नई दिल्ली ब्यूरो
दूरसंचार नियामक ने मोबाइल, लैंडलाइन और इंटरनेट सेवाओं की शिकायत व्यवस्था को नए सिरे से तय कर दिया है। शिकायत केंद्र अब सप्ताह के सातों दिन चौबीस घंटे उपलब्ध रहेंगे, इंसानी सहायता कम से कम 16 घंटे रोज मिलेगी, शिकायत या अपील का निपटान नियमों के विरुद्ध होने पर कंपनी पर आर्थिक दंड लगेगा, और अपील दाखिल करने की मियाद 30 दिन से घटकर 15 दिन रह गई है। अपील पर फैसला भी 15 दिन के भीतर करना होगा।
क्या बदला है — एक नजर में
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने 2 नवंबर 2026 को दूरसंचार उपभोक्ता शिकायत निवारण (चौथा संशोधन) विनियम, 2026 जारी किए हैं। ये नियम वर्ष 2012 के शिकायत विनियमों में संशोधन करते हैं, जिनमें पिछला बड़ा बदलाव 2014 में हुआ था। इस बार बदलाव का दायरा सिर्फ समय बढ़ाने तक सीमित नहीं है — शिकायत दर्ज करने के माध्यम, अपील की प्रक्रिया, जवाबदेही और निगरानी, सभी को एक साथ बदला गया है।
नए ढांचे की सबसे बड़ी बात यह है कि उपभोक्ता को अब अपनी शिकायत के लिए दिन के तय घंटों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। शिकायत केंद्र चौबीस घंटे खुले रहेंगे। साथ ही, यह भी साफ किया गया है कि चौबीस घंटे की सुविधा का मतलब चौबीस घंटे इंसानी कर्मचारी नहीं है — इंसानी सहायता कम से कम 16 घंटे रोज उपलब्ध करानी होगी, बाकी समय में तकनीक आधारित व्यवस्था इंसानी निगरानी में काम कर सकेगी। उपभोक्ता को यह बताना भी अनिवार्य होगा कि वह किसी स्वचालित प्रणाली या कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित एजेंट से बात कर रहा है या किसी व्यक्ति से।
नियमों में यह भी तय किया गया है कि अपील की मियाद आधी कर दी गई है। पहले शिकायत के निपटान के बाद अपील के लिए 30 दिन मिलते थे, अब सिर्फ 15 दिन मिलेंगे। अपीलीय प्राधिकारी को भी अपील मिलने के 15 दिन के भीतर फैसला करके उपभोक्ता को सूचित करना होगा। यानी देरी की गुंजाइश दोनों तरफ से कम की गई है — उपभोक्ता जल्दी अपील करे और कंपनी जल्दी फैसला दे।
चौबीस घंटे शिकायत केंद्र, इंसानी मदद कम से कम 16 घंटे
पहले शिकायत केंद्रों की व्यवस्था 16 घंटे की थी। नए नियमों में इसे बढ़ाकर सप्ताह के सातों दिन, चौबीस घंटे कर दिया गया है। इसका सीधा फायदा उन उपभोक्ताओं को मिलेगा जो दिन में काम के कारण शिकायत नहीं दर्ज करा पाते, या जिनकी समस्या रात में सामने आती है — जैसे अचानक इंटरनेट बंद होना, नेटवर्क गायब होना या बिल से जुड़ी गड़बड़ी का पता चलना।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बारीकी समझना जरूरी है। चौबीस घंटे की सुविधा का अर्थ यह नहीं है कि रात के हर पहर फोन पर कोई व्यक्ति ही मिलेगा। नियम कहते हैं कि इंसानी सहायता कम से कम 16 घंटे रोज उपलब्ध रहेगी। शेष समय में कंपनी स्वचालित प्रणाली या कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित एजेंट का उपयोग कर सकती है, बशर्ते वह प्रणाली उचित इंसानी निगरानी में काम करे। और जब उपभोक्ता किसी स्वचालित एजेंट से बात कर रहा हो, तो उसे यह बात साफ-साफ बतानी होगी। यह प्रावधान इसलिए अहम है क्योंकि कई बार उपभोक्ता को पता ही नहीं चलता कि सामने व्यक्ति है या मशीन, और बातचीत के बीच में ही वह भटक जाता है।
