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आज अहोई अष्टमी: संतान की लंबी उम्र के लिए माताओं का व्रत, जानें अहोई माता का महत्व, व्रत कथा और पूजा का पूरा क्रम

सांकेतिक चित्र: अहोई अष्टमी की पूजा के दीये सांकेतिक चित्र: अहोई अष्टमी की पूजा — प्रतीकात्मक तस्वीर

डेस्क रिपोर्ट

आज, 1 नवंबर को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जा रहा है। माताएं संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से दिनभर व्रत रखकर शाम को अहोई माता की पूजा करेंगी और तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलेंगी।

आज कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है और इसी तिथि पर हर वर्ष अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। इस वर्ष यह व्रत रविवार, 1 नवंबर को पड़ रहा है। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर शुरू हो रही है और 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार व्रत आज ही रखा जाएगा। यही कारण है कि आज सुबह से ही घरों में व्रत की तैयारी दिख रही है और शाम की पूजा को लेकर उत्सुकता है।

आज का व्रत क्यों खास है

अहोई अष्टमी को अहोई आठे के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत माताओं का व्रत कहलाता है, क्योंकि इसे संतान के लिए रखा जाता है। माताएं इस दिन अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, तरक्की और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार विधि-विधान से अहोई माता की आराधना करने पर संतान के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। यही भाव इस व्रत को परिवारों के लिए इतना खास बनाता है।

इस व्रत की एक और विशेषता इसका समय है। यह व्रत करवा चौथ के कुछ दिन बाद आता है और दीपावली से पहले के पर्वों की श्रृंखला का हिस्सा है। इसलिए घरों में इस समय पूजा, व्रत और त्योहार की तैयारियां एक साथ चल रही होती हैं। अहोई अष्टमी का दिन मातृत्व, ममता और परिवार की सुख-शांति से जुड़ा हुआ माना जाता है।

अहोई माता कौन हैं और व्रत का महत्व

मान्यता के अनुसार अहोई माता को मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। कुछ परंपराओं में उन्हें देवी पार्वती का स्वरूप भी कहा जाता है और कई स्थानों पर उन्हें स्याहु माता के नाम से भी पुकारा जाता है। अहोई माता के चित्र में माता के साथ सेह और उसके बच्चों की आकृति बनाई जाती है, जो इस व्रत की कथा से जुड़ी हुई है।

व्रत का महत्व संतान की रक्षा और उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना से जुड़ा है। माना जाता है कि जो माताएं श्रद्धा और नियम से यह व्रत रखती हैं, उनकी संतान को सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। यह भी माना जाता है कि इस व्रत से निःसंतान दंपतियों को संतान की प्राप्ति की कामना पूरी होती है। ये बातें आस्था और परंपरा से जुड़ी मान्यताएं हैं, जिन्हें परिवार पीढ़ियों से मानते आ रहे हैं।

अहोई अष्टमी का व्रत कठिन व्रतों में गिना जाता है, क्योंकि इसमें तारे दिखने तक व्रत रखा जाता है। कई परिवारों में यह व्रत निर्जला रखा जाता है, जबकि कुछ परिवारों में पारिवारिक परंपरा के अनुसार फलाहार भी किया जाता है। इसलिए इस व्रत का स्वरूप हर घर में थोड़ा अलग दिख सकता है, लेकिन भाव एक ही रहता है — संतान के लिए प्रार्थना।

सांकेतिक चित्र: अहोई अष्टमी की पूजा के दीये
सांकेतिक चित्र: अहोई अष्टमी की पूजा — प्रतीकात्मक तस्वीर

अहोई अष्टमी व्रत कथा

कथा के अनुसार एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे, सात बहुएं और एक बेटी थी। दीपावली से कुछ दिन पहले घर की साफ-सफाई और लिपाई-पुताई की तैयारी शुरू हुई। इसके लिए साहूकार की सातों बहुएं और उसकी बेटी मिट्टी लेने जंगल की ओर गईं।

मिट्टी खोदते समय साहूकार की बेटी की कुदाल से एक सेह के बच्चे की मृत्यु हो गई। सेह को जब इस बात का पता चला तो वह बहुत दुखी और क्रोधित हुई। उसने साहूकार की बेटी को श्राप देने का फैसला किया। यह देखकर छोटी बहू आगे आई और उसने अपनी ननद की जगह श्राप खुद लेने की बात कही।

इसके बाद छोटी बहू के बच्चों को लेकर दुखद घटनाएं होने लगीं। वह अपने दुख से परेशान रहने लगी और परिवार के लोग भी उसकी परेशानी देखकर चिंतित हो गए। तब एक विद्वान पंडित ने उसे गौ माता की सेवा करने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि गौ माता की कृपा से उसके दुख दूर हो सकते हैं।

छोटी बहू ने पूरी श्रद्धा से गौ माता की सेवा शुरू कर दी। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर गौ माता ने उसकी मदद करने का निश्चय किया। सेह भी उसकी श्रद्धा और सेवा से प्रसन्न हुई और उसने अपना श्राप वापस ले लिया। इसके बाद छोटी बहू के जीवन में खुशियां लौट आईं, उसके परिवार में फिर से सुख-समृद्धि आने लगी और उसकी संतान को सुखी जीवन का आशीर्वाद मिला।

यही कथा अहोई अष्टमी के व्रत की पृष्ठभूमि मानी जाती है। कथा सुनने और सुनाने की परंपरा इस व्रत का अहम हिस्सा है। माना जाता है कि कथा के बिना व्रत पूरा नहीं माना जाता।

