पांढुर्णा ब्यूरो
सार: पांढुर्णा में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव में मुख्यमंत्री निवास से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से जिले के उन्नतशील किसानों ने संवाद किया और खेती में किए जा रहे नवाचारों तथा अपनी सफलता के अनुभव साझा किए। प्राकृतिक खेती से तैयार उत्पादों के जापान और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचने, 16 एकड़ में संतरे से 15 से 20 लाख रुपये की सालाना आय और दुग्ध प्रसंस्करण इकाई से रोजगार सृजन की कहानियों ने महोत्सव में मौजूद किसानों को नई प्रेरणा दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि कम वर्षा की स्थिति को देखते हुए सर्वे कराया जा रहा है और किसानों को हरसंभव सहायता एवं सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
मुख्यमंत्री निवास से वर्चुअल संवाद, किसानों के अनुभव सुने
बुधवार को पांढुर्णा में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री निवास से वर्चुअली संबोधित किया और जिले के उन्नतशील कृषकों से सीधा संवाद किया। महोत्सव में मौजूद किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक, प्राकृतिक खेती, कृषि यंत्रीकरण और शासन की विभिन्न किसान हितैषी योजनाओं की जानकारी भी दी गई। कार्यक्रम में उन्नतशील किसानों, मेधावी विद्यार्थियों और पशुपालकों का सम्मान भी किया गया।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन की शुरुआत में जामसांवली धाम के हनुमान जी का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश निरंतर विकास के नए आयाम स्थापित कर रहा है और किसान, महिला, युवा एवं गरीब सहित समाज के सभी वर्गों के कल्याण के लिए राज्य सरकार संकल्पबद्ध है। किसानों की आय बढ़ाने और समृद्धि के लिए सरकार निरंतर कार्य कर रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2026 को किसान कल्याण वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है और बलराम कृषि महोत्सव के माध्यम से किसानों को उन्नत कृषि तकनीक, प्राकृतिक खेती और किसान हितैषी योजनाओं से जोड़ने का कार्य किया जा रहा है। पांढुर्णा जिला गेहूं, मक्का, चना, तुअर और संतरा उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। यहां खेती-किसानी के साथ किसानों की आय और दुग्ध उत्पादन में भी निरंतर वृद्धि हो रही है।
कार्यक्रम में पांढुर्णा जिले के प्रभारी मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने भी वर्चुअल संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि पांढुर्णा जिला खेती के साथ कृषि आधारित उत्पादों के निर्माण में भी आगे बढ़ रहा है और जिले में स्थापित विभिन्न कृषि आधारित इकाइयों से युवाओं को रोजगार मिल रहा है। उन्होंने ग्रामीणों को उनकी संपत्ति की निःशुल्क रजिस्ट्री कराने के लिए मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। मध्यप्रदेश राज्य सहकारी बैंक के प्रशासक महेंद्र सिंह यादव ने किसानों को आधुनिक एवं उन्नत खेती के नवाचारों से जोड़ने और बलराम जयंती को किसान दिवस घोषित करने के लिए मुख्यमंत्री का आभार माना।
कार्यक्रम में कलेक्टर नीरज कुमार वशिष्ठ, सांस्कृतिक प्रकोष्ठ संयोजक एवं प्रदेश प्रभारी बलराम कृषि महोत्सव कपिल यारदे, पूर्व मंत्री नानाभाऊ मोहोड़, संदीप मोहोड़, नगर पालिका अध्यक्ष संदीप घाटोडे, जनपद अध्यक्ष लताबाई तुमडॉम सहित अनेक जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में किसान उपस्थित रहे।
प्राकृतिक खेती से जापान और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंचे उत्पाद
संवाद के दौरान विकासखंड सौंसर के ग्राम भुम्मा के कृषक मटरूलाल डोंगरे ने अपनी सफलता की कहानी सुनाई। उन्होंने बताया कि वे प्राकृतिक खेती से हल्दी, अरहर एवं गेहूं का उत्पादन कर रहे हैं। उत्पादों का वैल्यू एडिशन कर वे प्रतिवर्ष 2 से 2.5 लाख रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित कर रहे हैं। उनके प्राकृतिक उत्पाद जापान और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच रहे हैं।
