डेस्क रिपोर्ट
सार: दीपावली से ठीक पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी, जिसे छोटी दिवाली और रूप चौदस भी कहा जाता है, इस बार तिथि के कारण दो दिनों में बंटी हुई है — चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर की सुबह शुरू होकर 8 नवंबर की सुबह तक रहेगी, रात की पूजा 7 नवंबर को होगी और अभ्यंग स्नान 8 नवंबर की सुबह सूर्योदय से पहले किया जाएगा।
दीपोत्सव का पर्व पांच दिनों तक चलता है, लेकिन उसकी असली शुरुआत की आहट छोटी दिवाली से ही सुनाई देने लगती है। घरों की सफाई पूरी हो चुकी होती है, बाजारों में दीयों और मिठाइयों की रौनक बढ़ जाती है और शाम ढलते ही पहला दीपक जल उठता है। नरक चतुर्दशी का पर्व इसी आहट का नाम है। इसे छोटी दिवाली, रूप चौदस, रूप चतुर्दशी और कई क्षेत्रों में काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की जीत, बुराई पर अच्छाई की जीत और शरीर तथा मन की शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
इस बार दो दिन में बंटा पर्व: तिथि का पूरा गणित
इस साल नरक चतुर्दशी की तिथि को लेकर लोगों के मन में थोड़ा असमंजस है, और इसका कारण पंचांग की गणना है। चतुर्दशी तिथि 7 नवंबर 2026, शनिवार को सुबह 10 बजकर 47 मिनट पर शुरू होगी और 8 नवंबर 2026, रविवार को सुबह 11 बजकर 27 मिनट पर समाप्त होगी। यानी तिथि दो कैलेंडर दिनों में फैली हुई है। इसी कारण इस पर्व से जुड़े अलग-अलग अनुष्ठान अलग-अलग समय पर किए जाएंगे।
रात में की जाने वाली पूजा — जिसमें काली पूजा और हनुमान पूजा शामिल है — 7 नवंबर की रात को होगी, क्योंकि उस रात चतुर्दशी तिथि व्याप्त रहेगी। वहीं अभ्यंग स्नान, जो सूर्योदय से पहले किया जाता है, 8 नवंबर की सुबह होगा, क्योंकि 8 नवंबर की सुबह सूर्योदय के समय चतुर्दशी तिथि मौजूद रहेगी। उदयातिथि के नियम से भी यही निष्कर्ष निकलता है। यही कारण है कि इस साल छोटी दिवाली की शाम की परंपराएं 7 नवंबर को और सुबह का अभ्यंग स्नान 8 नवंबर को पड़ रहा है। खास बात यह भी है कि 8 नवंबर की शाम को ही बड़ी दिवाली, यानी लक्ष्मी पूजा भी है, क्योंकि उस शाम अमावस्या तिथि रहेगी। इस तरह इस साल छोटी दिवाली की सुबह और बड़ी दिवाली की शाम एक ही दिन पड़ रही है, जो पंचांग की दृष्टि से एक दुर्लभ संयोग है।
स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है, इसलिए अपने शहर के पंचांग से समय की पुष्टि कर लेना हमेशा अच्छा रहता है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार अभ्यंग स्नान का मुहूर्त 8 नवंबर की सुबह 5 बजकर 41 मिनट से 6 बजकर 38 मिनट तक रहेगा।
पंचांग के अनुसार तिथि और मुहूर्त का विवरण भी देखें।
नरकासुर वध की कथा: अंधकार पर प्रकाश की जीत
नरक चतुर्दशी की सबसे प्रसिद्ध कथा नरकासुर के वध से जुड़ी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार नरकासुर नाम का एक अत्याचारी असुर था, जिसने देवताओं और ऋषियों को बहुत परेशान किया और हजारों राजकुमारियों को बंदी बना लिया था। उसके अत्याचार से त्रस्त होकर देवताओं ने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की। मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ मिलकर कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध किया और बंदी बनाई गई सभी स्त्रियों को मुक्त कराया।
