नई दिल्ली ब्यूरो
सार: के आर नारायणन जयंती पर आज देश ने भारत के दसवें राष्ट्रपति को याद किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में पूर्व राष्ट्रपति को पुष्पांजलि अर्पित की, जबकि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव सहित कई नेताओं ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी।
के आर नारायणन जयंती आज 27 अक्टूबर को देशभर में मनाई गई। साल 1920 में आज ही के दिन केरल के उझवूर में जन्मे नारायणन ने साधारण पृष्ठभूमि से उठकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक का सफर तय किया था। उनकी 106वीं जयंती पर राष्ट्रपति भवन में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम के साथ-साथ देश के कई हिस्सों में उन्हें याद किया गया। पूर्व राष्ट्रपति का जीवन शिक्षा, कूटनीति, संसदीय राजनीति और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का एक लंबा अध्याय है, जिसे आज फिर दोहराया गया।
राष्ट्रपति भवन में श्रद्धांजलि, देशभर में नमन
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को राष्ट्रपति भवन में पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन को उनकी जयंती पर पुष्पांजलि अर्पित की। राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी जानकारी के अनुसार यह श्रद्धांजलि कार्यक्रम सुबह आयोजित हुआ। पूर्व राष्ट्रपतियों की जयंती पर राष्ट्रपति भवन में पुष्पांजलि अर्पित करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है, और इसी क्रम में नारायणन को भी याद किया गया।
इस मौके पर देश के कई नेताओं ने भी पूर्व राष्ट्रपति को श्रद्धांजलि दी। नेताओं ने अपने संदेशों में नारायणन के सादे जीवन, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और देश की सेवा के प्रति समर्पण का उल्लेख किया। किसी भी नेता के संदेश को तथ्य की तरह नहीं, बल्कि श्रद्धांजलि के रूप में देखा जाना चाहिए। इन संदेशों से यह स्पष्ट होता है कि नारायणन दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर सम्मान पाने वाले राजनेताओं में गिने जाते हैं।

मुख्यमंत्री मोहन यादव सहित कई नेताओं ने किया याद
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन की जयंती पर श्रद्धांजलि दी। मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में पूर्व राष्ट्रपति को सादर नमन किया और उनके जीवन को प्रेरणादायी बताया। मुख्यमंत्री का संदेश इस बात का संकेत है कि नारायणन का व्यक्तित्व आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में याद किया जाता है।
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी पूर्व राष्ट्रपति को याद करते हुए कहा कि राष्ट्र की सेवा और समाज के उत्थान के लिए उनका काम अतुलनीय रहा। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी अपनी श्रद्धांजलि में नारायणन के लंबे सार्वजनिक जीवन का उल्लेख किया। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी अपने संदेश में कहा कि नारायणन की सादगी, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और राष्ट्र के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
इन श्रद्धांजलियों में एक बात समान थी। सभी ने नारायणन को केवल एक पूर्व राष्ट्रपति के रूप में नहीं, बल्कि संविधान और सामाजिक न्याय के मूल्यों के प्रतीक के रूप में याद किया। यही कारण है कि उनकी जयंती हर साल एक औपचारिक स्मरण से आगे बढ़कर लोकतंत्र के मूल्यों पर चर्चा का अवसर बन जाती है।
उझवूर के साधारण परिवार से राष्ट्रपति भवन तक
कोचेरिल रामन नारायणन का जन्म 27 अक्टूबर 1920 को केरल के कोट्टायम जिले के उझवूर गांव में हुआ था। उनका परिवार आर्थिक रूप से साधारण था और उस दौर की सामाजिक व्यवस्था में उन्हें कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद पढ़ाई के प्रति उनकी लगन ने उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।
