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जैसलमेर में रक्षा आधुनिकीकरण पर बड़ी बैठक: 2029 तक 3 लाख करोड़ का रक्षा उत्पादन और 50 हजार करोड़ के निर्यात का लक्ष्य

सांकेतिक चित्र: रेगिस्तानी हवाई अड्डे पर लड़ाकू विमान सांकेतिक चित्र

जैसलमेर ब्यूरो

सार: जैसलमेर में रक्षा मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति की बैठक में देश की सैन्य आधुनिकीकरण की दिशा तय की गई। बैठक में 2029 तक रक्षा उत्पादन को 3 लाख करोड़ रुपये और रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि रणनीतिक स्वायत्तता और स्वदेशी तकनीकी क्षमता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।

राजस्थान के जैसलमेर में 3 नवंबर 2026 को रक्षा मंत्रालय की सलाहकार समिति की बैठक हुई। इस बैठक का विषय भारतीय सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण था। बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। बैठक में उभरती सुरक्षा चुनौतियों, युद्ध के बदलते स्वरूप, तकनीकी प्रगति और भविष्य के लिए तैयार, तकनीकी रूप से सक्षम तथा संचालन में लचीली सेना बनाने की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा हुई।

बैठक में यह बात साफ तौर पर सामने आई कि आधुनिकीकरण केवल नए हथियार खरीदने तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है सेना की तैयारी को बेहतर बनाना, नई तकनीक को अपनाना और लंबे समय तक चलने वाली स्वदेशी क्षमता विकसित करना। चर्चा का जोर इस बात पर रहा कि इरादा जमीन पर परिणाम में बदले और इसके लिए स्पष्ट प्राथमिकताएं, संस्थागत व्यवस्था और मापने योग्य लक्ष्य तय हों।

बैठक में क्या-क्या हुआ

बैठक में कई अहम बिंदुओं पर विचार हुआ। पहला बिंदु क्षमता विकास और बल आधुनिकीकरण का था, जिसके तहत अगली पीढ़ी के प्लेटफॉर्म, हथियार प्रणालियों और तकनीकों को तेजी से सेना में शामिल करने पर जोर दिया गया। दूसरा बिंदु तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और एकीकरण का था, ताकि संयुक्त संचालन योजना और कई क्षेत्रों में क्षमताओं का समन्वित उपयोग हो सके।

तीसरा बिंदु स्वदेशी रक्षा निर्माण का था। इसमें मेक-इन-इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को और गति देने की बात हुई, जिसमें स्वदेशी शोध, डिजाइन, विकास और निर्माण के साथ घरेलू उद्योग, स्टार्टअप और शिक्षण संस्थानों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया। चौथा बिंदु उभरती और विघटनकारी तकनीकों का था, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त प्रणालियां, मानवरहित प्लेटफॉर्म, साइबर, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और उन्नत संचार को भविष्य के संघर्षों के स्वरूप के लिए तैयार करने का माध्यम बताया गया।

पांचवां बिंदु रक्षा शोध और नवाचार का था। इसमें सशस्त्र बलों, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, निजी उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच सहयोग मजबूत करने की बात हुई, ताकि नवाचार तेजी से संचालन क्षमता में बदल सके। छठा बिंदु संसाधन अनुकूलन और क्रियान्वयन का था, जिसमें यह तय किया गया कि आधुनिकीकरण की पहलें ठोस संचालन परिणामों में बदलें।

2029 का लक्ष्य: आंकड़े क्या कहते हैं

बैठक में रखे गए लक्ष्यों की पृष्ठभूमि में पिछले एक दशक के आंकड़े अहम हैं। रक्षा उत्पादन 2014-15 में 46,429 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसी तरह रक्षा निर्यात 2014 में 2,000 करोड़ रुपये से कम था, जो अब लगभग 40,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

इन आंकड़ों के सामने 2029 का लक्ष्य रखा गया है: रक्षा उत्पादन 3 लाख करोड़ रुपये और रक्षा निर्यात 50,000 करोड़ रुपये। इसका अर्थ यह है कि उत्पादन को मौजूदा रिकॉर्ड स्तर से भी लगभग दोगुना करना होगा, जबकि निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि की जरूरत होगी। यह लक्ष्य केवल संख्या का लक्ष्य नहीं है, बल्कि इसके पीछे घरेलू उद्योग की क्षमता, तकनीक और निर्यात बाजार में भारत की स्थिति को मजबूत करने की पूरी रणनीति जुड़ी हुई है।

यह भी समझना जरूरी है कि उत्पादन और निर्यात के ये लक्ष्य एक-दूसरे से जुड़े हैं। जब घरेलू उत्पादन बढ़ता है, तो निर्यात की संभावना भी बढ़ती है। और जब निर्यात बढ़ता है, तो उत्पादन को पैमाना मिलता है, लागत घटती है और तकनीक में निवेश की गुंजाइश बढ़ती है। बैठक में इसी चक्र को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

