नई दिल्ली ब्यूरो
सार: नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण बैठक में चार राज्यों ने सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े दशकों पुराने लंबित मुद्दों को सुलझाने की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में हुई प्राधिकरण की समीक्षा समिति की 15वीं बैठक में जुलाई 2026 में बने समझौते को प्रभावी रूप से लागू करने पर जोर दिया गया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव भी इस बैठक में शामिल हुए, क्योंकि नर्मदा का पानी, उसकी सिंचाई और उससे जुड़ी परियोजनाएं मध्य प्रदेश के लाखों किसानों और शहरों से सीधे जुड़ी हैं।
नर्मदा नदी मध्य भारत की जीवनरेखा मानी जाती है। यह नदी मध्य प्रदेश से निकलकर गुजरात तक जाती है और रास्ते में महाराष्ट्र और राजस्थान के हिस्सों को भी पानी देती है। इसलिए इस नदी के पानी के बंटवारे, बांधों के संचालन और परियोजनाओं की लागत को लेकर चारों राज्यों के बीच दशकों से बातचीत चलती रही है। 27 अक्टूबर की बैठक इसी लंबी बातचीत की ताजा कड़ी है। इस बैठक का महत्त्व इस बात में है कि चारों राज्य एक मंच पर आए, पुराने समझौते को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी और आगे की कार्ययोजना पर भी चर्चा हुई।
इस खबर का सीधा असर मध्य प्रदेश पर इसलिए पड़ता है, क्योंकि नर्मदा घाटी की ज्यादातर परियोजनाएं मध्य प्रदेश की धरती से जुड़ी हैं। यहां के बांधों से सिंचाई होती है, पीने का पानी मिलता है और बिजली भी बनती है। जब चार राज्यों के बीच पानी और परियोजना से जुड़े मुद्दे सुलझते हैं, तो मध्य प्रदेश में सिंचाई की योजनाओं, पेयजल की आपूर्ति और विकास के कामों को भी स्पष्ट दिशा मिलती है। यही वजह है कि इस बैठक को सिर्फ एक औपचारिक बैठक के रूप में नहीं, बल्कि नर्मदा घाटी के भविष्य से जुड़ी एक अहम बैठक के रूप में देखा जा रहा है।
नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण बैठक में क्या हुआ
27 अक्टूबर 2026 को नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण बैठक के तहत प्राधिकरण की समीक्षा समिति की 15वीं बैठक नई दिल्ली में हुई। बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल ने की। बैठक में सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े लंबे समय से लंबित मुद्दों पर चर्चा हुई और जुलाई 2026 में चारों राज्यों के बीच बने समझौते को प्रभावी रूप से लागू करने पर जोर दिया गया।
बैठक में कहा गया कि आपसी सहमति, समन्वय, सहयोग और विश्वास से दशकों पुराने जल समझौतों ने अब मूर्त रूप लेना शुरू कर दिया है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में अंतरराज्यीय जल सहयोग के नए आयाम स्थापित हुए हैं। बैठक में यह संदेश भी साफ रहा कि पुराने विवादों को टकराव से नहीं, बल्कि बातचीत और सहयोग से सुलझाया जाएगा।
नर्मदा जल समझौते की क्रियान्विति पर बैठक में विस्तार से चर्चा हुई। चारों राज्यों ने यह माना कि समझौते को जमीन पर उतारना ही असली काम है। कागज पर बनी सहमति तभी मायने रखेगी, जब पानी का सही बंटवारा हो, परियोजनाओं का काम समय पर आगे बढ़े और किसानों तक पानी पहुंचे। इसी सोच के साथ बैठक में आगे की कार्ययोजना पर भी बात हुई।
नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण बैठक में कौन-कौन शामिल हुआ
नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण बैठक में चारों नर्मदा घाटी राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हुए। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव, गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा बैठक में शामिल रहे। इसके अलावा केंद्र और राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में मौजूद रहे।
