ग्वालियर ब्यूरो। ओबीसी प्रमाणपत्र से जुड़े एक अहम मामले में हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि क्रीमीलेयर का निर्धारण केवल माता-पिता के वेतन की राशि के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए अभिभावक की सेवा-स्थिति, पद की श्रेणी, पदोन्नति की तारीख और आय के स्वरूप सहित निर्धारित मापदंडों की जांच करना भी जरूरी है।
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने 29 सितंबर को पारित आदेश में आवेदिका रागिनी राठौर के मामले में पहले पारित दोनों आदेशों को निरस्त कर दिया और प्रकरण को नए सिरे से निर्णय के लिए सक्षम अधिकारी के पास भेज दिया।

सिर्फ आय देखकर खारिज किया था आवेदन
आदेश के अनुसार, आवेदिका के पिता की 16.99 लाख रुपये की आय को निर्धारित सीमा से अधिक मानते हुए उनका ओबीसी प्रमाणपत्र का आवेदन खारिज कर दिया गया था। अपीलीय अधिकारी ने भी इसी आधार पर वह आदेश बरकरार रखा था।
कोर्ट ने कहा कि मामले का फैसला केवल पिता को मिलने वाले वेतन की राशि देखकर नहीं किया जा सकता। आवेदिका की ओर से बताया गया कि उनके पिता की प्रारंभिक नियुक्ति सिविल जज वर्ग-दो के पद पर हुई थी और 16 जून 2008 को 40 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद उन्हें सिविल जज वर्ग-एक के पद पर पदोन्नति मिली थी। यह भी दावा किया गया कि पिता की आय का स्रोत केवल वेतन है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले में 11 मार्च 2026 को दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमीलेयर निर्धारण में केवल आय सीमा को यांत्रिक तरीके से लागू करने के बजाय माता-पिता के पद और सेवा श्रेणी जैसे पहलुओं को भी प्रासंगिक माना था।
छह सप्ताह में नया आदेश
हाई कोर्ट ने 23 अक्टूबर 2020 को अनुविभागीय अधिकारी द्वारा और 29 नवंबर 2022 को अपर कलेक्टर द्वारा पारित आदेशों को निरस्त करते हुए सक्षम अधिकारी को निर्देश दिया कि सरकारी परिपत्रों, पिता की सेवा-स्थिति, पदोन्नति की तारीख, आय के स्रोत और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर छह सप्ताह में कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने आवेदिका के ओबीसी प्रमाणपत्र के दावे पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। प्रमाणपत्र जारी होगा या नहीं, इसका फैसला अब सक्षम अधिकारी को लागू नियमों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर करना होगा।