कहा जाता है कि नरकासुर ने मरते समय वरदान मांगा था कि इस दिन जो व्यक्ति सूर्योदय से पहले स्नान करे, उसे नरक का भय न रहे। इसी वरदान के कारण इस दिन का नाम नरक चतुर्दशी पड़ा और सुबह के स्नान को इतना महत्व मिला। नरकासुर के वध के बाद द्वारका में उत्सव मनाया गया था, और उसी उत्सव की स्मृति में दीपक जलाने की परंपरा शुरू हुई। इस तरह नरक चतुर्दशी का पर्व केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है, बल्कि यह अन्याय और अत्याचार के अंत तथा मुक्ति के उल्लास का पर्व है।
एक अन्य कथा राजा रंतिदेव से भी जुड़ी बताई जाती है, जिनके जीवन में एक भूखे ब्राह्मण को द्वार से लौटाने के कारण नरक का भय बना था और जिन्हें एक वर्ष का अतिरिक्त समय मिलने पर दान-पुण्य से मुक्ति मिली थी। ये कथाएं अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में मिलती हैं, लेकिन इनका साझा संदेश एक ही है — दान, करुणा और शुद्ध आचरण ही मनुष्य को भय से मुक्त करते हैं।

अभ्यंग स्नान: विधि और महत्व
नरक चतुर्दशी की सबसे विशिष्ट परंपरा अभ्यंग स्नान है। अभ्यंग का अर्थ है पूरे शरीर पर तेल की मालिश। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर तिल के तेल से मालिश की जाती है और फिर उबटन लगाकर स्नान किया जाता है। उबटन पारंपरिक रूप से बेसन, हल्दी, चंदन, तिल और गुलाब जल से बनाया जाता है। मान्यता है कि इस स्नान से शरीर की शुद्धि होती है, पापों से मुक्ति मिलती है और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
अभ्यंग स्नान की विधि सरल है। सबसे पहले सुबह सूर्योदय से पहले उठकर देवताओं का ध्यान किया जाता है। फिर तिल के तेल से पूरे शरीर की हल्की मालिश की जाती है। इसके बाद उबटन लगाया जाता है और कुछ देर बाद गुनगुने पानी से स्नान किया जाता है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सूर्योदय के बाद किया गया अभ्यंग स्नान अपना विशेष फल नहीं देता, इसलिए समय का ध्यान रखना जरूरी माना जाता है।
इस स्नान का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं है। बदलते मौसम में तेल मालिश और उबटन से त्वचा की देखभाल होती है, शरीर में गर्माहट आती है और सर्दी की शुरुआत से पहले शरीर तैयार होता है। यही कारण है कि यह परंपरा सदियों से घर-घर में निभाई जाती रही है।
रूप चौदस: सौंदर्य और आरोग्य का दिन
उत्तर भारत और राजस्थान में नरक चतुर्दशी को रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन उबटन लगाकर स्नान करने से रूप और सौंदर्य बढ़ता है। इसी कारण इस दिन को सौंदर्य का दिन भी कहा जाता है। घरों में महिलाएं विशेष रूप से उबटन तैयार करती हैं और पूरे परिवार के लिए स्नान की तैयारी करती हैं।
रूप चौदस की परंपरा में शरीर की देखभाल के साथ-साथ मन की प्रसन्नता का भी महत्व है। साफ-सुथरे घर, सजे हुए द्वार और शाम को जलते दीपक मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिसमें त्योहार की खुशी दोगुनी हो जाती है। कई परिवारों में इस दिन नए वस्त्र पहनने और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देने की परंपरा भी है।
यम दीपदान और काली चौदस: शाम की पूजा
नरक चतुर्दशी की शाम को यमराज के नाम एक दीपक जलाने की परंपरा है, जिसे यम दीपदान कहा जाता है। मान्यता है कि इस दीपक से परिवार पर अकाल मृत्यु का संकट नहीं आता और घर में सुख-शांति बनी रहती है। यम का दीपक शाम को सूर्यास्त के बाद घर के मुख्य द्वार के बाहर या दक्षिण दिशा में जलाया जाता है। कई परंपराओं में चौमुखी दीपक जलाने का विधान बताया जाता है।