सांकेतिक चित्र: रक्षा निर्माण इकाई में मिसाइल प्रणाली
सांकेतिक चित्र

बजट और पूंजीगत खर्च: कितना पैसा, किस काम में

बैठक में वित्त वर्ष 2026-27 के रक्षा बजट का भी उल्लेख हुआ। इस वर्ष का कुल रक्षा बजट रिकॉर्ड 7.85 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाया गया है। इसमें से 2.19 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत खर्च के लिए रखे गए हैं, जो आधुनिकीकरण और पूंजीगत खरीद के लिए निर्धारित है।

रक्षा मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि केवल पर्याप्त वित्तीय संसाधन होना ही काफी नहीं है। संसाधनों का प्रभावी उपयोग और सेनाओं की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को प्राथमिकता देना भी उतना ही जरूरी है। बजट का आकार बढ़ना एक बात है, और उस पैसे का सही जगह, सही समय पर और सही तकनीक में लगना दूसरी बात है। बैठक में इसी प्रभावी उपयोग की बात को बार-बार दोहराया गया।

पूंजीगत खर्च का अर्थ है नई प्रणालियां, प्लेटफॉर्म और तकनीक खरीदना तथा विकसित करना। यह खर्च सेना की भविष्य की क्षमता तय करता है। इसलिए पूंजीगत आवंटन को आधुनिकीकरण की रीढ़ माना जाता है। 2.19 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत परिव्यय इस दिशा में एक बड़ा संकेत है।

तीन स्तंभ: बजट, तकनीक और मानव संसाधन

बैठक में आधुनिकीकरण के तीन प्रमुख आयामों पर चर्चा हुई। पहला आयाम बजट और पूंजीगत अधिग्रहण तथा आत्मनिर्भरता का था। दूसरा आयाम तकनीक का था। तीसरा आयाम मानव संसाधन का था।

तकनीक के आयाम में यह बात सामने आई कि तकनीकी प्रगति युद्ध के स्वरूप को बदल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त प्रणालियां, साइबर और अंतरिक्ष क्षमताएं अब युद्ध की योजना और संचालन का हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसे में सेना को इन तकनीकों के साथ तालमेल में रहना होगा, नहीं तो वह पीछे रह जाएगी।

मानव संसाधन के आयाम में यह बात रेखांकित की गई कि किसी सेना की ताकत केवल तकनीक और वित्तीय संसाधनों से तय नहीं होती। उसकी असली ताकत उसके कर्मियों की क्षमता और तैयारी से तय होती है। हथियार और प्रणालियां कितनी भी उन्नत क्यों न हों, उन्हें चलाने वाले, उनकी रणनीति बनाने वाले और कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने वाले लोग ही परिणाम तय करते हैं। इसलिए प्रशिक्षण, नेतृत्व और नई संरचनाओं को भी आधुनिकीकरण का हिस्सा माना गया।

तकनीक का बदलता चेहरा: एआई से साइबर तक

आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले युद्ध मुख्य रूप से मैदान में आमने-सामने की लड़ाई तक सीमित माना जाता था। अब युद्ध कई क्षेत्रों में एक साथ लड़ा जाता है: जमीन, समुद्र, हवा, अंतरिक्ष, साइबर और सूचना का क्षेत्र। इसीलिए बैठक में बहु-क्षेत्रीय चुनौतियों का सामना करने में सक्षम सेना बनाने की बात हुई।

बैठक में जिन तकनीकों पर चर्चा हुई, उनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त प्रणालियां, मानवरहित प्लेटफॉर्म, साइबर क्षमता, अंतरिक्ष क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और उन्नत संचार शामिल हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य दुश्मन की गतिविधि को जल्दी पहचानना, तेजी से निर्णय लेना, सटीकता बढ़ाना और अपने संचार तथा प्रणालियों को सुरक्षित रखना है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की भूमिका भी इस चर्चा में अहम रही। संगठन उन्नत हथियार, मिसाइल और प्रणालियों के विकास में लगा हुआ है। बैठक में यह बात सामने आई कि शोध को प्रयोगशाला से निकालकर मैदान तक पहुंचाना ही असली चुनौती है। इसके लिए सेना, शोध संस्थान, सार्वजनिक क्षेत्र और निजी उद्योग के बीच निरंतर सहयोग जरूरी है।

स्वदेशी निर्माण और निजी उद्योग की भूमिका

बैठक का एक बड़ा संदेश स्वदेशी निर्माण को लेकर था। रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ है कि महत्वपूर्ण रक्षा जरूरतों के लिए देश को दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़े। विदेशी स्रोतों पर निर्भरता कम करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि संकट के समय आपूर्ति, तकनीक और पुर्जों की उपलब्धता अनिश्चित हो सकती है।

इसीलिए घरेलू रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने पर जोर दिया गया। इस पारिस्थितिकी तंत्र में रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, निजी कंपनियां, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम, स्टार्टअप और शिक्षण संस्थान सभी शामिल हैं। बैठक में निजी क्षेत्र को समान अवसर देने की बात हुई, ताकि छोटी कंपनियों से लेकर बड़ी कंपनियों तक सभी रक्षा क्षमता मजबूत करने में योगदान दे सकें।

