डेस्क रिपोर्ट
सार: छठ महापर्व की व्रत कथा के बिना यह पर्व अधूरा माना जाता है। मान्यता के अनुसार, संतानहीन राजा प्रियव्रत को षष्ठी देवी के दर्शन हुए और उन्हीं के वरदान से छठ पूजा की परंपरा शुरू हुई। इस कथा के साथ द्रौपदी, कर्ण और राम-सीता से जुड़े प्रसंग भी सुनाए जाते हैं। वर्ष 2026 में छठ महापर्व 13 नवंबर को नहाय-खाय से शुरू होकर 16 नवंबर को उषा अर्घ्य के साथ पूरा होगा।
छठ को लोक आस्था का महापर्व कहा जाता है। यह चार दिनों तक चलने वाला कठिन व्रत है, जिसमें सूर्य देव और छठी मैया की आराधना की जाती है। इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें डूबते सूर्य को भी अर्घ्य दिया जाता है और उगते सूर्य को भी। व्रत रखने वाले लोग इस दौरान शुद्धता, संयम और अनुशासन का कड़ाई से पालन करते हैं। घाटों पर जब लोकगीत गूंजते हैं और व्रती कमर तक जल में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं, तब यह पर्व केवल एक पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव बन जाता है।
इस महापर्व से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे मुख्य और सबसे अधिक सुनाई जाने वाली कथा राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी की है। कहा जाता है कि छठ के दिन इसी कथा को सुनना चाहिए। इसके अलावा महाभारत काल की द्रौपदी की कथा, सूर्यपुत्र कर्ण का प्रसंग और रामायण काल से जुड़ी परंपरा भी इस पर्व के साथ जोड़ी जाती है। ये सभी कथाएं मान्यताओं पर आधारित हैं और इन्हें आस्था के रूप में सुनाया जाता है, किसी ऐतिहासिक दावे के रूप में नहीं।
छठी मैया कौन हैं
मान्यता के अनुसार, छठी मैया को षष्ठी देवी कहा जाता है। कथा के अनुसार, वे सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसलिए उनका नाम षष्ठी पड़ा। उन्हें बच्चों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। यही कारण है कि बच्चे के जन्म के छठे दिन भी छठी देवी की पूजा की परंपरा रही है, ताकि बच्चे को अच्छा स्वास्थ्य और लंबी आयु का आशीर्वाद मिले।
छठ पर्व में सूर्य देव के साथ-साथ छठी मैया की पूजा का विशेष विधान है। मान्यता यह भी है कि छठी मैया सूर्य देव की बहन हैं। इसलिए सूर्य को अर्घ्य देकर छठी मैया को प्रसन्न किया जाता है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों से शुरू हुआ यह पर्व आज देश के कई हिस्सों और विदेशों में भी मनाया जाने लगा है। मध्य प्रदेश के शहरों में भी छठ के अवसर पर घाटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।
संतानहीन राजा प्रियव्रत की पीड़ा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। राजा के पास राजपाट, वैभव और प्रजा का प्रेम सब कुछ था, लेकिन लंबे समय तक उन्हें कोई संतान नहीं हुई। संतान न होने का दुख राजा और रानी दोनों के मन में गहरा बैठ गया था। कथा के अनुसार, वे इस दुख से बहुत व्याकुल रहते थे और संतान प्राप्ति के लिए तरह-तरह के उपाय करते थे।
आखिरकार संतान की कामना से राजा प्रियव्रत ने महर्षि कश्यप से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ संपन्न होने के बाद महर्षि ने रानी मालिनी को यज्ञ की आहुति के लिए बनाई गई खीर प्रसाद के रूप में दी। कथा के अनुसार, खीर ग्रहण करने के प्रभाव से रानी गर्भवती हुईं। पूरे राज्य में इस समाचार से प्रसन्नता छा गई और सभी लोग राजा-रानी को बधाई देने लगे।

पुत्रेष्टि यज्ञ और मृत पुत्र का जन्म
कथा के अनुसार, नौ महीने बाद रानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन दुर्भाग्य से वह पुत्र मृत पैदा हुआ। इस समाचार से पूरे राज्य में शोक छा गया। राजा प्रियव्रत पुत्र के वियोग में अत्यंत दुखी हो गए। कथा के अनुसार, शोक में डूबे राजा अपने पुत्र को लेकर श्मशान पहुंचे और प्राण त्यागने का विचार करने लगे। यह कथा का सबसे मार्मिक मोड़ है, जहां एक पिता की पीड़ा अपने चरम पर पहुंच जाती है।
