इंदौर ब्यूरो
सार: DAVV छात्रसंघ चुनाव को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) को 75 दिनों के भीतर चुनाव कराने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी की एकलपीठ ने गुरुवार, 5 नवंबर को एक अवमानना याचिका का निपटारा करते हुए विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और सक्षम प्राधिकारी को आदेश दिया कि वे निर्धारित समय-सीमा में चुनाव कराने के लिए जरूरी कदम उठाएँ और मुख्य पीठ के आदेश का पालन सुनिश्चित करें। प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछली बार छात्रसंघ चुनाव 2017 में हुए थे, और जबलपुर स्थित मुख्य पीठ के 3 अगस्त के आदेश के बावजूद सितंबर 2026 में तय चुनाव नहीं कराए गए थे।
DAVV छात्रसंघ चुनाव पर हाईकोर्ट का आदेश क्या है
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने DAVV छात्रसंघ चुनाव के लिए 75 दिनों का समय दिया है। इंदौर पीठ के आदेश के अनुसार विश्वविद्यालय प्रशासन को इस अवधि के भीतर चुनाव की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। अदालत ने यह निर्देश एक अवमानना याचिका पर सुनवाई के बाद दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि विश्वविद्यालय ने मुख्य पीठ के पहले के आदेश का पालन नहीं किया।
आदेश में कहा गया है कि विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और सक्षम प्राधिकारी 75 दिनों के भीतर छात्रसंघ चुनाव कराने के लिए जरूरी कदम उठाएँ। यह समय-सीमा आदेश की प्रति मिलने की तारीख से गिनी जाएगी और इसे बाहरी समय-सीमा बताया गया है। इसका अर्थ है कि विश्वविद्यालय को हर हाल में इस अवधि के भीतर चुनाव संपन्न कराने होंगे। इस हिसाब से समय-सीमा जनवरी 2027 के तीसरे सप्ताह के आसपास पूरी होगी, हालाँकि अंतिम तारीख आदेश की प्रति मिलने की तारीख पर निर्भर करेगी।
यह आदेश सिर्फ एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। इंदौर पीठ ने यह निर्देश जबलपुर स्थित मुख्य पीठ के 3 अगस्त के आदेश के अनुपालन में जारी किया है, जिसमें राज्य के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव कराने को कहा गया था। अवमानना याचिका विशेष रूप से देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में चुनाव नहीं कराए जाने को लेकर दायर की गई थी, इसलिए ताजा आदेश में विश्वविद्यालय का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है।
मामला हाईकोर्ट तक कैसे पहुंचा

यह मामला कानून के छात्र अरुणेश मिश्रा की ओर से दायर अवमानना याचिका से शुरू हुआ। याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्य द्वारा संचालित देवी अहिल्या विश्वविद्यालय अदालत के आदेश के बावजूद छात्रसंघ चुनाव कराने में विफल रहा है। याचिकाकर्ता ने इसे अदालत के आदेश का उल्लंघन बताते हुए अवमानना याचिका दायर की थी।
अवमानना याचिका सिविल क्रमांक 7815/2026 के रूप में दर्ज हुई और इसमें उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव अनुपम राजन और अन्य को पक्षकार बनाया गया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता जयेश गुरनानी ने पैरवी की। न्यायमूर्ति पवन कुमार द्विवेदी की एकलपीठ ने 5 नवंबर को इस याचिका पर सुनवाई की और उसका निपटारा करते हुए चुनाव कराने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता अरुणेश मिश्रा कानून के छात्र हैं और छात्र संगठन एनएसयूआई से जुड़े बताए गए हैं। उनकी याचिका में कहा गया था कि मुख्य पीठ के स्पष्ट आदेश के बाद भी विश्वविद्यालय में चुनाव की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई। अदालत ने मामले के तथ्यों और पहले पारित आदेश पर विचार करने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन को समयबद्ध तरीके से चुनाव कराने को कहा।
3 अगस्त का आदेश और सितंबर की समय-सीमा
