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दिल्ली में मोदी और लिकटेंस्टीन के प्रिंस एलोइस की वार्ता: व्यापार, निवेश और तकनीक पर बढ़ेगा सहयोग, EFTA समझौते को मिली नई गति

सांकेतिक चित्र: नई दिल्ली का हैदराबाद हाउस सांकेतिक चित्र: नई दिल्ली का हैदराबाद हाउस

नई दिल्ली ब्यूरो

सार: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में लिकटेंस्टीन के प्रिंस एलोइस के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता की। व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के साथ लोगों के बीच आपसी संपर्क बढ़ाने पर चर्चा हुई, और भारत-ईएफटीए व्यापार समझौते से मिल रही गति को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में लिकटेंस्टीन के वंशानुगत प्रिंस एलोइस के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता की। प्रिंस एलोइस अपनी पत्नी राजकुमारी सोफिया के साथ भारत की राजकीय यात्रा पर आए हैं। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच राजनयिक, व्यापारिक और आर्थिक सहयोग को नई गति देने का लक्ष्य रखा गया है। वार्ता में व्यापार और निवेश के साथ विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार और लोगों के बीच आपसी संपर्क जैसे विषयों पर चर्चा हुई। क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी विचारों का आदान-प्रदान हुआ।

लिकटेंस्टीन के प्रिंस एलोइस से हैदराबाद हाउस में वार्ता

मंगलवार को दिन की शुरुआत में प्रिंस एलोइस और राजकुमारी सोफिया हैदराबाद हाउस पहुंचे, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे मुलाकात की। इसके बाद दोनों पक्षों के प्रतिनिधिमंडलों के बीच औपचारिक वार्ता हुई। वार्ता का मुख्य विषय दोनों देशों के बीच सहयोग के दायरे को बढ़ाना था। व्यापार और निवेश के साथ विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों के रूप में रखा गया। लोगों के बीच आपसी संपर्क को भी चर्चा में जगह मिली, क्योंकि शिक्षा, संस्कृति और पेशेवर आदान-प्रदान से दोनों समाजों के बीच समझ बढ़ती है।

हैदराबाद हाउस नई दिल्ली में विदेशी मेहमानों के साथ होने वाली उच्च स्तरीय बैठकों का एक प्रमुख स्थल है। यहां होने वाली वार्ताओं में आमतौर पर दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल होते हैं। इस वार्ता में भी दोनों पक्षों के प्रतिनिधिमंडलों ने अपने-अपने देशों की प्राथमिकताओं और संभावनाओं को सामने रखा। बैठक का माहौल सहयोग बढ़ाने की साझा इच्छा से जुड़ा रहा।

राष्ट्रपति भवन में औपचारिक स्वागत और राजघाट पर श्रद्धांजलि

प्रिंस एलोइस का राष्ट्रपति भवन में औपचारिक स्वागत किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका अभिनंदन किया। औपचारिक स्वागत किसी भी राजकीय यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, क्योंकि इससे मेहमान देश के प्रति सम्मान और संबंधों की गंभीरता का संदेश जाता है।

स्वागत के बाद शाही जोड़े ने राजघाट जाकर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने पुष्पांजलि समारोह में भाग लिया और आगंतुक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर केंद्रीय राज्य मंत्री जयंत चौधरी भी मौजूद थे। राजघाट पर श्रद्धांजलि भारत आने वाले लगभग हर विदेशी मेहमान के कार्यक्रम में शामिल होती है, और यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों के प्रति सम्मान का प्रतीक मानी जाती है।

सांकेतिक चित्र: नई दिल्ली का हैदराबाद हाउस
सांकेतिक चित्र: नई दिल्ली का हैदराबाद हाउस

जयशंकर की मुलाकात और ईएफटीए समझौते की गति

प्रधानमंत्री के साथ वार्ता से पहले दिन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी प्रिंस एलोइस से मुलाकात की। इस मुलाकात में द्विपक्षीय संबंधों और भारत-यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ यानी ईएफटीए के साथ हुए व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते से पैदा हुए नए अवसरों पर जोर दिया गया। जयशंकर ने कहा कि इस समझौते से दोनों देशों की साझेदारी को कई क्षेत्रों में मजबूत गति मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रिंस की प्रधानमंत्री के साथ बैठक से सहयोग को और आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

ईएफटीए में आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड शामिल हैं। भारत और ईएफटीए के बीच व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौता 2025 में लागू हुआ। इस समझौते के बाद भारत और ईएफटीए देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग के नए रास्ते खुले हैं। लिकटेंस्टीन इस समूह का एक छोटा लेकिन आर्थिक रूप से मजबूत सदस्य है, जो वित्तीय सेवाओं, उन्नत विनिर्माण और नवाचार के लिए जाना जाता है। यही कारण है कि इस समझौते को दोनों देशों के रिश्तों में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

प्रिंस एलोइस ने किन क्षेत्रों में सहयोग की संभावना बताई

प्रिंस एलोइस ने इस यात्रा को अपने देश के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह यात्रा भारत के साथ संबंधों को लिकटेंस्टीन की ओर से दिए जा रहे महत्व को दिखाती है। उन्होंने व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते को एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया और कहा कि लिकटेंस्टीन इस समझौते से पैदा हुई गति को आगे बढ़ाना चाहता है।

