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हरदीप सिंह पुरी मध्य प्रदेश से निर्विरोध राज्यसभा सांसद निर्वाचित: नाम वापसी की समयसीमा खत्म होते ही जारी हुआ प्रमाण पत्र, कार्यकाल 2 अप्रैल 2030 तक

सांकेतिक चित्र: शाम के समय विधानसभा भवन और तिरंगा सांकेतिक चित्र
भोपाल ब्यूरो

सार: मध्य प्रदेश से राज्यसभा की रिक्त सीट पर हुए उपचुनाव में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं। गुरुवार को नाम वापसी की समयसीमा दोपहर तीन बजे खत्म होते ही रिटर्निंग ऑफिसर उमेश कुमार शर्मा ने उनके निर्विरोध निर्वाचन की औपचारिक घोषणा कर दी और निर्वाचन प्रमाण पत्र जारी किया। पुरी की गैरमौजूदगी में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने विधानसभा पहुंचकर प्रमाण पत्र प्राप्त किया। उपचुनाव में दो अन्य उम्मीदवारों के पर्चे खारिज हो गए थे, जिसके बाद पुरी अकेले वैध उम्मीदवार बचे थे। इस सीट पर अब मतदान की जरूरत नहीं पड़ी और उनका कार्यकाल दो अप्रैल 2030 तक रहेगा। निर्विरोध निर्वाचन तय होने की बात तीन नवंबर की जांच के बाद ही सामने आ गई थी, गुरुवार को उस पर औपचारिक मुहर लग गई।

नाम वापसी की समयसीमा खत्म होते ही औपचारिक घोषणा

मध्य प्रदेश विधानसभा में गुरुवार को राज्यसभा उपचुनाव की प्रक्रिया का आखिरी चरण पूरा हुआ। नाम वापसी की अंतिम तिथि पांच नवंबर को दोपहर तीन बजे तक तय थी। निर्धारित समय पूरा होते ही रिटर्निंग ऑफिसर उमेश कुमार शर्मा ने हरदीप सिंह पुरी के निर्विरोध निर्वाचित होने की औपचारिक घोषणा कर दी। इसके साथ ही उन्हें निर्वाचन प्रमाण पत्र जारी किया गया।

प्रमाण पत्र लेने के लिए पुरी खुद विधानसभा नहीं पहुंचे थे। उनकी गैरमौजूदगी में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने विधानसभा पहुंचकर रिटर्निंग ऑफिसर से निर्वाचन प्रमाण पत्र प्राप्त किया। इस मौके पर उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा तथा भगवानदास सबनानी भी मौजूद रहे। भाजपा प्रदेश संगठन और वरिष्ठ नेताओं ने पुरी को बधाई और शुभकामनाएं दी हैं।

पुरी के निर्विरोध चुने जाने के बाद इस सीट पर 12 नवंबर को होने वाले मतदान की जरूरत नहीं पड़ी। चुनाव आयोग ने पहले मतदान का कार्यक्रम तय किया था, लेकिन मैदान में एक ही वैध उम्मीदवार बचने के कारण मतदान कराए बिना ही परिणाम घोषित कर दिया गया। यह उपचुनाव बिना वोटिंग के ही संपन्न हो गया।

दो उम्मीदवारों के पर्चे क्यों खारिज हुए

मध्य प्रदेश की इस राज्यसभा सीट के उपचुनाव के लिए कुल तीन उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया था। भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, कांग्रेस समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राजकुमार लोहानी और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में कांते सयन्ना मैदान में थे। तीन नवंबर को नामांकन पत्रों की जांच के दौरान दो उम्मीदवारों के पर्चे खारिज कर दिए गए।

रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश के अनुसार कांते सयन्ना का नामांकन इसलिए खारिज हुआ क्योंकि उनके नामांकन के लिए जरूरी प्रस्तावकों के हस्ताक्षर पूरे नहीं थे। नियम के अनुसार नामांकन के लिए विधानसभा के कम से कम 10 निर्वाचित सदस्यों या कुल निर्वाचित सदस्यों के 10 प्रतिशत के हस्ताक्षर जरूरी थे। इनमें जो संख्या कम हो, उतने सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए थे। सयन्ना के मामले में यह शर्त पूरी नहीं हुई।

