जबलपुर ब्यूरो। गोंडवाना की वीरांगना रानी दुर्गावती की 502वीं जयंती 5 अक्टूबर को मनाई जाएगी। पाँच शताब्दियों पहले की यह कहानी आज भी मध्यप्रदेश की धरती के स्वाभिमान का प्रतीक है।
वर्ष 1524 में कालिंजर के किले में जन्मीं दुर्गावती महोबा की चंदेल राजकुमारी थीं। गढ़ा-कटंगा के गोंडवाना राजा से विवाह के बाद वे इस धरती की रानी बनीं। पति के निधन के बाद उन्होंने अपने नाबालिग पुत्र की संरक्षिका के रूप में शासन की बागडोर संभाली।
कुशल प्रशासक और विदुषी
रानी दुर्गावती सिर्फ युद्धभूमि की नायिका नहीं थीं, कुशल प्रशासक भी थीं। उन्होंने राजधानी चौरागढ़ स्थानांतरित की और रानीताल, चेरीताल तथा अधारताल जैसे जलाशयों का निर्माण कराया। विद्या को संरक्षण देने वाली यह रानी अपने समय की विदुषी महिलाओं में गिनी जाती थीं।
अंतिम युद्ध: नरई का मैदान
वर्ष 1564 में दिल्ली के बादशाह के सेनापति ने गोंडवाना पर आक्रमण किया। समर्पण के प्रस्ताव को ठुकराकर रानी दुर्गावती स्वयं युद्धभूमि में उतरीं। घायल होने के बाद भी उन्होंने लड़ाई जारी रखी और 24 जून 1564 को नरई के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुईं। यह मैदान आज के जबलपुर के पास है।
मध्यप्रदेश की अपनी कहानी
मध्यप्रदेश के लिए यह कहानी खास तौर पर अपनी है — उनका राज्य आज के जबलपुर, सागर और भोपाल क्षेत्र में फैला था। जबलपुर स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय आज भी उनके नाम को जीवित रखता है। वर्ष 2023 में उनकी 500वीं जयंती पर डाक टिकट जारी किया गया था। पाँच शताब्दियों बाद भी रानी दुर्गावती स्वाभिमान और शौर्य का अमर प्रतीक बनी हुई हैं।