टेलीफोन व्यवस्था के लिए भी नियम तय किए गए हैं। कॉल प्रणाली में शिकायत और अपील के विकल्प साफ तौर पर पहचाने जाने चाहिए, उपभोक्ता इंसानी प्रतिनिधि तक पहुंच सके, और कतार में प्रतीक्षा के दौरान कॉल-बैक का विकल्प मिले। शिकायत के लिए दिया गया उपभोक्ता सेवा नंबर उपभोक्ता से शुल्क योग्य नहीं होगा। ये छोटे-छोटे प्रावधान मिलकर शिकायत की प्रक्रिया को कम थकाऊ बनाते हैं।

अपील अब 15 दिन में दाखिल, फैसला भी 15 दिन में
नए नियमों का दूसरा बड़ा बदलाव अपील की समय-सीमा से जुड़ा है। शिकायत के निपटान से असंतुष्ट उपभोक्ता को अब 15 दिन के भीतर अपील दाखिल करनी होगी। पहले यह अवधि 30 दिन थी। इसका मतलब यह है कि उपभोक्ता को निपटान के बाद ज्यादा दिन तक रुकना नहीं चाहिए — अगर जवाब संतोषजनक नहीं लगा, तो तुरंत अपील की तैयारी करनी होगी।
दूसरी ओर, अपीलीय प्राधिकारी की जिम्मेदारी भी तय कर दी गई है। अपील मिलने के 15 दिन के भीतर उसे अपील पर विचार करना, शिकायत के समाधान के लिए उचित कार्रवाई करनी और अंतिम फैसला उपभोक्ता को बताना होगा। पहले अपीलों के निपटान की प्रक्रिया में सलाहकार समिति की व्यवस्था थी, जिसे अब समाप्त कर दिया गया है ताकि अपीलों का निपटान तेज और समयबद्ध हो सके। अपीलीय प्राधिकारी में अब सेवा प्रदाता के प्रबंधन के नियमित कर्मचारी शामिल होंगे, जिनके पास कम से कम पांच वर्ष का अनुभव होगा।
यह बदलाव दोनों पक्षों के लिए एक तरह का अनुशासन है। उपभोक्ता के लिए संदेश साफ है कि अपील में देरी भारी पड़ सकती है, और कंपनी के लिए संदेश यह है कि अपील को लटकाया नहीं जा सकेगा।
ऐप, वेबसाइट और पोर्टल से शिकायत का नया रास्ता
नए नियम डिजिटल माध्यमों को शिकायत व्यवस्था के केंद्र में रखते हैं। उपभोक्ता अब अपने सेवा प्रदाता के मोबाइल ऐप के जरिए भी शिकायत दर्ज करा सकेगा, अपील दाखिल कर सकेगा, सेवा अनुरोध भेज सकेगा और सेवा से जुड़े प्रश्न पूछ सकेगा। इसके अलावा वेबसाइट, पोर्टल और शिकायत केंद्र जैसे मौजूदा माध्यम भी बने रहेंगे। अपील के लिए ईमेल, डाक और व्यक्तिगत रूप से पहुंचने जैसे माध्यम भी उपलब्ध रहेंगे।
शिकायत दर्ज होने पर कंपनी को उसे एक डॉकेट नंबर देना होगा, उसके निपटान का अनुमानित समय बताना होगा, और देरी होने पर उपभोक्ता को सूचित करके संशोधित समय-सीमा बतानी होगी। जहां किसी अन्य नियम में निपटान की अलग अवधि तय नहीं है, वहां शिकायत या सेवा अनुरोध का निपटान तीन दिन के भीतर करना होगा। यह व्यवस्था उपभोक्ता को एक लिखित निशान देती है — शिकायत कब दर्ज हुई, उसका नंबर क्या है, और कब तक जवाब मिलना चाहिए। विवाद की स्थिति में यही निशान सबसे बड़ा सबूत बनता है।
डिजिटल व्यवस्था का एक और पहलू यह है कि सेवा प्रदाता के ऐप, वेबसाइट और पोर्टल को सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार सुलभता सुविधाओं से लैस करना होगा, ताकि दिव्यांग उपभोक्ता भी बिना रुकावट के इनका उपयोग कर सकें।
दिव्यांग उपभोक्ताओं के लिए अलग डेस्क और सुलभता
नए नियमों में दिव्यांग उपभोक्ताओं के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। सेवा प्रदाताओं को अपने शिकायत केंद्रों या उपभोक्ता सहायता केंद्रों में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए समर्पित डेस्क या हेल्पलाइन की व्यवस्था करनी होगी। साथ ही, मोबाइल ऐप, वेबसाइट और पोर्टल में सुलभता से जुड़ी सुविधाएं सरकारी दिशानिर्देशों के अनुरूप होनी चाहिए।
यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिकायत व्यवस्था अक्सर उन्हीं लोगों के लिए सबसे कठिन होती है जिन्हें सबसे ज्यादा मदद की जरूरत होती है। अगर ऐप पढ़ने योग्य नहीं है, फोन पर विकल्प समझ नहीं आते, या केंद्र तक पहुंचना मुश्किल है, तो शिकायत दर्ज होना ही मुश्किल हो जाता है। अलग डेस्क और सुलभता की शर्त इस बाधा को कम करने की कोशिश है।
गलत निपटान पर जुर्माना: शिकायत पर 1,000, अपील पर 5,000 रुपये
नए नियमों में जवाबदेही को आर्थिक दंड से जोड़ा गया है। अगर किसी शिकायत या अपील का निपटान नियमों के विरुद्ध किया जाता है, तो सेवा प्रदाता पर वित्तीय हतोत्साहन लगाया जा सकेगा — हर शिकायत पर 1,000 रुपये और हर अपील पर 5,000 रुपये। यह दंड प्रति सेवा क्षेत्र प्रति तिमाही 20 लाख रुपये तक सीमित रहेगा। तिमाही प्रदर्शन रिपोर्ट समय पर जमा न करने या देरी से जमा करने पर भी दंड लग सकेगा।
यह व्यवस्था शिकायतों को सिर्फ आंकड़ों में दर्ज करके बंद करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए बनाई गई है। पहले शिकायत बंद तो हो जाती थी, लेकिन उपभोक्ता को यह पता नहीं चलता था कि उसके मामले में क्या हुआ। अब गलत निपटान की कीमत कंपनी को चुकानी होगी, और यह कीमत हर तिमाही में जुड़कर एक बड़ी राशि बन सकती है। हालांकि यह दंड उपभोक्ता को सीधे मुआवजे के रूप में नहीं मिलेगा — यह नियामकीय दंड है, जिसका उद्देश्य कंपनियों को नियमों का पालन करने के लिए प्रेरित करना है।
निगरानी, फीडबैक सर्वे और तिमाही रिपोर्ट का नया ढांचा
नए नियमों में निगरानी का भी एक नया ढांचा बनाया गया है। उपभोक्ता शिकायत निवारण निगरानी समिति समय-समय पर हर सेवा प्रदाता की शिकायत निवारण व्यवस्था की समीक्षा करेगी। नियामक कंपनियों के रिकॉर्ड का ऑडिट और निरीक्षण कर सकेगा, तिमाही प्रदर्शन रिपोर्टों का विश्लेषण कर सकेगा और उपभोक्ता फीडबैक की समीक्षा कर सकेगा।
शिकायत या अपील के समाधान के बाद सेवा प्रदाता को ऑनलाइन फीडबैक सर्वे करना होगा। इसमें उपभोक्ता की संतुष्टि पांच अंकों के पैमाने पर मापी जाएगी — पूरी तरह संतुष्ट से लेकर पूरी तरह असंतुष्ट तक। इन सर्वेक्षणों के परिणाम कंपनी की वेबसाइट पर तिमाही आधार पर प्रकाशित करने होंगे। साथ ही, शिकायत और अपील निवारण से जुड़ी तिमाही रिपोर्टें और फीडबैक परिणाम कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी या निदेशक मंडल के सामने भी रखे जाएंगे। यानी शिकायतों की स्थिति अब सिर्फ कस्टमर केयर तक सीमित नहीं रहेगी, वह कंपनी के शीर्ष स्तर तक पहुंचेगी।
किन कंपनियों पर लागू होंगे ये नियम
नए नियम मोबाइल और लैंडलाइन जैसी एक्सेस सेवाएं देने वाली कंपनियों और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं पर लागू होंगे। इंटरनेट सेवा प्रदाताओं के लिए शर्त यह है कि पिछले वित्तीय वर्ष के अंत में उनके ग्राहकों की संख्या 10,000 से अधिक हो। पहले ग्राहक संख्या के अलावा वार्षिक कारोबार 5 करोड़ रुपये से अधिक होने का वैकल्पिक मापदंड भी था, जिसे अब हटा दिया गया है। इससे नियमों का दायरा साफ हो गया है — छोटी-सीमा से ऊपर के सभी बड़े प्रदाता इसके दायरे में आएंगे।
मध्य प्रदेश के उपभोक्ताओं के लिए भी ये नियम उसी तरह लागू होंगे जैसे देश के बाकी हिस्सों में। राज्य में काम करने वाली बड़ी टेलीकॉम कंपनियां और 10,000 से अधिक ग्राहकों वाले इंटरनेट प्रदाता सभी इस व्यवस्था के दायरे में आएंगे। त्योहारों के समय जब मोबाइल और इंटरनेट का उपयोग बढ़ जाता है, तब शिकायतों के तेजी से निपटान की जरूरत और भी बढ़ जाती है।