चारों मुख्यमंत्रियों की एक साथ मौजूदगी इस बैठक की सबसे बड़ी खासियत रही। पानी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जब चारों राज्य एक मंच पर आते हैं, तो फैसलों को लागू करना आसान हो जाता है। पहले कई बार ऐसा हुआ है कि एक राज्य की सहमति के बाद दूसरे राज्य की आपत्ति से काम अटक जाता था। इस बार बैठक का माहौल सहयोग का रहा, जिसमें सभी राज्यों ने एक-दूसरे की जरूरतों को समझने की कोशिश की।
मध्य प्रदेश के लिहाज से मुख्यमंत्री मोहन यादव की मौजूदगी इसलिए अहम थी, क्योंकि नर्मदा परियोजनाओं का सबसे बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश से जुड़ा है। मध्य प्रदेश में नर्मदा पर बने बांध, नहरें और सिंचाई परियोजनाएं राज्य की खेती और पेयजल व्यवस्था की रीढ़ हैं। इसलिए बैठक में मध्य प्रदेश के हितों की बात उठना स्वाभाविक था।
जुलाई 2026 का समझौता क्या था
इस बैठक की पृष्ठभूमि में 7 जुलाई 2026 का समझौता है। उस दिन नई दिल्ली में चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में, नर्मदा जल से जुड़ा एक समझौता हुआ था। 27 अक्टूबर की बैठक में उसी समझौते को प्रभावी रूप से लागू करने की बात कही गई।
जुलाई के समझौते का मकसद लंबे समय से चले आ रहे वित्तीय और संचालन से जुड़े मुद्दों को एक साझा रास्ते पर लाना था। सरदार सरोवर परियोजना की लागत, उसके रखरखाव और प्रभावित क्षेत्रों से जुड़े सवालों पर चारों राज्यों के बीच अलग-अलग राय रही है। जुलाई में बनी सहमति ने इन सवालों को सुलझाने का एक ढांचा दिया था। अक्टूबर की बैठक में उसी ढांचे को आगे बढ़ाया गया।
यहां एक बात साफ करना जरूरी है। बैठक के बाद आए अलग-अलग विवरणों में समझौते की स्थिति को लेकर थोड़ा फर्क दिखता है। एक ओर केंद्रीय मंत्री के संदेश में लंबित देयों के निपटारे को अंतिम रूप देने की बात कही गई है। दूसरी ओर, एक रिपोर्ट में कहा गया है कि समझौते की मंजूरी के बाद भी कुछ लंबित मुद्दों पर आगे चर्चा की जरूरत होगी। इसलिए इस खबर में यह दावा नहीं किया जा रहा है कि सारे बकाया एक ही दिन में चुका दिए गए हैं। सही तस्वीर यह है कि समझौता आगे बढ़ा है, उसे लागू करने की दिशा में कदम उठे हैं और कुछ मुद्दों पर आगे भी बातचीत जारी रहेगी।
मध्य प्रदेश के लिए इसका क्या अर्थ है
मध्य प्रदेश के लिए नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं है, बल्कि खेती, पेयजल और बिजली का बड़ा स्रोत है। राज्य में नर्मदा घाटी की परियोजनाओं से लाखों हेक्टेयर खेतों को सिंचाई का पानी मिलता है। इंदौर जैसे बड़े शहरों को भी नर्मदा का पानी मिलता है। धार की नर्मदा माइक्रो लिफ्ट परियोजना इसका एक ताजा उदाहरण है, जिसमें सैकड़ों गांवों के खेतों तक नर्मदा का पानी पहुंचाने की योजना है।
जब चार राज्यों के बीच नर्मदा से जुड़े मुद्दे सुलझते हैं, तो मध्य प्रदेश को तीन तरह के फायदे होते हैं। पहला, सिंचाई की योजनाओं को लेकर अनिश्चितता कम होती है। दूसरा, पेयजल की आपूर्ति को लेकर राज्यों के बीच तालमेल बेहतर होता है। तीसरा, बिजली उत्पादन और परियोजनाओं के रखरखाव को लेकर स्पष्टता आती है। ये तीनों बातें सीधे किसानों और आम लोगों के जीवन से जुड़ी हैं।
कैबिनेट की सिंचाई मंजूरियां भी इसी दिशा में एक कड़ी हैं। हाल ही में राज्य सरकार ने सिंचाई परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिनसे कई जिलों के किसानों को फायदा मिलने की उम्मीद है। नर्मदा घाटी में राज्यों के बीच सहयोग बढ़ने से ऐसी परियोजनाओं को भी गति मिलने की उम्मीद की जा रही है। हालांकि, किसी एक बैठक से सारी परियोजनाएं एक साथ पूरी नहीं हो जातीं। असली फायदा तब मिलेगा, जब समझौते के फैसले जमीन पर लागू होंगे।
