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NDTV समिट में जयशंकर का बड़ा बयान: ट्रंप की रूस-तेल डील पर बोले — “अमेरिका अपने हितों की रक्षा कर रहा”; ट्रेड डील पर कहा — “इट्स नेवर डन टिल इट्स डन”

सांकेतिक तस्वीर: नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और अमेरिका के झंडे

दिल्ली ब्यूरो

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने NDTV वर्ल्ड समिट 2026 में भारत-अमेरिका संबंधों के सबसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। नई दिल्ली में आयोजित इस समिट के एक सत्र में उन्होंने भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर कहा कि समझौता अपने अंतिम चरण में जरूर है, लेकिन “इट्स नेवर डन टिल इट्स डन” — यानी जब तक काम पूरा नहीं हो जाता, तब तक उसे पूरा नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रूस के साथ तेल डील पर भी टिप्पणी की और कहा कि अमेरिका अपने हितों की रक्षा कर रहा है।

ट्रेड डील पर जयशंकर का रुख: “अंतिम चरण में, लेकिन पूरी नहीं”

जयशंकर से जब अमेरिका के साथ चल रही ट्रेड डील के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि इस दिशा में लगातार प्रगति हो रही है। उन्होंने बताया कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल भी यही कह चुके हैं कि समझौता अपने अंतिम चरणों में पहुंच चुका है। लेकिन विदेश मंत्री ने सावधानी बरतते हुए कहा, “अक्सर आखिरी चरणों में अपनी चुनौतियां होती हैं। मुझे लगता है कि हमारी टीमें इन चुनौतियों को सुलझाने पर काम कर रही हैं।”

जब उनसे पूछा गया कि ये चुनौतियां आखिर हैं क्या, तो जयशंकर ने साफ कहा कि वे इसका खुलासा नहीं करेंगे। “अगर आप मुझसे पूछें कि वे चुनौतियां वास्तव में क्या हैं, तो माफ कीजिए, मैं आपको नहीं बता सकता। यह बातचीत करने वालों का काम है कि वे इन्हें सुलझाएं,” विदेश मंत्री ने कहा।

गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी कह चुके हैं कि भारत के साथ “बिल्कुल अलग तरह की” ट्रेड डील “काफी नजदीक” है। ऐसे में जयशंकर का यह बयान इस बात का संकेत है कि दोनों देश समझौते के करीब तो हैं, लेकिन अंतिम हस्ताक्षर से पहले कई तकनीकी और नीतिगत मुद्दों पर सहमति बाकी है।

ट्रंप की रूस-तेल डील पर विदेश मंत्री का तर्क

रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर जयशंकर ने अमेरिका के रुख पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने हितों की रक्षा कर रहा है — ट्रंप प्रशासन की रूस के साथ तेल डील इसी का उदाहरण है। विदेश मंत्री का तर्क था कि जब अमेरिका अपने उपभोक्ताओं के हित में रूस से आपूर्ति की ओर रुख कर सकता है, तो भारत के ऊर्जा फैसलों पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

भारत लंबे समय से कहता रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद उसके राष्ट्रीय हितों से तय होती है और रूस से तेल खरीदना इसी नीति का हिस्सा है। जयशंकर के इस बयान को इसी स्थापित रुख की पुनः पुष्टि के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि आज की अस्थिर दुनिया में कोई भी देश व्यापार, ऊर्जा और भू-राजनीति में स्थिरता को हल्के में नहीं ले सकता। सरकारों और कारोबारियों को इस अस्थिरता को अपनी योजनाओं में शामिल करना होगा और एक ही स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता से बचना होगा।

राहुल गांधी के ‘मुंबई’ वाले सवाल पर इंदिरा गांधी का उदाहरण

सत्र के दौरान जयशंकर से कांग्रेस नेता राहुल गांधी की उस आपत्ति के बारे में भी पूछा गया, जिसमें उन्होंने विदेश मंत्री की अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से मुंबई में हुई मुलाकात पर सवाल उठाए थे। राहुल गांधी ने इस मुलाकात को लेकर तंज कसा था।

इस पर जयशंकर ने पलटवार करते हुए कहा, “मुझे समझ नहीं आता कि उन्हें मुंबई से क्या दिक्कत है। मुझे लगता है कि यह एक शानदार शहर है। यह हमारी आर्थिक राजधानी है, बॉलीवुड का केंद्र है। यहां बहुत कुछ है।”