नारायणन ने त्रावणकोर विश्वविद्यालय से स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। इसके बाद छात्रवृत्ति पर वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स गए, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र में स्नातक (ऑनर्स) की उपाधि प्राप्त की। लंदन में उनके शिक्षकों में प्रसिद्ध राजनीतिक चिंतक हेरोल्ड लास्की भी थे, जिनसे नारायणन काफी प्रभावित हुए। शिक्षा ने ही उनके जीवन की दिशा बदली, और बाद में वे खुद शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे मजबूत माध्यम मानते रहे।
भारत लौटने के बाद नारायणन ने कुछ समय पत्रकारिता भी की। साल 1949 में वे भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुए। यह वह दौर था जब आजाद भारत अपनी विदेश नीति की नींव रख रहा था। नारायणन की विद्वता और संतुलित दृष्टि ने उन्हें जल्द ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिलाईं।
कूटनीति के तीन दशक: थाईलैंड से अमेरिका तक
विदेश सेवा में नारायणन का करियर करीब तीन दशक लंबा रहा। वे रंगून, टोक्यो, लंदन, कैनबरा और हनोई जैसे शहरों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। साल 1967 से 1969 तक वे थाईलैंड में भारत के राजदूत रहे। इसके बाद साल 1973 से 1975 तक उन्होंने तुर्की में राजदूत का दायित्व संभाला।
साल 1976 से 1978 तक नारायणन चीन में भारत के राजदूत रहे। यह जिम्मेदारी इसलिए भी अहम थी क्योंकि 1962 के युद्ध के बाद भारत-चीन संबंधों में आई दूरी को पाटना आसान नहीं था। चीन में उनके कार्यकाल को दोनों देशों के बीच समझ बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। साल 1978 में विदेश सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद वे 1979 से 1980 तक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।
साल 1980 में नारायणन को अमेरिका में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया, जहां वे 1984 तक रहे। अमेरिका में उनके कार्यकाल के दौरान भारत-अमेरिका संबंधों में आई ठंडक को कम करने की कोशिशें हुईं। साल 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अमेरिका यात्रा के दौरान भी नारायणन की भूमिका अहम मानी जाती है। कूटनीति के इन वर्षों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति की गहरी समझ दी, जो बाद में उनके राष्ट्रपति कार्यकाल में भी दिखाई दी।
संसद से उपराष्ट्रपति पद तक का सफर
साल 1984 में नारायणन ने चुनावी राजनीति में कदम रखा। वे केरल के ओट्टापालम संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए। इसके बाद साल 1989 और 1991 में भी वे इसी क्षेत्र से लगातार चुनाव जीते। इस तरह उन्होंने तीन बार लोकसभा में अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
संसद में रहते हुए नारायणन ने राजीव गांधी की सरकार में राज्य मंत्री के रूप में भी काम किया। अलग-अलग समय पर उन्होंने योजना, विदेश मामले और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी जैसे मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। संसदीय अनुभव ने उन्हें सरकार के कामकाज और लोकतांत्रिक संस्थाओं की बारीकियों से और करीब से परिचित कराया।
साल 1992 में नारायणन को भारत का नौवां उपराष्ट्रपति चुना गया। वे 21 अगस्त 1992 से 24 जुलाई 1997 तक इस पद पर रहे। उपराष्ट्रपति के रूप में वे राज्यसभा के सभापति भी थे। इस दौरान उनकी शांत, अध्ययनशील और संतुलित कार्यशैली की काफी चर्चा हुई। साल 1997 में उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा होने के बाद वे राष्ट्रपति पद के लिए चुने गए।
संविधान के प्रहरी के रूप में राष्ट्रपति कार्यकाल
के आर नारायणन ने 25 जुलाई 1997 को भारत के दसवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। वे देश के पहले राष्ट्रपति थे जो दलित समुदाय से आते थे। उनका राष्ट्रपति कार्यकाल 25 जुलाई 2002 तक चला। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रपति पद को केवल औपचारिक पद नहीं रहने दिया, बल्कि उसे संविधान की रक्षा के एक सक्रिय मंच के रूप में इस्तेमाल किया।
