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संडे डायरी: गोबर शिल्पकार जितेंद्र राठौर और गौहर महल का दीपोत्सव

सांकेतिक चित्र: मिट्टी का दीया — गौहर महल दीपोत्सव और गोबर शिल्प की कहानी सांकेतिक चित्र

भोपाल ब्यूरो

सार: भोपाल के जितेंद्र राठौर ने अस्पताल की नौकरी छूटने के बाद गाय के गोबर से मूर्तियाँ और दीये बनाना शुरू किया और आज उनका काम 200 से ज्यादा महिलाओं तक रोजगार पहुँचा रहा है, वहीं ऐतिहासिक गौहर महल में दीपोत्सव के दौरान 50 से ज्यादा शिल्पकारों ने माटी की कला से दीवाली को पर्यावरण-अनुकूल रंग दिया। गौहर महल दीपोत्सव में 50 से ज्यादा शिल्पकारों की माटी की कला देखने को मिली।

दीवाली का त्योहार हर साल घरों में रोशनी लाता है, लेकिन इस बार भोपाल की दीवाली की रोशनी के पीछे दो ऐसी कहानियाँ हैं जो मिट्टी, गोबर और मेहनत से जुड़ी हैं। एक कहानी एक ऐसे शख्स की है जिसने नौकरी छूटने के बाद हार नहीं मानी और गोबर को अपनी पहचान बना लिया। दूसरी कहानी राजधानी के ऐतिहासिक गौहर महल की है, जहाँ दीपोत्सव में प्रदेश भर के शिल्पकार अपनी कला लेकर पहुँचे। दोनों कहानियों का एक ही संदेश है — त्योहार मनाएँ, लेकिन अपनी मिट्टी और अपने कारीगरों के साथ।

अस्पताल की नौकरी छोड़ गोबर शिल्प की राह

भोपाल के जितेंद्र राठौर की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। करीब 15 साल तक उन्होंने शहर के बड़े अस्पतालों में काम किया। एम्स, बंसल और पीपुल्स जैसे अस्पतालों में नौकरी के दौरान उनका जीवन एक तय रास्ते पर चल रहा था। फिर कोविड का दौर आया और उनकी नौकरी चली गई। जिस दौर में हजारों लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हुआ, उसी दौर में जितेंद्र राठौर ने एक ऐसा रास्ता चुना जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी — गाय के गोबर से सजावटी सामान और मूर्तियाँ बनाना।

शुरुआत बहुत छोटी थी। बताया जाता है कि उन्होंने महज दस हजार रुपये से इस काम की शुरुआत की थी। गोबर को सुखाकर उसमें लकड़ी का बुरादा और प्राकृतिक रंग मिलाकर मूर्तियाँ ढालना, फिर उन्हें धूप में सुखाकर तैयार करना — यह काम आसान नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। आज वे गोबर से 70 से ज्यादा तरह के उत्पाद बनाते हैं, जिनमें लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ, दीये, स्वास्तिक, शुभ-लाभ, श्री यंत्र, वॉल पेंटिंग, घड़े और धूपबत्ती तक शामिल हैं।

200 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार, लाखों की कमाई

जितेंद्र राठौर की सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ उनका अपना कारोबार नहीं है, बल्कि वह रोजगार है जो उन्होंने दूसरों तक पहुँचाया है। रिपोर्टों के अनुसार इस काम से 200 से ज्यादा महिलाओं को जोड़ा गया है, जो गोबर से उत्पाद बनाने और उन्हें तैयार करने के काम में लगी हैं। एक समय नौकरी खो चुके शख्स के हाथों आज सैकड़ों परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है।

इस काम से सालाना लाखों रुपये की कमाई होने की बात भी सामने आई है। यह कमाई किसी बड़े निवेश या फैक्ट्री से नहीं, बल्कि गाँव-शहर की गौशालाओं से मिलने वाले गोबर और हाथ के हुनर से हुई है। जितेंद्र राठौर खुद कहते हैं कि गोबर ने उन्हें घर बैठे देश भर में पहचान दिलाई है। गणेशोत्सव के दौरान उन्होंने घर से ही गोबर के 200 गणेश बेचे थे, जिनकी माँग भोपाल के बाहर पुणे और दिल्ली तक से आई थी।

इस दीवाली 150 से ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद

इस बार की दीवाली जितेंद्र राठौर के लिए खास रही। इस दीवाली के लिए उन्होंने 150 से ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद तैयार किए हैं। इनमें लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ, शुभ-लाभ, श्रीनाथजी और तिरुपति बालाजी की मूर्तियाँ, स्वास्तिक, तोरण, दीयों और पूजा चौकी तक शामिल हैं। गोबर से बने ये उत्पाद विसर्जन के बाद पानी को प्रदूषित नहीं करते, बल्कि खाद का काम करते हैं। यही वजह है कि पर्यावरण के प्रति जागरूक खरीदार इनकी ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