विदेश मंत्री ने आगे कहा, “मुझे नहीं पता कि उन्हें ऐसी आपत्तियां क्यों हैं। अगर दिल्ली से बाहर जाकर किसी विदेशी नेता या समकक्ष से मिलना ‘बुलाया जाना’ है, तो मेरे पास इसके कई उदाहरण हैं। मिसेज गांधी शिमला गई थीं भुट्टो से मिलने, क्या वह शिखर वार्ता थी? सलमान खुर्शीद जयपुर गए थे एक पाकिस्तानी मंत्री से मिलने। देखिए, हम सभी समझदार लोग हैं। समझदारी से बात करते हैं।”

उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी की आपत्ति के बाद इस मुद्दे पर कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई और आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। जयशंकर के जवाब को सरकार की ओर से इस विवाद पर अंतिम टिप्पणी के तौर पर देखा जा रहा है।

मुंबई में रुबियो से मुलाकात की पृष्ठभूमि

जयशंकर ने इसी सप्ताह मुंबई में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मेजबानी की थी। यह पांच महीने से भी कम समय में रुबियो की दूसरी भारत यात्रा थी। इस मुलाकात में रक्षा, ऊर्जा, उभरती प्रौद्योगिकियों और व्यापार समेत कई क्षेत्रों में सहयोग गहरा करने पर व्यापक चर्चा हुई थी।

रुबियो ने इस मुलाकात को “सार्थक चर्चा” बताया था और कहा था कि दोनों देश अपनी “अभूतपूर्व गति” वाली द्विपक्षीय साझेदारी को आगे बढ़ा रहे हैं। बैठक में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी मौजूद थे।

टैरिफ से H-1B तक: संबंधों में तनाव के मुद्दे

भारत-अमेरिका संबंधों में पिछले कुछ समय से कई मुद्दों पर तनाव देखा गया है। अमेरिका ने पिछले साल भारत पर दंडात्मक टैरिफ लगाए थे। इसके अलावा राष्ट्रपति ट्रंप ने मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य टकराव को कम करने में अपनी भूमिका के दावे किए थे, जिस पर भारतीय अधिकारियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी।

अमेरिका की नई आव्रजन नीति और H-1B वीजा शुल्क में बढ़ोतरी ने भी दोनों देशों के संबंधों में खटास पैदा की है। इसके बाद अमेरिका ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और विप्रो समेत प्रमुख वैश्विक और भारतीय आईटी कंपनियों के लिए एक प्रमुख ग्रीन कार्ड प्रसंस्करण कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया, जिससे तनाव और बढ़ा।

इन्हीं पृष्ठभूमियों के बीच रुबियो की भारत यात्रा और अब जयशंकर के बयान को संबंधों को पटरी पर लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

रुबियो ने क्या कहा: रूस के तेल पर भारत की विविधीकरण नीति “समझदारी”

रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो ने भी नरम रुख दिखाया था। उन्होंने कहा था कि भारत ने बार-बार अपने ऊर्जा पोर्टफोलियो में विविधता लाने की इच्छा जताई है, जो एक समझदारी भरा कदम है। रुबियो ने कहा, “जाहिर है, यह एक दिन में नहीं हो सकता। मुझे लगता है कि उन्होंने इस दिशा में काफी प्रगति की है और हमें यह देखकर खुशी है। लेकिन अंत में यह सिर्फ रूसी तेल के बारे में नहीं है; यह उनकी विविधता लाने की इच्छा के बारे में है, और जाहिर है हम सोचते हैं कि हम उनकी कुछ ऊर्जा जरूरतों का स्रोत बन सकते हैं।”

रुबियो के इस बयान और जयशंकर के तर्क को एक साथ रखकर देखें, तो यह साफ है कि दोनों देश ऊर्जा के मुद्दे पर एक-दूसरे के रुख को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

आगे क्या: ट्रेड डील की राह में क्या बचा है

जयशंकर के बयान से यह साफ है कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील अपने अंतिम चरण में है, लेकिन अभी अंतिम मुहर नहीं लगी है। दोनों देशों की वार्ता टीमें बचे हुए मुद्दों को सुलझाने में जुटी हैं। विदेश मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में भारत अपनी व्यापार और ऊर्जा नीतियों में विविधता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है।

आने वाले हफ्तों में इस डील पर और घोषणाएं हो सकती हैं। लेकिन जयशंकर के शब्दों में — “इट्स नेवर डन टिल इट्स डन” — अंतिम घोषणा से पहले किसी भी नतीजे का दावा करना जल्दबाजी होगी।

डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध स्रोतों और सत्यापन के आधार पर तैयार की गई है। किसी तथ्य में त्रुटि होने पर सुधार प्रकाशित किया जाएगा।

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