छिंदवाड़ा ब्यूरो
सार: छिंदवाड़ा जिले के एक किसान परिवार के बेटे जयपाल मालवीय ने दोहा में चल रही विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। इस पदक के साथ भारत को लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 के लिए शूटिंग का पहला कोटा भी मिल गया है।
दोहा में ऐतिहासिक रजत: 242.2 अंक के साथ दूसरे स्थान पर
कतर की राजधानी दोहा में चल रही आईएसएसएफ विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में गुरुवार को पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा का फाइनल खेला गया। आठ निशानेबाजों के बीच हुए इस फाइनल में छिंदवाड़ा के जयपाल मालवीय ने 242.2 अंक के साथ रजत पदक अपने नाम किया। चीन के हू काई ने 243.9 अंक के साथ स्वर्ण पदक जीता, जबकि चेक गणराज्य के जिंदरिख दुबोवी 220.9 अंक के साथ तीसरे स्थान पर रहे और उन्होंने कांस्य पदक जीता।
जयपाल ने क्वालिफिकेशन दौर में 585 अंक बनाए थे और वह तीसरे स्थान पर रहकर फाइनल में पहुंचे थे। क्वालिफिकेशन में उनके 24 शॉट इनर टेन में लगे थे, जो उनकी एकाग्रता और तैयारी को दर्शाता है। फाइनल की शुरुआत में उनकी शुरुआत धीमी रही और पहले 12 शॉट्स में कई बार नौ के अंक भी आए, लेकिन 13वें से 16वें शॉट तक उन्होंने लगातार चार बार दस का निशाना लगाया। इन चार शॉट्स के अंक 10.6, 10.2, 10.7 और 10.8 रहे और यहीं से पदक की ओर उनका रास्ता साफ हो गया।
फाइनल के एक मोड़ पर स्वर्ण पदक भी उनकी पहुंच में दिख रहा था, जब चीन के हू काई ने एक शॉट में 8.4 अंक बनाए। लेकिन अनुभव की कमी के बावजूद जयपाल ने संयम नहीं खोया और आखिर तक दूसरे स्थान पर बने रहे। यह रजत पदक भारतीय शूटिंग के लिए इस चैंपियनशिप की सबसे बड़ी उपलब्धि बन गया, क्योंकि इसी स्पर्धा से भारत को लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 के लिए शूटिंग का पहला कोटा मिला है।
कोटा देश का है, ओलंपिक टिकट अभी बाकी

जयपाल के रजत पदक से मिला ओलंपिक कोटा भारत के नाम हुआ है, किसी एक खिलाड़ी के नाम नहीं। ओलंपिक के नियमों के अनुसार कोटा देश को मिलता है और अंतिम टीम का चयन बाद में होने वाली चयन प्रक्रिया से तय होता है। इसका अर्थ यह है कि जयपाल को लॉस एंजिलिस जाने के लिए आगे भी अपनी फॉर्म और प्रदर्शन को बरकरार रखना होगा।
फिर भी, इस कोटे का महत्व कम नहीं है। विश्व चैंपियनशिप ओलंपिक कोटा देने वाली पहली बड़ी प्रतियोगिता है और भारत ने इसमें अपना खाता सबसे पहले खोल लिया है। महिलाओं की 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में भारत की स्टार निशानेबाज मनु भाकर और सुरुचि इंदर सिंह व्यक्तिगत कोटा हासिल करने से चूक गई थीं। मनु पांचवें स्थान पर रहीं और सुरुचि छठे स्थान पर। हालांकि महिला टीम ने मनु, सुरुचि और सैन्यम के साथ टीम स्पर्धा में रजत पदक जीता। टीम ने 1738 अंक बनाए, जबकि चीन 1745 अंक के साथ पहले स्थान पर रहा।
गेहूं बेचकर खरीदी पिस्तौल, माता-पिता से छिपाई सच्चाई
जयपाल मालवीय की कहानी सिर्फ एक पदक की कहानी नहीं है, यह एक किसान बेटे के सपने, संघर्ष और छिपी हुई मेहनत की कहानी है। छिंदवाड़ा जिले के चांदनगांव गांव में रहने वाले जयपाल के माता-पिता खेती करते हैं। सोयाबीन, मक्का और गेहूं की खेती से परिवार की आजीविका चलती है। जयपाल ने गेहूं की फसल बेचकर मिले पैसों से अपनी पहली पिस्तौल खरीदी थी। यह एक सेकेंड हैंड पिस्तौल थी, जिसकी कीमत करीब एक लाख पांच हजार रुपये थी। आज भी वह उसी पिस्तौल से निशाना लगाते हैं, क्योंकि उनके अनुसार वह ठीक से काम करती है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जयपाल ने वर्षों तक अपने माता-पिता से अपनी असली जिंदगी छिपाकर रखी। माता-पिता को लगता था कि उनका बेटा मध्यप्रदेश सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा है और बाद में भोपाल में एक दफ्तर में नौकरी कर रहा है, जहां उसे बीस हजार रुपये महीना मिलता है। हकीकत यह थी कि जयपाल ने कभी कोई नौकरी नहीं की। पढ़ाई के लिए दिए गए पैसे वह निशानेबाजी की तैयारी और पिस्तौल पर खर्च करते रहे। गुरुवार की रात जब उनके रजत पदक की खबर गांव पहुंची, तब माता-पिता को पहली बार पता चला कि उनका बेटा निशानेबाज है।
