमावस्या के दिन मनाई जाती है, लेकिन महाकाल मंदिर में चतुर्दशी पर ही दीपोत्सव मनाने की परंपरा चली आ रही है। इस बार यह परंपरा एक विशेष संयोग के साथ जुड़ रही है, जिसने इस वर्ष के उत्सव को और भी खास बना दिया है।
चतुर्दशी और अमावस्या का विशेष संयोग
इस बार 8 नवंबर को चतुर्दशी और अमावस्या एक ही दिन पड़ रही हैं। इसी कारण तड़के भस्म आरती के दौरान ही महाकाल के दरबार में दीपावली का उत्सव शुरू हो जाएगा। मंदिर की परंपरा के अनुसार भस्म आरती में भगवान का विशेष पूजन और श्रृंगार किया जाएगा और वहीं से दीपोत्सव की औपचारिक शुरुआत मानी जाएगी।
शाम को नगरवासी अपने घरों में दीपावली मनाएंगे। इस तरह एक ही दिन में दो स्तरों पर उत्सव मनाया जाएगा — पहले तड़के मंदिर में राजाधिराज के दरबार में और फिर शाम को पूरे नगर में। यही वह विशेषता है जो महाकाल की दीपावली को देश के बाकी हिस्सों से अलग करती है। मंदिर में दीपों और फुलझड़ियों की रोशनी से दरबार जगमगाएगा और श्रद्धालुओं के लिए यह दृश्य किसी अलौकिक अनुभव से कम नहीं होगा।

तड़के चार बजे से शुरू होगा उत्सव का क्रम
दीपावली के दिन सुबह चार बजे मंदिर के पट खुलने के बाद भगवान महाकाल का विशेष अभिषेक और पूजन किया जाएगा। सबसे पहले तिल्ली के तेल से अभ्यंग स्नान कराया जाएगा। अभ्यंग स्नान के बाद पुजारी परिवार की महिलाएं केसर और चंदन का उबटन लगाकर गर्म जल और सुगंधित द्रव्यों से स्नान कराएंगी।
उबटन लगाने की यह परंपरा साल में एक ही दिन निभाई जाती है। माना जाता है कि रूप चौदस के दिन भगवान का रूप निखारने के लिए यह विशेष उबटन लगाया जाता है। पुजारी परिवार की महिलाएं ही इस सेवा को करती हैं और इसके बाद कपूर की आरती होती है। स्नान के बाद भगवान को नए वस्त्र धारण कराए जाएंगे और सोने-चांदी के आभूषणों से राजसी श्रृंगार किया जाएगा।
भस्म आरती के दौरान पुजारी मंत्रोच्चार के बीच भगवान का ध्यान करेंगे और इसके बाद दीपोत्सव की शुरुआत होगी। तड़के की इस आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है, क्योंकि महाकाल की भस्म आरती के दर्शन के लिए देशभर से भक्त उज्जैन पहुंचते हैं।
अन्नकूट का महाभोग और पारंपरिक पकवान
दीपावली के अवसर पर महाकाल को पारंपरिक पकवानों का भोग अर्पित किया जाएगा। इसके लिए अन्नकूट सजाया जाएगा, जिसमें गुजिया, पपड़ी, खुरमे, खीर, पूड़ी, भजिया, चावल, दाल, विभिन्न सब्जियां और चटनियां शामिल होंगी। अन्नकूट का अर्थ है अन्न का पर्वत — यानी भगवान को अन्न के अनेक व्यंजनों का भोग लगाना।
परंपरा के अनुसार महाकाल मंदिर में अन्नकूट सबसे पहले लगाने की परंपरा है। कार्तिक मास में देवालयों में अन्नकूट लगाने की परंपरा रही है, लेकिन महाकाल मंदिर में भस्म आरती करने वाले पुजारी परिवार की ओर से रूप चतुर्दशी के दिन ही अन्नकूट लगा दिया जाता है। यही कारण है कि महाकाल की दीपावली में अन्नकूट का विशेष स्थान है। श्रद्धालु इस महाभोग के दर्शन को भी पुण्य का अवसर मानते हैं।
पांचों आरतियों में फुलझड़ियों की जगमगाहट
महाकाल मंदिर की दीपावली का सबसे खास आकर्षण फुलझड़ियों से होने वाली आरती है। दीपावली पर सुबह से लेकर रात तक होने वाली पांचों आरतियों में फुलझड़ियां जलाई जाएंगी। दीपों और फुलझड़ियों की रोशनी से महाकाल का पूरा दरबार जगमगा उठेगा।
मंदिर में पूजा-अर्चना और उत्सवों के लिए ग्वालियर के पंचांग को प्रधानता दी जाती है। इस बार पंचांगीय गणना में तिथियों की घट-बढ़ के कारण धनत्रयोदशी से गोवर्धन पूजा तक एक दिन उत्सव और अगले दिन विराम की स्थिति बनेगी। हालांकि दीपोत्सव की रौनक पांच दिन बनी रहेगी और परंपरा अनुसार पुजारी पांच दिन भगवान महाकाल की फुलझड़ियों से आरती करेंगे। मंदिर दीपों, पुष्पों और विद्युत रोशनी से जगमगाएगा।