मटरूलाल डोंगरे का अनुभव इस बात का उदाहरण है कि रासायनिक खादों पर निर्भरता घटाकर और फसल के बाद मूल्य संवर्धन पर ध्यान देकर एक छोटा किसान भी अपनी आय को सम्मानजनक स्तर तक ले जा सकता है। प्राकृतिक खेती में मिट्टी की सेहत बनी रहती है, लागत घटती है और उत्पाद के लिए अलग बाजार मिलता है। महोत्सव में मौजूद किसानों के लिए यह कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसमें खेती के साथ प्रसंस्करण और विपणन की पूरी कड़ी शामिल थी।
मुख्यमंत्री ने ऐसे नवाचारी किसानों की सराहना करते हुए कहा कि बलराम कृषि महोत्सव का उद्देश्य ही यही है कि किसानों को उन्नत कृषि तकनीक और प्राकृतिक खेती से जोड़ा जाए, ताकि वे अपनी मेहनत का पूरा मूल्य पा सकें।

16 एकड़ संतरे से 15 से 20 लाख रुपये की सालाना आय
ग्राम तिगांव के कृषक नरेंद्र ठाकरे ने बताया कि वे 16 एकड़ में संतरे का उत्पादन कर प्रतिवर्ष 15 से 20 लाख रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। इसके साथ ही वे पशुपालन एवं सब्जी उत्पादन भी कर रहे हैं। उनकी कहानी बताती है कि एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय बागवानी, पशुपालन और सब्जी उत्पादन का संयोजन आय को स्थिरता देता है और बाजार के उतार-चढ़ाव का जोखिम कम करता है।
पांढुर्णा जिला संतरा उत्पादन के लिए जाना जाता है और यहां की जलवायु तथा मिट्टी संतरे की खेती के अनुकूल मानी जाती है। ठाकरे जैसे किसानों का अनुभव दूसरे किसानों को यह समझने में मदद करता है कि बागवानी में शुरुआती निवेश और देखभाल के बाद लंबे समय तक नियमित आय मिल सकती है। पशुपालन से दूध की दैनिक आय और सब्जियों से नकदी का प्रवाह बना रहता है, जिससे परिवार की नियमित जरूरतें पूरी होती हैं।
350 महिलाओं की खादी और सीड ज्वेलरी की पहल
ग्राम पारडसिंगा की रोशनी नरवरे ने बताया कि वे 14 गांवों की 350 महिलाओं को जोड़कर देशी कपास से खादी, सीड बॉल एवं सीड ज्वेलरी का निर्माण करवा रही हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से इन उत्पादों की बिक्री कर महिलाएं अच्छी आय अर्जित कर रही हैं।
यह पहल खेती से आगे बढ़कर ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण की कहानी है। देशी कपास से बनी खादी और बीजों से बने आभूषण जैसे उत्पाद पारंपरिक हुनर को आधुनिक बाजार से जोड़ते हैं। ऑनलाइन बिक्री ने इन महिलाओं को अपने गांव से बाहर निकले बिना ग्राहकों तक पहुंचने का रास्ता दिया है। महोत्सव में इस अनुभव को साझा करने का उद्देश्य यही था कि अन्य गांवों की महिलाएं भी समूह बनाकर ऐसे काम शुरू कर सकें।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि समाज के सभी वर्गों के कल्याण के लिए सरकार संकल्पबद्ध है। महिलाओं के ऐसे समूह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं और परिवारों की आय में सीधा योगदान देते हैं।
दुग्ध प्रसंस्करण इकाई से आय और रोजगार दोनों
पांढुर्णा के कृषक कृष्ण कुमार रबड़े ने पीएमएफएमई योजना का लाभ लेकर दुग्ध प्रसंस्करण इकाई स्थापित की है। वे पनीर, घी एवं मावा जैसे उत्पाद तैयार कर प्रतिवर्ष 8 से 10 लाख रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। उनकी इकाई से 8 से 10 लोगों को रोजगार भी मिला है।
रबड़े का अनुभव बताता है कि दूध को कच्चा बेचने के बजाय उसका प्रसंस्करण करने से किसान की आय कई गुना बढ़ जाती है। पनीर, घी और मावा जैसे उत्पादों की मांग शहरों में लगातार बनी रहती है और इनका भंडारण भी कच्चे दूध की तुलना में आसान होता है। साथ ही, एक छोटी इकाई से आसपास के लोगों को रोजगार मिलता है, जिससे गांव की अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है।
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना यानी पीएमएफएमई का उद्देश्य ऐसे ही छोटे खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को सहारा देना है। महोत्सव में इस योजना की जानकारी देने का मकसद यह था कि दूध, फल और अनाज का प्रसंस्करण करने वाले किसान इसका लाभ उठा सकें।