26 साल की उम्र में शुरुआत, एनसीसी से मिला पहला मौका
जयपाल ने निशानेबाजी की शुरुआत 26 साल की उम्र में की, जो इस खेल के लिए देर से मानी जाती है। अधिकतर निशानेबाज बचपन से ही इस खेल से जुड़ जाते हैं, लेकिन जयपाल का रास्ता अलग था। उन्हें पहली बार राइफल छूने का मौका राष्ट्रीय कैडेट कोर यानी एनसीसी के कार्यक्रम में मिला था। वहीं से उनमें निशानेबाजी का शौक जागा।
उन्होंने मध्यप्रदेश सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी भी की थी, लेकिन 2020 में यह परीक्षा कोरोना महामारी के कारण टल गई। इसी दौरान उन्होंने निशानेबाजी को गंभीरता से अपनाने का फैसला किया। वह भोपाल आ गए और मध्यप्रदेश राज्य शूटिंग अकादमी में प्रशिक्षण लेने लगे। अकादमी में उन्होंने अपनी तकनीक को निखारा और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी शुरू की।
राष्ट्रीय ट्रायल से विश्व मंच तक का सफर
जयपाल का अंतरराष्ट्रीय सफर अभी बहुत छोटा है। दोहा विश्व चैंपियनशिप उनका दूसरा ही अंतरराष्ट्रीय मुकाबला था। इससे पहले उन्होंने इस साल चीन के हांगझोऊ में हुए विश्व कप में हिस्सा लिया था, जहां उन्होंने क्वालिफिकेशन में 585 अंक बनाए थे, लेकिन नौवें स्थान पर रहकर फाइनल से चूक गए थे।
भारत में उन्होंने 2026 के राष्ट्रीय चयन ट्रायल में पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्टल ट्रायल-1 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था। दिल्ली के डॉ. कर्णी सिंह शूटिंग रेंज में हुए इस ट्रायल के फाइनल में उन्होंने 245.6 अंक बनाए थे। पांच राष्ट्रीय ट्रायल्स में उन्होंने पेरिस ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता सरबजोत सिंह और 2025 के विश्व चैंपियनशिप स्वर्ण पदक विजेता सम्राट राणा जैसे स्थापित निशानेबाजों को पीछे छोड़ा था। 31 साल की उम्र में वह भारतीय टीम में सबसे उम्रदराज पदार्पण करने वाले खिलाड़ी भी थे, लेकिन उन्होंने अपने प्रदर्शन से उम्र को सिर्फ एक संख्या साबित कर दिया।
मध्यप्रदेश के लिए क्या मायने रखता है यह पदक
जयपाल मालवीय का रजत पदक मध्यप्रदेश के खेल इतिहास में एक खास स्थान रखता है। राज्य के एक छोटे से गांव के किसान बेटे का विश्व चैंपियनशिप के मंच तक पहुंचना और वहां भारत के लिए पहला ओलंपिक कोटा जीतना, प्रदेश के हजारों युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है। यह पदक भोपाल की राज्य शूटिंग अकादमी की भूमिका को भी रेखांकित करता है, जहां जयपाल ने अपना प्रशिक्षण पूरा किया।
मध्यप्रदेश में खेल सुविधाओं और अकादमियों पर लगातार जोर दिया जा रहा है और जयपाल की सफलता इस बात का प्रमाण है कि सही मार्गदर्शन और मौके मिलने पर गांव-कस्बों के युवा भी विश्व स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकते हैं। राज्य के खेल प्रेमियों और युवा निशानेबाजों के लिए यह पदक एक नई उम्मीद लेकर आया है।
आगे क्या: चयन प्रक्रिया और लॉस एंजिलिस की राह
अब सबकी नजर आगे की चयन प्रक्रिया पर रहेगी। कोटा मिलने के बाद भारतीय निशानेबाजी संघ और चयनकर्ता आने वाले महीनों में ट्रायल और प्रदर्शन के आधार पर लॉस एंजिलिस ओलंपिक के लिए टीम का चयन करेंगे। जयपाल के लिए चुनौती यही होगी कि वह अपनी मौजूदा फॉर्म को बनाए रखें और आने वाली प्रतियोगिताओं में भी ऐसा ही प्रदर्शन दोहराएं।
विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक जीतने के बाद जयपाल अब अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी में एक पहचाना हुआ नाम बन गए हैं। उनके गांव चांदनगांव में इस खबर के बाद खुशी का माहौल है। खेती-किसानी करने वाला परिवार अब अपने बेटे की उपलब्धि पर गर्व कर रहा है। जयपाल का सपना ओलंपिक में खेलने का है और उन्होंने यह सपना खुलकर जाहिर भी किया है। दोहा का रजत पदक उस सपने की ओर बढ़ाया गया पहला बड़ा कदम है।
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