भोपाल ब्यूरो
सार: मध्य प्रदेश सरकार ने शहरों के सीवेज को बोझ की बजाय संपत्ति में बदलने की तैयारी कर ली है। उपचारित अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग की नीति-2026 का ड्राफ्ट जारी कर दिया गया है, जिसमें 2037 तक उपचारित पानी का 50 प्रतिशत तक पुनः उपयोग करने का लक्ष्य रखा गया है। विभाग ने नागरिकों, विशेषज्ञों, उद्योगों और नगरीय निकायों से 10 दिन के भीतर सुझाव मांगे हैं।
मध्य प्रदेश में अब नालियों से बहने वाला गंदा पानी साफ होकर फिर से काम आएगा। नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने उपचारित अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण एवं पुनः उपयोग नीति-2026 का ड्राफ्ट तैयार किया है। यह ड्राफ्ट मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में तैयार किया गया और 28 अक्टूबर को इंदौर के ब्रिलिएंट कन्वेंशन सेंटर में आयोजित अर्बन ग्रोथ कॉन्क्लेव 2.0 में प्रस्तुत किया गया। नीति का मकसद प्रदेश के शहरों को जल-सुरक्षित बनाना है, ताकि ताजे पानी और भूजल पर दबाव कम हो और हर बूंद का समुचित उपयोग हो सके। विभाग ने अब इस ड्राफ्ट पर आम लोगों से सुझाव आमंत्रित किए हैं, जिससे अंतिम नीति बनने से पहले जनता, विशेषज्ञों और उद्योग जगत की राय भी इसमें शामिल की जा सके।
क्या है मध्य प्रदेश उपचारित अपशिष्ट जल नीति 2026
मध्य प्रदेश उपचारित अपशिष्ट जल नीति 2026 का मूल विचार सीधा है — शहरों से निकलने वाले सीवेज को अपशिष्ट मानकर नदियों और नालों में बहा देने की बजाय उसे साफ करके दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाना। नीति के तहत शहरी क्षेत्रों में एकत्र किए गए सीवेज के शत-प्रतिशत उपचार का लक्ष्य रखा गया है। उपचारित जल का पुनः उपयोग 2027 तक 20 प्रतिशत, 2030 तक 30 प्रतिशत और 2037 तक 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया है। यह नीति नगर निगमों सहित प्रदेश की सभी नगरीय निकायों पर लागू होगी। नीति के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय को दी गई है। नीति में उपचारित पानी की गुणवत्ता के हिसाब से ए से एफ तक की श्रेणियां तय की गई हैं, जिससे पार्कों की सिंचाई से लेकर औद्योगिक प्रक्रिया तक हर उपयोग के लिए पानी की गुणवत्ता का मानक स्पष्ट रहे।
सुझाव कैसे भेजें: 10 दिन का समय, ई-मेल और पोर्टल
विभाग ने ड्राफ्ट पर नागरिकों, विशेषज्ञों, संस्थाओं, उद्योगों और स्थानीय निकायों से सुझाव आमंत्रित किए हैं। सुझाव 10 दिनों के भीतर ई-मेल su.dma@mp.gov.in पर भेजे जा सकते हैं। ड्राफ्ट विभाग की वेबसाइट और mygov.mp.gov.in पर उपलब्ध है। जो नागरिक, विशेषज्ञ या उद्योग इस नीति से सीधे जुड़े हैं, वे ड्राफ्ट पढ़कर अपने सुझाव भेज सकते हैं। सुझावों में यह बताया जा सकता है कि उपचारित पानी के इस्तेमाल के कौन से क्षेत्र प्राथमिकता में रखे जाएं, कीमतों की व्यवस्था कैसी हो और छोटे शहरों में यह नीति कैसे लागू की जाए। विभाग के अनुसार सुझावों पर विचार के बाद नीति को अंतिम रूप दिया जाएगा।
उपचारित पानी का इस्तेमाल कहाँ-कहाँ होगा
नीति के तहत उपचारित पानी का इस्तेमाल उद्योगों, निर्माण कार्यों, पार्कों एवं उद्यानों, सिंचाई तथा अन्य गैर-पीने योग्य उपयोगों में बढ़ावा दिया जाएगा। ताप बिजली संयंत्रों को लेकर नीति में स्पष्ट प्रावधान है — सीवेज उपचार संयंत्र के 50 किलोमीटर के दायरे में स्थित ताप बिजली संयंत्रों को उपचारित पानी का इस्तेमाल करना होगा, जो केंद्र की 2016 की टैरिफ नीति के अनुरूप है। नगर निकायों को भी पार्कों, सड़कों की धुलाई और अग्निशमन जैसे कामों में उपचारित पानी का इस्तेमाल करना होगा। उद्योगों में मशीनों की कूलिंग और धुलाई, रेलवे में कोच व प्लेटफॉर्म की सफाई, निर्माण कार्य, सड़कों की धुलाई और उद्यानों की सिंचाई में उपचारित पानी की आपूर्ति की जाएगी। इसके लिए नगरीय निकाय निर्धारित दरों पर पानी बेचेंगे। खाद्य और फार्मा उद्योगों को यह पानी नहीं दिया जाएगा।
ताजे पानी और भूजल पर लगाम: नए प्रावधान क्या कहते हैं
