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मां के लिए 15 हजार किलोमीटर की दौड़: 19 साल के मोनू राज 236 दिन बाद उज्जैन पहुंचे, महाकाल के दर्शन किए

सांकेतिक चित्र: भोर में मंदिर नगरी की ओर जाती सड़क, किनारे गेंदे के फूल सांकेतिक चित्र

उज्जैन ब्यूरो

सार: मोनू राज महाकाल उज्जैन पहुंचे — मां की लंबी उम्र की मन्नत पूरी करने के लिए 15 मार्च से दौड़ रहे बिहार के 19 साल के मोनू राज चौहान 236 दिन और लगभग 15 हजार किलोमीटर का सफर तय कर उज्जैन पहुंचे, जहां उन्होंने महाकाल के दर्शन किए और धनतेरस की भस्म आरती में शामिल हुए।

धनतेरस की भोर उज्जैन के लिए एक असाधारण कहानी लेकर आई। बिहार के पटना जिले के एक छोटे से गांव से चला 19 साल का एक युवक दौड़ते-दौड़ते उज्जैन पहुंच गया है। उसके पीछे न कोई गाड़ी है, न कोई बड़ा दल-बल — सिर्फ एक मन्नत, एक मां के लिए दुआ और 236 दिन की लगातार दौड़। मोनू राज चौहान ने 15 मार्च 2026 को यह यात्रा शुरू की थी और अब तक लगभग 15 हजार किलोमीटर का रास्ता तय कर चुके हैं। उज्जैन पहुंचने पर उन्होंने सबसे पहले प्राचीन शनि मंदिर में दर्शन किए, फिर महाकालेश्वर मंदिर पहुंचकर बाबा महाकाल के दर्शन किए और शुक्रवार तड़के भस्म आरती में शामिल हुए। मंदिर प्रबंध समिति ने उनका स्वागत-सम्मान भी किया। मोनू राज महाकाल उज्जैन पहुंचकर इस यात्रा के आठवें ज्योतिर्लिंग पड़ाव पर पहुंचे हैं — यह यात्रा देश के 12 ज्योतिर्लिंगों और चार धामों की है।

मोनू राज महाकाल उज्जैन: पटना से उज्जैन तक 236 दिन की दौड़

मोनू राज चौहान बिहार के पटना जिले के फुलवारी शरीफ प्रखंड की चिल्बिलि ग्राम पंचायत के गांव बेउर बेतोरा के रहने वाले हैं। उन्होंने 15 मार्च 2026 को अपने गांव से यह यात्रा शुरू की थी। तब से लेकर उज्जैन पहुंचने तक 236 दिन बीत चुके हैं। इस दौरान वे नौ राज्यों से होकर गुजरे और लगभग 15 हजार किलोमीटर का सफर दौड़ते और पैदल चलते हुए पूरा किया। वे 4 नवंबर की रात उज्जैन पहुंचे। 5 नवंबर को दिनभर उन्होंने उज्जैन शहर में समर्थकों से मुलाकात की और शहर में दौड़ भी लगाई। 6 नवंबर को भस्म आरती में दर्शन करने के बाद वे 7 नवंबर को अपने अगले पड़ाव की ओर बढ़ जाएंगे। उनकी यह यात्रा सामान्य तीर्थ यात्रा से बिल्कुल अलग है, क्योंकि इसमें हर दिन की दूरी दौड़कर तय की जाती है। सोशल मीडिया पर वे ‘ब्लैक पैंथर’ के नाम से पहचाने जाते हैं और देशभर में लाखों लोग उनकी इस यात्रा से जुड़ चुके हैं।

मां के गले में फंसा था मछली का कांटा

सांकेतिक चित्र: प्राचीन शिव मंदिर में जलते दीये और गेंदे के फूल
सांकेतिक चित्र

इस लंबी दौड़ के पीछे एक मां और बेटे की भावुक कहानी है। करीब छह साल पहले मोनू की मां लालती देवी के गले में मछली का कांटा फंस गया था। परिवार पर अचानक मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। मां के इलाज में 10 लाख रुपये से अधिक खर्च हुए और पूरा परिवार उनकी सेहत को लेकर चिंता में डूब गया। उस समय मोनू की उम्र करीब 13 साल थी। उन्होंने गांव से लगभग 50 किलोमीटर दूर जहानाबाद के बराबर पहाड़ स्थित बाबा सिद्धेश्वर नाथ के दरबार में माथा टेका और मन्नत मांगी कि अगर उनकी मां पूरी तरह स्वस्थ हो जाती हैं, तो वे देश के 12 ज्योतिर्लिंगों और चार धामों के दर्शन दौड़कर करेंगे। मां की सेहत में सुधार हुआ और परिवार ने राहत की सांस ली। उसी मन्नत को पूरा करने के लिए मोनू ने इस साल 15 मार्च को दौड़ शुरू की। मां ने विदा करते समय बेटे को समझाया था कि भोजन समय पर करना, जंगल में रात मत बिताना, अपना ध्यान रखना और समय-समय पर फोन लगाते रहना। साथ ही मां ने कहा था कि जो संकल्प लिया है, उसे पूरा करके ही लौटना।