उपभोक्ता के लिए इसका मतलब क्या है — चरण-दर-चरण तरीका
पहला कदम यह है कि शिकायत दर्ज करते समय डॉकेट नंबर जरूर लें और उसे सुरक्षित रखें। यही नंबर आगे अपील और फीडबैक में काम आएगा। दूसरा कदम यह है कि निपटान का अनुमानित समय नोट करें — अगर समय बीत जाए और जवाब न आए, तो देरी की सूचना मांगें। तीसरा कदम यह है कि निपटान से असंतुष्ट होने पर 15 दिन के भीतर अपील दाखिल करें, क्योंकि अब 30 दिन का समय नहीं मिलेगा। चौथा कदम यह है कि समाधान के बाद मिलने वाले फीडबैक सर्वे में अपनी राय ईमानदारी से दर्ज करें, क्योंकि यही सर्वे तिमाही रिपोर्टों में जाएगा और कंपनी के शीर्ष स्तर तक पहुंचेगा।
साथ ही, उपभोक्ताओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शिकायत दर्ज करते समय अपने बिल, संदेश, स्क्रीनशॉट और बातचीत का रिकॉर्ड सुरक्षित रखें। नियम व्यवस्था को मजबूत करते हैं, लेकिन सबूत की जिम्मेदारी अंततः उपभोक्ता की ही रहती है।
कब से लागू होंगे नियम, और क्या अभी तुरंत नहीं बदलेगा
नए नियम 2 नवंबर 2026 को जारी हुए हैं, लेकिन इनके सभी प्रावधान एक ही दिन से लागू नहीं होंगे। अलग-अलग प्रावधानों के लिए राजपत्र में प्रकाशन के बाद 30, 60 या 90 दिन की अवधि तय की गई है। शिकायत केंद्र, इंटरैक्टिव वॉयस व्यवस्था और डिजिटल माध्यमों से जुड़ी व्यवस्थाओं का पूर्ण क्रियान्वयन 90 दिन के भीतर होना है। यानी उपभोक्ता को अगले कुछ हफ्तों में धीरे-धीरे बदलाव दिखेगा, एक रात में सब कुछ नहीं बदलेगा।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि चौबीस घंटे की सुविधा और 15 दिन की अपील व्यवस्था का पूरा लाभ चरणबद्ध तरीके से मिलेगा। अगर किसी कंपनी की व्यवस्था में अभी पुरानी समय-सीमा दिख रही है, तो वह संक्रमण अवधि का हिस्सा हो सकती है। लेकिन नियमों के जारी होने के बाद कंपनियों पर इन्हें लागू करने की जिम्मेदारी तय हो चुकी है।
उद्योग की चिंता और संतुलन
रिपोर्टों के अनुसार, दूरसंचार कंपनियों के संगठन ने वित्तीय दंड और चौबीस घंटे की व्यवस्था को लेकर चिंता जताई थी और लागत तथा तकनीकी कठिनाइयों का हवाला देते हुए इन प्रावधानों को हटाने की मांग की थी। नियामक ने इन चिंताओं के बावजूद नियमों को जारी किया है, लेकिन इंसानी सहायता की न्यूनतम सीमा 16 घंटे रखकर और तकनीक आधारित व्यवस्था को इंसानी निगरानी में चलाने की छूट देकर एक संतुलन भी बनाया है। यानी उपभोक्ता को हर समय मदद मिले, लेकिन कंपनी पर हर घंटे इंसानी कर्मचारी बैठाने का बोझ न पड़े।
इस संतुलन की असली परीक्षा आने वाले महीनों में होगी — जब शिकायत केंद्रों की नई व्यवस्था जमीन पर उतरेगी, अपीलों की नई समय-सीमा लागू होगी और पहली तिमाही रिपोर्टें सामने आएंगी। तभी पता चलेगा कि नियम कागज से आगे बढ़कर उपभोक्ता के अनुभव में कितना बदलाव लाते हैं।
आगे क्या देखें
उपभोक्ताओं को अब यह देखना चाहिए कि उनकी कंपनी के ऐप और वेबसाइट में शिकायत तथा अपील के विकल्प कैसे बदलते हैं, शिकायत केंद्रों के समय में क्या बदलाव आता है, और अपील के फैसले कितने दिन में मिलने लगते हैं। अगर कोई कंपनी नई समय-सीमा का पालन नहीं करती है, तो उपभोक्ता के पास डॉकेट नंबर, तारीख और लिखित रिकॉर्ड के आधार पर अपनी बात रखने का मजबूत आधार होगा। नियमों का उद्देश्य यही है — शिकायत को एक अनुरोध से बदलकर एक जवाबदेह प्रक्रिया बनाना।
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