शाजापुर ब्यूरो
सार: शाजापुर जिले के रंथभंवर गांव में चल रहे कृष्णमृग रेस्क्यू अभियान का मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बुधवार को जायजा लिया। बोमा पद्धति से अब तक 1,275 कृष्णमृग सुरक्षित स्थानों पर भेजे जा चुके हैं। यह अभियान 31 अक्टूबर तक चलेगा और दूसरे चरण में 2,000 कृष्णमृगों के स्थानांतरण का लक्ष्य रखा गया है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बुधवार सुबह हेलीकॉप्टर से शाजापुर जिले के रंथभंवर गांव पहुंचे। गांव के अस्थायी हेलीपैड पर उतरने के बाद वे सड़क मार्ग से बोमा स्थल तक गए, जहां कृष्णमृगों को पकड़कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम चल रहा है। मौके पर उन्होंने वन विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों से अभियान की प्रगति और व्यवस्थाओं की जानकारी ली। विशेषज्ञों ने उन्हें बोमा पद्धति से रेस्क्यू की पूरी प्रक्रिया समझाई। मुख्यमंत्री ने कैमोफ्लाज्ड मचान से चल रहे रेस्क्यू कार्य को भी देखा और मौके पर मौजूद वन विभाग तथा प्रशासनिक टीम के सदस्यों के साथ समूह फोटो खिंचवाई। शाजापुर कृष्णमृग रेस्क्यू अभियान के दूसरे चरण का यह निरीक्षण इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे किसानों को फसलों के नुकसान से राहत और वन्यजीवों को सुरक्षित आवास, दोनों मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
हेलीकॉप्टर से हेलीपैड, फिर सड़क मार्ग से बोमा स्थल तक
मुख्यमंत्री के दौरे की शुरुआत सुबह करीब आठ बजे शाजापुर पहुंचने के साथ हुई थी। रंथभंवर गांव में बनाए गए अस्थायी हेलीपैड पर अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने उनकी अगवानी की। वहां से वे सीधे उस स्थान पर पहुंचे जहां बोमा बनाकर कृष्णमृगों को सुरक्षित तरीके से पकड़ा जा रहा है। निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से यह भी पूछा कि पकड़े गए वन्यजीवों को ले जाने, उनकी देखभाल करने और उन्हें छोड़ने की व्यवस्था किस तरह की गई है। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि पूरी प्रक्रिया में पशु चिकित्सकों की टीम, जरूरी उपकरण और प्रशिक्षित मैदानी कर्मचारी शामिल हैं, ताकि किसी भी वन्यजीव को चोट न पहुंचे। रंथभंवर और कुलमनखेड़ी क्षेत्र में चल रहे इस अभियान को लेकर स्थानीय लोगों में भी खासा उत्साह देखा गया, क्योंकि लंबे समय से कृष्णमृग और नीलगाय के झुंड खेतों में घुसकर फसलें चौपट कर रहे थे।
बोमा पद्धति क्या है और यह कैसे काम करती है
बोमा पद्धति दक्षिण अफ्रीका से आई एक विशेष तकनीक है, जिसमें हेलीकॉप्टर की मदद से वन्यजीवों को धीरे-धीरे हांककर एक कीप के आकार के घेरे की ओर ले जाया जाता है। इस घेरे को ही बोमा कहा जाता है। हेलीकॉप्टर से हांका लगाने का काम इस तरह किया जाता है कि जानवर घबराकर बिखरें नहीं, बल्कि नियंत्रित ढंग से तय रास्ते पर आगे बढ़ें। बोमा के अंदर पहुंचने के बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से पकड़कर विशेष वाहनों में रखा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में दक्षिण अफ्रीका की विशेषज्ञ संस्था कंजर्वेशन सॉल्यूशंस तकनीकी सहयोग दे रही है। मुख्यमंत्री ने मौके पर कहा कि दक्षिण एशिया में पहली बार हेलीकॉप्टर की मदद से बोमा पद्धति के आधार पर वन्यजीवों के रेस्क्यू का इतना बड़ा अभियान चलाया गया है। यह बात उन्होंने अपने संबोधन में संतोष के साथ रखी। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह बताई जाती है कि इसमें जानवरों को बिना चोट पहुंचाए, कम समय में और बड़ी संख्या में सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सकता है।

क्यों चल रहा है यह अभियान: फसलों पर मंडरा रहा संकट