इसी रात को काली चौदस भी मनाई जाती है। गुजरात और पश्चिम भारत में इस रात को मां महाकाली की विशेष पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां काली की उपासना से नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव दूर होता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है। इस रात हनुमान पूजा की भी परंपरा है — दक्षिण भारत की मान्यता के अनुसार इसी तिथि से हनुमान जयंती भी जुड़ी हुई है, इसलिए हनुमान जी की पूजा से संकट टलने और निर्भयता मिलने की मान्यता है।
इस तरह नरक चतुर्दशी की रात एक ही तिथि में कई देवताओं की उपासना समेटे हुए है — कृष्ण, मां काली, हनुमान जी और यमराज। यही इस पर्व की विशेषता है कि यह भय से मुक्ति, शक्ति की उपासना और प्रकाश के उत्सव को एक साथ जोड़ता है।
इस साल की खास बात: छोटी और बड़ी दिवाली का दुर्लभ संयोग
इस साल का दीपोत्सव कैलेंडर कुछ अलग है। धनतेरस 6 नवंबर को, नरक चतुर्दशी की रात की पूजा 7 नवंबर को, अभ्यंग स्नान 8 नवंबर की सुबह और उसी दिन शाम को लक्ष्मी पूजा के साथ बड़ी दिवाली मनाई जाएगी। इसके बाद गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को और भैया दूज 11 नवंबर को पड़ेगी। यानी पांच दिनों का दीपोत्सव इस बार तिथियों के कारण थोड़ा सिमटकर और भी खास हो गया है।
इस संयोग के कारण 8 नवंबर का दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। सुबह अभ्यंग स्नान से दिन की शुरुआत होगी और शाम को लक्ष्मी-गणेश की पूजा के साथ दीपावली का मुख्य उत्सव मनाया जाएगा। परिवारों के लिए यह दिन सुबह से रात तक त्योहार के रंग में रंगा रहेगा।
घर में कैसे मनाएं: सरल क्रम
नरक चतुर्दशी को घर में मनाने का क्रम सरल है। सुबह सूर्योदय से पहले उठकर अभ्यंग स्नान करें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान कृष्ण और अपने कुलदेवता की पूजा करें। दिन में घर की सफाई और सजावट को अंतिम रूप दें। शाम को घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाएं और यमराज के नाम एक दीपक दक्षिण दिशा में रखें। रात को मां काली और हनुमान जी की पूजा अपनी परंपरा के अनुसार करें।
बच्चों को इस पर्व की कथा सुनाना भी एक अच्छी परंपरा है। नरकासुर वध की कथा बच्चों को यह सिखाती है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अच्छाई की जीत निश्चित है। यही संदेश दीपावली के पूरे पर्व की आत्मा है।
क्या ध्यान रखें: स्थानीय पंचांग और सहजता
त्योहार मनाते समय दो बातों का ध्यान रखना अच्छा रहता है। पहली, मुहूर्त और तिथि के समय में शहर के अनुसार कुछ मिनट का अंतर हो सकता है, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग से पुष्टि कर लें। दूसरी, त्योहार का असली अर्थ सहजता और प्रसन्नता में है — पूजा और परंपराएं अपनी श्रद्धा के अनुसार, बिना किसी दबाव के निभाई जाएं तो ही उनका आनंद है।
नरक चतुर्दशी हमें यह याद दिलाती है कि प्रकाश का पर्व केवल दीपक जलाने का नाम नहीं है। यह शरीर की शुद्धि, मन की निर्मलता और दूसरों के प्रति करुणा का पर्व है। छोटी दिवाली की सुबह का स्नान और शाम का दीपक, दोनों मिलकर यही संदेश देते हैं — अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, एक दीपक उसे दूर करने के लिए काफी है।
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