पांच साल में सबसे कमजोर मानसून: मप्र के 30 जिलों में बारिश का कोटा अधूरा, पश्चिम में 12% की भारी कमी
भोपाल ब्यूरो। मध्य प्रदेश में इस बार का मानसून बीते पांच सालों में सबसे कमजोर साबित हुआ है। मानसून सीजन की विदाई के बाद सामने आए आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश के 55 में से 30 जिलों में सामान्य बारिश का कोटा पूरा नहीं हो पाया है। इनमें 11 जिले ऐसे हैं जहां सामान्य की तुलना में 80 प्रतिशत से भी कम पानी गिरा है, जबकि आलीराजपुर जिले में आधी बारिश भी दर्ज नहीं हुई है।

पश्चिम सूखा, पूर्व तर — बिगड़ा बारिश का संतुलन
इस बार प्रदेश में बारिश का क्षेत्रीय वितरण पूरी तरह असंतुलित रहा। पश्चिमी हिस्से — इंदौर, उज्जैन, नर्मदापुरम और ग्वालियर-चंबल संभागों में सामान्य से करीब 12 प्रतिशत तक कम बारिश हुई। वहीं पूर्वी हिस्से — जबलपुर, रीवा, सागर और शहडोल संभागों में सामान्य से 4 प्रतिशत अधिक पानी गिरा। प्रदेश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की सामान्य बारिश 37.3 इंच मानी जाती है, लेकिन इस बार महज 35.6 इंच (करीब 904 मिमी) बारिश दर्ज हुई, जो औसत से 4 प्रतिशत कम है।
सिर्फ 0.6 प्रतिशत से चूका ‘सामान्य’ का दर्जा
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मानकों के अनुसार सामान्य कोटे की 96 से 104 प्रतिशत बारिश को ही ‘सामान्य’ माना जाता है। इस बार मध्य प्रदेश में 95.4 प्रतिशत बारिश दर्ज हुई — यानी महज 0.6 प्रतिशत पानी और गिर जाता तो प्रदेश सामान्य बारिश की श्रेणी में आ जाता। पिछले वर्षों से तुलना करें तो 2022 में करीब 46 इंच, 2023 में 37.2 इंच, 2024 में 40.2 इंच और 2025 में 45.2 इंच बारिश हुई थी। इस लिहाज से यह पांच साल में सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा।
जून की देरी पड़ी भारी
इस बार मानसून 9 दिन की देरी से 24 जून को मध्य प्रदेश पहुंचा था, जिसकी वजह से जून में ही सामान्य से 30 प्रतिशत कम बारिश दर्ज हुई। जुलाई के पहले सप्ताह में स्थिति सुधरी और अगस्त के दूसरे सप्ताह से भारी बारिश का दौर भी आया, लेकिन ये महीने जून में हुई कमी की भरपाई नहीं कर सके।
रबी फसल और पेयजल पर खतरे की घंटी
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि अनियमित और असमान वितरण की वजह से भू-जल स्तर और बड़े शहरों के जलाशयों में पानी का भंडारण प्रभावित हो सकता है, जिसका सीधा असर आगामी रबी फसल, पेयजल व्यवस्था और औद्योगिक गतिविधियों पर पड़ेगा। पश्चिमी मध्य प्रदेश के जिन इलाकों में बारिश सबसे कम हुई है, वहां किसानों और प्रशासन दोनों की चिंता बढ़ गई है।