राजकुमार लोहानी का नामांकन इसलिए खारिज हुआ क्योंकि उन्होंने जरूरी फॉर्म-26 का शपथपत्र तय समय पर जमा नहीं किया था। उन्हें दो नवंबर को दोपहर तीन बजे तक यह दस्तावेज जमा करना था, लेकिन समयसीमा बीत गई। इसके बाद उनका नामांकन निरस्त कर दिया गया। दोनों पर्चे खारिज होने के बाद पुरी अकेले वैध उम्मीदवार रह गए और उनका निर्विरोध चुना जाना लगभग तय हो गया था।

सांकेतिक चित्र: खाली संसदीय सदन
सांकेतिक चित्र

कांग्रेस की आपत्तियां और जांच का फैसला

तीन नवंबर को नामांकन पत्रों की जांच के दौरान कांग्रेस नेताओं और निर्दलीय उम्मीदवारों की ओर से पुरी के नामांकन और हलफनामे पर आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। आपत्तियों में पुरी की ओर से जमा किए गए शपथपत्र को अधूरा और अमान्य बताया गया था। कांग्रेस का कहना था कि हलफनामे में कई गलतियां हैं और इस आधार पर नामांकन निरस्त किया जाना चाहिए।

रिटर्निंग ऑफिसर उमेश कुमार शर्मा ने सभी आपत्तियों पर सुनवाई की और दस्तावेजों की जांच की। सुनवाई के बाद उन्होंने आपत्तियों को खारिज कर दिया और पुरी का नामांकन वैध घोषित करते हुए स्वीकार कर लिया। रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश में कहा गया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनिवार्य प्रावधानों का कोई उल्लंघन नहीं पाया गया। इस फैसले के बाद पुरी का नामांकन पूरी तरह मान्य हो गया।

लोहानी कांग्रेस समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार थे और उनका पर्चा खारिज होने के बाद कांग्रेस के पास इस उपचुनाव में कोई उम्मीदवार नहीं बचा था। घोषणा के बाद कांग्रेस की ओर से इस पर कोई नई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। कांग्रेस की आपत्तियां जांच में खारिज होने के साथ ही इस उपचुनाव का राजनीतिक मुकाबला भी समाप्त हो गया था।

सीट खाली कैसे हुई: एल मुरुगन का इस्तीफा

मध्य प्रदेश की यह राज्यसभा सीट केंद्रीय राज्य मंत्री एल मुरुगन के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। उन्होंने 14 अक्टूबर को राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था। उनका कार्यकाल मूल रूप से दो अप्रैल 2030 तक था। उनके इस्तीफे के कारण इस सीट पर उपचुनाव कराना पड़ा।

एल मुरुगन के इस्तीफे के बाद चुनाव आयोग ने उपचुनाव का कार्यक्रम जारी किया था। कार्यक्रम के अनुसार दो नवंबर तक नामांकन दाखिल किए जाने थे, तीन नवंबर को नामांकन पत्रों की जांच होनी थी, पांच नवंबर तक नाम वापस लिए जा सकते थे और 12 नवंबर को मतदान होना था। निर्विरोध निर्वाचन के बाद अब मतदान की प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ी। पुरी अब मुरुगन के बचे हुए कार्यकाल, यानी दो अप्रैल 2030 तक, इस सीट से राज्यसभा सदस्य रहेंगे।

नामांकन का दिन: 31 अक्टूबर को भोपाल में क्या हुआ

हरदीप सिंह पुरी ने 31 अक्टूबर को भोपाल स्थित मध्य प्रदेश विधानसभा में अपना नामांकन दाखिल किया था। इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल और जगदीश देवड़ा, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और राज्य सरकार के कई मंत्री मौजूद थे। नामांकन के समय विधानसभा परिसर में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और विधायकों की बड़ी मौजूदगी रही।

नामांकन दाखिल होने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा था कि पुरी का यहां से नामांकन भरना प्रदेश के लिए सौभाग्य की बात है और यह दीपावली से पहले का तोहफा है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कहा था कि पुरी ने केंद्रीय मंत्री रहते हुए मध्य प्रदेश को कई सौगातें दी हैं। विधानसभा में भाजपा के पास 230 में से 164 सदस्यों का बहुमत है, इसलिए नामांकन के दिन से ही पुरी का निर्विरोध चुना जाना लगभग तय माना जा रहा था।

