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जयशंकर-लावरोव का वायरल वीडियो फर्जी निकला: विदेश मंत्रालय और पीआईबी ने किया खंडन, रूस के दूतावास ने भी चेताया

सांकेतिक चित्र: तथ्य-जांच के लिए स्मार्टफोन और आवर्धक कांच सांकेतिक चित्र

नई दिल्ली ब्यूरो

सार: विदेश मंत्रालय और सरकारी सूचना ब्यूरो ने 3 नवंबर 2026 को साफ किया है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के बीच कथित बातचीत दिखाने वाला वायरल वीडियो फर्जी और एआई से छेड़छाड़ किया हुआ है। असली फुटेज में न तो ऐसी बातचीत हुई थी और न ही वे बयान दिए गए थे, जो वीडियो में जोड़े गए हैं।

क्या वायरल हुआ था

सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से फैला, जिसमें दावा किया गया कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूस और यूक्रेन से युद्ध खत्म करने की अपील की है, क्योंकि युद्ध से केवल आर्थिक नुकसान हो रहा है। वीडियो में यह भी दिखाया गया कि रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने इस अपील पर व्यंग्यात्मक जवाब दिया और जयशंकर इससे निराश हुए।

एक दूसरा दावा भी उसी दौरान फैला। इसमें कहा गया कि लावरोव ने भारत को केवल एक व्यापारिक साझेदार बताया है और कहा है कि भारत को रूस की विदेश नीति में दखल देने या सलाह देने का अधिकार नहीं है। इन दोनों दावों को इस तरह पेश किया गया, जैसे भारत और रूस के बीच कोई बड़ी कूटनीतिक दरार पड़ गई हो।

हकीकत में दोनों ही दावे गलत निकले। वीडियो में इस्तेमाल किया गया फुटेज असली बैठकों का था, लेकिन उस पर नकली ऑडियो और कैप्शन चिपका दिए गए थे। बोलने वाले चेहरों की हरकत से मेल न खाने वाली आवाज, काट-छांट कर जोड़े गए संवाद और सनसनीखेज कैप्शन ने इसे भरोसेमंद दिखाने की कोशिश की, लेकिन तथ्य-जांच में यह पूरी तरह मनगढ़ंत साबित हुआ।

विदेश मंत्रालय ने क्या कहा

सांकेतिक चित्र

विदेश मंत्रालय की तथ्य-जांच इकाई ने 3 नवंबर को सोशल मीडिया पर चेतावनी जारी की। इकाई ने साफ शब्दों में कहा कि रूस के विदेश मंत्री का जो वीडियो इस्तेमाल किया जा रहा है, वह फर्जी है। इकाई ने कई ऐसी पोस्ट के स्क्रीनशॉट भी साझा किए, जिन पर फर्जी और एआई से तैयार होने का निशान लगाया गया था।

मंत्रालय का संदेश सीधा था — इस वीडियो पर भरोसा न करें और इसे आगे न फैलाएं। विदेश मंत्रालय की चेतावनी इसलिए भी अहम है, क्योंकि इस तरह के वीडियो का मकसद सिर्फ भ्रम फैलाना नहीं होता, बल्कि दो देशों के रिश्तों के बारे में गलत धारणा बनाना भी होता है। जब किसी देश के विदेश मंत्री के नाम से मनगढ़ंत बयान चलाया जाता है, तो वह सिर्फ एक व्यक्ति के बारे में झूठ नहीं होता, बल्कि पूरी विदेश नीति के बारे में गलत संदेश देता है।

पीआईबी की चेतावनी और उसका मतलब

सरकारी सूचना ब्यूरो ने भी इसी मामले में गलत सूचना को लेकर चेतावनी जारी की। ब्यूरो ने कहा कि जयशंकर का जो वीडियो चलाया जा रहा है, वह डिजिटल तरीके से बदला गया है और उससे जुड़ा दावा फर्जी है। ब्यूरो ने यह भी स्पष्ट किया कि विदेश मंत्री ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया था, जैसा वायरल पोस्ट में दिखाया जा रहा है।

सरकारी सूचना ब्यूरो की चेतावनी का महत्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि ब्यूरो सरकार की आधिकारिक सूचनाओं को लोगों तक पहुंचाने का माध्यम है। जब ब्यूरो किसी वीडियो को बदला हुआ बताता है, तो इसका अर्थ है कि मूल वीडियो की जांच की गई है और उसमें जोड़े गए हिस्से की पुष्टि नहीं हुई है। पाठकों के लिए यह एक साफ संकेत है कि वायरल सामग्री को सच मानने से पहले आधिकारिक स्रोत से उसकी पुष्टि कर लेनी चाहिए।

