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विजयादशमी पर सिंदूर खेला: मां दुर्गा की विदाई में महिलाओं ने खेला सिंदूर, कोलकाता से दिल्ली तक धूम

सांकेतिक चित्र: सिंदूर खेला (फोटो: सांकेतिक, फाइल फोटो)

डेस्क रिपोर्ट

21 अक्टूबर (बुधवार) को विजयादशमी के साथ पांच दिवसीय दुर्गा पूजा उत्सव का समापन हो गया। समापन के इस भावुक क्षण में पश्चिम बंगाल सहित देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं ने पारंपरिक सिंदूर खेला में भाग लिया। सिंदूर खेला में महिलाएं पहले देवी दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे के माथे और गालों पर सिंदूर लगाती हैं। यह मां दुर्गा की विदाई का प्रतीक है और इसके साथ महिलाएं अपने वैवाहिक सुख तथा परिवार की समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।

सिंदूर खेला: परंपरा और अर्थ

सिंदूर खेला बंगाल की दुर्गा पूजा का सबसे भावनात्मक और रंगीन अनुष्ठान माना जाता है। विजयादशमी के दिन, प्रतिमा विसर्जन से पहले, विवाहित महिलाएं लाल साड़ी और पारंपरिक श्रृंगार में सजकर देवी के सामने एकत्र होती हैं। पहले वे मां दुर्गा के चरणों में सिंदूर अर्पित करती हैं — यह मां की विदाई का प्रतीक है। इसके बाद वे एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मां से अपने पति की दीर्घायु तथा परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। सिंदूर सुहाग का प्रतीक है, इसलिए यह अनुष्ठान वैवाहिक जीवन की मंगलकामना से जुड़ा है। ढाक की थाप, शंखनाद और ‘आसছে बोछोर आबार होबे’ (अगले साल फिर होगा) के नारों के बीच यह दृश्य हर वर्ष लाखों लोगों को भावुक कर देता है।

कोलकाता और बीरभूम में धूम

कोलकाता में इस वर्ष भी सिंदूर खेला की धूम रही। शहर के प्रमुख पूजा पंडालों में महिलाओं ने उत्साहपूर्वक सिंदूर खेला में भाग लिया, जिनमें मुदियाली क्लब का पंडाल भी शामिल था। सुबह से ही पंडालों में महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी थी। बीरभूम जिले में भी पारंपरिक उत्साह के साथ सिंदूर खेला का आयोजन हुआ। PTI और ANI जैसी समाचार एजेंसियों की तस्वीरों वाली खबरें आज राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता से छपीं, जिनमें सिंदूर से सनी महिलाओं के भावुक और रंगीन दृश्य कैद थे।

बेलूर मठ: दर्पण विसर्जन और शांति-जल

रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय बेलूर मठ में विजयादशमी की पूजा पारंपरिक विधि-विधान से संपन्न हुई। सुबह 6:30 बजे देवी की पूजा हुई और 8:30 बजे दर्पण विसर्जन किया गया। दर्पण विसर्जन में देवी की प्रतिमा के सामने दर्पण रखकर उसमें देवी का प्रतिबिंब देखकर विसर्जन का संकल्प लिया जाता है। शाम की आरती के बाद प्रतिमा का विसर्जन किया गया और उपस्थित श्रद्धालुओं पर शांति-जल छिड़का गया। बेलूर मठ की दुर्गा पूजा अपने अनुशासन और आध्यात्मिक वातावरण के लिए देशभर में प्रसिद्ध है।

दिल्ली और त्रिपुरा में बंगाली प्रवासियों का उत्सव

पश्चिम बंगाल से दूर रह रहे बंगाली प्रवासी भी इस परंपरा से अछूते नहीं रहे। दिल्ली के चित्तरंजन पार्क (CR पार्क) और आरामबाग पूजा समिति में बंगाली प्रवासी महिलाओं ने उत्साहपूर्वक सिंदूर खेला। CR पार्क, जिसे दिल्ली का ‘मिनी कोलकाता’ कहा जाता है, में हर साल दुर्गा पूजा बड़े धूमधाम से मनाई जाती है और सिंदूर खेला यहां का मुख्य आकर्षण होता है। दक्षिण त्रिपुरा में भी महिलाओं ने सिंदूर खेला में भाग लेकर मां की विदाई की।

मुंबई: सेलिब्रिटी भक्तिभाव और वायरल ‘कबीरा’

मुंबई के नॉर्थ बॉम्बे सरबोजनीन दुर्गा पूजा पंडाल में इस बार सेलिब्रिटी भक्तों की खूब चर्चा रही। अभिनेता रणबीर कपूर, फिल्म निर्माता अयान मुखर्जी और गायिका हरशदीप कौर पंडाल में देखे गए। हरशदीप कौर के ‘कबीरा’ गायन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसे भक्तों ने खूब सराहा। मुंबई की दुर्गा पूजा में बंगाली परंपरा और बॉलीवुड का यह संगम हर साल आकर्षण का केंद्र रहता है।

आगे क्या

विजयादशमी के साथ दुर्गा पूजा का समापन हो गया है और अब श्रद्धालु अगले वर्ष मां के आगमन की प्रतीक्षा करेंगे। सिंदूर खेला की ये तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं, जो बंगाल की इस अनूठी परंपरा को देश-दुनिया तक पहुंचा रहे हैं। मां दुर्गा की विदाई के साथ ही बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश लेकर विजयादशमी का पर्व संपन्न हुआ।

पांच दिवसीय उत्सव का भावुक समापन

दुर्गा पूजा का उत्सव पांच दिनों तक चलता है — षष्ठी को देवी का बोधन और आमंत्रण होता है, सप्तमी, अष्टमी और नवमी को विशेष पूजा-अर्चना होती है, और दशमी को विजयादशमी के साथ मां की विदाई होती है। इन पांच दिनों में पंडाल श्रद्धालुओं से भरे रहते हैं, ढाक बजता है, धुनुची नृत्य होता है और भोग का वितरण होता है। लेकिन दशमी का दिन सबसे भावुक होता है — जिस मां का पांच दिन तक स्वागत-सत्कार किया, उन्हीं की विदाई का क्षण। महिलाएं एक ओर खुशी मनाती हैं कि मां आईं, तो दूसरी ओर आंखें नम हो जाती हैं कि अब अगले साल ही दर्शन होंगे। यही भावना सिंदूर खेला को केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक भावनात्मक अनुभव बनाती है।

सुहाग और समृद्धि का प्रतीक

सिंदूर खेला का सामाजिक अर्थ भी गहरा है। सिंदूर भारतीय परंपरा में सुहाग और वैवाहिक जीवन की खुशहाली का प्रतीक है। जब महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, तो वे आपस में सुख-दुख बांटने और एक-दूसरे के परिवार की खुशहाली की कामना करने का संकल्प भी दोहराती हैं। यह अनुष्ठान महिलाओं के बीच आपसी बंधन और सामुदायिक एकता को भी मजबूत करता है। बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक, जहां भी बंगाली समुदाय है, वहां सिंदूर खेला इसी भावना के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष भी देशभर से आई तस्वीरों में यही भावना झलक रही है — रंग, भक्ति और आपसी प्रेम का अनूठा संगम।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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