आज की पूजा विधि — क्रमवार

अहोई अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है और साफ कपड़े पहने जाते हैं। इसके बाद पूजा स्थल पर अहोई माता का ध्यान करके संतान की सुख-समृद्धि और लंबी उम्र की कामना के साथ व्रत का संकल्प लिया जाता है। दिनभर व्रत के नियमों का पालन किया जाता है।

शाम की पूजा के लिए घर की दीवार पर गेरू या रोली से अहोई माता का चित्र बनाया जाता है, जिसमें माता के साथ सेह और उसके बच्चों की आकृति होती है। आजकल बाजार में मिलने वाले कैलेंडर या चित्र का भी उपयोग किया जाता है। पूजा स्थल पर चौकी रखकर उस पर लाल कपड़ा बिछाया जाता है और अहोई माता की तस्वीर स्थापित की जाती है।

संध्या काल में प्रदोष बेला के दौरान माता के चित्र के सामने दीप जलाया जाता है। माता को रोली, अक्षत, फूल और माला अर्पित की जाती है। भोग के रूप में माता को 8 पूरियां, 8 पुए और हलवे का भोग लगाने की परंपरा है। एक कटोरी में चावल और दूसरी में मूंग की दाल रखी जाती है। इसके बाद हाथ में गेहूं या चावल के दाने लेकर अहोई माता की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है। पूजा के अंत में माता की आरती की जाती है।

व्रत के नियम और सावधानियां

इस व्रत में सुबह से शाम तक नियम का पालन किया जाता है। व्रत रखने वाली माताएं दिनभर सात्विक आचरण रखती हैं और शाम की पूजा तक व्रत करती हैं। जिन परिवारों में निर्जला व्रत की परंपरा है, वहां बिना जल के व्रत रखा जाता है, जबकि कुछ परिवारों में फलाहार की छूट रहती है। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार ही व्रत का स्वरूप तय किया जाता है।

शारीरिक स्थिति के अनुसार व्रत रखने में सावधानी भी जरूरी है। बुजुर्ग, बीमार या विशेष स्थिति वाली महिलाओं को परिवार की परंपरा और चिकित्सकीय सलाह का ध्यान रखना चाहिए। व्रत का उद्देश्य श्रद्धा और संयम है, इसलिए किसी भी तरह की जबरदस्ती या दिखावे से बचना चाहिए। पूजा में स्वच्छता और शांति का विशेष ध्यान रखा जाता है।

एक और नियम कथा और चित्र से जुड़ा है। पूजा के समय अहोई माता के चित्र के साथ बच्चों के चित्र भी बनाए जाते हैं। व्रत खोलने से पहले बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेने की परंपरा भी कई परिवारों में निभाई जाती है।

तारा दर्शन की परंपरा — करवा चौथ से क्या अलग है

अहोई अष्टमी की सबसे खास परंपरा तारों को अर्घ्य देने की है। करवा चौथ में व्रत चंद्रमा को देखकर खोला जाता है, लेकिन अहोई अष्टमी में चंद्रमा का इंतजार नहीं किया जाता। इस दिन चंद्रमा बहुत देर रात को उदय होता है, इसलिए माताएं शाम को आसमान में तारे निकलने का इंतजार करती हैं।

सूर्यास्त के कुछ देर बाद, शाम करीब 6 बजे के आसपास आसमान में तारे नजर आने लगते हैं। तारे दिखने के बाद माताएं जल से भरे करवे से तारों को अर्घ्य देती हैं, उनकी पूजा करती हैं और अपनी संतान की लंबी उम्र की कामना करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करके अपना व्रत पूरा करती हैं। कुछ परिवारों में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा भी है, लेकिन अधिकतर स्थानों पर तारा दर्शन ही व्रत खोलने का आधार माना जाता है।

यही परंपरा इस व्रत को दूसरे व्रतों से अलग पहचान देती है। शाम के समय छतों और आंगनों में तारों को देखने का दृश्य इस पर्व की पहचान बन गया है।

आज का मुहूर्त और तिथि एक नजर में

पंचांग के अनुसार आज अहोई अष्टमी की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। तारों के दर्शन का समय शाम करीब 6 बजे के आसपास रहेगा। अष्टमी तिथि आज दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी और कल दोपहर 1 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी।

मुहूर्त को लेकर कुछ पंचांग गणनाओं में कुछ मिनट का अंतर भी मिलता है, इसलिए अपने शहर के पंचांग या परिवार की परंपरा के अनुसार समय देखना उचित रहता है। तारों और चंद्रमा के निकलने का समय शहर के अनुसार अलग-अलग हो सकता है, इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए।

आज शाम क्या होगा

आज शाम देशभर के घरों में अहोई माता की पूजा होगी। माताएं सज-धजकर पूजा की तैयारी करेंगी, कथा सुनेंगी और तारों को अर्घ्य देंगी। बच्चों के लिए यह दिन मां के आशीर्वाद और परिवार की परंपरा से जुड़ने का अवसर होता है। दीपावली से पहले के इन पर्वों में घरों का माहौल भक्ति और उत्साह से भरा रहता है।

अहोई अष्टमी का संदेश सीधा है — संतान के प्रति मां का प्रेम और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना। यही भाव इस व्रत को पीढ़ियों से जीवित रखे हुए है और आज भी घर-घर में इसे उसी श्रद्धा से मनाया जा रहा है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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