नामांकन के दिन से लेकर घोषणा तक की पूरी प्रक्रिया में पुरी के पक्ष में भाजपा संगठन एकजुट दिखाई दिया। मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष की मौजूदगी में भरा गया नामांकन इस बात का संकेत था कि पार्टी ने इस उपचुनाव को पूरी गंभीरता से लिया है। गुरुवार की घोषणा के साथ यह प्रक्रिया पूरी हो गई।

हरदीप सिंह पुरी कौन हैं: राजनयिक से मंत्री तक का सफर

हरदीप सिंह पुरी का जन्म 15 फरवरी 1952 को नई दिल्ली में हुआ था। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक (ऑनर्स) की पढ़ाई प्रथम स्थान के साथ पूरी की और इतिहास में ही स्नातकोत्तर में प्रथम श्रेणी हासिल की। साल 1974 में वह भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुए और करीब चार दशक तक राजनयिक के रूप में काम किया।

विदेश सेवा में अपने कार्यकाल के दौरान पुरी 2009 से 2013 तक संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहे। उन्होंने जिनेवा और न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के साथ काम किया और टोक्यो तथा कोलंबो में भी महत्वपूर्ण राजनयिक जिम्मेदारियां निभाईं। विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय में भी वह कई अहम पदों पर रहे।

राजनय से सेवानिवृत्त होने के बाद पुरी जनवरी 2014 में भाजपा में शामिल हुए। जनवरी 2018 में वह पहली बार उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बने और नवंबर 2020 में दोबारा चुने गए। सितंबर 2017 में उन्हें आवास और शहरी कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें नागरिक उड्डयन मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली।

जुलाई 2021 में वह केंद्रीय मंत्री बने और उन्हें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के साथ आवास और शहरी कार्य मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। जून 2024 में नई सरकार के गठन के बाद वह पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री के रूप में काम कर रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अमृतसर से चुनाव लड़ा था, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार गुरजीत सिंह औजला से करीब एक लाख मतों से हार गए थे।

उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश तक: कार्यकाल का सवाल

पुरी का उत्तर प्रदेश से राज्यसभा का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए पांच अक्टूबर को घोषित उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम शामिल नहीं किया था, जिसके बाद उनके संसदीय भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई थीं। एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री के रूप में उनका राज्यसभा में बने रहना जरूरी माना जा रहा था।

28 अक्टूबर को भाजपा ने इन अटकलों पर विराम लगाते हुए पुरी को मध्य प्रदेश से राज्यसभा उपचुनाव का उम्मीदवार घोषित किया। इसके साथ ही यह साफ हो गया कि पुरी अब मध्य प्रदेश से राज्यसभा पहुंचेंगे। गुरुवार की घोषणा के बाद यह रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है और अब वह दो अप्रैल 2030 तक मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य रहेंगे।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री के रूप में पुरी के पास देश के ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी जिम्मेदारी है। वैश्विक ईंधन बाजार में दबाव और कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के बीच यह मंत्रालय केंद्र सरकार के लिए अहम माना जाता है। मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बनने के बाद अब वह संसद में प्रदेश के प्रतिनिधि के रूप में भी काम करेंगे।

आगे क्या: शपथ और संसद में नई भूमिका

निर्वाचन प्रमाण पत्र मिलने के बाद अब पुरी के शपथ ग्रहण की प्रक्रिया होगी। नए राज्यसभा सदस्य सभापति के समक्ष शपथ लेते हैं, जिसके बाद वह सदन की कार्यवाही में भाग ले सकते हैं। शपथ के बाद पुरी औपचारिक रूप से मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य के रूप में काम करना शुरू करेंगे।

मध्य प्रदेश के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि प्रदेश को अब संसद के उच्च सदन में एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री का प्रतिनिधित्व मिलेगा। पुरी के पास राजनय और सरकार, दोनों का लंबा अनुभव है। संसद में वह प्रदेश से जुड़े मुद्दों को उठा सकेंगे और केंद्र सरकार में मंत्री के रूप में प्रदेश के विकास से जुड़े कामों में उनकी भूमिका बनी रहेगी।

इस उपचुनाव के निर्विरोध संपन्न होने से भाजपा को भी राहत मिली है। बिना मतदान के ही पार्टी के उम्मीदवार का चुना जाना संगठन की मजबूती को दर्शाता है। अब सबकी नजर पुरी के शपथ ग्रहण और संसद के अगले सत्र में उनकी भूमिका पर रहेगी।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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