इसी क्षण कथा में एक दिव्य मोड़ आता है। कहा जाता है कि उसी समय आकाश से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। वे देवी कोई और नहीं, बल्कि ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना थीं, जिन्हें षष्ठी देवी या छठी मैया के नाम से जाना जाता है। देवी के प्रकट होते ही वातावरण में एक अलग तरह की शांति छा गई और राजा का ध्यान उनकी ओर गया।
षष्ठी देवी का प्रकट होना और वरदान
कथा के अनुसार, देवी षष्ठी ने राजा प्रियव्रत से कहा कि वे सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसलिए उन्हें षष्ठी कहा जाता है। उन्होंने राजा से कहा कि वे निसंतान को संतान का वरदान देती हैं और बच्चों की रक्षा करती हैं। जो भी व्यक्ति सच्चे मन से उनकी पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। देवी ने राजा को अपनी पूजा करने और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करने को कहा।
कथा के अनुसार, देवी षष्ठी के स्पर्श से मृत बालक जीवित हो उठा। यह चमत्कार देखकर राजा प्रियव्रत अत्यंत प्रसन्न हुए। इसके बाद देवी के आदेश के अनुसार, राजा ने कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को पूरे विधि-विधान से देवी षष्ठी की पूजा करवाई। मान्यता के अनुसार, इस पूजा के फलस्वरूप राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और तभी से छठ पूजा करने की परंपरा शुरू हुई।
इस कथा का संदेश यह है कि सच्ची भक्ति और धैर्य से मनोकामना पूरी होती है। यही कारण है कि छठ व्रत करने वाली महिलाएं और पुरुष इस कथा को बड़े ध्यान से सुनते हैं। माना जाता है कि जो व्यक्ति छठ पर्व की विधिवत पूजा के साथ व्रत रखता है, उस पर छठी मैया की कृपा बनी रहती है और उसकी संतान को लंबी आयु तथा अच्छा स्वास्थ्य मिलता है।
कार्तिक शुक्ल षष्ठी को पहला छठ व्रत
कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को देवी षष्ठी का व्रत किया था। इसी तिथि के कारण इस पर्व को छठ कहा जाता है, क्योंकि षष्ठी का ही अपभ्रंश छठ है। दीपावली के छह दिन बाद आने वाली इस तिथि को ही छठ महापर्व मनाया जाता है। इस दिन व्रती डूबते सूर्य को संध्या अर्घ्य देते हैं और अगले दिन उगते सूर्य को उषा अर्घ्य देकर व्रत का पारण करते हैं।
छठ का व्रत अत्यंत कठिन माना जाता है। खरना के बाद से व्रती लगभग 36 घंटे तक निर्जला उपवास रखते हैं। इस दौरान वे अन्न और जल दोनों का त्याग करते हैं। यही कारण है कि इसे महाव्रत भी कहा जाता है। व्रत के दौरान शुद्धता का इतना ध्यान रखा जाता है कि प्रसाद बनाने से लेकर पूजा की सामग्री तक, हर चीज को विशेष नियमों के अनुसार तैयार किया जाता है। गेहूं, गुड़ और घी से बना ठेकुआ इस पर्व का सबसे प्रसिद्ध प्रसाद है।
द्रौपदी की कथा: राजपाट की वापसी की मान्यता
छठ से जुड़ी दूसरी प्रसिद्ध कथा महाभारत काल की है। मान्यता के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए थे, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। कथा के अनुसार, द्रौपदी के व्रत से प्रसन्न होकर षष्ठी देवी ने पांडवों को उनका राजपाट वापस दिला दिया। इस कथा को सुनाते समय यह बात भी कही जाती है कि कठिन समय में धैर्य और भक्ति से ही संकट दूर होता है।
द्रौपदी की कथा छठ व्रत की महिमा को एक और आयाम देती है। जहां प्रियव्रत की कथा संतान प्राप्ति से जुड़ी है, वहीं द्रौपदी की कथा खोए हुए सम्मान और अधिकार की वापसी से जुड़ी है। इसलिए छठ व्रत को केवल संतान की कामना तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे हर तरह की मनोकामना की पूर्ति का व्रत भी माना जाता है। व्रती अपनी-अपनी कामनाओं के साथ इस कठिन व्रत को पूरा करते हैं।
कर्ण और राम-सीता से जुड़े प्रसंग
छठ की परंपरा को महाभारत काल के सूर्यपुत्र कर्ण से भी जोड़ा जाता है। मान्यता के अनुसार, कर्ण सूर्य देव के परम भक्त थे और घंटों तक जल में खड़े होकर सूर्य की उपासना करते थे। कहा जाता है कि कर्ण ने ही सबसे पहले सूर्य देव की इस तरह की पूजा शुरू की थी। कर्ण की सूर्य भक्ति को छठ पर्व की परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