शाजापुर जिले के साथ ही देवास, उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों में कृष्णमृग और नीलगाय की बढ़ती संख्या किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन गई थी। रातों-रात झुंड खेतों में घुस जाते थे और खड़ी फसल को भारी नुकसान पहुंचाते थे। कई गांवों में किसानों की मेहनत एक ही रात में बर्बाद हो जाती थी। इसी मानव-वन्यप्राणी द्वंद्व को कम करने के लिए वन विभाग ने यह अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य साफ है — फसलों को होने वाली क्षति को कम करना, प्रभावित ग्रामीण समुदायों को राहत देना और वन्यजीवों को उपयुक्त वन्य आवास में सुरक्षित स्थानांतरित करना। प्रदेश में किसान कल्याण वर्ष मनाया जा रहा है और सरकार का कहना है कि किसानों की फसलों की सुरक्षा के साथ वन्यजीवों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। इसी संतुलन को ध्यान में रखकर यह अभियान चलाया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने मीडिया से बातचीत में कहा कि सरकार की कोशिश है कि वन्यजीवों को भी किसी तरह का नुकसान न हो और किसानों की फसलें भी सुरक्षित रहें।
शाजापुर कृष्णमृग रेस्क्यू: अब तक का आंकड़ा और लक्ष्य
नौ अक्टूबर से शुरू हुए इस अभियान में अब तक 1,275 कृष्णमृगों को बोमा पद्धति से पकड़कर विभिन्न अभयारण्यों में भेजा गया है। ग्राम बाड़ीगांव में सोमवार को 169 और मंगलवार को 111 वन्यजीवों का रेस्क्यू किया गया, यानी वहां दो दिनों में कुल 280 वन्यजीवों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया। अभियान 31 अक्टूबर तक चलेगा और दूसरे चरण में कृष्णमृगों के स्थानांतरण का लक्ष्य 2,000 रखा गया है। एक बात का उल्लेख जरूरी है — मौके पर मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री ने लगभग 1,236 कृष्णमृगों के पकड़े जाने का आंकड़ा भी साझा किया था, जबकि ताजा रिपोर्ट में कुल संख्या 1,275 बताई गई है। आंकड़ों में यह मामूली अंतर रिपोर्टिंग के समय से जुड़ा है, क्योंकि अभियान लगातार जारी है और हर दिन नई संख्या जुड़ रही है। इसलिए इस खबर में ताजा रिपोर्ट के अनुसार 1,275 का आंकड़ा मुख्य रूप से दिया गया है। अभियान की रफ्तार को देखते हुए लक्ष्य पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है।
पकड़े गए हिरण कहां भेजे जा रहे हैं
जिले से पकड़े गए कृष्णमृग और नीलगाय को कूनो नेशनल पार्क श्योपुर, वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व सागर और गांधी सागर अभ्यारण्य मंदसौर भेजा जा रहा है। इनमें श्योपुर के जंगल और रानी दुर्गावती रिजर्व फॉरेस्ट भी शामिल हैं। इन अभयारण्यों में बड़ी संख्या में शेर, चीता, तेंदुआ और अन्य वन्य जीव रहते हैं। गांधी सागर में हाल में चीते भी बसाए गए हैं, इसलिए वहां कृष्णमृगों की मौजूदगी को शिकार-आधार मजबूत करने के लिहाज से भी देखा जाता है। पकड़े गए वन्यजीवों को सुरक्षित स्थानों तक ले जाने के लिए 11 ट्रकों की व्यवस्था की गई है। इस पूरी प्रक्रिया में पशु चिकित्सकों की टीम, जरूरी उपकरणों और विशेष सावधानियों का ध्यान रखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जानवरों को सुरक्षित तरीके से पकड़ने से लेकर उन्हें दूसरे स्थान पर पहुंचाने तक की व्यवस्था अपने आप में उल्लेखनीय है। रेस्क्यू के दौरान उनकी सेहत और सुरक्षा का ध्यान रखना बेहद जरूरी है, ताकि स्थानांतरण की प्रक्रिया में वन्यजीवों को किसी तरह की परेशानी न हो।
पिछले वर्ष का पायलट अभियान कैसे सफल हुआ
शाजापुर जिले में यह अभियान दूसरी बार चल रहा है। पिछले वर्ष इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया गया था और वह प्रदेश में अपनी तरह का पहला प्रयोग था, जिसमें ग्रामीण रहवासी क्षेत्र में हेलीकॉप्टर की मदद से बोमा तकनीक से वन्यजीव पकड़े गए। शुरुआत में लक्ष्य 400 कृष्णमृग पकड़ने का था, लेकिन सकारात्मक परिणाम सामने आने पर लक्ष्य बढ़ाया गया और अंत में लक्ष्य से दोगुने से ज्यादा, यानी 846 कृष्णमृग और 67 नीलगाय पकड़कर प्रदेश के विभिन्न अभयारण्यों में छोड़े गए। पिछले वर्ष के अभियान के दौरान प्रदेश के वन अमले के वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर मैदानी कर्मचारियों तक ने दक्षिण अफ्रीका की टीम की तकनीक को समझा और उसकी बारीकियां सीखीं। शाजापुर के साथ ही मंदसौर, नीमच, रतलाम, देवास, राजगढ़, उज्जैन और अन्य कुछ जिलों की वन विभाग टीमों ने अभियान में हिस्सा लिया और तकनीक सीखी थी। टीम में पायलट, चिकित्सक और वाहन चालक भी शामिल थे। उसी अनुभव का लाभ इस वर्ष के अभियान में मिल रहा है और अब प्रदेश का अपना अमला भी इस तकनीक में दक्ष होता जा रहा है।
सुरक्षा और परिवहन की क्या व्यवस्था है