इसे पूरे देश के प्रयास के रूप में देखा गया। इसका अर्थ है कि रक्षा क्षमता केवल सरकार या सेना का काम नहीं है, बल्कि इसमें उद्योग, शोध, शिक्षा और नवाचार से जुड़ा हर पक्ष शामिल है। जब तकनीकी विकास सैन्य जरूरतों के साथ तालमेल में होता है, तो भारतीय उद्योग के लिए अवसर बढ़ते हैं और देश की विदेशी निर्भरता घटती है।

सेना के नए फॉर्मेशन: असनी, भैरव और शक्तिबान

बैठक में भारतीय सेना के नए फॉर्मेशनों का भी उल्लेख हुआ। इनमें असनी, भैरव और शक्तिबान प्लाटून शामिल हैं। बैठक में कहा गया कि ये नए फॉर्मेशन समकालीन संचालन आवश्यकताओं को पूरा करने और युद्ध के मैदान की बदलती गतिशीलता के अनुसार ढलने में अत्यधिक प्रभावी साबित हो रहे हैं।

तीनों सेनाओं ने अपनी संरचनाओं और फॉर्मेशनों को लगातार परिष्कृत किया है, ताकि वे आधुनिक युद्ध की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप बने रहें। इसका अर्थ है कि आधुनिकीकरण केवल उपकरण बदलने का नाम नहीं है, बल्कि संगठन, प्रशिक्षण और संचालन के तरीके को भी बदलने का नाम है।

नए फॉर्मेशनों का उल्लेख इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दिखाता है कि आधुनिकीकरण जमीन पर संरचनात्मक बदलाव के रूप में भी हो रहा है, न कि केवल कागज पर। सेना की छोटी इकाइयों का लचीलापन, गति और तकनीक के साथ तालमेल आधुनिक युद्ध में निर्णायक हो सकता है।

आगे क्या होगा: चरणबद्ध रोडमैप

बैठक में सांसदों ने भी अपने सुझाव दिए। लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों के विविध दृष्टिकोणों ने सलाहकारी प्रक्रिया को समृद्ध किया। चर्चा के बाद एक स्पष्ट कार्य-योजना की रूपरेखा सामने आई, जिसमें महत्वपूर्ण क्षमताओं को प्राथमिकता देना, हितधारकों के बीच समन्वय मजबूत करना, अधिग्रहण और विकास प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना और निर्धारित उद्देश्यों के मुकाबले प्रगति का समय-समय पर आकलन करना शामिल है।

बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि इरादे को क्रियान्वयन में बदलना होगा। इसके लिए संरचित और चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाया जाएगा। इसका उद्देश्य ऐसी सेना बनाना है, जो पारंपरिक, उप-पारंपरिक और बहु-क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके।

बैठक में रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह, रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, पूर्व सैनिक कल्याण सचिव सुकृति लिखी, रक्षा वित्त सचिव विश्वजीत सहाय तथा अन्य वरिष्ठ नागरिक और सैन्य अधिकारी भी उपस्थित थे। उनकी उपस्थिति से यह साफ हुआ कि आधुनिकीकरण की चर्चा केवल सैन्य अधिकारियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें नीति, वित्त, उत्पादन और कल्याण से जुड़े सभी पक्ष शामिल थे।

इसका व्यापक अर्थ क्या है

इस बैठक का व्यापक अर्थ भारत की सुरक्षा रणनीति की दिशा से जुड़ा है। पहला अर्थ यह है कि भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए स्वदेशी क्षमता पर भरोसा बढ़ाना चाहता है। दूसरा अर्थ यह है कि तकनीक को युद्ध का केंद्र माना जा रहा है, न कि केवल सहायक साधन। तीसरा अर्थ यह है कि उत्पादन और निर्यात के लक्ष्य भारत को वैश्विक रक्षा बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की कोशिश का हिस्सा हैं।

चौथा अर्थ यह है कि आधुनिकीकरण को निरंतर प्रक्रिया माना जा रहा है। यह कोई एक बार का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि बदलती तकनीक और बदलती चुनौतियों के साथ लगातार चलने वाला प्रयास है। इसीलिए दीर्घकालिक क्षमता विकसित करने, शोध को बढ़ावा देने, औद्योगिक भागीदारी बढ़ाने और नवाचार को प्रोत्साहित करने की बात बार-बार सामने आई।

आम पाठक के लिए इसका सीधा अर्थ यह है कि आने वाले वर्षों में भारत की सेना अधिक तकनीकी रूप से सक्षम, अधिक स्वदेशी उपकरणों से लैस और अधिक एकीकृत संचालन वाली होगी। इसका असर रक्षा उद्योग में रोजगार, शोध और निर्यात पर भी पड़ेगा। हालांकि लक्ष्य महत्वाकांक्षी हैं, और उन्हें हासिल करना उत्पादन क्षमता, तकनीकी सफलता और वैश्विक बाजार की स्थितियों पर निर्भर करेगा। बैठक में रखे गए लक्ष्य दिशा बताते हैं, उनकी प्राप्ति की गति आने वाले वर्षों में स्पष्ट होगी।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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