1979 का अधिकरण फैसला और प्राधिकरण की भूमिका
नर्मदा के पानी के बंटवारे की कहानी 1979 से शुरू होती है। उस साल नर्मदा जल विवाद अधिकरण ने अपना अंतिम फैसला दिया था। इस फैसले में नर्मदा के पानी का बंटवारा मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच किया गया था। हर राज्य को उसके हिस्से का पानी, उसके उपयोग की शर्तें और परियोजनाओं से जुड़े अधिकार तय किए गए थे।
इस फैसले को लागू करने के लिए 1980 में नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण का गठन किया गया था। प्राधिकरण का काम यह देखना है कि अधिकरण के फैसले के अनुसार पानी का बंटवारा हो, बांधों का संचालन सही तरीके से हो और परियोजनाओं का काम तय नियमों के अनुसार आगे बढ़े। प्राधिकरण की समीक्षा समिति की बैठकें इसी काम की निगरानी के लिए होती हैं।
15वीं बैठक का मतलब यह है कि यह निगरानी की प्रक्रिया लगातार चल रही है। हर बैठक में पुराने फैसलों की समीक्षा होती है, नई समस्याओं पर चर्चा होती है और आगे के काम की दिशा तय होती है। इसलिए 27 अक्टूबर की बैठक को एक अकेली घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक लंबी संस्थागत प्रक्रिया के हिस्से के रूप में देखना चाहिए।
सरदार सरोवर परियोजना क्यों अहम है
सरदार सरोवर परियोजना नर्मदा नदी पर बनी सबसे बड़ी परियोजना है। यह बांध गुजरात के केवडिया के पास नर्मदा नदी पर बना है। इस परियोजना से गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान को पानी और बिजली का लाभ मिलता है। सिंचाई के लिए पानी, शहरों के लिए पेयजल और बिजली उत्पादन — ये तीनों काम इस परियोजना से जुड़े हैं।
इस परियोजना की कहानी लंबी और विवादों से भरी रही है। बांध के निर्माण के दौरान विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरण से जुड़े सवाल उठे थे। प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को लेकर लंबी लड़ाई चली थी। अदालतों में भी इस परियोजना से जुड़े मामले गए थे। इन्हीं वजहों से सरदार सरोवर परियोजना सिर्फ एक बांध नहीं, बल्कि विकास, विस्थापन और राज्यों के अधिकारों से जुड़ी एक बड़ी बहस का प्रतीक भी बन गई है।
आज जब चारों राज्य इस परियोजना से जुड़े लंबित मुद्दों को सुलझाने की बात करते हैं, तो उसमें परियोजना की लागत, रखरखाव और प्रभावित क्षेत्रों से जुड़े सवाल भी शामिल होते हैं। इन सवालों का समाधान आसान नहीं है, क्योंकि हर राज्य की अपनी जरूरतें और अपनी दलीलें हैं। यही वजह है कि इस तरह की बैठकों में धैर्य और बातचीत की जरूरत होती है।

राजस्थान का अधिशेष पानी का प्लान
बैठक में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने मानसून के दौरान मिलने वाले अधिशेष पानी के उपयोग की योजना के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि राजस्थान सरकार 1979 के अधिकरण फैसले के तहत मानसून अवधि में उपलब्ध अधिशेष जल के उपयोग के लिए प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है। अधिशेष जल के भंडारण के लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
राजस्थान के मुख्यमंत्री ने कहा कि मानसून के दौरान व्यर्थ बहने वाले अतिरिक्त पानी को संरक्षित करके प्रदेश के जलाभावग्रस्त क्षेत्रों की बढ़ती मांग को पूरा करना इस योजना का मकसद है। पश्चिमी राजस्थान में पानी की कमी एक पुरानी समस्या है। वहां पीने के पानी और सिंचाई के पानी की जरूरत हर साल बढ़ रही है। इसलिए अधिशेष पानी को सहेजने की योजना को राजस्थान के लिए अहम माना जा रहा है।