इससे पहले भी गलत संदेशों और फर्जी दावों पर सरकारी चेतावनियां जारी होती रही हैं। हाल ही में त्योहारी सीजन में फर्जी संदेशों को लेकर भी लोगों को सतर्क किया गया था, ताकि कोई व्यक्ति किसी लिंक पर क्लिक करके या निजी जानकारी साझा करके ठगी का शिकार न हो। फर्जी वीडियो का मामला उसी सतर्कता की अगली कड़ी है, जहां नुकसान पैसों का नहीं, बल्कि भरोसे और सही जानकारी का होता है।

रूस के दूतावास की प्रतिक्रिया

नई दिल्ली स्थित रूस के दूतावास ने भी इस मामले में अपनी बात रखी। दूतावास ने सोशल मीडिया पर एआई से तैयार फर्जी सामग्री फैलाने वालों को रोकने की अपील की और कहा कि इस तरह की बेतुकी एआई नकल को आगे बढ़ाना बंद किया जाए।

दूतावास की प्रतिक्रिया इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि फर्जी वीडियो में रूस के विदेश मंत्री को भी गलत तरीके से पेश किया गया था। जब दोनों देशों की आधिकारिक संस्थाएं एक ही बात कह रही हों कि वीडियो बदला हुआ है, तो उसके सच होने की कोई गुंजाइश नहीं बचती। यह मामला दिखाता है कि गलत सूचना किसी एक देश तक सीमित नहीं रहती — वह अंतरराष्ट्रीय रिश्तों तक पहुंच जाती है और दोनों पक्षों को सफाई देनी पड़ती है।

असल में जयशंकर ने क्या कहा था

जयशंकर ने 30 और 31 अक्टूबर को अमेरिका के अटलांटा में हुई जी20 विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लिया था। उसी बैठक के असली फुटेज को काटकर फर्जी वीडियो बनाया गया। असली बयान में जयशंकर ने यूक्रेन संघर्ष से जुड़े तीन मुद्दों पर चर्चा की बात कही थी।

पहला मुद्दा आम नागरिकों के जहाजों और नाविकों की सुरक्षा से जुड़ा था। दूसरा मुद्दा रूस और यूक्रेन से अनाज निर्यात की बहाली से जुड़ा था, ताकि खाद्य आपूर्ति बाधित न हो। तीसरा मुद्दा ऊर्जा से जुड़ा था, जिसे उन्होंने तीनों में सबसे जटिल बताया था। उन्होंने यह भी बताया था कि वे पहले मॉस्को गए थे, उसी दिन लावरोव से चर्चा हुई थी, बीच में वे कीव भी गए थे और यूक्रेनी पक्ष से संपर्क में हैं। इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि अमेरिका की अपनी शांति-मध्यस्थता पहल के कारण उससे भी तालमेल किया जा रहा है।

तथ्य-जांच में यह भी सामने आया कि जयशंकर की असली टिप्पणी काला सागर की सुरक्षा और अनाज निर्यात जैसे विषयों पर केंद्रित थी, न कि उस अपील पर, जो फर्जी वीडियो में दिखाई गई। यानी वीडियो में जो संवाद दिखाया गया, वह मूल भाषण का हिस्सा ही नहीं था।

लावरोव वाला दावा भी गलत कैसे साबित हुआ

लावरोव से जुड़े दूसरे दावे की जांच में मूल वीडियो भी मिल गया। मूल फुटेज 31 अक्टूबर को सामने आए एक वीडियो से जुड़ा था, जिसमें लावरोव उन खबरों पर सवालों का जवाब दे रहे थे, जिनमें कहा गया था कि रूस के राष्ट्रपति यूक्रेन के राष्ट्रपति से मिलने में हिचक रहे हैं। जी20 बैठक के बाद 30 अक्टूबर को हुई उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस की लाइव स्ट्रीम और रूस के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद भाषण के लिखित रूप में भी वह बयान नहीं मिला, जो फर्जी वीडियो में उनसे कहलवाया गया था।

इसके अलावा एआई पहचानने वाले उपकरणों से वीडियो और आवाज की जांच की गई। जांच में वीडियो को एआई से छेड़छाड़ किया हुआ पाया गया। यानी न केवल शब्द बदले गए थे, बल्कि आवाज और चेहरे की हरकत को भी तकनीक से इस तरह ढाला गया था कि वह असली लगे। यही कारण है कि आज के दौर में सिर्फ वीडियो देखकर सच का फैसला करना खतरनाक हो सकता है।

