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इंदौर में RSS कार्यकारी मंडल: सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी का वक्तव्य, राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत राजनारायण बसु की द्विशताब्दी पर नमन

राजनारायण बसु का चित्र

इंदौर ब्यूरो

सार: इंदौर में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक के दौरान सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत राजनारायण बसु की द्विशताब्दी के अवसर पर वक्तव्य जारी कर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया और कहा कि उनके विचार और दर्शन आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

इंदौर में 2 से 4 नवंबर तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक चल रही है। बैठक के दौरान सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने राजनारायण बसु के जन्म की द्विशताब्दी के आलोक में एक वक्तव्य जारी किया। वक्तव्य में बसु को राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत, महान देशभक्त, समाज सुधारक और दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी के रूप में स्मरण किया गया है।

वक्तव्य में क्या कहा गया

वक्तव्य में कहा गया है कि भारत का स्वाधीनता संग्राम भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। ब्रिटिश आक्रमण जैसा सर्वंकष था, वैसा ही समग्र हमारा उत्तर था। ब्रिटिशों के आक्रमण के कारण शिक्षित समाज अपने मूल से कटकर आत्मविस्मृति का शिकार होकर आत्मगौरव से शून्य हो रहा था। उस समय अनेक महापुरुषों ने राष्ट्रीय चेतना जगाने और राष्ट्र के स्वरूप की सुस्पष्ट कल्पना के लिए प्रभावी प्रयास किए, और उनमें राजनारायण बसु का नाम अग्रणी है।

वक्तव्य के अनुसार, बसु ने शिक्षित वर्ग में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने और उनमें आत्मगौरव तथा आत्मविश्वास का भाव विकसित करने के लिए अनथक प्रयास किए। उनका मानना था कि इन गुणों के बिना किसी भी राष्ट्र का उत्थान संभव नहीं है। वक्तव्य का समापन इस भाव के साथ होता है कि राष्ट्र उनके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेगा।

कौन थे राजनारायण बसु

सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी

राजनारायण बसु का जन्म 7 दिसंबर 1826 को बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बोराल गांव में हुआ था। उनका द्विशताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने संस्कृत विद्यालय में अध्यापन कार्य किया और अपने जीवन को सामाजिक सुधार के कार्य के लिए समर्पित कर दिया।

समाज सुधार के क्षेत्र में उनके प्रयास विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे। उन्होंने निर्धनों के उत्थान, नशा मुक्ति, महिलाओं में शिक्षा के प्रसार और विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए विशेष प्रयास किए। इस दृष्टि से उन्होंने अपने भाई का विवाह एक विधवा से कराकर समाज के समक्ष एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। उनका यह कदम उस समय के समाज में एक साहसिक और प्रेरक पहल के रूप में देखा गया, क्योंकि विधवा पुनर्विवाह को लेकर समाज में गहरी रूढ़ियां मौजूद थीं।

राष्ट्रीय भाव का संवर्धन और हिंदू मेला

अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए राजनारायण बसु ने राष्ट्रीय भाव के संवर्धन हेतु एक संस्था की रचना का प्रारूप तैयार किया, जिसे ‘Prospectus of a Society for Promotion of National Feeling’ के नाम से जाना जाता है। उनके निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप नवगोपाल मित्र द्वारा 1867 से प्रारंभ किया गया हिंदू मेला राष्ट्रीय भाव के पोषण और संवर्धन का एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा।

राजनारायण बसु ने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का प्रबल समर्थन किया और हिंदू मेले के माध्यम से स्वदेशी भाव को आगे बढ़ाया। स्वदेशी का यह आग्रह केवल वस्तुओं के उपयोग तक सीमित नहीं था, बल्कि यह आत्मगौरव और आत्मनिर्भरता की भावना से जुड़ा हुआ था। हिंदू मेला उस दौर में राष्ट्रीय भावना को एक सार्वजनिक और सांस्कृतिक मंच देने का माध्यम बना, जहां स्वदेशी, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के विचारों को बल मिला।

मातृभाषा, हिंदू धर्म और महा हिंदू समिति की परिकल्पना

राजनारायण बसु मातृभाषा के प्रयोग के महत्व पर सदैव बल देते थे। उनका मानना था कि मातृभाषा आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना की महत्वपूर्ण आधारशिला है। वे हिंदू धर्म को भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता का आधार मानते थे।

1873 में उन्होंने ‘हिंदू धर्म की श्रेष्ठता’ (The Superiority of Hinduism) नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें उन्होंने हिंदू संस्कृति के दार्शनिक सामर्थ्य और विशिष्टताओं को अभिव्यक्त किया। भारत की राष्ट्रीय चेतना के पितामह के रूप में विख्यात राजनारायण बसु ने महा हिंदू समिति की परिकल्पना सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय जागरण के एक आधारभूत माध्यम के रूप में की थी। उन्होंने इस योजना का उल्लेख 1880 के दशक में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका ‘वृद्ध हिन्दूर आशा’ (The Old Hindu’s Hope) में किया था।

अरविन्द और पुनर्जागरण के नायकों पर प्रभाव

राजनारायण बसु महर्षि अरविन्द के नाना थे। उनके विचारों और राष्ट्रवादी दृष्टि ने युवा अरविन्द को गहरे रूप से प्रभावित किया था। इस प्रकार बसु की राष्ट्रवादी दृष्टि अगली पीढ़ी के एक महान चिंतक और स्वतंत्रता सेनानी के निर्माण में भी परिलक्षित होती है।

राष्ट्रीय पुनर्जागरण और स्वतंत्रता आंदोलन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, स्वामी विवेकानंद और भगिनी निवेदिता सहित अनेक नायक उनके प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव रखकर प्रेरणा प्राप्त करते थे। यह तथ्य बसु के व्यक्तित्व और विचारों के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है कि उनके समकालीन और परवर्ती पीढ़ी के अनेक प्रमुख व्यक्तित्व उनसे प्रेरणा लेते थे।

आज की प्रासंगिकता और बैठक की पृष्ठभूमि

वक्तव्य में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि राजनारायण बसु द्वारा प्रस्तुत विचार और दर्शन आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। वे हमें आत्मगौरव, सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव और राष्ट्रीय एकता के शाश्वत महत्व का स्मरण कराते हैं। आत्मगौरव और आत्मविश्वास के बिना किसी राष्ट्र के उत्थान की कल्पना नहीं की जा सकती, यह संदेश बसु के जीवन और कार्य का केंद्रीय सूत्र रहा है।

इंदौर में चल रही अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक संघ की सर्वोच्च नीति-निर्धारक बैठकों में से एक मानी जाती है। इसमें शताब्दी वर्ष की समीक्षा और भविष्य की कार्ययोजना पर मंथन हो रहा है। इसी बैठक के दौरान महापुरुषों पर वक्तव्य जारी करने की श्रृंखला में राजनारायण बसु पर यह वक्तव्य जारी किया गया है। राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत की 200वीं जयंती के अवसर पर जारी इस वक्तव्य के माध्यम से उनके योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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