नारायणन के कार्यकाल की सबसे चर्चित घटनाओं में राष्ट्रपति शासन की सिफारिशों को पुनर्विचार के लिए लौटाना शामिल है। साल 1997 में उत्तर प्रदेश और साल 1998 में बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश को उन्होंने पुनर्विचार के लिए वापस भेजा था। यह कदम इस बात का उदाहरण माना जाता है कि राष्ट्रपति सरकार के फैसलों पर आंख मूंदकर मुहर नहीं लगाता, बल्कि संवैधानिक औचित्य की जांच भी करता है। नारायणन का मानना था कि राष्ट्रपति न तो सरकार का विरोधी प्राधिकरण बने और न ही केवल मुहर लगाने वाला पद रह जाए।
साल 2000 में गणतंत्र के 50 वर्ष पूरे होने पर दिए गए अपने संदेश में नारायणन ने राजनीतिक लोकतंत्र और सामाजिक-आर्थिक असमानता के बीच की दूरी पर गंभीर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि जब तक सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रहेगी, तब तक समान नागरिकता का वादा अधूरा रहेगा। उनका यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक माना जाता है। साल 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा के दौरान भी नारायणन की स्वतंत्र सोच और गरिमा की चर्चा हुई थी।
शिक्षा और समानता का संदेश
नारायणन के जीवन का सबसे स्थायी संदेश शिक्षा और समानता से जुड़ा है। उनका मानना था कि शिक्षा केवल रोजगार पाने का साधन नहीं है, बल्कि आलोचनात्मक सोच, सामाजिक गतिशीलता और जागरूक नागरिकता की नींव है। उनका अपना जीवन इसका उदाहरण था। एक साधारण परिवार में जन्मा बच्चा छात्रवृत्ति के बल पर लंदन तक पहुंचा और फिर देश के सर्वोच्च पद तक गया।
वे धर्मनिरपेक्षता को भारत की एकता की बुनियाद मानते थे। उनके अनुसार भारत की एकता धार्मिक एकरूपता पर नहीं, बल्कि समान नागरिकता पर टिकी है। बहुमत को शासन का अधिकार मिलता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संवैधानिक सुरक्षा उपायों को कमजोर किया जाए या राष्ट्रीय पहचान पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार हो। संविधान को वे वह साझा जमीन मानते थे जिस पर विविधता, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व एक साथ टिके रह सकते हैं।
नारायणन भीमराव आंबेडकर के संवैधानिक दृष्टिकोण से भी गहराई से प्रभावित थे। उनका मानना था कि राजनीतिक समानता तब तक सुरक्षित नहीं रह सकती, जब तक सामाजिक पदानुक्रम और आर्थिक विषमता लोगों के जीवन के अवसर तय करते रहें। आंबेडकर का नाम लेकर उनकी उपेक्षा करना और सामाजिक न्याय की दिशा में काम न करना, उनके अनुसार, संविधान की भावना के खिलाफ होगा।
आज भी प्रासंगिक क्यों हैं नारायणन
आज, जब देश में कृषि संकट, असमान अवसर और शिक्षित युवाओं की निराशा जैसे मुद्दों पर चर्चा होती है, तब नारायणन की चेतावनी फिर याद आती है। उन्होंने दशकों पहले आगाह किया था कि आर्थिक वृद्धि और वैज्ञानिक उपलब्धियां गरीबी, जातिगत भेदभाव, निरक्षरता और असमान अवसर की भरपाई नहीं कर सकतीं। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता, जब तक असमानता समान नागरिकता के अर्थ को खोखला करती रहे।
नारायणन का उदाहरण आज के सार्वजनिक जीवन के लिए भी एक मानक तय करता है। उनका मानना था कि सार्वजनिक पद पर बौद्धिक ईमानदारी, योग्यता और नैतिक जिम्मेदारी जरूरी है। किसी भी पद की गरिमा दिखावे से नहीं, बल्कि संस्थागत निष्पक्षता, अवसर की समानता और सामान्य नागरिक को मिलने वाली गरिमा से मापी जानी चाहिए। उनकी जयंती पर यही सवाल फिर उठता है कि क्या हम राजनीतिक समानता और जीवन के वास्तविक अनुभव के बीच की दूरी को कम कर पा रहे हैं।
नारायणन का निधन 9 नवंबर 2005 को नई दिल्ली में हुआ था। वे 85 वर्ष के थे। उनके निधन के बाद भी उनकी लिखी बातें, उनके भाषण और उनके फैसले भारतीय लोकतंत्र की पाठ्यपुस्तक का हिस्सा बने हुए हैं। हर साल 27 अक्टूबर को उनकी जयंती केवल एक पूर्व राष्ट्रपति को याद करने का दिन नहीं होती, बल्कि यह दिन संविधान के उन मूल्यों को फिर से दोहराने का अवसर होता है जिनके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था।
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