बैतूल ब्यूरो
सार: बैतूल के जल पुरुष मोहन नागर ने दशकों की मेहनत से सूखते जल स्रोतों को फिर जीवन दिया है। वर्षा जल संचयन, भूजल संवर्धन और गांव-गांव जनभागीदारी के उनके काम को 2026 में पद्मश्री से राष्ट्रीय पहचान मिली। मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस पर यह संडे डायरी उसी शांत, सतत सेवा की कहानी है।
मध्य प्रदेश आज अपना स्थापना दिवस मना रहा है। इस अवसर पर प्रदेश की विकास यात्रा के साथ उन लोगों को याद करना भी जरूरी है, जिनके काम ने चुपचाप, बिना किसी शोर के, आम लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाया है। बैतूल के मोहन नागर ऐसे ही एक व्यक्ति हैं। उन्हें बैतूल में जल पुरुष के नाम से जाना जाता है। जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके दशकों लंबे योगदान के लिए वर्ष 2026 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान किसी एक दिन की मेहनत का परिणाम नहीं है, बल्कि वर्षों तक गांव, पहाड़ी, नाले और तालाब के साथ जुड़े रहने की कहानी है।
बैतूल के जल पुरुष मोहन नागर कौन हैं
मोहन नागर का जन्म 23 फरवरी 1968 को राजगढ़ जिले में हुआ। उन्होंने उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई के बाद उनका जीवन सामाजिक सेवा और पर्यावरण संरक्षण की ओर मुड़ गया। आज वे मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष और बैतूल स्थित भारत भारती शिक्षा संस्थान के सचिव के रूप में काम कर रहे हैं। इन भूमिकाओं में भी उनका मुख्य काम एक ही रहा है — लोगों को अपने जल स्रोतों की देखभाल के लिए साथ जोड़ना।
बैतूल में उन्हें जल पुरुष इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने जिले में सैकड़ों जल संरक्षण कार्य किए हैं। तालाब, चेक डैम, वर्षा जल संचयन और भूजल संवर्धन से जुड़े उनके प्रयासों ने सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल स्रोतों को फिर से जीवंत करने में मदद की है। रिपोर्टों के अनुसार, उनके नेतृत्व में लगभग 75 हजार जल संरचनाओं के निर्माण का काम हुआ है। यह आंकड़ा किसी एक संरचना की कहानी नहीं, बल्कि गांव-गांव फैले एक बड़े जनअभियान की ओर इशारा करता है।
गंगा अवतरण अभियान: पानी को जन आंदोलन बनाना

मोहन नागर के काम की सबसे बड़ी पहचान गंगा अवतरण अभियान है। इस अभियान का मूल विचार सीधा था — पानी बचाना केवल सरकार या किसी एक संस्था का काम नहीं है, बल्कि हर गांव, हर परिवार की साझा जिम्मेदारी है। अभियान के तहत जल संरचनाओं का निर्माण हुआ, तालाबों और नालों का पुनर्जीवन हुआ, वर्षा जल को संजोने के प्रयास बढ़े और लोगों में पानी बचाने की जागरूकता फैली।
बैतूल जिले की सोना घाटी में वर्षा जल संचयन और जल संरचनाओं के निर्माण के जरिए प्राकृतिक जल चक्र को पुनर्जीवित करने का काम इस अभियान का अहम हिस्सा रहा। पहाड़ियों पर हरियाली लौटाना, नालों में पानी रोकना और भूजल को फिर से भरने देना — ये छोटे-छोटे कदम मिलकर बड़ा बदलाव लाते हैं। जब भूजल स्तर सुधरता है, तो कुओं और हैंडपंपों में पानी टिकता है, खेतों को सिंचाई में सहारा मिलता है और गांव में पलायन का दबाव कम होता है। यही कारण है कि जल संरक्षण का काम केवल पर्यावरण का काम नहीं रहता, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी से सीधे जुड़ जाता है।
माचना नदी पुनर्जीवन और बाचा गांव का मॉडल
जल संरक्षण के काम में नदियों का पुनर्जीवन एक और बड़ी कड़ी है। माचना नदी पुनर्जीवन अभियान ने नदी संरक्षण के क्षेत्र में एक नया मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई। नदी को बचाने का काम जब गांव के लोगों के हाथ में आता है, तो वह लंबे समय तक चलता है। लोग नदी के किनारे पेड़ लगाते हैं, नालों की सफाई और संरक्षण में हिस्सा लेते हैं और पानी के सही उपयोग के प्रति जागरूक होते हैं।
इसी जनभागीदारी का एक जीवंत उदाहरण बैतूल का बाचा गांव है। बाचा गांव को वाटर और सोलर विलेज के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। इस गांव के मॉडल में दो बातें एक साथ जुड़ी हैं — पानी का संरक्षण और सौर ऊर्जा का उपयोग। जब गांव अपने जल स्रोतों का प्रबंधन खुद करता है और ऊर्जा के लिए भी स्थानीय, स्वच्छ विकल्प अपनाता है, तो वह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता है। बाचा गांव का यह मॉडल दूसरे गांवों के लिए भी प्रेरणा बना है, क्योंकि यह दिखाता है कि बड़े बजट या बड़ी तकनीक के बिना भी, सामुदायिक इच्छाशक्ति से गांव की तस्वीर बदली जा सकती है।