इस मामले की जड़ जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य पीठ के 3 अगस्त 2026 के आदेश में है। मुख्य न्यायाधिपति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने उस दिन राज्य के प्रत्येक महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव कराने का निर्देश दिया था। यह आदेश रिट याचिका क्रमांक 34295/2024 पर सुनवाई के बाद पारित हुआ था, जिसमें प्रदेश के हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव कराने की मांग की गई थी।
राज्य सरकार ने मुख्य पीठ के सामने शैक्षणिक सत्र 2026-27 का अकादमिक कैलेंडर प्रस्तुत किया था। उस कैलेंडर में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि पूरे प्रदेश में सितंबर 2026 के महीने में छात्रसंघ चुनाव कराए जाएंगे। याचिकाकर्ता के वकील जयेश गुरनानी के अनुसार, कैलेंडर में तय समय बीतने के बाद भी चुनाव नहीं हुए। सितंबर का महीना निकल गया, लेकिन किसी भी संस्थान में चुनाव की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई।
इसी निष्क्रियता को अदालत के आदेश का उल्लंघन मानते हुए अवमानना याचिका दायर की गई। इंदौर पीठ ने सुनवाई के दौरान पूर्व में पारित खंडपीठ के आदेश और वर्तमान प्रकरण के तथ्यों पर विचार किया। अदालत ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि पूर्व का आदेश संपूर्ण मध्य प्रदेश के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव कराने के संबंध में था, जबकि वर्तमान अवमानना याचिका विशेष रूप से देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में चुनाव नहीं कराए जाने को लेकर थी।
2017 के बाद से क्यों नहीं हुए छात्रसंघ चुनाव
याचिकाकर्ता के वकील जयेश गुरनानी के मुताबिक, मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछली बार छात्रसंघ चुनाव 2017 में हुए थे। इसके बाद से राज्य के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव नहीं कराए गए हैं। यानी करीब नौ वर्षों से प्रदेश के छात्र अपने प्रतिनिधि चुनने के लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित रहे हैं।
नौ साल का यह अंतराल अपने आप में बड़ी बात है। इस अवधि में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कई बैच के छात्र आए और पढ़ाई पूरी करके चले गए, लेकिन किसी भी बैच को छात्रसंघ चुनाव में मतदान का अवसर नहीं मिला। छात्रसंघ चुनाव छात्र जीवन का अहम हिस्सा माने जाते हैं, क्योंकि इनके जरिए छात्र अपनी समस्याएँ और मांगें संस्थागत तरीके से उठा सकते हैं। लंबे समय तक चुनाव न होने से परिसरों में छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्था ठप पड़ी रही।
अदालत का रास्ता इसीलिए अपनाया गया। पहले 2024 में रिट याचिका दायर हुई, फिर 2026 में मुख्य पीठ का आदेश आया और जब उस आदेश पर भी अमल नहीं हुआ तो अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। अब इंदौर पीठ के ताजा आदेश ने इस लंबी खामोशी को तोड़ते हुए विश्वविद्यालय को 75 दिनों की स्पष्ट समय-सीमा दे दी है।
DAVV: प्रदेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में से एक
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में से एक है। इसकी स्थापना 1964 में हुई थी, तब इसका नाम इंदौर विश्वविद्यालय था। बाद में इसका नाम बदलकर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय कर दिया गया। विश्वविद्यालय के दो परिसर हैं — आरएनटी मार्ग स्थित नालंदा परिसर, जहाँ विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कार्यालय हैं, और खंडवा रोड स्थित तक्षशिला परिसर, जहाँ विश्वविद्यालय के अनेक विभाग और संस्थान संचालित होते हैं।
विश्वविद्यालय का विधि संकाय भी पुराना है। स्कूल ऑफ लॉ की स्थापना 1998 में हुई थी और यह शहर में कानूनी शिक्षा का एक सरकारी संस्थान है। यह संयोग ही है कि जिस छात्र ने छात्रसंघ चुनाव के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया, वह खुद कानून का छात्र है।
प्रदेश में मेधावी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की योजनाएँ चल रही हैं और राज्योत्सव के दौरान मेधावी छात्रों को सम्मानित भी किया गया है। लेकिन छात्र कल्याण का एक अहम पहलू छात्र प्रतिनिधित्व भी है, जो चुनावों के अभाव में लंबे समय से अधूरा रहा है। अब अदालत के आदेश के बाद विश्वविद्यालय को न सिर्फ चुनाव कराने हैं, बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया खड़ी करनी है जो नौ साल के अंतराल के बाद पहली बार अमल में आएगी।