बैठक में यह भी बताया गया कि राजस्थान में नर्मदा नहर परियोजना के तहत जालोर और बाड़मेर जिलों के पूरे कमांड क्षेत्र में स्प्रिंकलर सिंचाई को अनिवार्य किया गया है। इससे पानी की बर्बादी लगभग न के बराबर हो गई है। 2.46 लाख हेक्टेयर के खेती योग्य कमांड क्षेत्र के लिए 40 प्रतिशत सिंचाई तीव्रता का लक्ष्य भी हासिल किया जा रहा है। किसानों की फसल पैदावार में बढ़ोतरी हो रही है। इस मॉडल को पूरे देश के लिए जल संरक्षण का एक उदाहरण बताया गया।
राजस्थान के मुख्यमंत्री ने रामजल सेतु लिंक परियोजना और यमुना जल समझौते का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और पड़ोसी राज्यों के साथ बेहतर समन्वय से अंतरराज्यीय जल सहयोग के नए आयाम स्थापित हुए हैं। इन समझौतों ने जलाभावग्रस्त क्षेत्रों के लिए नई उम्मीद जगाई है।
आगे क्या होगा
नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण बैठक के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि समझौते के फैसले जमीन पर कैसे उतरते हैं। प्राधिकरण की समीक्षा समिति की आगे की बैठकों में यह देखा जाएगा कि जुलाई के समझौते के तहत तय काम कितने आगे बढ़े हैं। अगर काम समय पर आगे बढ़ता है, तो किसानों और शहरों को इसका फायदा मिलने लगेगा।
आगे की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पानी का बंटवारा मौसम पर निर्भर करता है। मानसून कमजोर रहने पर राज्यों के बीच पानी को लेकर तनाव बढ़ सकता है। इसलिए प्राधिकरण को हर साल मानसून की स्थिति, बांधों में पानी के स्तर और सिंचाई की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा। यही इस प्राधिकरण का सबसे कठिन काम है।
मध्य प्रदेश के लिए आगे का रास्ता यह है कि राज्य सरकार नर्मदा घाटी की अपनी परियोजनाओं को तेज करे और प्राधिकरण के फैसलों का लाभ किसानों तक पहुंचाए। सिंचाई की नहरों, पाइपलाइन आधारित परियोजनाओं और पेयजल की योजनाओं को समय पर पूरा करना होगा। तभी बैठक में बनी सहमति का असली फायदा मध्य प्रदेश के लोगों को मिलेगा।
क्यों यह खबर किसानों और शहरों के लिए मायने रखती है
आम आदमी के लिए नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण बैठक की खबर दूर की खबर लग सकती है। लेकिन इसका असर सीधे खेतों और घरों तक पहुंचता है। जब पानी का बंटवारा साफ होता है, तो किसान को यह भरोसा रहता है कि उसकी फसल के लिए पानी मिलेगा। जब परियोजनाओं का काम आगे बढ़ता है, तो नए गांवों तक सिंचाई पहुंचती है। जब शहरों को पानी की आपूर्ति को लेकर राज्यों के बीच तालमेल रहता है, तो गर्मियों में पानी की किल्लत कम होती है।
इसलिए इस बैठक को सिर्फ चार मुख्यमंत्रियों की बैठक के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह बैठक नर्मदा घाटी के भविष्य, किसानों की सिंचाई, शहरों के पेयजल और राज्यों के बीच सहयोग की कहानी है। अगर समझौते के फैसले जमीन पर उतरते हैं, तो इसका फायदा मध्य प्रदेश सहित चारों राज्यों के लोगों को मिलेगा। अगर फैसले कागज पर ही रह जाते हैं, तो पुरानी समस्याएं फिर से उभर सकती हैं।
अगली बैठक और उसके बाद की प्रगति पर नजर रखना इसलिए जरूरी है। नर्मदा का पानी किसी एक राज्य की संपत्ति नहीं है। यह चारों राज्यों की साझा धरोहर है। इस धरोहर का सही उपयोग तभी होगा, जब चारों राज्य एक-दूसरे के साथ सहयोग करते रहेंगे। 27 अक्टूबर की बैठक ने इसी सहयोग की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है।
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