4 अक्टूबर 1957 की रात कजाखस्तान के बैकानूर से उठे एक रॉकेट ने इंसानियत के इतिहास का रुख बदल दिया था। उस रॉकेट के ऊपर सवार था सिर्फ 84 किलो वज़नी एक चमकदार धातु का गोला — स्पुतनिक-1। दुनिया के पहले कृत्रिम उपग्रह के प्रक्षेपण को आज 69 साल पूरे हो गए हैं, और आज ही से विश्व अंतरिक्ष सप्ताह 2026 की शुरुआत हो रही है।
सिर्फ 58 सेंटीमीटर का गोला, जिसने ‘बीप-बीप’ से दुनिया हिला दी
स्पुतनिक-1 दिखने में बेहद साधारण था — 58 सेंटीमीटर व्यास का गोलाकार धातु का खोल, जिस पर चार लंबे एंटीना लगे थे। लेकिन इसके अंदर दो रेडियो ट्रांसमीटर थे, जो 20.005 और 40.002 मेगाहर्ट्ज़ पर लगातार ‘बीप… बीप… बीप…’ का संकेत भेजते थे। पृथ्वी की कक्षा में यह उपग्रह करीब 96 मिनट में एक परिक्रमा पूरी करता था, और दुनिया भर के शौकिया रेडियो ऑपरेटर इसका संकेत पकड़ते थे। यह अंतरिक्ष से आई इंसान की पहली आवाज़ थी।
तत्कालीन सोवियत संघ ने इस उपग्रह को आर-7 रॉकेट की मदद से छोड़ा था। मूल रूप से यह रॉकेट लंबी दूरी की मिसाइल के तौर पर बना था, और इसके सफल प्रक्षेपण ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था — खासकर अमेरिका को। करीब तीन हफ्तों तक संकेत भेजने के बाद उपग्रह की बैटरियां खत्म हो गईं, और जनवरी 1958 की शुरुआत में यह वायुमंडल में जलकर नष्ट हो गया। लेकिन तब तक अंतरिक्ष युग की नींव पड़ चुकी थी।
स्पुतनिक संकट और नासा का जन्म
स्पुतनिक-1 के प्रक्षेपण के बाद अमेरिका में जो हलचल मची, उसे इतिहास ‘स्पुतनिक संकट’ के नाम से जानता है। स्कूलों में विज्ञान और गणित की पढ़ाई पर ज़ोर बढ़ा, और 1958 में अमेरिका ने अपना नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम चलाने के लिए नासा की स्थापना की। दोनों महाशक्तियों के बीच अंतरिक्ष की दौड़ शुरू हुई, जो एक दशक बाद 1969 में चांद पर इंसान के कदम के रूप में अपने चरम पर पहुंची।
आज से विश्व अंतरिक्ष सप्ताह: 2026 की थीम ‘रॉकेट क्रांति’
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1999 में हर साल 4 से 10 अक्टूबर तक विश्व अंतरिक्ष सप्ताह मनाने की घोषणा की थी। ये तारीखें दो ऐतिहासिक घटनाओं की याद में चुनी गईं — 4 अक्टूबर 1957 को स्पुतनिक-1 का प्रक्षेपण और 10 अक्टूबर 1967 को बाह्य अंतरिक्ष संधि पर हस्ताक्षर। 95 से अधिक देशों में मनाया जाने वाला यह दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक अंतरिक्ष आयोजन है।
इस साल की थीम है ‘रॉकेट क्रांति’ — यानी पुन: प्रयोज्य रॉकेटों और निजी प्रक्षेपण कंपनियों के दौर में अंतरिक्ष तक पहुंच कैसे सस्ती और सबके लिए खुलती जा रही है। स्कूलों, संग्रहालयों और विज्ञान केंद्रों में इस सप्ताह छात्र-छात्राओं के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित होते हैं, ताकि नई पीढ़ी विज्ञान और प्रौद्योगिकी की ओर आकर्षित हो।
69 साल पहले एक छोटे से गोले ने साबित किया था कि आसमान इंसान की सीमा नहीं है। आज जब उपग्रह मौसम की जानकारी देते हैं, नेविगेशन चलाते हैं और संचार जोड़ते हैं, तो स्पुतनिक-1 की वह ‘बीप-बीप’ आवाज़ आज भी गूंजती सुनाई देती है।
फोटो: स्पुतनिक-1 का मॉडल — Retro Lenses / Wikimedia Commons (सौजन्य)