जैविक खेती और समन्वित कृषि का मॉडल
ग्राम पिपलानी के कृषक विजेश भादे ने बताया कि आत्मा योजना के तहत बीआरसी सेंटर स्थापित कर वे 2.5 एकड़ में जैविक खेती कर रहे हैं। पशुपालन एवं उद्यानिकी सहित समन्वित खेती अपनाकर वे प्रतिवर्ष 3 से 4 लाख रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं।
समन्वित खेती का अर्थ है कि खेत का हर हिस्सा एक-दूसरे का पूरक बने — फसल से पशुओं को चारा मिले, पशुओं से खेत को खाद मिले और बागवानी से अतिरिक्त आय हो। भादे का मॉडल छोटे खेत वाले किसानों के लिए इसलिए उपयोगी है क्योंकि इसमें कम जमीन पर भी कई स्रोतों से आय बनती है। आत्मा योजना के तहत स्थापित बीआरसी सेंटर किसानों को तकनीक और प्रशिक्षण का स्थानीय केंद्र उपलब्ध कराते हैं।
तीन लाख तक ब्याज मुक्त ऋण और कम वर्षा पर सर्वे का भरोसा
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार किसानों को तीन लाख रुपये तक का ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध करा रही है। इस ऋण से किसान बीज, खाद, उपकरण और सिंचाई की व्यवस्था समय पर कर सकते हैं, बिना ब्याज के बोझ के। महोत्सव में किसानों को ऐसी योजनाओं की पात्रता और आवेदन की प्रक्रिया की जानकारी भी दी गई।
कम वर्षा की स्थिति पर मुख्यमंत्री ने कहा कि सर्वे कराया जा रहा है और किसानों को हरसंभव सहायता एवं सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। यह भरोसा पांढुर्णा के किसानों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कम बारिश से फसल प्रभावित होने पर सर्वे ही मुआवजा और सहायता का आधार बनता है। सरकार की ओर से सर्वे की बात दोहराए जाने से किसानों को यह संकेत मिला है कि उनकी स्थिति का आकलन किया जा रहा है।
पांढुर्णा की कृषि पहचान और बलराम महोत्सव की कड़ी
पांढुर्णा जिला गेहूं, मक्का, चना, तुअर और संतरा उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। यहां खेती के साथ दुग्ध उत्पादन भी बढ़ रहा है। बलराम कृषि महोत्सव की कड़ी में प्रदेश के विभिन्न जिलों में ऐसे आयोजन हो रहे हैं, जिनमें मुख्यमंत्री किसानों से संवाद कर रहे हैं। छिंदवाड़ा में आयोजित महोत्सव में भी मक्का और स्वीट कॉर्न को राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने तथा सिंचाई क्षमता बढ़ाने की बात सामने आई थी। पांढुर्णा का महोत्सव उसी श्रृंखला की अगली कड़ी है, लेकिन इसकी कहानियां पूरी तरह स्थानीय किसानों की अपनी हैं।
बलराम कृषि महोत्सव का आयोजन किसान कल्याण वर्ष के तहत किया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसानों को आधुनिक तकनीक, प्राकृतिक खेती और शासन की योजनाओं से जोड़ना है। हर जिले के महोत्सव में वहां के किसानों के अपने अनुभव सामने आते हैं, जिससे दूसरे जिलों के किसान भी सीख सकते हैं। पांढुर्णा में महिलाओं के समूह, दुग्ध प्रसंस्करण और जैविक खेती के अनुभव इसी कड़ी का हिस्सा हैं।
आगे क्या: सर्वे के बाद सहायता और तकनीक से जुड़ाव
महोत्सव के बाद अब निगाहें कम वर्षा के सर्वे और उसके आधार पर मिलने वाली सहायता पर रहेंगी। किसानों को उम्मीद है कि सर्वे पूरा होने के बाद प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुंचेगी। साथ ही, महोत्सव में दी गई तकनीक और योजनाओं की जानकारी का लाभ उठाकर किसान अपनी खेती में बदलाव ला सकेंगे।
प्राकृतिक और जैविक खेती अपनाने वाले किसानों के उत्पादों के लिए बाजार तक पहुंच, दुग्ध प्रसंस्करण जैसी इकाइयों के लिए योजना का लाभ और महिलाओं के समूहों के लिए ऑनलाइन बिक्री का विस्तार — ये वे रास्ते हैं जिन पर पांढुर्णा के किसानों की आगे की कहानी निर्भर करेगी। बलराम कृषि महोत्सव ने इन रास्तों की ओर ध्यान दिलाया है, अब इन पर चलना किसानों और प्रशासन की साझा जिम्मेदारी होगी।
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