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उज्जैन में महाकाल का अलौकिक श्रृंगार: भाल पर चंद्रमा, शीश पर पुष्पमाला — भस्म आरती के बाद दीपोत्सव की तैयारियाँ तेज़

सांकेतिक चित्र: उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर फाइल चित्र: महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन

उज्जैन ब्यूरो

सार: उज्जैन में 1 नवंबर को कार्तिक कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि पर बाबा महाकाल की भस्म आरती अलौकिक श्रृंगार के साथ संपन्न हुई, जिसमें भाल पर चंद्रमा और शीश पर पुष्पमाला अर्पित की गई; इसके साथ ही मंदिर में दीपोत्सव की तैयारियों ने भी गति पकड़ ली है, जो धनतेरस से गोवर्धन पूजा तक पाँच दिन की रौनक लेकर आएगा।

उज्जैन की सुबह आज फिर महाकाल के जयकारों से गूँजी। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि पर रविवार तड़के महाकालेश्वर मंदिर में परंपरागत विधि-विधान के साथ भस्म आरती संपन्न हुई। श्रद्धालुओं ने भस्म आरती के दर्शन किए और दिन की शुरुआत महाकाल के दर्शन से की। मंदिर परिसर में सुबह से ही भक्तों की आवाजाही बनी रही। इस अवसर पर महाकाल का जो श्रृंगार किया गया, उसने दर्शन करने आए भक्तों को विशेष अनुभूति दी। भाल पर चंद्रमा और शीश पर पुष्पमाला के साथ महाकाल का स्वरूप अत्यंत मनोहारी दिखाई दिया।

तड़के खुले कपाट, वीरभद्र की आज्ञा से शुरू हुई आरती

परंपरा के अनुसार रविवार तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ महाकाल के कपाट खोले गए। कपाट खुलते ही गर्भगृह में पूजन का क्रम शुरू हुआ। पुजारियों ने सबसे पहले गर्भगृह में स्थापित सभी देवी-देवताओं का पूजन किया। इसके बाद महाकाल का जलाभिषेक किया गया। पूजन के दौरान प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया। मंत्रोच्चार के बीच भगवान का ध्यान किया गया। इसके बाद झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के साथ भस्म आरती का क्रम आगे बढ़ा। भस्म आरती में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने दर्शन कर पुण्य लाभ कमाया। लोगों ने नंदी महाराज के दर्शन भी किए और परंपरा के अनुसार उनके कान के समीप जाकर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण होने का आशीर्वाद माँगा।

पंचामृत अभिषेक और भस्म अर्पण का पूरा क्रम

जलाभिषेक के बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक पूजन किया गया। भांग, चंदन और आभूषणों से दिव्य श्रृंगार किया गया। भस्म अर्पण से पहले प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम का जल अर्पित किया गया और मंत्रोच्चार के बीच भगवान का ध्यान किया गया। कपूर की आरती के बाद ज्योतिर्लिंग को कपड़े से ढांककर भस्म रमाई गई। इसके बाद शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुण्डमाल, रुद्राक्ष की माला और पुष्पों की मालाएँ अर्पित की गईं। आभूषणों और सुगंधित पुष्पों से भगवान का अलंकरण हुआ। इसी क्रम में मस्तक पर चंद्रमा और शीश पर पुष्पमाला अर्पित कर महाकाल का भव्य श्रृंगार किया गया। कपूर आरती के बाद महाकाल ने मुकुट धारण किया और श्रद्धालुओं को दर्शन हुए। परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है।

सांकेतिक चित्र: उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर
फाइल चित्र: महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन

मान्यता: निराकार से साकार दर्शन का भाव

मान्यता है कि भस्म अर्पण के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि भस्म आरती को महाकाल के दर्शन का सबसे विशेष अवसर माना जाता है। भक्तों के बीच यह विश्वास गहरा है कि भस्म आरती के दर्शन से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। यही भाव हर दिन तड़के मंदिर में उमड़ने वाली भीड़ में दिखाई देता है। कार्तिक मास में इस भाव का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि यह महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। सप्तमी तिथि की इस भस्म आरती ने कार्तिक मास के धार्मिक वातावरण को और गहरा कर दिया। उज्जैन को महाकाल की नगरी कहा जाता है और यहाँ का धार्मिक जीवन मंदिर की परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। भस्म आरती, श्रृंगार और दर्शन की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