रामायण काल से जुड़ी मान्यता के अनुसार, त्रेता युग में अयोध्या लौटने के बाद राम और सीता ने सूर्य देव की उपासना की थी। कुछ कथाओं में यह भी कहा जाता है कि ऋषि मुग्दल के कहने पर राम और सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य की आराधना की थी। इन प्रसंगों को आस्था के रूप में सुनाया जाता है और ये छठ पर्व की प्राचीनता को दर्शाते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इन कथाओं के रूप में थोड़ा अंतर भी मिल सकता है, लेकिन सूर्य उपासना का मूल भाव सब में एक जैसा है।
कथा कब सुनते हैं और व्रत का कठिन अनुशासन
छठ व्रत के दौरान कथा सुनने की परंपरा विशेष रूप से संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के समय निभाई जाती है। रात भर जागरण होता है, जिसमें छठी मैया के गीत गाए जाते हैं और कथा सुनाई जाती है। परिवार के लोग एक साथ बैठकर कथा सुनते हैं। माना जाता है कि कथा सुने बिना छठ व्रत पूरा नहीं माना जाता। इसलिए कथा को व्रत का अभिन्न हिस्सा माना गया है।
व्रत के चारों दिन के अपने अलग नियम हैं। पहले दिन नहाय-खाय में व्रती स्नान करके सात्विक भोजन करते हैं। दूसरे दिन खरना में दिन भर का उपवास रखकर रात में गुड़ की खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। तीसरे दिन संध्या अर्घ्य में डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और चौथे दिन उषा अर्घ्य में उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है। इस पूरे क्रम में शुद्धता, संयम और प्रकृति के प्रति सम्मान सबसे ऊपर रखा जाता है।
छठ महापर्व 2026 की तारीखें और अर्घ्य का समय
वर्ष 2026 में छठ महापर्व 13 नवंबर से शुरू होकर 16 नवंबर तक चलेगा। पहले दिन 13 नवंबर, शुक्रवार को नहाय-खाय होगा। दूसरे दिन 14 नवंबर, शनिवार को खरना मनाया जाएगा। तीसरे दिन 15 नवंबर, रविवार को संध्या अर्घ्य दिया जाएगा, जो इस पर्व का मुख्य दिन है। चौथे दिन 16 नवंबर, सोमवार को उषा अर्घ्य के साथ व्रत का पारण होगा। इस वर्ष संध्या अर्घ्य रविवार को पड़ रहा है, जिसे सूर्य देव का दिन माना जाता है और इसलिए इसे विशेष संयोग के रूप में भी देखा जा रहा है।
अर्घ्य का समय स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त के अनुसार तय होता है, इसलिए हर शहर का समय कुछ मिनट अलग हो सकता है। दिल्ली के पंचांग के अनुसार, 15 नवंबर को संध्या अर्घ्य के समय सूर्यास्त लगभग शाम 5 बजकर 28 मिनट पर होगा और 16 नवंबर को उषा अर्घ्य के समय सूर्योदय लगभग सुबह 6 बजकर 44 मिनट पर होगा। अपने शहर के लिए सही समय अपने स्थानीय पंचांग से अवश्य जांच लें, क्योंकि पटना जैसे शहरों में सूर्यास्त का समय दिल्ली से पहले हो सकता है। पंचांग के अनुसार, 15 नवंबर को सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है।
कथा का संदेश: प्रकृति, शुद्धता और समानता
छठ की कथा केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक संदेश भी है। यह पर्व सिखाता है कि प्रकृति के बिना जीवन संभव नहीं है और सूर्य, जल तथा अन्न के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना चाहिए। व्रत के दौरान अपनाया जाने वाला अनुशासन, शुद्धता और संयम रोजमर्रा की जिंदगी में भी स्वस्थ आदतों की ओर ले जाता है। यही कारण है कि इस पर्व को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन और प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देने वाला पर्व भी कहा जाता है।
छठ की एक और विशेषता यह है कि इसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं होता। घाट पर सभी लोग एक साथ खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। अमीर-गरीब, छोटे-बड़े का भेद इस पर्व में मिट जाता है। यही समानता का भाव छठ को लोक आस्था का महापर्व बनाता है। कथा सुनने के बाद व्रती प्रसाद बांटते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। इस तरह यह पर्व परिवार, समाज और प्रकृति को एक धागे में पिरो देता है।
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