किसे लाभ मिला: किसान, आदिवासी समुदाय और गांव की महिलाएं
मोहन नागर के काम का सबसे बड़ा लाभ उन लोगों तक पहुंचा है, जो पानी की कमी को सबसे पहले और सबसे ज्यादा महसूस करते हैं। सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसान, आदिवासी समुदाय और छोटे गांवों के परिवार — इन सभी के लिए पानी का अर्थ केवल प्यास बुझाना नहीं है, बल्कि खेती, पशुपालन और रोजगार से जुड़ी सुरक्षा भी है। जब जल स्रोत पुनर्जीवित होते हैं, तो खेतों में सिंचाई की संभावना बढ़ती है, पशुओं के लिए पानी उपलब्ध रहता है और गांव में रहने का भरोसा मजबूत होता है।
महिलाओं के जीवन पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। जहां पानी दूर से लाना पड़ता है, वहां महिलाओं का सबसे ज्यादा समय और श्रम इसी काम में खर्च होता है। गांव के पास ही जल स्रोत सुरक्षित होने से यह बोझ कम होता है और समय शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के कामों में लग पाता है। बाचा गांव जैसे मॉडलों में सौर ऊर्जा के उपयोग से धुएं और ईंधन की परेशानी भी कम हुई है, जिससे घर का वातावरण स्वस्थ हुआ है। इस तरह जल संरक्षण का एक काम, स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका — कई मोर्चों पर राहत लेकर आता है।
पद्मश्री तक का सफर और पहले मिले सम्मान
गणतंत्र दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म पुरस्कारों में मोहन नागर का नाम शामिल हुआ। 23 जून 2026 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित नागरिक अलंकरण समारोह में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया। इस सम्मान के पीछे जल संरक्षण, नदी पुनर्जीवन, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी क्षेत्रों में जनभागीदारी आधारित विकास कार्यों का लंबा योगदान था। उन्होंने यह सम्मान बैतूल के आदिवासी समुदाय और अभियान से जुड़े लोगों को समर्पित किया। यह समर्पण ही उनके काम की आत्मा को बताता है — यह सम्मान किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन सैकड़ों हाथों का है, जिन्होंने श्रमदान, जागरूकता और देखरेख से पानी बचाया।
पद्मश्री से पहले भी उनके काम को कई स्तरों पर सराहना मिली थी। वर्ष 2019 में उन्हें राष्ट्रीय जल प्रहरी सम्मान मिला और वर्ष 2020 में जल शक्ति मंत्रालय की ओर से वाटर हीरो के रूप में पहचान मिली। भाऊराव देवरस स्मृति सम्मान भी उनके नाम रहा है। ये सम्मान बताते हैं कि उनका काम लंबे समय से विशेषज्ञों और संस्थाओं की नजर में था, और पद्मश्री ने उस निरंतरता को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दी।
स्थापना दिवस पर क्या सीख: हर गांव में एक जल पुरुष क्यों जरूरी है
मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस पर मोहन नागर की कहानी एक सीधा संदेश देती है — प्रदेश का विकास केवल बड़े प्रोजेक्टों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से भी मापा जाता है कि गांव का तालाब भरा है या सूखा, नदी बह रही है या सिमट गई है, और गांव के लोग पानी के लिए कितनी दूर जाते हैं। जल संरक्षण का काम धैर्य मांगता है, क्योंकि इसका परिणाम एक बरसात में नहीं, बल्कि कई बरसातों के बाद दिखता है। यही धैर्य मोहन नागर के काम की सबसे बड़ी पूंजी है।
आगे का रास्ता भी इसी जनभागीदारी से होकर जाता है। हर गांव में वर्षा जल संचयन, तालाबों का रखरखाव, नालों का संरक्षण और पेड़ लगाने का काम नियमित रूप से हो, तो पानी की सुरक्षा मजबूत होती है। स्कूलों, पंचायतों और स्वयंसेवी समूहों की भागीदारी से यह काम पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ सकता है। युवा पीढ़ी के लिए यह कहानी इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यह बताती है कि बदलाव के लिए बड़े पद या बड़े संसाधन का इंतजार जरूरी नहीं है — अपने गांव, अपने जल स्रोत और अपने समुदाय से शुरुआत की जा सकती है।
मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस पर यह संडे डायरी बैतूल के जल पुरुष मोहन नागर को समर्पित है — उस व्यक्ति को, जिसने पानी को बचाने के काम को जन आंदोलन बनाया और यह साबित किया कि शांत, सतत सेवा भी प्रदेश की सबसे बड़ी पूंजी होती है।
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