दीवाली के लिए उन्होंने गोबर से बना एक खास पूजा गिफ्ट हैंपर भी तैयार किया है, जिसकी कीमत 950 रुपये रखी गई है। इस हैंपर में गोबर से बनी बंधनवार, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति, माता लक्ष्मी की चरण पादुका, धूपबत्ती और गोबर का वैदिक दीया शामिल है। यह हैंपर उन लोगों के लिए तैयार किया गया है जो त्योहार पर अपने प्रियजनों को कुछ अलग और पर्यावरण के अनुकूल भेंट देना चाहते हैं।

गौहर महल दीपोत्सव: 50 से ज्यादा शिल्पकारों की माटी की कला

दीवाली की दूसरी कहानी भोपाल के ऐतिहासिक गौहर महल से जुड़ी है। वहाँ दीपोत्सव के दौरान रिपोर्ट के अनुसार दीवान-ए-खास 2,027 मिट्टी के दीयों से जगमगा उठा। यह आयोजन मध्य प्रदेश हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम की ओर से किया गया, जिसमें प्रदेश के विभिन्न जिलों से 50 से ज्यादा शिल्पकार अपनी पारंपरिक कला लेकर पहुँचे। प्रदर्शनी 7 नवंबर तक चली, जिसमें मिट्टी के दीये, सजावटी सामान और हस्तनिर्मित उत्पादों की भरमार रही।

इस बार की खास बात यह रही कि पहली बार मिट्टी के शिल्पकारों के एक समूह को सामूहिक रूप से आमंत्रित किया गया, जिन्होंने हाथ से बने दीये और मूर्तियाँ प्रदर्शित कीं। ग्वालिन की आकृतियाँ और ओरछा की राम दरबार कलाकृति भी प्रदर्शनी के मुख्य आकर्षणों में रहीं। मध्य प्रदेश माटीकला बोर्ड के सहयोग से आयोजित इस मेले का उद्देश्य स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना और माटी कला से जुड़े कारीगरों को बेहतर बाजार दिलाना रहा।

गौहर महल दीपोत्सव में बांस शिल्प के धर्मेंद्र रोहर भी साथ

गौहर महल दीपोत्सव और भोपाल की पर्यावरण-अनुकूल दीवाली की कहानी में एक और नाम जुड़ता है — बांस शिल्पकार धर्मेंद्र रोहर। वे पिछले 20 साल से भोपाल में बांस की कला से जुड़े हैं। बांस से बने दीये, तोरण और दीवारों की सजावट उनकी पहचान है। बताया गया है कि गोबर शिल्प और बांस शिल्प दोनों ही प्राकृतिक सामग्री से बनते हैं और प्लास्टिक की सजावट का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प पेश करते हैं।

किसका फायदा: शिल्पकार, पर्यावरण और खरीदार

इन दोनों कहानियों का फायदा सीधे तीन पक्षों तक पहुँचता है। पहला, शिल्पकार और कारीगर — जिनकी साल भर की मेहनत को त्योहारों के मौसम में बाजार मिलता है और जिनकी आमदनी बढ़ती है। दूसरा, पर्यावरण — क्योंकि मिट्टी और गोबर से बने दीये और मूर्तियाँ विसर्जन के बाद मिट्टी में मिल जाती हैं और पानी को नुकसान नहीं पहुँचातीं। तीसरा, खरीदार — जिन्हें सस्ते, सुंदर और परंपरा से जुड़े उत्पाद मिलते हैं।

स्थानीय कारीगरों से खरीदारी का एक और फायदा यह है कि पैसा सीधे कारीगर के परिवार तक पहुँचता है, न कि किसी बड़ी फैक्ट्री या आयातित सामान की श्रृंखला में खो जाता है। यही वजह है कि वोकल फॉर लोकल का नारा त्योहारों के मौसम में सबसे ज्यादा असर दिखाता है।

गौहर महल दीपोत्सव के बाद आगे क्या: माटी की कला को स्थायी बाजार की जरूरत

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। राज्य सरकार ने माटी और गोबर से बनी मूर्तियों को बढ़ावा देने के लिए माटी गणेश-सिद्ध गणेश अभियान भी शुरू किया है, जिसके तहत प्रदेश भर में प्रशिक्षण के जरिए महिलाओं और कारीगरों को इस कला से जोड़ा जा रहा है। इसका मकसद है कि पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों का चलन सिर्फ त्योहारों तक सीमित न रहे, बल्कि साल भर बना रहे।

लेकिन शिल्पकारों को अभी भी स्थायी बाजार, कच्चे माल की आसान उपलब्धता और ऑनलाइन बिक्री के साधनों की जरूरत है। गौहर महल दीपोत्सव जैसे आयोजनों से उन्हें मंच जरूर मिलता है, पर असली बदलाव तब होगा जब खरीदार हर साल दीवाली पर मिट्टी का दीया और गोबर की मूर्ति खरीदने को अपनी आदत बना लेंगे। भोपाल के जितेंद्र राठौर और गौहर महल के शिल्पकारों ने रास्ता दिखा दिया है — अब बारी खरीदारों की है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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