यह मामला क्यों अहम है

यह मामला इसलिए अहम है, क्योंकि इसमें एक साथ कई संवेदनशील धागे जुड़े हुए हैं। एक तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध चल रहा है, दूसरी तरफ भारत के रूस से ऊर्जा और व्यापार संबंधों पर दुनिया भर में चर्चा होती रहती है। ऐसे में अगर यह झूठ फैल जाता कि रूस के विदेश मंत्री ने भारत को अपमानित किया है या भारत के विदेश मंत्री ने सार्वजनिक रूप से निराशा जताई है, तो उसका असर आम लोगों की राय और दोनों देशों के रिश्तों की समझ पर पड़ता।

गलत सूचना का एक और खतरा यह है कि वह तेजी से फैलती है और सफाई धीरे-धीरे पहुंचती है। कई लोग फर्जी वीडियो देखकर अपनी राय बना लेते हैं और बाद में आई सच्चाई तक नहीं पहुंच पाते। इसलिए आधिकारिक चेतावनी का समय पर आना जरूरी होता है, ताकि झूठ को सच बनने से पहले ही रोका जा सके।

इसी दिन सेना की तथ्य-जांच इकाई से जुड़ा एक और मामला भी सामने आया, जिसमें नाथू ला के पास चीनी वाणिज्यिक वाहनों के वीडियो को गलत तरीके से घुसपैठ का सबूत बताकर फैलाया जा रहा था। सेना ने स्पष्ट किया कि वह स्थान भारत-चीन सीमा पर एक तय व्यापारिक बिंदु है और वीडियो में दिख रहे वाहन वाणिज्यिक वाहन थे। यह उदाहरण भी यही बताता है कि वीडियो का एक टुकड़ा देखकर पूरी कहानी मान लेना कितना भ्रामक हो सकता है।

फर्जी वीडियो की पहचान कैसे करें

पाठकों के लिए सबसे पहला नियम यह है कि किसी भी सनसनीखेज वीडियो को आगे बढ़ाने से पहले उसके स्रोत की जांच करें। अगर वीडियो किसी आधिकारिक खाते, समाचार एजेंसी या मूल प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं आया है, तो उस पर तुरंत भरोसा न करें। आधिकारिक खातों पर जारी बयान और मूल वीडियो की तुलना करना सबसे सुरक्षित तरीका है।

दूसरा संकेत आवाज और होठों की हरकत का मेल न खाना है। एआई से बने वीडियो में कई बार आवाज थोड़ी कृत्रिम लगती है, चेहरे के हाव-भाव अचानक बदलते हैं या पृष्ठभूमि की आवाज गायब होती है। तीसरा संकेत कैप्शन की भाषा है — अगर कैप्शन में बहुत बड़े दावे किए गए हों, लेकिन वीडियो में उसका कोई ठोस सबूत न दिख रहा हो, तो सावधान हो जाना चाहिए।

चौथा तरीका रिवर्स इमेज खोज का है, जिसमें वीडियो के किसी फ्रेम की तस्वीर खोजकर यह पता लगाया जा सकता है कि वह फुटेज असल में कहां का है। पांचवां और सबसे जरूरी नियम यह है कि संदेह होने पर वीडियो को आगे न बढ़ाएं। एक बार फैला हुआ झूठ वापस लेना मुश्किल होता है, लेकिन उसे न फैलाना पूरी तरह हमारे हाथ में होता है।

आगे क्या होगा

विदेश मंत्रालय और सरकारी सूचना ब्यूरो की चेतावनी के बाद अब यह उम्मीद की जा रही है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस फर्जी सामग्री के प्रसार पर नजर रखी जाएगी और उपयोगकर्ता भी इसे साझा करने से पहले सोचेंगे। हालांकि, यह भी सच है कि एक वीडियो के हटने से गलत सूचना की समस्या खत्म नहीं हो जाती। तकनीक के बेहतर होने के साथ-साथ फर्जी वीडियो भी ज्यादा भरोसेमंद दिखने लगे हैं, इसलिए तथ्य-जांच की भूमिका और बढ़ गई है।

आने वाले दिनों में इस बात पर भी नजर रहेगी कि क्या इस तरह की सामग्री फैलाने वाले खातों पर कोई कार्रवाई होती है। सोशल मीडिया पर कुछ उपयोगकर्ताओं ने ऐसे खातों पर कार्रवाई की मांग भी उठाई है, लेकिन इस बारे में अभी कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। इसलिए इस खबर में किसी कार्रवाई का दावा नहीं किया जा रहा है — केवल यह दर्ज किया जा रहा है कि आधिकारिक चेतावनी जारी हो चुकी है और फर्जी दावा गलत साबित हो चुका है।

पाठकों के लिए इस खबर का संदेश साफ है — खबर चाहे कितनी भी सनसनीखेज क्यों न लगे, उसे सच मानने से पहले उसकी जांच करें। आधिकारिक बयान, मूल वीडियो और स्वतंत्र तथ्य-जांच ही वह पैमाना है, जिससे सच और झूठ के बीच फर्क किया जा सकता है।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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