दीपोत्सव: तिथियों की घट-बढ़ के बीच पाँच दिन की रौनक

भस्म आरती के साथ ही महाकाल मंदिर में दीपोत्सव की तैयारियों ने भी गति पकड़ ली है। इस बार दीपावली का वैभव मंदिर में अनूठा होगा। राजाधिराज का आंगन दीपों की आभा से दमकेगा और फुलझड़ियों की झिलमिलाहट में उत्सव के रंग बिखरेंगे। तिथियों की घट-बढ़ से पाँच दिवसीय दीपपर्व की परंपरा में भी नया रंग दिखाई देगा। धनतेरस से गोवर्धन पूजा तक उत्सव के बीच एक-एक दिन का अंतर रहेगा। यानी एक दिन उत्सव और अगले दिन विराम की स्थिति बनेगी। फिर भी दीपोत्सव की रौनक पाँच दिन बनी रहेगी। परंपरा के अनुसार पुजारी पाँच दिन भगवान महाकाल की फुलझड़ियों से आरती करेंगे। मंदिर में पूजा-अर्चना और उत्सवों के लिए ग्वालियर के पंचांग को प्रधानता दी जाती है। इसी पंचांगीय गणना के आधार पर दीपोत्सव के कार्यक्रम तय किए गए हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह दीपोत्सव इसलिए भी खास होगा, क्योंकि इसमें महाकाल के आंगन में दीपों, फूलों और आतिशबाजी की परंपरा एक साथ दिखाई देगी।

धनतेरस से गोवर्धन तक: क्या-क्या होगा

दीपोत्सव का क्रम 6 नवंबर को धनतेरस से शुरू होगा। धनतेरस पर पुरोहित समिति देश, प्रदेश और नगर की सुख-समृद्धि के लिए भगवान महाकाल की विशेष पूजा-अर्चना करेगी। इस दिन भगवान को चांदी के सिक्के अर्पित किए जाएंगे। समिति के अध्यक्ष लोकेंद्र व्यास के अनुसार ग्वालियर के पंचांग में धनत्रयोदशी की पूजा 6 नवंबर को है, इसलिए इसी दिन महापूजा होगी। इसके बाद 8 नवंबर को दीपावली मनाई जाएगी। रूपचतुर्दशी पर तड़के चार बजे भस्म आरती में भगवान महाकाल के आंगन में दीपावली मनेगी। दीपावली के दिन गर्म जल से स्नान, अन्नकूट का भोग और फुलझड़ियों से आरती की परंपरा निभाई जाएगी। दीपोत्सव का समापन 10 नवंबर को गोवर्धन पूजा के साथ होगा। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मंदिर समिति ग्राम चिंतामन स्थित वैदिक शोध संस्थान की महाकालेश्वर गोशाला में गोवर्धन और गोवंश का विधि-विधान से पूजन करेगी। इस तरह धनतेरस, दीपावली और गोवर्धन पूजा का यह क्रम महाकाल के आंगन को पाँच दिन तक उत्सव के रंग में रंगे रखेगा।

पंचांग को लेकर क्या कहा गया

तिथियों की गणना को लेकर एक बात सामने आई है, जिसे समझना श्रद्धालुओं के लिए जरूरी है। ग्वालियर के पंचांग के अनुसार धनत्रयोदशी की पूजा 6 नवंबर को बताई गई है, जबकि मंदिर के कैलेंडर में 6 नवंबर को कार्तिक कृष्ण द्वादशी तिथि बताई जा रही है। यह अंतर पंचांगीय गणना की अलग-अलग परंपराओं से जुड़ा हुआ है। मंदिर में पूजा-अर्चना और उत्सवों के लिए ग्वालियर के पंचांग को प्रधानता दिए जाने के कारण महापूजा 6 नवंबर को ही आयोजित की जा रही है। श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे दीपोत्सव के कार्यक्रमों के लिए मंदिर की ओर से जारी सूचना पर ध्यान दें। तिथियों में इस तरह का अंतर पहले भी सामने आता रहा है और मंदिर समिति परंपरा के अनुसार कार्यक्रम तय करती है। इस खबर में तिथियों को लेकर कोई अनुमान नहीं लगाया गया है; जो जानकारी सामने आई है, वही यहाँ दी गई है।

श्रद्धालुओं के लिए क्या जानना जरूरी

आज की भस्म आरती के बाद अब श्रद्धालुओं की नजर दीपोत्सव पर रहेगी। धनतेरस, दीपावली और गोवर्धन पूजा के दिनों में मंदिर में भीड़ बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसे में दर्शन के लिए आने वाले भक्तों को समय का ध्यान रखना होगा। भस्म आरती का समय पहले से तय रहता है और दीपोत्सव के दिनों में विशेष आरतियों का क्रम भी परंपरा के अनुसार चलेगा। महाकाल के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु नंदी महाराज के दर्शन की परंपरा भी निभाते हैं। उज्जैन में महाकाल मंदिर के साथ-साथ महाकाल लोक और आसपास के मंदिरों में भी दीपोत्सव की रौनक देखने को मिलेगी। आने वाले दिनों में धनतेरस की महापूजा और दीपावली के कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी मंदिर की ओर से सामने आने पर उसे भी पाठकों तक पहुँचाया जाएगा। फिलहाल आज की भस्म आरती और दीपोत्सव की तैयारियों ने उज्जैन के धार्मिक वातावरण को उत्सवमय बना दिया है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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