नीति का सबसे सख्त हिस्सा ताजे पानी और भूजल के इस्तेमाल को लेकर है। पार्कों, ग्रीन बेल्ट और गैर-जरूरी भूदृश्य निर्माण के लिए ताजे पानी और भूजल के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाएगी। जल संकट वाले क्षेत्रों में जहाँ उपचारित पानी उपलब्ध हो सकेगा, वहाँ ऐसे कामों के लिए इस्तेमाल हो रहे बोरवेल बंद भी किए जा सकेंगे। मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्य स्तरीय उच्चाधिकार प्राप्त संचालन समिति को नो फ्रेशवाटर जोन घोषित करने, आपूर्ति का आवंटन करने और जहाँ उपचारित पानी उपलब्ध हो वहाँ ताजा पानी लेने वालों पर जुर्माना लगाने का अधिकार होगा। कीमतों को लेकर नीति में अलग-अलग दरों का प्रस्ताव है — उपचारित पानी ताजे पानी से सस्ता होगा, जबकि औद्योगिक और वाणिज्यिक उपयोगकर्ताओं से अधिक दर ली जाएगी। विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के अनुसार प्रदेश में द्वितीयक उपचार की सुविधाएं पहले से मौजूद हैं, अब तृतीयक उपचार की सुविधाएं विकसित करनी हैं।
प्रदेश की मौजूदा तस्वीर: कितना सीवेज, कितना उपचार
प्रदेश में इस नीति की जरूरत का अंदाजा मौजूदा आंकड़ों से लगाया जा सकता है। प्रदेश की 418 नगरीय निकायों में से केवल 64 में ही सीवरेज योजनाएं मौजूद हैं। प्रदेश में हर दिन लगभग 2,666 मिलियन लीटर सीवेज निकलता है, जिसमें से रोज लगभग 1,639 मिलियन लीटर पानी का उपचार किया जा रहा है। चालू सीवेज उपचार संयंत्रों की कुल स्थापित क्षमता लगभग 1,656 मिलियन लीटर प्रतिदिन है, जिसमें से लगभग 1,105 मिलियन लीटर का ही इस्तेमाल हो पा रहा है। यानी उपचार के बाद भी अधिकांश पानी नदियों, झीलों और नालों में बहा दिया जाता है, जबकि बागवानी, पार्कों के रखरखाव और सड़कों की सफाई जैसे कामों तक ही इसका इस्तेमाल सीमित है। नई नीति इसी अंतर को पाटने की कोशिश है — उपचारित पानी को बेकार बहाने की बजाय उसे बेचकर निकायों की कमाई का जरिया भी बनाया जा सकेगा। इंदौर में जल संकट के चलते निजी बोरवेल खुदाई पर लगी रोक भी बताती है कि भूजल पर दबाव कितना बढ़ चुका है और उपचारित पानी का दोबारा इस्तेमाल अब विकल्प नहीं, जरूरत बन गया है।
पैसा कहाँ से आएगा: वित्त और क्रियान्वयन की रूपरेखा
नीति के क्रियान्वयन के लिए वित्त की व्यवस्था केंद्रीय योजनाओं और राज्य के संसाधनों के मेल से की जाएगी। अमृत 2.0 और नमामि गंगे जैसी केंद्रीय योजनाओं, राज्य अनुदान, सीएसआर निधि, व्यवहार्यता अंतर निधि और प्रस्तावित समर्पित राज्य उपचारित जल निधि से पैसा जुटाया जाएगा। डिजाइन-बिल्ड-ऑपरेट और हाइब्रिड एन्युटी जैसे मॉडलों के जरिए निजी भागीदारी को भी बढ़ावा दिया जाएगा। तृतीयक उपचार संयंत्र सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल पर विकसित किए जाएंगे। नीति के समन्वय के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्य स्तरीय समिति और नगरीय प्रशासन एवं विकास आयुक्त के अधीन एक तकनीकी प्रकोष्ठ काम करेगा, जो अनुमोदन, निगरानी और त्रैमासिक समीक्षा संभालेगा। नगरीय निकाय संग्रहण, वितरण और नगरपालिका उपयोग के केंद्र में रहेंगे।
शहरों और किसानों को क्या फायदा, आगे क्या
इस नीति से शहरों को दोहरा फायदा होगा — एक तरफ नदियों और भूजल पर दबाव कम होगा, दूसरी तरफ निकायों को उपचारित पानी बेचकर आमदनी होगी। सागर में औद्योगिक विकास निगम के साथ 10 मिलियन लीटर प्रतिदिन उपचारित पानी उद्योगों को देने का समझौता हो चुका है, जबकि ग्वालियर में उपचारित पानी सिंचाई नहर नेटवर्क में भेजा जा रहा है। आने वाले समय में प्रदेश के अन्य शहरों में भी उद्योगों, निर्माण और सिंचाई के लिए उपचारित पानी की आपूर्ति बढ़ेगी। सुझावों की अवधि पूरी होने के बाद विभाग प्राप्त सुझावों पर विचार करेगा और नीति को अंतिम रूप देगा। अंतिम नीति लागू होने के बाद शहरों में उपचारित पानी के इस्तेमाल के लिए अधिसूचनाएं जारी की जाएंगी और निकायों को अपने-अपने क्षेत्र में पुनः उपयोग का लक्ष्य पूरा करना होगा। जनता के लिए अभी सबसे जरूरी कदम यही है कि ड्राफ्ट को पढ़कर अपने सुझाव तय समय में विभाग तक पहुंचाए जाएं, क्योंकि यही सुझाव तय करेंगे कि मध्य प्रदेश के शहर पानी के मामले में कितने आत्मनिर्भर बनेंगे।
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