रेस्क्यू अभियान में सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा गया है। दक्षिण अफ्रीका की टीम के मार्गदर्शन में पशु चिकित्सकों, वन अधिकारियों और मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों से आए प्रशिक्षित मैदानी कर्मचारियों की टीम रेस्क्यू, हैंडलिंग और परिवहन का काम संभाल रही है। पकड़े गए वन्यजीवों को विशेष रूप से तैयार ट्रकों में रखा जाता है और लंबी दूरी तक ले जाने के दौरान उनकी सेहत पर नजर रखी जाती है। मुख्यमंत्री ने इस व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि पशु चिकित्सकों, आवश्यक उपकरणों और पूरी सावधानी के साथ जानवरों को सुरक्षित रूप से ले जाने की यह व्यवस्था वास्तव में अद्भुत है। उन्होंने इस अभियान में जुटे वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को बधाई भी दी। अधिकारियों का कहना है कि हर चरण में यह ध्यान रखा जाता है कि किसी भी वन्यजीव को चोट न पहुंचे और स्थानांतरण के बाद वह नए आवास में सुरक्षित ढंग से रह सके।
मुख्यमंत्री ने क्या कहा: दूसरे राज्यों में भी चलेगा अभियान
निरीक्षण के बाद मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि किसान कल्याण वर्ष के तहत यह संतोषजनक काम है। अभियान के जरिए वन्यजीवों को सुरक्षित ढंग से विभिन्न अभयारण्यों में छोड़ा जा रहा है, जिससे किसानों को फसलों के नुकसान से राहत मिलेगी। उन्होंने कहा कि यह अभियान अन्य राज्यों और जिलों में भी चलाया जाएगा। मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई कि मध्यप्रदेश में इस परियोजना को मिलने वाली सफलता के आधार पर देश के दूसरे राज्य ही नहीं, बल्कि अन्य देश भी बोमा पद्धति को अपना सकते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार बनने के बाद से ही जनकल्याणकारी कार्यों को तेजी से धरातल पर उतारने का काम किया गया है, विशेष रूप से किसान कल्याण, युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने तथा प्रकृति और वन्यजीवों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किए गए हैं। काले हिरणों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का अभियान भी इसी दिशा में एक अहम कदम है और इससे मध्यप्रदेश वन्यजीव प्रबंधन के क्षेत्र में एक उदाहरण बन सकता है।
आगे क्या होगा
अभियान 31 अक्टूबर तक जारी रहेगा और दूसरे चरण का 2,000 कृष्णमृगों का लक्ष्य पूरा करने पर जोर है। इसके बाद अभियान के नतीजों का आकलन किया जाएगा कि किन क्षेत्रों में फसल नुकसान में कितनी कमी आई और स्थानांतरित वन्यजीव नए आवास में कैसे रह रहे हैं। सरकार की योजना इस तकनीक को दूसरे जिलों और राज्यों तक ले जाने की है, ताकि जहां भी कृष्णमृग और नीलगाय से फसलों को नुकसान की समस्या है, वहां भी इसी तरह का सुरक्षित समाधान अपनाया जा सके। शाजापुर के बाद मुख्यमंत्री का दिन इंदौर में अर्बन ग्रोथ कॉन्क्लेव से जुड़े कार्यक्रमों में बीतने वाला था, जहां शहरी विकास और निवेश पर मंथन होना है। लंबे समय की दृष्टि से यह भी अहम है कि प्रदेश का वन अमला खुद इस तकनीक में पूरी तरह दक्ष हो जाए, ताकि भविष्य में ऐसे अभियान स्थानीय टीमों के भरोसे भी चलाए जा सकें।
संतुलन की चुनौती: संरक्षण और फसल सुरक्षा साथ-साथ
यह अभियान एक बड़े सवाल का जवाब भी तलाश रहा है — खेती और वन्यजीव एक ही जमीन पर कैसे साथ रह सकते हैं। सिर्फ हिरणों को एक जगह से दूसरी जगह भेज देना स्थायी समाधान नहीं माना जाता। इसके साथ ही वन्य आवासों की देखभाल, वन्यजीवों की संख्या पर नजर और फसलों की सुरक्षा के उपाय भी जरूरी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर्याप्त और सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक वे खेतों की ओर आते रहेंगे। इसलिए स्थानांतरण के साथ-साथ आवास सुधार और निगरानी को भी उतना ही महत्व देना होगा। शाजापुर का यह प्रयोग अगर सफल रहता है, तो यह दूसरे राज्यों के लिए भी एक रास्ता दिखा सकता है कि किसान हित और वन्यजीव संरक्षण को टकराव की बजाय संतुलन के रास्ते पर कैसे ले जाया जाए। फिलहाल इस अभियान पर सबकी नजर है, क्योंकि इसके नतीजे आने वाले वर्षों में वन्यजीव प्रबंधन की दिशा तय कर सकते हैं।
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