रोज 40-50 किलोमीटर, 11 घंटे सड़क पर

मोनू की दिनचर्या किसी साधारण यात्री जैसी नहीं है। वे रोज करीब 40 से 50 किलोमीटर दौड़ते हैं। सुबह 8 से 9 बजे के बीच यात्रा शुरू करते हैं और इस दूरी को तय करने में लगभग 11 घंटे लग जाते हैं। इतनी लंबी दौड़ के बावजूद उन्होंने अपनी फिटनेस के लिए अलग दिनचर्या बना रखी है। सुबह एक घंटा और शाम को एक घंटा व्यायाम करते हैं, जिसमें हाई नीज, पुशअप, उठक-बैठक और देसी कसरत शामिल है। उनकी कोई प्रोटीन डाइट नहीं है। वे पूरी तरह शाकाहारी हैं और रास्ते में जो शाकाहारी भोजन उपलब्ध हो जाता है, वही ग्रहण करते हैं। रात को रुकने का फैसला संबंधित क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार होता है। कभी होटल, कभी मंदिर, कभी आश्रम तो कभी किसी समर्थक के घर पर ठहर जाते हैं। यात्रा में उनके साथ दो साथी बाइक पर चल रहे हैं। रास्ते में डॉक्टरों ने सेवा भाव से उनका चेकअप भी किया, जिसमें शुगर और बीपी सामान्य पाए गए। मोनू बताते हैं कि अब तक उन्हें दौड़ के दौरान कोई बड़ी शारीरिक परेशानी, चोट या पैरों में छाले नहीं हुए हैं। वे इसे ज्योतिर्लिंगों और चार धामों का आशीर्वाद मानते हैं। हर ज्योतिर्लिंग और धाम पहुंचने पर वे दो से तीन दिन रुककर दर्शन और आराम करते हैं। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग पहुंचते ही उन्हें घर में भतीजी के होने की सूचना मिली, जिसे वे भगवान का आशीर्वाद मानते हैं।

अब तक 7 ज्योतिर्लिंग और 2 धाम, महाकाल आठवां पड़ाव

उज्जैन पहुंचने से पहले मोनू राज 7 ज्योतिर्लिंगों — बैद्यनाथ, मल्लिकार्जुन, रामेश्वरम, भीमाशंकर, त्र्यंबकेश्वर, घृष्णेश्वर और ओंकारेश्वर — तथा 2 धामों, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी, के दर्शन कर चुके हैं। उज्जैन में महाकालेश्वर उनका आठवां ज्योतिर्लिंग है। उज्जैन पहुंचने पर उन्होंने सबसे पहले प्राचीन शनि मंदिर में पूजा-अर्चना की। इसके बाद वे विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और बाबा महाकाल के दर्शन कर मां की खुशहाली की प्रार्थना की। मंदिर प्रबंध समिति ने उनका स्वागत किया और श्रद्धालुओं के लिए की गई दर्शन व्यवस्थाओं की उन्होंने सराहना भी की। धनतेरस के पावन अवसर पर शुक्रवार तड़के वे भस्म आरती में शामिल हुए। उज्जैन में इन दिनों दीपोत्सव का उल्लास है और धनतेरस से दीपावली पर्व की शुरुआत हो चुकी है। ऐसे में महाकाल के दरबार में इस युवा की उपस्थिति ने श्रद्धालुओं का ध्यान खींचा और लोग उनसे मिलकर उनकी यात्रा के बारे में जानने लगे।

अगला पड़ाव सोमनाथ, लक्ष्य काशी विश्वनाथ

मोनू राज महाकाल उज्जैन से 7 नवंबर को विदा होकर गुजरात स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की ओर बढ़ेंगे। उनका लक्ष्य 9 महीने में काशी विश्वनाथ पहुंचना है। इसके बाद भी यात्रा जारी रहेगी, क्योंकि संकल्प देश के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों और चार धामों के दर्शन का है। हर पड़ाव पर वे दो से तीन दिन रुकते हैं, दर्शन करते हैं और आराम करके आगे बढ़ते हैं। इतनी लंबी यात्रा में मौसम, रास्ते और थकान की चुनौतियां रोज सामने आती हैं, लेकिन मोनू का कहना है कि मां की दुआ और मन्नत का संकल्प उन्हें हर दिन आगे बढ़ाता है। सोमनाथ के बाद वे शेष ज्योतिर्लिंगों की ओर बढ़ेंगे और अंत में काशी विश्वनाथ के दर्शन के साथ इस संकल्प को पूरा करने की ओर बढ़ेंगे।