DAVV छात्रसंघ चुनाव: अब आगे क्या होगा
आदेश के बाद अब विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने DAVV छात्रसंघ चुनाव की पूरी प्रक्रिया तय समय में पूरी करने की चुनौती है। छात्रसंघ चुनाव की प्रक्रिया में आमतौर पर कई चरण होते हैं। पहले मतदाता सूची तैयार की जाती है, जिसमें उन छात्रों के नाम दर्ज होते हैं जो मतदान के पात्र हैं। इसके बाद चुनाव कार्यक्रम की घोषणा होती है, जिसमें नामांकन, नाम वापसी, प्रचार, मतदान और मतगणना की तारीखें तय की जाती हैं।
इसके बाद उम्मीदवार नामांकन दाखिल करते हैं, उनकी जांच होती है और फिर प्रचार का दौर चलता है। मतदान के दिन छात्र अपने प्रतिनिधि चुनते हैं और मतगणना के बाद परिणाम घोषित किए जाते हैं। चुने गए प्रतिनिधि फिर छात्रसंघ का गठन करते हैं। यह पूरी प्रक्रिया विश्वविद्यालय के नियमों और चुनाव से जुड़े दिशा-निर्देशों के अनुसार संपन्न होती है।
75 दिनों की समय-सीमा को देखते हुए विश्वविद्यालय को बिना देरी के काम शुरू करना होगा। आदेश की प्रति मिलने के बाद से समय गिना जाएगा, इसलिए प्रशासन के पास तैयारी के लिए सीमित समय है। यदि समय-सीमा का पालन नहीं हुआ तो मामला फिर अदालत के सामने आ सकता है, क्योंकि यह आदेश अवमानना याचिका के निपटारे में ही दिया गया है।
पूरे प्रदेश के कॉलेजों पर क्या असर होगा
हालाँकि ताजा आदेश देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के लिए है, लेकिन इसका असर पूरे प्रदेश में महसूस किया जाएगा। इसकी वजह यह है कि इंदौर पीठ ने यह आदेश मुख्य पीठ के 3 अगस्त के आदेश के अनुपालन में दिया है, और वह आदेश राज्य के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर लागू होता है। इसलिए अन्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों पर भी चुनाव कराने का दबाव बढ़ेगा।
प्रदेश भर के छात्र लंबे समय से छात्रसंघ चुनाव की मांग कर रहे हैं। 2017 के बाद से चुनाव न होने से छात्र राजनीति और छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्था लगभग ठप हो गई थी। अदालत के लगातार आदेशों के बाद अब यह उम्मीद बनी है कि आने वाले महीनों में प्रदेश के अन्य संस्थानों में भी चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
इन रिपोर्टों में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से आदेश पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया दर्ज नहीं है। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार और सक्षम प्राधिकारी को आदेश की प्रति मिलने के बाद ही चुनाव की तैयारियों की तस्वीर साफ होगी।
छात्रों के लिए क्यों अहम है यह फैसला
छात्रसंघ चुनाव छात्रों के लिए सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं होते। छात्रसंघ के जरिए छात्र छात्रावास, शुल्क, परीक्षा, पुस्तकालय और परिसर की सुविधाओं से जुड़े मुद्दे उठाते हैं। चुने गए प्रतिनिधि विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच सेतु का काम करते हैं। जब चुनाव ही नहीं होते, तो छात्रों की आवाज संस्थागत तरीके से प्रशासन तक नहीं पहुंच पाती।
नौ साल के अंतराल के बाद होने वाले चुनाव इसलिए भी अहम हैं क्योंकि इस बार मतदान करने वाले अधिकांश छात्र पहली बार छात्रसंघ चुनाव में हिस्सा लेंगे। उनके लिए यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पहला अनुभव होगा। विश्वविद्यालयों में लोकतंत्र की यह पहली सीढ़ी ही छात्रों को आगे चलकर सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के लिए तैयार करती है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि विश्वविद्यालय DAVV छात्रसंघ चुनाव की प्रक्रिया 75 दिनों की समय-सीमा में कैसे पूरी करता है। मतदाता सूची से लेकर मतगणना तक हर चरण समय पर पूरा होना जरूरी है। अदालत के आदेश ने रास्ता साफ कर दिया है, अब गेंद विश्वविद्यालय प्रशासन के पाले में है।
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