उन्होंने नवाचार, उन्नत विनिर्माण, वित्तीय सेवाओं, शिक्षा और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग बढ़ाने की काफी संभावना बताई। उनका कहना था कि दोनों देशों की ताकतें एक-दूसरे की पूरक हैं, इसलिए इन क्षेत्रों में साझेदारी से दोनों को लाभ हो सकता है। लिकटेंस्टीन की अर्थव्यवस्था आकार में छोटी है, लेकिन वह उच्च तकनीक, सटीक विनिर्माण और वित्तीय सेवाओं में मजबूत मानी जाती है। भारत की ओर से बड़ा बाजार, कुशल मानव संसाधन और तेजी से बढ़ता प्रौद्योगिकी क्षेत्र इस साझेदारी को संतुलन देता है।

मुंबई और वडोदरा से दिल्ली तक की यात्रा

प्रिंस एलोइस की यह राजकीय यात्रा नई दिल्ली से शुरू नहीं हुई। वह पहले मुंबई पहुंचे, जहां उनका स्वागत किया गया। इसके बाद वह वडोदरा गए और फिर नई दिल्ली पहुंचे। उनके साथ राजकुमारी सोफिया के अलावा वरिष्ठ अधिकारियों का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल और उद्योग जगत के नेताओं का एक व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी है। व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी से यह साफ होता है कि इस यात्रा में आर्थिक सहयोग को विशेष महत्व दिया गया है।

नई दिल्ली में प्रिंस के कार्यक्रम में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्य मंत्री जयंत चौधरी के साथ बैठकें भी शामिल थीं। इसके बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ बैठक हुई, जिन्होंने उनके सम्मान में एक आधिकारिक भोज की मेजबानी की। विदेश मंत्रालय के अनुसार प्रतिनिधिमंडल बुधवार को अपनी यात्रा समाप्त कर भारत से रवाना होगा।

1993 से आज तक: भारत-लिकटेंस्टीन संबंधों की पृष्ठभूमि

भारत और लिकटेंस्टीन ने 1993 में राजनयिक संबंध स्थापित किए थे। 2023 में दोनों देशों ने अपने संबंधों की 30वीं वर्षगांठ मनाई। इन तीन दशकों में दोनों देशों के बीच राजनीतिक संपर्क, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान धीरे-धीरे बढ़ा है। हालांकि लिकटेंस्टीन भौगोलिक रूप से बहुत छोटा देश है, लेकिन उसकी आर्थिक और वित्तीय क्षेत्र में पहचान मजबूत है।

प्रिंस एलोइस इससे पहले भी भारत आ चुके हैं। वह फरवरी 2026 में एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन में भाग लेने नई दिल्ली आए थे। इससे पहले वह 2010 और 2018 में भी भारत की यात्रा कर चुके हैं। इन यात्राओं से दोनों देशों के बीच निरंतर संपर्क बना रहा है। मौजूदा राजकीय यात्रा को इसी निरंतरता में एक नया अध्याय माना जा रहा है, क्योंकि इसमें राजकीय स्वागत, राष्ट्रपति के साथ बैठक और प्रधानमंत्री के साथ औपचारिक वार्ता जैसे सभी तत्व शामिल हैं।

इस वार्ता का भारत के लिए क्या महत्व है

इस वार्ता का महत्व सिर्फ दो देशों के द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है। भारत यूरोप के साथ अपने आर्थिक संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है, और ईएफटीए समझौता इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। लिकटेंस्टीन जैसे देश के साथ सहयोग बढ़ने से भारत को उन्नत विनिर्माण, वित्तीय सेवाओं और नवाचार के क्षेत्र में नई तकनीक और निवेश के अवसर मिल सकते हैं।

दूसरी ओर, लिकटेंस्टीन के लिए भारत एक बड़ा और तेजी से बढ़ता बाजार है। भारतीय कंपनियों और संस्थानों के साथ साझेदारी से लिकटेंस्टीन की कंपनियों को एशिया में अपनी पहुंच बढ़ाने का अवसर मिलता है। शिक्षा और लोगों के बीच संपर्क बढ़ने से दोनों देशों के युवाओं, शोधकर्ताओं और पेशेवरों के लिए भी नए अवसर खुल सकते हैं।

आगे क्या: यात्रा के बाद की उम्मीदें

प्रतिनिधिमंडल की यात्रा बुधवार को समाप्त हो रही है, लेकिन वार्ता में उठे विषयों पर आगे भी काम जारी रहने की उम्मीद है। व्यापार, निवेश, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग को ठोस परियोजनाओं में बदलने के लिए दोनों देशों के अधिकारियों और व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों के बीच संपर्क बना रहेगा। ईएफटीए समझौते के तहत बने ढांचे से भी इस सहयोग को संस्थागत समर्थन मिलेगा।

इस बैठक को दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे और साझा हितों का संकेत माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वार्ता में चर्चा किए गए क्षेत्रों में कौन-सी ठोस पहल आगे बढ़ती है। फिलहाल इतना साफ है कि भारत और लिकटेंस्टीन दोनों ही अपने संबंधों को व्यापार, तकनीक और लोगों के बीच संपर्क के जरिए और गहरा करना चाहते हैं।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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