‘ब्लैक पैंथर’ नाम और सोशल मीडिया पर चर्चा

मोनू की यात्रा जितनी दिलचस्प जमीन पर है, उतनी ही पहचान सोशल मीडिया पर भी बन रही है। सोशल मीडिया पर वे ‘ब्लैक पैंथर’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। यात्रा शुरू करते समय उनके इंस्टाग्राम पर डेढ़ लाख फॉलोअर्स थे, जो अब 16 लाख पहुंच गए हैं। यूट्यूब और फेसबुक अकाउंट बनाए थे, तब शून्य फॉलोअर्स थे, जो अब उज्जैन पहुंचने तक यूट्यूब पर 2 लाख सब्सक्राइबर और फेसबुक पर 5 लाख फॉलोअर्स हो गए हैं। तीनों प्लेटफॉर्म को मिलाकर करीब 23 लाख फॉलोअर्स और सब्सक्राइबर्स का आंकड़ा है और करोड़ों व्यूज भी शामिल हैं। उनकी पहचान उनके बड़े बाल, पीली बनियान और हाफ लोअर से भी जुड़ी है। वे बताते हैं कि इन्हीं कपड़ों में वे खुद को ज्यादा आरामदायक महसूस करते हैं, इसलिए लंबी दूरी की दौड़ के दौरान भी यही पहनते हैं। रास्ते में मिलने वाले लोगों से वे आत्मीयता से बात करते हैं और लोग सेल्फी लेने के लिए जुड़ जाते हैं। खंडवा और इंदौर के दो युवा भी रास्ते में उनके साथ हो गए और महाकालेश्वर तक उनके साथ ही दौड़ लगाई। 19 साल की उम्र में भी उनका व्यवहार और बातचीत लोगों को आकर्षित करती है, यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग उनकी यात्रा से जुड़ रहे हैं।

परिवार की चिंता, फिर गर्व

मोनू परिवार के सबसे छोटे बेटे हैं और 12वीं तक पढ़ाई की है। उन्हें क्रिकेट खेलने का शौक है और क्रिकेटर बनने का सपना है, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के कारण क्रिकेट छोड़ना पड़ा। उनके पिता महेश चौहान इलेक्ट्रीशियन हैं, जबकि भाई सोनू भी काम करते हैं। परिवार में दो बहनें हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। यात्रा पर निकलते समय पिता को बेटे की सुरक्षा और इतनी लंबी यात्रा को लेकर चिंता हुई थी और वे इस फैसले से नाराज भी थे। लेकिन जब उन्होंने सोशल मीडिया पर बेटे के वीडियो देखे और देशभर से मिल रहे समर्थन को जाना, तो उनकी नाराजगी दूर हो गई। अब पिता भी गर्व महसूस करते हैं। मोनू बताते हैं कि घर वालों से हर रात फोन पर बातचीत होती है। परिवार को सबसे ज्यादा चिंता उनके भोजन, रहने और सुरक्षा की रहती है। मां की दी हुई हिदायतें — समय पर खाना, जंगल में रात न बिताना और संकल्प पूरा करके ही लौटना — वे हर दिन याद रखते हैं। यही पारिवारिक सहारा उनकी सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है।

मन्नत, मां और दौड़ का संदेश

मोनू राज महाकाल उज्जैन की यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं है, यह मां के प्रति समर्पण और संकल्प की मिसाल भी है। 13 साल की उम्र में मांगी गई मन्नत को 19 साल की उम्र में दौड़कर पूरा करना आसान नहीं है। हर दिन 40-50 किलोमीटर दौड़ना, धूप, बारिश और लंबी दूरी की थकान झेलना और फिर भी अगले दिन उसी ऊर्जा से आगे बढ़ना — यह अनुशासन और भक्ति दोनों का संगम है। उज्जैन में महाकाल के दर्शन के बाद उनकी यात्रा अब सोमनाथ की ओर बढ़ेगी। धनतेरस और दीपावली के इस पावन समय में उनकी कहानी उन हजारों श्रद्धालुओं तक पहुंच रही है, जो त्योहारों के दिनों में उज्जैन आ रहे हैं। मां की लंबी उम्र की कामना लेकर निकले इस युवा की दौड़ अभी जारी है और देश के कोने-कोने से लोग उसकी मंजिल तक पहुंचने की कामना कर रहे हैं।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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