चतुर्दशी से होली तक गर्म जल से स्नान की परंपरा
चतुर्दशी से ही भगवान को गर्म जल से स्नान कराने का क्रम शुरू हो जाता है, जो फाल्गुन पूर्णिमा होली के दिन तक चलता है। माना जाता है कि कार्तिक मास की चौदस से ठंड की शुरुआत मानी जाती है और भगवान को ठंड से बचाने के लिए उन्हें गर्म जल से स्नान कराया जाता है।
यह परंपरा महाकाल मंदिर की दिनचर्या से जुड़ी हुई है। ठंड के मौसम में भगवान का स्नान गर्म जल से कराना और उन्हें गर्म वस्त्र धारण कराना मंदिर की सेवा परंपरा का हिस्सा है। दीपावली के दिन से शुरू होने वाला यह क्रम होली तक जारी रहता है और इसके बाद फिर से शीतल जल से स्नान की परंपरा शुरू हो जाती है।
पांच दिवसीय दीपपर्व का पूरा कार्यक्रम
इस बार दीपपर्व का कार्यक्रम इस प्रकार रहेगा। 6 नवंबर को धनत्रयोदशी मनाई जाएगी। धनतेरस पर पुरोहित समिति देश, प्रदेश और नगर की सुख-समृद्धि के लिए भगवान महाकाल की विशेष पूजा-अर्चना करेगी और भगवान को चांदी के सिक्के अर्पित किए जाएंगे। ग्वालियर के पंचांग में धनत्रयोदशी की पूजा 6 नवंबर को है, इसलिए इसी दिन महापूजा होगी। हालांकि मंदिर के कैलेंडर में 6 नवंबर को कार्तिक कृष्ण द्वादशी तिथि बताई जा रही है — पंचांगों के इस अंतर को मंदिर से जुड़े लोग पहले से जानते हैं और परंपरा के अनुसार ग्वालियर के पंचांग को ही प्रधानता दी जाती है।
8 नवंबर को दीपावली मनाई जाएगी। रूप चतुर्दशी पर तड़के चार बजे भस्म आरती में भगवान महाकाल के आंगन में दीपावली मनेगी। इसी दिन से भगवान को गर्म जल से स्नान कराने की परंपरा शुरू होगी। पुजारी पहले हल्दी-चंदन से स्नान कराएंगे, इसके बाद गर्म जल से अभिषेक होगा। सोने-चांदी के आभूषणों से विशेष श्रृंगार कर अन्नकूट का भोग लगाया जाएगा और फुलझड़ियों की जगमगाहट के बीच आरती होगी।
10 नवंबर को गोवर्धन पूजा होगी। इस तरह धनतेरस से गोवर्धन पूजा तक पांच दिवसीय दीपपर्व मनाया जाएगा, जिसमें प्रत्येक उत्सव के बीच एक दिन का अंतर रहेगा, लेकिन दीपोत्सव की रौनक पांचों दिन बनी रहेगी।
महाकाल की दीपावली क्यों है सबसे अलग
महाकाल मंदिर में त्योहार सबसे पहले मनाने की परंपरा रही है। माना जाता है कि महाकाल मृत्युलोक के राजा हैं, इसलिए देश में होली, दीपावली या कोई भी त्योहार सबसे पहले यहीं सूर्योदय से पहले भस्म आरती में मनाया जाता है। यही कारण है कि महाकाल की दीपावली का उत्सव देशभर के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रखता है।
भस्म आरती स्वयं महाकाल मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा है। तड़के की इस आरती में भस्म अर्पित की जाती है और माना जाता है कि महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। दीपावली के दिन यह आरती और भी विशेष हो जाती है, क्योंकि इसमें अभ्यंग स्नान, उबटन, अन्नकूट और फुलझड़ियों की आरती एक साथ जुड़ जाती है।
श्रद्धालुओं के लिए क्या है खास
दीपावली के अवसर पर उज्जैन आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर में विशेष व्यवस्था रहती है। तड़के की भस्म आरती के दर्शन के लिए भक्तों की बड़ी संख्या उमड़ती है और मंदिर परिसर में दीपों की रोशनी से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। शाम को नगरवासी अपने घरों में दीप जलाकर दीपावली मनाएंगे और पूरा उज्जैन दीपों की रोशनी से जगमगा उठेगा।
महाकाल मंदिर में दीपावली का उत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह उज्जैन की सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है। सदियों पुरानी परंपराओं का यह निर्वहन ही इस नगरी को देशभर में अलग पहचान देता है। इस बार चतुर्दशी और अमावस्या के विशेष संयोग ने इस उत्सव को और भी यादगार बना दिया है।
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